01 July 2013

!!! पुराणों के अनुसार शिवजी की आराधना !!!


पुराणों के अनुसार शिवजी की आराधना से मनुष्य की सारी मनोकामना पूरी होती है। शिवलिंग पर मात्र जल चढ़ाने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। 12ज्योतिर्लिंगों का दर्शन करने वाला प्राणी सबसे खुशनसीब है।

शिवपुराण कथा में बारह ज्योतिर्लिंग के वर्णन की महिमा बताई गई है। इन सभी का दर्शन हर कोई नहीं कर सकता। सिर्फ किस्मत वाले लोग ही देश भर में स्थित इन ज्योतिर्लिंगों का दर्शन कर पाते हैं।


पौराणिक ग्रंथो के अनुसार भगवान शिव के उपासना स्थल, 12 ज्योतिर्लिंग निम्नलिखित है :

  1. श्री सोमनाथ काठियावाड़ (गुजरात) में विराजमान है। 
  2. श्रीशैल पर्वत आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। 
  3. श्री महाकालेश्वर मालवा क्षेत्र (मध्यप्रदेश) में क्षिप्रा नदी के तटपर उज्जैन नगर में विराजमान है। 
  4. मालवा क्षेत्र में ही ॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के तट पर है। उज्जैन के पास ॐकारेश्वर और अमलेश्वर के दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं। 
  5. आन्ध्र प्रदेश के हैदराबाद नगर के परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग है। 
  6. श्रीभीमशङ्कर का स्थान मुंबई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे सह्मपर्वत पर है 
  7. श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनद जिले में है।
  8. नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग बड़ौदा क्षेत्रांतर्गत है 
  9. काशी के श्रीविश्वनाथजी हैं। 
  10. श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में है. 
  11. श्री केदारनाथ हिमालय के केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं 
  12. श्रीघुश्मेश्वर को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान दौलताबाद स्टेशन से बारह मील दूर बेरूल गांव के पास है।


शिव के 12 ज्योतिर्लिंग

1. सोमनाथ


  - यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है।

2. श्री शैल मल्लिकार्जुन - 


तस्वीरों में करें 12 ज्योतिर्लिग के दर्शन

मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थातिप है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग।

3. महाकाल 



 उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था। 

4. ओंकारेश्वर



 ममलेश्वर मध्यप्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदाने देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया। 

5. नागेश्वर



गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग। 


6. बैजनाथ

 
बिहार के बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग। 


7. भीमशंकर

 
महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग। 


8. त्र्यंम्बकेश्वर


तस्वीरों में करें 12 ज्योतिर्लिग के दर्शन 

नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग। 


9. घुमेश्वर


महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गांव में स्थापित घुमेश्वर ज्योतिर्लिंग। 

10. केदारनाथ 

तस्वीरों में करें 12 ज्योतिर्लिग के दर्शन

हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है। 

11. विश्वनाथ



बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग।

12. रामेश्वरम्‌
त्रिचनापल्ली (मद्रास) 


तस्वीरों में करें 12 ज्योतिर्लिग के दर्शन

समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।






!!! भगवान महेश्वर त्रम्बक शिव !!!


हमारी भारतीय संस्कृति इतनी विशाल है कि उसका प्रत्येक कार्य चाहे उपवास हो, पूजन हो, ध्यान हो या सामाजिक कार्य हो, सदैव संस्कृति से जुड़ा रहता है। हमारे देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक देवताओं का पूजन होता रहा है किंतु शिव की व्यापकता ऐसी है कि वह हर जगह पूजे जाते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ, जो हर जिज्ञासा को शांत करने में समर्थ हैं, जो श्रुति स्मृति के दैदीप्यमान स्तंभ हैं, ऐसे वेदों के वाग्मय में जगह-जगह शिव को ईश्वर या रुद्र के नाम से संबोधित कर उनकी व्यापकता को दर्शाया गया है।


यजुर्वेद के एकादश अध्याय के 54वें मंत्र में कहा गया है कि रुद्रदेव ने भूलोक का सृजन किया और उसको महान तेजस्विता से युक्त सूर्यदेव ने प्रकाशित किया। उन रुद्रदेव की प्रचंड ज्योति ही अन्य देवों के अस्तित्व की परिचायक है। शिव ही सर्वप्रथम देव हैं, जिन्होंने पृथ्वी की संरचना की तथा अन्य सभी देवों को अपने तेज से तेजस्वी बनाया। यजुर्वेद के 19वें अध्याय में 66 मंत्र हैं, जिन्हें रुद्री का नाम या नमक चमक के मंत्रों की संज्ञा दी है। इसी से भगवान भूत भावन महाकाल की पूजा-अर्चन व अभिषेक आदि होता है। इसी अध्याय के चौथे मंत्र में भगवान शिव को पर्वतवासी कहा गया। उनसे संपूर्ण जगत के कल्याण की कामना की गई और अपने विचारों की पवित्रता तथा निर्मलता मांगी गई। आगे 19वें मंत्र में अपनी संतानों की तथा पशुधन की रक्षा चाही गई।

महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंश में महेश्वर त्रम्बक एवं न द्रपटा कहकर त्रिलोचन सदाशिव को ही महेश्वर कहा है। सभी प्रकार की याचनाएं उसी से की जाती हैं, जो उसको पूर्ण करने में समर्थ है और यही कारण है कि शिव औघरदानी के नाम से भी जाने जाते हैं।


वैदिक वांगमय में रुद्र का विशिष्ट स्थान है। शतपथ ब्रह्मण में रुद्र को अनेक जगह अग्नि के निकट ही माना गया है। कहते हैं कि ‘यो वैरुद्र: सो अग्नि’ रुद्र को पशुओं का पति भी कहा गया है। भगवान रुद्र को मरुत्तपिता कहा गया है। तैत्तरीय संहिता में शिव की व्यापकता बताई गई है। इसी कारण रुद्र एवं उनके गणों की यजुर्वेद में स्तुति की गई है।

शिव को पंचमुखी, दशभुजा युक्त माना है। शिव के पश्चिम मुख का पूजन पृथ्वी तत्व के रूप में किया जाता है। उनके उत्तर मुख का पूजन जल तत्व के रूप में, दक्षिण मुख का तेजस तत्व के रूप में तथा पूर्व मुख का वायु तत्व के रूप में किया जाता है। भगवान शिव के ऊध्र्वमुख का पूजन आकाश तत्व के रूप में किया जाता है। इन पांच तत्वों का निर्माण भगवान सदाशिव से ही हुआ है। इन्हीं पांच तत्वों से संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण हुआ है। तभी तो भवराज पुष्पदंत महिम्न में कहते हैं - हे सदाशिव! आपकी शक्ति से ही इस संपूर्ण संसार चर-अचर का निर्माण हुआ है।


आप ही रक्षक हैं। आपकी माया से ही इस ब्रम्हांड का लय होता है। हे शिव! सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण का समावेश भी आपसे ही होता है। श्लोक में आगे वे कहते हैं कि हे सदाशिव! आपके पास केवल एक बूढ़ा बेल, खाट की पाटी, कपाल, फरसा, सिंहचर्म, भस्म एवं सर्प है, किंतु सभी देवता आपकी कृपा से ही सिद्धियां, शक्तियां एवं ऐश्वर्य भोगते हैं। 29वें श्लोक में वे कहते हैं - शिव को ऋक, यजु, साम, ओंकार तीनों अवस्थाएं, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, स्वर्ग लोक, मृत्युलोक एवं पाताल लोक, ब्रह्मा, विष्णु आदि को धारण किए हुए दर्शाया है।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के दृष्टा हैं। निर्माण, रक्षण एवं संहरण कार्यो का कर्ता होने के कारण उन्हें ही ब्रम्हा, विष्णु एवं रुद्र कहा गया है। इदं व इत्थं से उनका वर्णन शब्द से परे है। शिव की महिमा वाणी का विषय नहीं है। मन का विषय भी नहीं है। वे तो सारे ब्रम्हांड में तद्रूप होकर विद्यमान होने से सदैव श्वास-प्रश्वास में अनुभूत होते रहते हैं। इसी कारण ईश्वर के स्वरूप को अनुभव एवं आनंद की संज्ञा दी गई है।


आगे भगवान सदाशिव को अनेक नामों से जानने का प्रयत्न किया गया है, जिसमें त्रिनेत्र, जटाधर, गंगाधर, महाकाल, काल, नक्षत्रसाधक, ज्योतिषमयाय, त्रिकालधृष, शत्रुहंता आदि अनेक नाम हैं। यहां महाकाल पर चर्चा करना आवश्यक होगा। काल का अर्थ है समय। ज्योतिषीय गणना में समय का बहुत महत्व है। उस समय की गणना किसे आधार मानकर की जाए, यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है। अवंतिका (उज्जैन) गौरवशालिनी है क्योंकि जब सूर्य की परम क्रांति 24 होती है, तब सूर्य ठीक अवंतिका के मस्तक पर होता है।


वर्ष में एक बार ही ऐसा होता है। यह स्थिति विश्व में और कहीं नहीं होती क्योंकि अवंतिका का ही अक्षांक्ष 24 है। यही संपूर्ण भूमंडल का मध्यवर्ती स्थान माना गया है। यह गौरव मात्र अवंतिका को ही प्राप्त है और इसी कारण यहां महाकाल स्थापित हुए हैं, जो स्वयंभू हैं। यहीं से भूमध्य रेखा को माना गया है। शिव को नक्षत्र साधक भी कहा गया है। जो यह स्पष्ट करता है कि शिव ज्योतिष शास्त्र के प्रणोता, गुरु, प्रसारक एवं उपदेशक शिव है।


भगवान सदाशिव का एक नाम शत्रुहंता भी है। हम इसका अर्थ लौकिक शत्रु का नाश करना समझते हैं, लेकिन इसका अर्थ है, अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना। अनेक कथाओं में हम देखते हैं कि जब ब्रrांड पर कोई भी विपत्ति आई, सभी देवता सदाशिव के पास गए। चाहे समुद्रमंथन से निकलने वाला जहर हो या त्रिपुरासुर का आतंक या आपतदैत्य का कोलाहल, इसी कारण तो भगवान शिव परिवार के सभी वाहन शत्रु भाव त्यागकर परस्पर मैत्री भाव से रहते हैं। शिवजी का वाहन नंदी (बैल), उमा (पार्वती) का वाहन सिंह, भगवान के गले का सर्प, कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणोश का चूहा सभी परस्पर प्रेम एवं सहयोग भाव से रहते हैं।

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है। ये तीन नेत्र सूर्य, चंद्र एवं वहनी है, जिनके नेत्र सूर्य एवं चंद्र हैं। शिव के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम है। अधिक न कहते हुए इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि शिव केवल नाम ही नहीं हैं अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल परिवर्तन, परिवर्धन आदि में भगवान सदाशिव के सर्वव्यापी स्वरूप के ही दर्शन होते हैं।


भगवान शिव के १०८ नाम


  • शिव - कल्याण स्वरूप
  • महेश्वर - माया के अधीश्वर
  • शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
  • पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
  • शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
  • वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  • विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
  • कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
  • नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
  • शंकर - सबका कल्याण करने वाले
  • शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
  • खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
  • विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
  • शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
  • अंबिकानाथ - भगवति के पति
  • श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
  • भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
  • भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
  • शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
  • त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
  • शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
  • शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
  • उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
  • कपाली - कपाल धारण करने वाले
  • कामारी - कामदेव के शत्रु
  • अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
  • गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
  • ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
  • कालकाल - काल के भी काल
  • कृपानिधि - करूणा की खान
  • भीम - भयंकर रूप वाले
  • परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
  • मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
  • जटाधर - जटा रखने वाले
  • कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
  • कवची - कवच धारण करने वाले
  • कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
  • त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
  • वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
  • वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
  • भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
  • सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
  • स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
  • त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
  • अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
  • सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
  • परमात्मा - सबका अपना आपा
  • सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
  • हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
  • यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
  • सोम - उमा के सहित रूप वाले
  • पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
  • सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
  • विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
  • वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
  • गणनाथ - गणों के स्वामी
  • प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
  • हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
  • दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
  • गिरीश - पहाड़ों के मालिक
  • गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
  • अनघ - पापरहित
  • भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
  • भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
  • गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  • गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
  • कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
  • पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
  • भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
  • प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
  • मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
  • सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
  • जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
  • जगद्गुरू - जगत् के गुरू
  • व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
  • महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
  • चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
  • रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
  • भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
  • स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  • अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
  • दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
  • अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
  • अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
  • सात्त्विक - सत्व गुण वाले
  • शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
  • शाश्वत - नित्य रहने वाले
  • खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  • अज - जन्म रहित
  • पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
  • मृड - सुखस्वरूप वाले
  • पशुपति - पशुओं के मालिक
  • देव - स्वयं प्रकाश रूप
  • महादेव - देवों के भी देव
  • अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
  • हरि - विष्णुस्वरूप
  • पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  • अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
  • दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
  • हर - पापों व तापों को हरने वाले
  • भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  • अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  • सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
  • सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
  • अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
  • अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
  • तारक - सबको तारने वाला
  • परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर


!!! भोले नाथ का विराट स्वरूप !!!



जगत पिता के नाम से हम भगवान शिव को पुकारते हैं। भगवान शिव को सर्वव्यापी व लोग कल्याण का प्रतीक माना जाता है जो पूर्ण ब्रह्म है। धर्मशास्त्रों के ज्ञाता ऐसा मानते हैं कि शिव शब्द की उत्पत्ति वंश कांतौ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- सबको चाहने वाला और जिसे सभी चाहते है। शिव शब्द का ध्यान मात्र ही सबको अखंड, आनंद, परम मंगल, परम कल्याण देता है।


शिव भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शन ज्ञान को संजीवनी प्रदान करने वाले हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में शिवलिंग की व साकार रूप में शिवमूर्ति की पूजा होती है। शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है। भारत में भगवान शिव के अनेक ज्योतिलिंग सोमनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, वैधनाथस नागेश्वर, रामेश्वर, घुवमेश्वर हैं। ये देश के विभिन्न हिस्सों उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में स्थित हैं, जो महादेव की व्यापकता को प्रकट करते हैं शिव को उदार ह्रदय अर्थात् भोले भंडारी कहा जाता है। कहते हैं ये थोङी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः इनके भक्तों की संख्या भारत ही नहीं विदेशों तक फैली है। यूनानी, रोमन, चीनी, जापानी संस्कृतियों में भी शिव की पूजा व शिवलिंगों के प्रमाण मिले हैं। भगवान शिव का महामृत्जुंजय मंत्र पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी को दीर्घायु, समृद्धि, शांति, सुख प्रदान करता रहा है और चिरकाल तक करता रहेगा। भगवान शिव की महिमा प्रत्येक भारतीय से जूङा है। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती है। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक मानव के लिए जरूरी है।
जटाएं- शिव को अंतरिक्ष का देवता कहते हैं, अतः आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, जटाएं वायुमंडल का प्रतीक हैं।



चंद्र- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है, उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। शिव का चंद्रमा उज्जवल है।

त्रिनेत्र- शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों का प्रतीक है।

सर्प का हार- सर्प जैसा क्रूर व हिसंक जीव महाकाल के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक वृत्ति का जीव है, जिसे शिव ने अपने अधीन कर रखा है।



त्रिशूल- शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशुल सृष्टि में मानव भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।


1. डमरू- शिव के एक हाथ में डमरू है जिसे वे तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्म रुप है।
मुंडमाला- शिव के गले में मुंडमाला है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।


2. छाल- शिव के शरीर पर व्याघ्र चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।


3. भस्म- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से करते हैं। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।
वृषभ- शिव का वाहन वृषभ है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ का अर्थ है, धर्म महादेव इस चार पैर वाले बैल की सवारी करते है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्ष उनके अधीन है। सार रूप में शिव का रूप विराट और अनंत है, शिव की महिमा अपरम्पार है। ओंकार में ही सारी सृष्टि समायी हुई है।



!!! शिव महिमा विस्तारपूर्वक !!!


हमारे हिंदू धर्म में त्रिदेवों अर्थात भगवान ब्रह्मा, विष्णु व शंकर का अपना एक विशिष्ट स्थान है और इसमें भी भगवान शंकर का चरित्र जहाँ अत्यधिक रोचक हैं वहीं यह पौराणिक कथाओं में अत्यधिक गूढ रहस्यों से भी भरा हुआ है ।

पौराणिक कथाओं में भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है क्योंकि उनका अपना चरित्र अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ है जैसे शिव का अर्थ है जो शुभकर व कल्याणकारी हो, जबकि शिवजी का अपना व्यक्तित्व इससे जरा भी मेल नहीं खाता, क्योंकि वे अपने शरीर में इत्र के स्थान पर चिता की राख मलते हैं तथा गले में फूल-मालाओं के स्थान पर विषैले सर्पों को धारण करते हैं । यही नहीं भगवान शिव को कुबेर का स्वामी माना जाता है जबकि वे स्वयं कैलाश पर्वत पर बिना किसी ठौर-ठिकानों के यूँ ही खुले आकाश के नीचे निवास करते हैं । कहने का तात्पर्य है कि भगवान शिव का स्वभाव शास्त्रों में वर्णित उनके गुणों से जरा भी मेल नहीं खाता और इतने अधिक विरोधाभासों में, किसी भी व्यक्ति की शिव के प्रति आस्था, उसके अपने विश्वास के आधार पर ही टिकी हुई है, इसलिए, सभी कथाओं में भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती को भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या के कठिन दौर से गुज़रना पडा था और चूँकि तपस्या के कठिन दौर की सफलता व्यक्ति की अपनी श्रद्धा पर निर्भर करती है और ऐसे समय भगवान शिव के प्रति माता पार्वती की श्रद्धा (चूँकि वे हिमालय पर्वत की बेटी हैं इसलिए) पर्वत की तरह अडिग व मज़बूत रहती है, इसलिए हमारी पौराणिक कथाओं में माता पार्वती को श्रद्धा का प्रतीक माना गया है ।

भगवान शिव के अपने दो पुत्र है, श्री कार्तिकेय व श्री गणेश । जहाँ कार्तिकेय का सीधा सा अर्थ यह है कि जो ‘तर्कय‘ हो अर्थात जो सभी प्रकार के तर्कों से मुक्त हो गया हो वहीं गणेश भगवान को माता पार्वती अपने मैल से उत्पन्न करती हैं किन्तु एक शिव भक्त के हाथों से उनका सिर, धड से अलग हो जाता हैं । संक्षेप में इसके द्वारा हमें यह बताने का प्रयास किया है कि अगर श्रद्धा अपने कुछ मैल रूपी अवगुणों को भी निकालती है तो उससे भी जगत में कुछ श्रेष्ठतम ही घटता है किन्तु इसके लिए श्रद्धा को विश्वास का सहयोग लेकर चलना चाहिए । इसके विपरीत आचरण करने पर इसके अमंगलमय होने की पूरी संभावना रहती है । कथा आगे कहती है कि इसके पश्चात भगवान शिव हाथी का सिर लगाकर श्री गणेशजी का उद्धार करते हैं अर्थात ऐसी अमंगलकारी स्थितियों में भी, हम विश्वास के सहयोग से इसे पुनर्व्यवस्थित कर, इसकी श्रेष्ठता को प्रमाणित कर सकते हैं और इसे शुभ सिद्ध कर सकते हैं ।
इस तरह पुराणों में वर्णित इस शिव-चरित्र के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि जिन व्यक्तियों के जीवन में मन अत्यधिक प्रबल हो उन्हें भगवान शिव की उपासना के द्वारा ही अपनी आध्यात्मिक सत्य की यात्रा आरम्भ करनी चाहिए क्योंकि इससे उनके मन में जहाँ विश्वास का भाव गहरे तौर पर अंकुरित होगा वहीं यह मज़बूत व अडिग श्रद्धा रूपी विशाल वट वृक्ष बनकर चहुं ओर अपनी शाखाएँ फैलाने लगेगा ।

इसी तरह और आगे की आध्यात्मिक यात्रा करने पर गणेश भगवान के आशीर्वाद से जहाँ उनकी सारी विघ्न बाधाएँ दूर होंगी वहीं इसके द्वारा उन्हें शुभ फलों की प्राप्ति भी होने लगेगी । जब भक्त इन सब बातों से उत्साहित होकर पूरी तन्मयता के साथ इसी रास्ते में थोडा और आगे निकलेगा तो वह स्वयं को सभी प्रकार के विधि-विधानों व तर्कों से मुक्त पाएगा तथा वह आध्यात्मिक सत्य व ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल होगा । यही शिव के अपने सम्पूर्ण जीवन का मर्म है जिसे कि शिव-चरित्र के माध्यम से हमें समझाने का प्रयास किया गया है ।

महा शिवरात्रि के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक पापी शिकारी अनजाने में ही बेलपत्रों के द्वारा भगवान शिव की उपासना करता है तथा हाथ में आए हुए शिकार को अभयदान देकर छोड देता है जिससे भगवान शिव प्रसन्न होकर उसे दर्शन देते हैं तथा उसका उद्धार करते हैं । इस कथा के द्वारा हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि अगर कोई अनजाने में ही अपने पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर की स्तुति करें तो भी उसके जीवन का उद्धार संभव है । यही वजह है कि कई वर्षों तक पाप व अपराध का जीवन ढोते वाल्मीकि ऋषि, मगध सम्राट अशोक आदि का जीवन भी अनजाने में ही उनके द्वारा किए गए ईश्वरीय स्तुति के परिणामस्वरुप, मात्र एक छोटी सी घटना को आधार बनाकर रूपान्तिरित हो उठा और भगवान के द्वारा इनका उद्धार हुआ ।
इसी प्रकार एक अन्य कथा में भगवान शिव अपना ध्यान भंग करने के जुर्म में कामदेव को पूर्णतः समाप्त करने के स्थान पर, उसकी देह को ही भस्म कर देते हैं क्योंकि ‘काम‘ का सम्बन्ध व्यक्ति की देह के साथ ही जुडा हुआ है । यही नहीं इस कथा के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि यदि व्यक्ति के अन्दर ईश्वर के प्रति विश्वास घनीभूत रूप में हो तो वह अपनी एक ही नज़र में ‘काम‘ जैसे विकारों को नष्ट कर सकता है । इसी तरह कथा आगे यह कहती है कि शिव के हाथों भस्म होने के पश्चात कामदेव का दोबारा जन्म कृष्ण-पुत्र श्री प्रद्युम्न के रूप में होता है । भगवान श्रीकृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार है जो कि हृदय के प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण भगवान इसी हृदय से निकले साक्षात प्रेम के ही रूप है । यहाँ यह समझने योग्य बात है कि प्रद्युम्न का जन्म ब्रज की गोपियों अथवा राधा के गर्भ से न होकर, कृष्ण की सामाजिक पत्नी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त रूक्मणि देवी के गर्भ से होता है अर्थात इस सम्पूर्ण कथा के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि यदि व्यक्ति के मन में काम का भाव यूँ ही उठे तब तो यह ग़लत है किन्तु यदि यह काम-भाव व्यक्ति के हृदय से निकले प्रेम रूप में हो तथा यह विवाह बंधन में बँधा हो, तब ही यह जगत के कल्याणकारी हित में पूर्णतः स्वीकार्य है ।






!!! महामृत्युञ्जय !!!


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ 

इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है.

इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं. इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है; शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र, और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या का एक घटक है. ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का ह्रदय कहा है. चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है.


महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ

  • त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
  • यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
  • सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
  • पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
  • वर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में)वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है, और स्वास्थ्य प्रदान करता है,एक अच्छा माली
  • उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)
  • इव= जैसे, इस तरह
  • बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द सेअधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
  • मृत्युर = मृत्यु से
  • मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
  • मा= न
  • अमृतात= अमरता, मोक्ष

मंत्र 

इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' माना जाता है। मंत्र इस प्रकार है -

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥




!!! रुद्राक्ष को धारण करने की सरल विधि !!!



रुद्राक्ष को धारण करने की सरल विधि यदि किसी कारणवश रुद्राक्ष के विशेषरुद्राक्ष मंत्रों से धारण न कर सके तो इस सरल विधि का प्रयोग करके धारणकर लें। रुद्राक्ष के मनकों को शुद्ध लाल धागे में माला तैयार करने के बादपंचामृत (गंगाजल मिश्रित रूप से) और पंचगव्य को मिलाकर स्नान करवानाचाहिए और प्रतिष्ठा के समय ॐ नमः शिवाय इस पंचाक्षर मंत्र को पढ़नाचाहिए। उसके पश्चात पुनः गंगाजल में शुद्ध करके निम्नलिखित मंत्र पढ़तेहुए चंदन, बिल्वपत्र, लालपुष्प, धूप, दीप द्वारा पूजन करके अभिमंत्रित करेॐ तत्पुरुषाय विदमहे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र: प्रचोदयात || इससेअभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए। शिवपूजन, मंत्र, जप, उपासना आरंभकरने से पूर्व ऊपर लिखी विधि के अनुसार रुद्राक्ष माला को धारण करने एवंएक अन्य रुद्राक्ष की माला का पूजन करके जप करना चाहिए। इसकेअतिरिक्त नीचे लिखी सावधानियों को भी ध्यान करना चाहिए।


1-जो रुद्राक्ष कीड़ो ने दूषित किया हो, जो टूटा-फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दानेन हो, जो वरणयुक्त हो तथा पूरा-पूरा गोल न हो, इन पांच प्रकार के रुद्राक्षों को धारण नहीं करना चाहिए।

2-जो रुद्राक्ष छिद्र करते हुए फट गये हो और जो शुद्ध रुद्राक्ष जैसे न हों] उन्हें धारण न करें।

3-धारण करने से पहले परीक्षण कर लें कि रुद्राक्ष असली है या नकली।नकली रुद्राक्ष पानी में तैरने लगेगा और असली रुद्राक्ष पानी में डूब जाएगा।

4-जो रुद्राक्ष गोल, चिकना, मोटा, कांटेदार हो, उसे ही खरीदना चाहिए।

5-एकमुखी रुद्राक्ष को किसी पीतल के बर्तन में रख दें। उसके ऊपर से 108 बिल्वपत्र लेकर चंदन से ओम नमः शिवाय मंत्र लिखकर सबसे नीचे रुद्राक्ष रखकर रात्रि में रख दें। प्रातः रुद्राक्ष बिल्वपत्र के ऊपर विराजित होगा तो वह शुद्ध रुद्राक्ष होगा।

6-एकमुखी रुद्राक्ष को ध्यानपूर्वक देखने पर त्रिशूल या नेत्र का निशान कहीं न कहीं अवश्य ही दिखाई देता है।

7-रुद्राक्ष के दानों को तेज धूप में छः घंटे तक रखने से अगर रुद्राक्ष चट कें (टूटे नहीं) तो असली माने जाते हैं।

8-रुद्राक्ष धारण करने पर मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहजन, लिसोडा और विड्वराह (ग्राम्यसूयकर) इन पदार्थो का परित्याग करना चाहिए।

9-जप आदि कार्यो में छोटा रुद्राक्ष ही विशेष फलदायक होता है और बड़ा रुद्राक्ष रोगों पर विशेष फलदायी माना जाता है ।

10-रुद्राक्ष शिवलिंग से अथवा शिव प्रतिमा से स्पर्श कराकर धारण करना चाहिए।

11-रुद्राक्ष धारण करने के उपरांत सुबह-सायं भगवान शंकर का पूजन और ओम नमः शिवाय मंत्र का जप अवश्य करना चाहिए।



!!! शिव जी के प्रकार !!!


औढरदानी शिव

भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा शांति के आगार हैं। वेद तथा आगमों में भगवान शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप बताया गया है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। उनका यह दिव्यज्ञान स्वतः सम्भूत है। 

ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया-शक्ति में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। फिर उनसे अधिक होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वे सबके मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियंता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे सभी पवित्रकारी पदार्थों को भी पवित्र करने वाले हैं, इसलिए वे समस्त कल्याण और मंगल के मूल कारण हैं।

भगवान शंकर दिग्वसन होते हुए भी भक्तों को अतुल ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, अनंत राशियों के अधिपति होने पर भी भस्म-विभूषण, श्मशानवासी होने पर भी त्रैलोक्याधिपति, योगिराज होने पर भी अर्धनारीश्वर, पार्वतीजी के साथ रहने पर भी कामजित तथा सबके कारण होते हुए भी अकारण हैं। आशुतोष और औढरदानी होने के कारण वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के संपूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान-विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं। कृपालुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है।

संपूर्ण विश्व में शिवमंदिर, ज्योतिर्लिंग, स्वयम्भूलिंग से लेकर छोटे-छोटे चबूतरों पर शिवलिंग स्थापित करके भगवान शंकर की सर्वाधिक पूजा उनकी लोकप्रियता का अद्भुत उदाहरण है।

हरिहर रूप

एक बार सभी देवता मिलकर संपूर्ण जगत के अशांत होने का कारण जानने के लिए विष्णुजी के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर तो भोलेनाथ ही दे सकते हैं। अब सभी देवता विष्णुजी को लेकर शिवजी की खोजने मंदर पर्वत गए। वहाँ शंकरजी के होते हुए भी देवताओं को उनके दर्शन नहीं हो रहे थे।

पार्वतीजी का गर्भ नष्ट करने पर देवताओं को महापाप लगा था और इस कारण ही ऐसा हो रहा था। तब विष्णुजी ने कहा कि सारे देवता शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तत्पकृच्छ्र व्रत करें। इसकी विधि भी विष्णुजी ने बताई। सारे देवताओं ने ऐसा ही किया। फलस्वरूप सारे देवता पापमुक्त हो गए। पुनः देवताओं को शंकरजी के दर्शन करने की इच्छा जागी। देवताओं की इच्छा जान प्रभु विष्णु ने उन्हें अपने हृदयकमल में विश्राम करने वाले भगवान शंकर के लिंग के दर्शन करा दिए।

अब सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्वगुणी विष्णु और तमोगुणी शंकर के मध्य यह एकता किस प्रकार हुई। देवताओं का विचार जान विष्णुजी ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया। देवताओं ने एक ही शरीर में भगवान विष्णु और भोलेनाथ शंकर अर्थात हरि और हर का एकसाथ दर्शन कर उनकी स्तुति की।

पंचमुखी शिव




मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभि- स्त्र्यक्षैरंजितमीशमिंदुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम्‌ ।
शूलं टंककृपाणवज्रदहनान्नागेन्द्रघंटांकुशान्‌ पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत्‌॥

'जिन भगवान शंकर के ऊपर की ओर गजमुक्ता के समान किंचित श्वेत-पीत वर्ण, पूर्व की ओर सुवर्ण के समान पीतवर्ण, दक्षिण की ओर सजल मेघ के समान सघन नीलवर्ण, पश्चिम की ओर स्फटिक के समान शुभ्र उज्ज्वल वर्ण तथा उत्तर की ओर जपापुष्प या प्रवाल के समान रक्तवर्ण के पाँच मुख हैं।

जिनके शरीर की प्रभा करोड़ों पूर्ण चंद्रमाओं के समान है और जिनके दस हाथों में क्रमशः त्रिशूल, टंक (छेनी), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घंटा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा हैं। ऐसे भव्य, उज्ज्वल भगवान शिव का मैं ध्यान करता हूँ।'


महामृत्युंजय


हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहंतं परम्‌ ।
अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥

भगवान मृत्युंजय अपने ऊपर के दो हाथों में स्थित दो कलशों से सिर को अमृत जल से सींच रहे हैं। अपने दो हाथों में क्रमशः मृगमुद्रा और रुद्राक्ष की माला धारण किए हैं। दो हाथों में अमृत-कलश लिए हैं। दो अन्य हाथों से अमृत कलश को ढँके हैं।


इस प्रकार आठ हाथों से युक्त, कैलास पर्वत पर स्थित, स्वच्छ कमल पर विराजमान, ललाट पर बालचंद्र का मुकुट धारण किए त्रिनेत्र, मृत्युंजय महादेव का मैं ध्यान करता हूँ।


!!! गंगा की कहानी !!!!


राजा भगीरथ ने जनकल्याण के लिए पतितपावन गंगाजी को पृथ्वी पर लाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने राजा भगीरथ को यह वचन दिया कि सर्वकल्याणकारी गंगा पृथ्वी पर आएगी। मगर समस्या यह थी कि गंगाजी को पृथ्वी पर संभालेगा कौन?


समस्या का समाधान करते हुए ब्रह्माजी ने कहा कि गंगाजी को धारण करने की शक्ति भगवान शंकर के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है अतः तुम्हें भगवान रुद्र की तपस्या करना चाहिए। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए। ब्रह्माजी के वचन सुनकर भगीरथ ने प्रभु भोलेनाथ की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ से कहा- 'नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। मैं गिरिराजकुमारी गंगा को अपने मस्तक पर धारण करके संपूर्ण प्राणियों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करूँगा।'

भगवान शंकर की स्वीकृति मिल जाने के बाद हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी बड़े ही प्रबल वेग से आकाश से भगवान शंकर के मस्तक पर गिरीं। उस समय गंगाजी के मन में भगवान शंकर को पराजित करने की प्रबल इच्छा थी। गंगाजी का विचार था कि मैं अपने प्रबल वेग से भगवान शंकर को लेकर पाताल में चली जाऊँगी।

गंगाजी के इस अहंकार को जान शिवजी कुपित हो उठे और उन्होंने गंगाजी को अदृश्य करने का विचार किया। पुण्यशीला गंगा जब भगवान रुद्र के मस्तक पर गिरीं, तब वे उनकी जटाओं के जाल में बुरी तरह उलझ गईं। लाख प्रयत्न करने पर भी वे बाहर न निकल सकीं। जब भगीरथ ने देखा कि गंगाजी भगवान शिव के जटामंडल में अदृश्य हो गईं, तब उन्होंने पुनः भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करना प्रारंभ कर दिया। उनके तप से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने गंगाजी को लेकर बिंदु सरोवर में छोड़ा। वहाँ से गंगाजी सात धाराएँ हो गईं।
इस प्रकार ह्लादिनी, पावनी और नलिनी नामक की धाराएँ पूर्व दिशा की ओर तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु- ये तीन धाराएँ पश्चिम की ओर चली गईं। सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चली और पृथ्वी पर आई। इस प्रकार भगवान शंकर की कृपा से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और भगीरथ के पितरों के उद्धार के साथ पतितपावनी गंगा संसारवासियों को प्राप्त हुईं।


!!! शिव की आराधना का विशेष महत्व है। !!!


शिव की आराधना का विशेष महत्व है। यह महत्व अनायास नहीं है। केवल कर्मकांड भी नहीं है। इनके राज गहरे हैं। केवल कर्मकाण्ड मानकर पूजा-पाठ करने से बात नहीं बनेगी।

शिव पूरक हैं। शिवत्व पूर्णता है। इनके व्यावहारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के जीवन में खास महत्व हैं। शिव के प्रचलित स्वरूप को ही देखें तो उनके हर अंग, आभूषण और मुद्रा का महत्व है। जैसे - जैसे आप इसे समझते हैं आप शिवमय होते जाते हैं। शिवत्व आपमें उतरता जाता है और आप सरस हो जाते हैं। केवल शिव ही हैं जिनकी आराधना के साथ अमर होने का वरदान जुड़ा हुआ है। वैसे तो शिव इतने व्यापक हैं कि उनके लेशमात्र का वर्णन करने की योग्यता मुझमें नहीं है, लेकिन उन्हीं की इच्छा से कोशिश करते हैं।


शिव की वेश-भूषा को देखिए। सर पर गंगा और चंद्रमा, माथे पर तीसरी खुली हुई आंख, कंठ और हाथों में सर्प, कंधे पर जनेउ, कमर में वाघम्बर, बाघम्बर का आसन, पद्मासन में भैरवी मुद्रा, त्रिशूल और डमरू। साथ में माता पार्वती और उनका वाहन नंदी। यह शिव की वाह्य छवि है जिसे हम देखते हैं। अगर हमें शिव को निरूपित करना हो तो हम कुछ ऐसी ही छवि बनाएंगे। सर के जिस स्थान पर गंगा को दर्शाया जाता है भारतीय शरीर शास्त्र (तंत्र) में उसे सहस्रार चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। जब बच्चा पैदा होता है तो सिर के मध्य भाग में एक स्थान बहुत कोमल होता है। बहुत दिनों तक उस स्थान पर होने वाले स्पंदन को प्रकट रूप में देखा जा सकता है। जैसे जैसे हमारी कोमलता नष्ट होने लगती है धीरे-धीरे वह स्थान भी कठोर हो जाता है। 

वह स्थान तंत्र में सहस्रार के रूप में परिभाषित है। सहस्रार का सामान्य अर्थ समझना हो तो उसे सहस्रदल कमल कह लें। वह अमरता का स्रोत है। सिर के उस हिस्से की बनावट ऐसी है जैसी कमल की पंखुड़ियां। कमल कहां पैदा होता है? पानी में। जल का पवित्रतम रूप हैं गंगा। और गंगा का उद्गम क्षेत्र है शिव की जटा। इसका मतलब यह हुआ कि गंगा को वहां स्थापित करने के पीछे कारण हैं। हम प्रतीक रूप में गंगा को देखकर यह समझ लें कि वह स्थान अमरता का केन्द्र है। उस केन्द्र तक पहुंचना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए शिव ही साधना की अनेक विधियां बताते हैं जो विभिन्न शास्त्रों में वर्णित हैं। सामान्य जीवन में गंगा का क्या महत्व है यह बताने की आवश्यकता नहीं है।


उससे थोड़ा नीचे चंद्रमा स्थापित हैं। शिव के शरीर में जिस स्थान पर चंद्रमा का दर्शन होता है तंत्र में उस स्थान को बिन्दु विसर्ग कहते हैं। भौतिक शरीर में यह स्थान बुद्धि का केन्द्र है। चंद्रमा का स्वभाव शीतल है। बुद्धि शीतल हो। शांत हो। चंद्रमा इसी बात का संकेत हैं।


कंठ और भुजाओं पर सर्प की माला। संभवत: शिव की भारतीय मानस में स्थापना का ही परिणाम है कि सांप का सामान्य जीवन में बड़ा आदर है। सांपों का इतना आदर दुनिया के शायद ही किसी देश में हो। सांप पर्यावास के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण जीव होता है। संभवत: सांप ही एकमात्र ऐसा जीव होता है जो अपनी पूरा कायाकल्प कर लेता है। कंठ में जो चक्र स्थापित है उसका नाम है विशुद्धि। विशुद्धि चक्र शरीर में कई तरह के रसों का उत्पादन करता है जो पाचक रसों के रूप में जाने जाते हैं। 


अगर इन पाचक रसों में व्यवधान आ जाए तो व्यक्ति में कई तरह के रोग घर कर जाते हैं। तंत्र के साधक ऐसा कहते हैं कि विशुद्धि चक्र जागृत हो जाता है तो व्यक्ति में विष को पचा लेने की क्षमता अपने-आप आ जाती है। वह रसों का स्वामी हो जाता है। सांप को प्रतीक रूप में चुनने का एक और अर्थ है। शरीर के सबसे निचले हिस्से में कुंडलिनी शक्ति का स्थान होता है। उस स्थान को मूलाधार चक्र कहते हैं। मूलाधार चक्र जागृत होने पर वह शक्ति उर्ध्वगामी होती है और शरीर के सारे चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में जाकर विस्फोट करती है। इस सुसुप्त शक्ति का जो आकार है वह कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प जैसी है। इड़ा और पिंगड़ा नाड़ियां सुषुम्ना को लपेटे हुए उपर की तरफ चलती हैं। इसलिए सांप को शिव के गले में प्रतीक रूप में रखने के पीछे यह महत्वपूर्ण कारण है।

इसी तरह शिव के माथे पर एक अधखुली आंख के दर्शन होते हैं। उसे त्रिनेत्र कहते हैं। शिव का यह त्रिनेत्र तंत्र में आज्ञा चक्र के रूप में परिभाषित है। आज्ञा चक्र सभी चक्रों का नियंत्रण करता है। उच्चतर साधनाओं के लिए त्रिनेत्र का खुलना जरूरी है। क्योंकि साधना के दौरान यह शरीर एक अनंत उर्जा का स्रोत बनता चला जाता है। इस उर्जा का समायोजन त्रिनेत्र के खुलने पर ही हो सकता है। अन्यथा कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति साधना के दौरान अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। 

त्रिनेत्र अथवा आज्ञा चक्र के खुलने पर हम एक नये ब्रह्माण्ड में पहुंच जाते हैं। इन दो आंखों से हम जो जगत देख पाते हैं त्रिनेत्र उसके परे के जगत से हमारा साक्षात्कार करवाता है। शिव के भाल पर त्रिनेत्र दर्शाने का संभवत: यही अर्थ है। क्योंकि जिन्हें तंत्र में चक्रों के रूप में परिभाषित किया गया है उनका कोई आकार तो है नहीं। वह उर्जा केन्द्र है। शिव में उन उर्जा केन्द्रों को उनके व्यवहार के अनुकूल दर्शाया गया है। आज्ञा चक्र का जो व्यवहार है उसको त्रिनेत्र के रूप इसीलिए दिखाया गया है।

!!! भगवान् शिव के द्वारा सृष्टि !!!



जिस समय सर्वत्र केवल अन्धकार-ही-अन्धकार था; न सूर्य दिखायी देते थे न चन्द्रमा, अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों का भी कहीं पता नहीं था; न दिन होता था न रात। अग्नि, पृथ्वी, जल और वायुकी भी सत्ता नहीं थी—उस समय एक मात्र सत् ब्रह्म अर्थात् सदाशिव की ही सत्ता विद्यमान थी, जो अनादि और चिन्मय कही जाती है। उन्हीं भगवान् सदाशिव को वेद, पुराण और उपनिषद् तथा संत-महात्म आदि ईश्वर तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं।

एक बार भगवान् शिव के मन में सृष्टि रचने की इच्छा हुई। उन्होंने सोचा कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ। यह विचार आते ही सबसे पहले परमेश्वर शिवने अपनी परा शक्ति अम्बिकाको प्रकट किया तथा उनसे कहा कि हमें सृष्टि के लिये किसी दूसरे पुरुष का सृजन करना चाहिये, जिसके कंधेपर सृष्टि-संचालन का महान् भार रखकर हम आनन्दपूर्वक विचरण कर सकें। ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित परमेश्वर शिव ने अपने वाम अंग के दसवें भागपर अमृत मल दिया। वहाँ से तत्काल एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उसका सौन्दर्य अतुलनीय था। उसमें सत्वगुणकी प्रधानता थी। वह परम शान्त तथा अथाह सागर की तरह गम्भीर था। रेशमी पीताम्बर से उसके अंग की शोभा द्विगुणित हो रही थी। उसके चार हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो रहे थे।


उस दिव्य पुरुष ने भगवान् को प्रणाम करके कहा कि ‘भगवन् ! मेरा नाम निश्चित कीजिये और काम बताइये।’ उसकी बात सुनकर भगवान् शंकरने मुस्कराकर कहा—‘वत्स ! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम विष्णु होगा। सृष्टि का पालन करना तुम्हारा कार्य होगा। इस समय तुम उत्तम तप करो।’

भगवान् शिव का आदेश प्राप्तकर श्रीविष्णु कठोर तपस्या करने लगे। उस तपस्या के श्रम से उनके अंगों से जल-धाराएं निकलने लगीं, जिससे सूना आकाश भर गया। अंततः उन्होंने थककर उसी जलमें शयन किया। जल अर्थात् ‘नार’ में शयन करने के कारण ही श्रीविष्णु का एक नाम ‘नारायण’ हुआ।



तदनन्तर सोये हुए नारायण की नाभि से एक उत्तम कमल प्रकट हुआ। उसी समय भगवान् शिव ने अपने दाहिने अंग से चतुर्मुख ब्रह्मा को प्रकट करके उस कमल पर डाल दिया। महेश्वर की माया से मोहित हो जाने के कारण बहुत दिनों तक ब्रह्माजी उस कमलके नाल में भ्रमण करते रहे, किंतु उन्हें अपने उत्पत्तिका का पता नहीं लगा। आकाशवाणी द्वारा तपका आदेश मिलने पर ब्रह्माजी ने अपने जन्मदाता के दर्शनार्थ बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। तत्पश्चात् उनके सम्मुख भगवान् विष्णु प्रकट हुए। परमेश्वर शिवकी लीला से उस समय वहाँ विष्णु और ब्रह्माजी के बीच विवाद छिड़ गया। सहसा उन दोनों के मध्य एक दिव्य अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ। बहुत प्रयास के बाद भी ब्रह्मा और विष्णु उस अग्निस्तम्भ के आदि-अन्त का पता नहीं लगा सके। अंततः थककर भगवान् विष्णु ने प्रार्थना किया कि ‘महाप्रभो ! हम आपके स्वरूप को नहीं जानते। आप जो कोई भी हों, हमें दर्शन दीजिये।’



भगवान् विष्णु की स्तुति सुनकर महेश्वर सहसा प्रकट हो गये और बोले —‘सुरश्रेष्ठगण मैं तुम दोनों के तप और भक्ति से संतुष्ट हूँ। ब्रह्मन् ! तुम मेरी आज्ञा से जगत की सृष्टि करो और वत्स विष्णु ! तू इस चराचर जगत का पालन करो,। तदनन्तर परमेश्वर शिवने अपने हृदयभाग से रुद्र को प्रकट किया और उन्हें संहार का दायित्व सौंपकर वहीं अंतर्धान हो गये।


अर्धनारीश्वर शिव



सृष्टि के प्रारम्भ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गयी मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई—‘ब्रह्मन् ! अब मैथुनी सृष्टि करो।’


आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिये कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदयमें प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान् उमा –महेश्वर नमे उन्हें अर्धनारीश्वर-रूप में दर्शन दिया। देवादिदेव भगवान् शिव के दिव्य स्वरूप को देखकर ब्रह्माजी अभिभूत हो उठे और उन्होंने दण्डकी भाँति भूमि पर लेटकर उस अलौकिक विग्रह को प्रणाम किया।




महेश्वर शिवने कहा—‘पुत्र ब्रह्मा ! मुझे तुम्हारा मनोरथ ज्ञात हो गया है। तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है; उससे मैं परम प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।’ ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमादेवी को अलग कर दिया। तदनन्तर परमेश्वर शिव के अर्धांग से अलग हुई उन पराशक्ति को साष्टांग प्रणाम करके ब्रह्माजी इस प्रकार कहने लगे—


‘शिवे ! सृष्टि के प्रारम्भ में आपके पति देवाधिदेव ने शम्भुने मेरी रचना की थी। भगवति ! उन्हीं के आदेश से मैने देवता आदि समस्त प्रजाओं का मानसिक सृष्टि की। परंतु अनेक प्रयासों के बाद भी उनकी वृद्धि करने में मैं असफल रहा हूँ। अतः अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाको उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूँ, किंतु अभीतक नारी-कुलका प्राकट्य नहीं हुआ है और नारी-कुलकी सृष्टि करना मेरी शक्ति से बाहर है। देवि ! आप सम्पूर्ण सृष्टि शक्तियों की उद्गमस्थली हैं। इसलिये हे मातेश्वरी, आप मुझे नारी-कुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान करें। मैं आपसे एक और विनती करता हूँ कि चराचर जगत् की वृद्धि के लिये आप मेरे पुत्र दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लेने की कृपा करें।’


ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर शिवाने ‘तथास्तु’—ऐसा ही होगा—कहा और ब्रह्माको उन्होंने नारी कुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान की। इसके लिए उन्होंने अपनी भौहों के मध्यभाग से अपने ही समान कान्तमती एक शक्ति प्रकट की। उसे देखकर देवदेवेश्वर शिवने हँसते हुए कहा—‘देवि ! ब्रह्माने तपस्या द्वारा तुम्हारी आराधना की है। अब तुम उनपर प्रसन्न हो जाओ और उनका मनोरथ पूर्ण करो।’ परमेश्वर शिवकी इस आज्ञा को शिरोधार्य करके वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गयी। इस प्रकार ब्रह्माजी को अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेवजी के शरीर में प्रविष्ट हो गयीं। फिर महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये तभी से इस लोक में मैथुनी सृष्टि चल पड़ी। सफल मनोरथ होकर ब्रह्माजी भी परमेश्वर शिव का स्मरण करते हुए निर्विघ्नरूपसे सृष्टि-विस्तार करने लगे।


इस प्रकार शिव और शक्ति एक-दूसरे से अभिन्न तथा सृष्टि के आदिकारण हैं। जैसे पुष्प में गन्ध, चन्द्रमें चन्द्रिका, सूर्य में प्रभा नित्य और स्वभाव-सिद्ध है, उसी प्रकार शिवमें शक्ति भी स्वभाव-सिद्ध है। शिव में इकार ही शक्ति है। शिव कूटस्थ तत्त्व है और शक्ति परिणामी तत्त्व। शिव अजन्मा आत्मा है और शक्ति जगत् में नाम-रूप के द्वारा व्यक्त सत्ता। यही अर्धनारीश्वर शिवका रहस्य है।



!!! रावण कृत शिव ताण्डव स्तोत्र !!!




जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलॆ
गलॆवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनॊतु नः शिवः शिवम् ॥ 1 ॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
-विलॊलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकॆ
किशॊरचन्द्रशॆखरॆ रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ 2 ॥

धराधरॆन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमॊदमानमानसॆ ।
कृपाकटाक्षधॊरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरॆ मनॊ विनॊदमॆतु वस्तुनि ॥ 3 ॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखॆ ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमॆदुरॆ
मनॊ विनॊदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ 4 ॥

सहस्रलॊचनप्रभृत्यशॆषलॆखशॆखर
प्रसूनधूलिधॊरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकॊरबन्धुशॆखरः ॥ 5 ॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
-निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलॆखया विराजमानशॆखरं
महाकपालिसम्पदॆशिरॊजटालमस्तु नः ॥ 6 ॥

करालफालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाधरीकृतप्रचण्डपञ्चसायकॆ ।
धराधरॆन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलॊचनॆ मतिर्मम ॥ 7 ॥

नवीनमॆघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनॊतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ 8 ॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
-विलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजॆ ॥ 9 ॥

अगर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजॆ ॥ 10 ॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
-द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालफालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥ 11 ॥

दृषद्विचित्रतल्पयॊर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजॊर्-
-गरिष्ठरत्नलॊष्ठयॊः सुहृद्विपक्षपक्षयॊः ।
तृष्णारविन्दचक्षुषॊः प्रजामहीमहॆन्द्रयॊः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजॆ ॥ 12 ॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकॊटरॆ वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलॊललॊचनॊ ललाटफाललग्नकः
शिवॆति मन्त्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम् ॥ 13 ॥

इमं हि नित्यमॆवमुक्तमुत्तमॊत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरॊ विशुद्धिमॆतिसन्ततम् ।
हरॆ गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमॊहनं हि दॆहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥ 14 ॥

पूजावसानसमयॆ दशवक्त्रगीतं यः
शम्भुपूजनपरं पठति प्रदॊषॆ ।
तस्य स्थिरां रथगजॆन्द्रतुरङ्गयुक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥ 15 ॥


॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

!!! गायत्री मंत्र के चमत्कार !!!




हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक गायत्री मंत्र द्वारा जगत की आत्मा माने गए साक्षात देवता सूर्य की उपासना निरोगी जीवन के साथ-साथ यश, प्रसिद्धि, धन व ऐश्वर्य देने वाली होती है। किंतु इसके लिए गायत्री मंत्र की साधना विधि विधान और मन, वचन, कर्म की पवित्रता के साथ जरूरी माना गया है।

वेदमाता मां गायत्री की उपासना 24 देवशक्तियों की भक्ति का फल व कृपा देने वाली भी मानी गई है। इससे सांसारिक जीवन में सुख, सफलता व शांति की चाहत पूरी होती है। खासतौर पर हर सुबह सूर्योदय या ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री मंत्र का जप ऐसी ही कामनाओं को पूरा करने में बहुत शुभ व असरदार माना गया है।
आप भी गायत्री मंत्र की शक्ति और शुभ प्रभाव से सफलता चाहते हैं तो बताई जा रही गायत्री मंत्र जप से जुड़ी जरूरी बातों का ध्यान जरूर रखें-


  • - गायत्री मंत्र जप किसी गुरु के मार्गदर्शन में करना चाहिए।
  • - गायत्री मंत्र जप के लिए सुबह का समय श्रेष्ठ होता है। किंतु यह शाम को भी किए जा सकते हैं।
  • - गायत्री मंत्र के लिए स्नान के साथ मन और आचरण पवित्र रखें। किंतु सेहत ठीक न होने या अन्य किसी वजह से स्नान करना संभव न हो तो किसी गीले वस्त्रों से तन पोंछ लें।
  • - साफ और सूती वस्त्र पहनें।
  • - कुश या चटाई का आसन बिछाएं। पशु की खाल का आसन निषेध है।
  • - तुलसी या चन्दन की माला का उपयोग करें।
  • - ब्रह्ममूहुर्त में यानी सुबह होने के लगभग 2 घंटे पहले पूर्व दिशा की ओर मुख करके गायत्री मंत्र जप करें। शाम के समय सूर्यास्त के घंटे भर के अंदर जप पूरे करें। शाम को पश्चिम दिशा में मुख रखें।
  • - इस मंत्र का मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है।
  • - शौच या किसी आकस्मिक काम के कारण जप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जप करें। बाकी मंत्र जप की संख्या को थोड़ी-थोड़ी पूरी करें। साथ ही एक से अधिक माला कर जप बाधा दोष का शमन करें।
  • - गायत्री मंत्र जप करने वाले का खान-पान शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। किंतु जिन लोगों का सात्विक खान-पान नहीं है, वह भी गायत्री मंत्र जप कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के असर से ऐसा व्यक्ति भी शुद्ध और सद्गुणी बन जाता है।

30 June 2013

!!! श्री अर्ध नारीस्वारा स्तोत्रम !!!



चाम्पॆयगौरार्धशरीरकायै
कर्पूरगौरार्धशरीरकाय ।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 1 ॥
कस्तूरिकाकुङ्कुमचर्चितायै
चितारजःपुञ्ज विचर्चिताय ।
कृतस्मरायै विकृतस्मराय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 2 ॥
झणत्क्वणत्कङ्कणनूपुरायै
पादाब्जराजत्फणिनूपुराय ।
हॆमाङ्गदायै भुजगाङ्गदाय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 3 ॥
विशालनीलॊत्पललॊचनायै
विकासिपङ्कॆरुहलॊचनाय ।
समॆक्षणायै विषमॆक्षणाय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 4 ॥
मन्दारमालाकलितालकायै
कपालमालाङ्कितकन्धराय ।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 5 ॥
अम्भॊधरश्यामलकुन्तलायै
तटित्प्रभाताम्रजटाधराय ।
निरीश्वरायै निखिलॆश्वराय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 6 ॥
प्रपञ्चसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै
समस्तसंहारकताण्डवाय ।
जगज्जनन्यै जगदॆकपित्रॆ
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 7 ॥
प्रदीप्तरत्नॊज्ज्वलकुण्डलायै
स्फुरन्महापन्नगभूषणाय ।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय
नमः शिवायै च नमः शिवाय ॥ 8 ॥
ऎतत्पठॆदष्टकमिष्टदं यॊ
भक्त्या स मान्यॊ भुवि दीर्घजीवी ।
प्राप्नॊति सौभाग्यमनन्तकालं
भूयात्सदा तस्य समस्तसिद्धिः ॥



!!! श्री शिव मंगला अष्टकम !!!


भवाय चन्द्रचूडाय निर्गुणाय गुणात्मनॆ ।
कालकालाय रुद्राय नीलग्रीवाय मङ्गलम् ॥ 1 ॥

वृषारूढाय भीमाय व्याघ्रचर्माम्बराय च ।
पशूनाम्पतयॆ तुभ्यं गौरीकान्ताय मङ्गलम् ॥ 2 ॥

भस्मॊद्धूलितदॆहाय नागयज्ञॊपवीतिनॆ ।
रुद्राक्षमालाभूषाय व्यॊमकॆशाय मङ्गलम् ॥ 3 ॥

सूर्यचन्द्राग्निनॆत्राय नमः कैलासवासिनॆ ।
सच्चिदानन्दरूपाय प्रमथॆशाय मङ्गलम् ॥ 4 ॥

मृत्युञ्जयाय साम्बाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणॆ ।
त्रयम्बकाय शान्ताय त्रिलॊकॆशाय मङ्गलम् ॥ 5 ॥

गङ्गाधराय सॊमाय नमॊ हरिहरात्मनॆ ।
उग्राय त्रिपुरघ्नाय वामदॆवाय मङ्गलम् ॥ 6 ॥

सद्यॊजाताय शर्वाय भव्य ज्ञानप्रदायिनॆ ।
ईशानाय नमस्तुभ्यं पञ्चवक्राय मङ्गलम् ॥ 7 ॥

सदाशिव स्वरूपाय नमस्तत्पुरुषाय च ।
अघॊराय च घॊराय महादॆवाय मङ्गलम् ॥ 8 ॥

महादॆवस्य दॆवस्य यः पठॆन्मङ्गलाष्टकम् ।
सर्वार्थ सिद्धि माप्नॊति स सायुज्यं ततः परम् ॥ 9 ॥


!!! शिवा कवचम !!!


अस्य श्री शिवकवच स्तॊत्र महामन्त्रस्य ऋषभयॊगीश्वर ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीसाम्बसदाशिवॊ दॆवता ।
ॐ बीजम् ।
नमः शक्तिः ।
शिवायॆति कीलकम् ।
मम साम्बसदाशिवप्रीत्यर्थॆ जपॆ विनियॊगः ॥

करन्यासः

ॐ सदाशिवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । नं गङ्गाधराय तर्जनीभ्यां नमः । मं मृत्युञ्जयाय मध्यमाभ्यां नमः ।
शिं शूलपाणयॆ अनामिकाभ्यां नमः । वां पिनाकपाणयॆ कनिष्ठिकाभ्यां नमः । यम् उमापतयॆ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

हृदयादि अङ्गन्यासः

ॐ सदाशिवाय हृदयाय नमः । नं गङ्गाधराय शिरसॆ स्वाहा । मं मृत्युञ्जयाय शिखायै वषट् ।
शिं शूलपाणयॆ कवचाय हुम् । वां पिनाकपाणयॆ नॆत्रत्रयाय वौषट् । यम् उमापतयॆ अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरॊमिति दिग्बन्धः ॥

ध्यानम्

वज्रदंष्ट्रं त्रिनयनं कालकण्ठ मरिन्दमम् ।
सहस्रकरमत्युग्रं वन्दॆ शम्भुम् उमापतिम् ॥
रुद्राक्षकङ्कणलसत्करदण्डयुग्मः पालान्तरालसितभस्मधृतत्रिपुण्ड्रः ।
पञ्चाक्षरं परिपठन् वरमन्त्रराजं ध्यायन् सदा पशुपतिं शरणं व्रजॆथाः ॥
अतः परं सर्वपुराणगुह्यं निःशॆषपापौघहरं पवित्रम् ।
जयप्रदं सर्वविपत्प्रमॊचनं वक्ष्यामि शैवम् कवचं हिताय तॆ ॥

पञ्चपूजा

लं पृथिव्यात्मनॆ गन्धं समर्पयामि ।
हम् आकाशात्मनॆ पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मनॆ धूपम् आघ्रापयामि ।
रम् अग्न्यात्मनॆ दीपं दर्शयामि ।
वम् अमृतात्मनॆ अमृतं महानैवॆद्यं निवॆदयामि ।
सं सर्वात्मनॆ सर्वॊपचारपूजां समर्पयामि ॥

मन्त्रः
ऋषभ उवाच

नमस्कृत्य महादॆवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ।
वक्ष्यॆ शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥ 1 ॥
शुचौ दॆशॆ समासीनॊ यथावत्कल्पितासनः ।
जितॆन्द्रियॊ जितप्राणश्चिन्तयॆच्छिवमव्ययम् ॥ 2 ॥
हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं स्वतॆजसा व्याप्तनभॊ‌உवकाशम् ।
अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं ध्यायॆत् परानन्दमयं महॆशम् ॥
ध्यानावधूताखिलकर्मबन्ध- श्चिरं चिदानन्द निमग्नचॆताः ।
षडक्षरन्यास समाहितात्मा शैवॆन कुर्यात्कवचॆन रक्षाम् ॥
मां पातु दॆवॊ‌உखिलदॆवतात्मा संसारकूपॆ पतितं गभीरॆ ।
तन्नाम दिव्यं परमन्त्रमूलं धुनॊतु मॆ सर्वमघं हृदिस्थम् ॥
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्ति- र्ज्यॊतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा ।
अणॊरणियानुरुशक्तिरॆकः स ईश्वरः पातु भयादशॆषात् ॥
यॊ भूस्वरूपॆण बिभर्ति विश्वं पायात्स भूमॆर्गिरिशॊ‌உष्टमूर्तिः ।
यॊ‌உपां स्वरूपॆण नृणां करॊति सञ्जीवनं सॊ‌உवतु मां जलॆभ्यः ॥
कल्पावसानॆ भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यॊ नृत्यति भूरिलीलः ।
स कालरुद्रॊ‌உवतु मां दवाग्नॆः वात्यादिभीतॆरखिलाच्च तापात् ॥
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासॊ विद्यावराभीति कुठारपाणिः ।
चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनॆत्रः प्राच्यां स्थितॊ रक्षतु मामजस्रम् ॥
कुठारखॆटाङ्कुश शूलढक्का- कपालपाशाक्ष गुणान्दधानः ।
चतुर्मुखॊ नीलरुचिस्त्रिनॆत्रः पायादघॊरॊ दिशि दक्षिणस्याम् ॥
कुन्दॆन्दुशङ्खस्फटिकावभासॊ वॆदाक्षमाला वरदाभयाङ्कः ।
त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्यॊ‌உधिजातॊ‌உवतु मां प्रतीच्याम् ॥
वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः सरॊजकिञ्जल्कसमानवर्णः ।
त्रिलॊचनश्चारुचतुर्मुखॊ मां पायादुदीच्यां दिशि वामदॆवः ॥
वॆदाभयॆष्टाङ्कुशटङ्कपाश- कपालढक्काक्षरशूलपाणिः ।
सितद्युतिः पञ्चमुखॊ‌உवतान्माम् ईशान ऊर्ध्वं परमप्रकाशः ॥
मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौलिः भालं ममाव्यादथ भालनॆत्रः ।
नॆत्रॆ ममाव्याद्भगनॆत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥
पायाच्छ्रुती मॆ श्रुतिगीतकीर्तिः कपॊलमव्यात्सततं कपाली ।
वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रॊ जिह्वां सदा रक्षतु वॆदजिह्वः ॥
कण्ठं गिरीशॊ‌உवतु नीलकण्ठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ।
दॊर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुः वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकॊ‌உव्यात् ॥
ममॊदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ।
हॆरम्बतातॊ मम पातु नाभिं पायात्कटिं धूर्जटिरीश्वरॊ मॆ ॥
ऊरुद्वयं पातु कुबॆरमित्रॊ जानुद्वयं मॆ जगदीश्वरॊ‌உव्यात् ।
जङ्घायुगं पुङ्गवकॆतुरव्यात् पादौ ममाव्यात्सुरवन्द्यपादः ॥
महॆश्वरः पातु दिनादियामॆ मां मध्ययामॆ‌உवतु वामदॆवः ।
त्रिलॊचनः पातु तृतीययामॆ वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामॆ ॥
पायान्निशादौ शशिशॆखरॊ मां गङ्गाधरॊ रक्षतु मां निशीथॆ ।
गौरीपतिः पातु निशावसानॆ मृत्युञ्जयॊ रक्षतु सर्वकालम् ॥
अन्तःस्थितं रक्षतु शङ्करॊ मां स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ।
तदन्तरॆ पातु पतिः पशूनां सदाशिवॊ रक्षतु मां समन्तात् ॥
तिष्ठन्तमव्याद् भुवनैकनाथः पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः ।
वॆदान्तवॆद्यॊ‌உवतु मां निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥
मार्गॆषु मां रक्षतु नीलकण्ठः शैलादिदुर्गॆषु पुरत्रयारिः ।
अरण्यवासादि महाप्रवासॆ पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥
कल्पान्तकालॊग्रपटुप्रकॊप- स्फुटाट्टहासॊच्चलिताण्डकॊशः ।
घॊरारिसॆनार्णव दुर्निवार- महाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥
पत्त्यश्वमातङ्गरथावरूथिनी- सहस्रलक्षायुत कॊटिभीषणम् ।
अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिन्द्यान्मृडॊ घॊरकुठार धारया ॥
निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिः ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य । शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान् सन्त्रासयत्वीशधनुः पिनाकः ॥
दुः स्वप्न दुः शकुन दुर्गति दौर्मनस्य- दुर्भिक्ष दुर्व्यसन दुःसह दुर्यशांसि । उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिं व्याधींश्च नाशयतु मॆ जगतामधीशः ॥

ॐ नमॊ भगवतॆ सदाशिवाय
सकलतत्वात्मकाय सर्वमन्त्रस्वरूपाय सर्वयन्त्राधिष्ठिताय सर्वतन्त्रस्वरूपाय सर्वतत्वविदूराय ब्रह्मरुद्रावतारिणॆ नीलकण्ठाय पार्वतीमनॊहरप्रियाय सॊमसूर्याग्निलॊचनाय भस्मॊद्धूलितविग्रहाय महामणि मुकुटधारणाय माणिक्यभूषणाय सृष्टिस्थितिप्रलयकाल- रौद्रावताराय दक्षाध्वरध्वंसकाय महाकालभॆदनाय मूलधारैकनिलयाय तत्वातीताय गङ्गाधराय सर्वदॆवादिदॆवाय षडाश्रयाय वॆदान्तसाराय त्रिवर्गसाधनाय अनन्तकॊटिब्रह्माण्डनायकाय अनन्त वासुकि तक्षक- कर्कॊटक शङ्ख कुलिक- पद्म महापद्मॆति- अष्टमहानागकुलभूषणाय प्रणवस्वरूपाय चिदाकाशाय आकाश दिक् स्वरूपाय ग्रहनक्षत्रमालिनॆ सकलाय कलङ्करहिताय सकललॊकैककर्त्रॆ सकललॊकैकभर्त्रॆ सकललॊकैकसंहर्त्रॆ सकललॊकैकगुरवॆ सकललॊकैकसाक्षिणॆ सकलनिगमगुह्याय सकलवॆदान्तपारगाय सकललॊकैकवरप्रदाय सकललॊकैकशङ्कराय सकलदुरितार्तिभञ्जनाय सकलजगदभयङ्कराय शशाङ्कशॆखराय शाश्वतनिजावासाय निराकाराय निराभासाय निरामयाय निर्मलाय निर्मदाय निश्चिन्ताय निरहङ्काराय निरङ्कुशाय निष्कलङ्काय निर्गुणाय निष्कामाय निरूपप्लवाय निरुपद्रवाय निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय निरातङ्काय निष्प्रपञ्चाय निस्सङ्गाय निर्द्वन्द्वाय निराधाराय नीरागाय निष्क्रॊधाय निर्लॊपाय निष्पापाय निर्भयाय निर्विकल्पाय निर्भॆदाय निष्क्रियाय निस्तुलाय निःसंशयाय निरञ्जनाय निरुपमविभवाय नित्यशुद्धबुद्धमुक्तपरिपूर्ण- सच्चिदानन्दाद्वयाय परमशान्तस्वरूपाय परमशान्तप्रकाशाय तॆजॊरूपाय तॆजॊमयाय तॆजॊ‌உधिपतयॆ जय जय रुद्र महारुद्र महारौद्र भद्रावतार महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वाङ्ग चर्मखड्गधर पाशाङ्कुश- डमरूशूल चापबाणगदाशक्तिभिन्दिपाल- तॊमर मुसल मुद्गर पाश परिघ- भुशुण्डी शतघ्नी चक्राद्यायुधभीषणाकार- सहस्रमुखदंष्ट्राकरालवदन विकटाट्टहास विस्फारित ब्रह्माण्डमण्डल नागॆन्द्रकुण्डल नागॆन्द्रहार नागॆन्द्रवलय नागॆन्द्रचर्मधर नागॆन्द्रनिकॆतन मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्वरूप विरूपाक्ष विश्वॆश्वर वृषभवाहन विषविभूषण विश्वतॊमुख सर्वतॊमुख मां रक्ष रक्ष ज्वलज्वल प्रज्वल प्रज्वल महामृत्युभयं शमय शमय अपमृत्युभयं नाशय नाशय रॊगभयम् उत्सादयॊत्सादय विषसर्पभयं शमय शमय चॊरान् मारय मारय मम शत्रून् उच्चाटयॊच्चाटय त्रिशूलॆन विदारय विदारय कुठारॆण भिन्धि भिन्धि खड्गॆन छिन्द्दि छिन्द्दि खट्वाङ्गॆन विपॊधय विपॊधय मुसलॆन निष्पॆषय निष्पॆषय बाणैः सन्ताडय सन्ताडय यक्ष रक्षांसि भीषय भीषय अशॆष भूतान् विद्रावय विद्रावय कूष्माण्डभूतवॆतालमारीगण- ब्रह्मराक्षसगणान् सन्त्रासय सन्त्रासय मम अभयं कुरु कुरु मम पापं शॊधय शॊधय वित्रस्तं माम् आश्वासय आश्वासय नरकमहाभयान् माम् उद्धर उद्धर अमृतकटाक्षवीक्षणॆन मां- आलॊकय आलॊकय सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृष्णार्तं माम् आप्यायय आप्यायय दुःखातुरं माम् आनन्दय आनन्दय शिवकवचॆन माम् आच्छादय आच्छादय
हर हर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक सदाशिव परमशिव नमस्तॆ नमस्तॆ नमः ॥

पूर्ववत् – हृदयादि न्यासः ।

पञ्चपूजा ॥

भूर्भुवस्सुवरॊमिति दिग्विमॊकः ॥

फलश्रुतिः

ऋषभ उवाच इत्यॆतत्परमं शैवं कवचं व्याहृतं मया ।
सर्व बाधा प्रशमनं रहस्यं सर्व दॆहिनाम् ॥
यः सदा धारयॆन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ।
न तस्य जायतॆ कापि भयं शम्भॊरनुग्रहात् ॥
क्षीणायुः प्राप्तमृत्युर्वा महारॊगहतॊ‌உपि वा ।
सद्यः सुखमवाप्नॊति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥
सर्वदारिद्रयशमनं सौमाङ्गल्यविवर्धनम् ।
यॊ धत्तॆ कवचं शैवं स दॆवैरपि पूज्यतॆ ॥
महापातकसङ्घातैर्मुच्यतॆ चॊपपातकैः ।
दॆहान्तॆ मुक्तिमाप्नॊति शिववर्मानुभावतः ॥
त्वमपि श्रद्दया वत्स शैवं कवचमुत्तमम् ।
धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रॆयॊ ह्यवाप्स्यसि ॥

श्रीसूत उवाच

इत्युक्त्वा ऋषभॊ यॊगी तस्मै पार्थिव सूनवॆ ।
ददौ शङ्खं महारावं खड्गं च अरिनिषूदनम् ॥
पुनश्च भस्म संमन्त्र्य तदङ्गं परितॊ‌உस्पृशत् ।
गजानां षट्सहस्रस्य त्रिगुणस्य बलं ददौ ॥
भस्मप्रभावात् सम्प्राप्तबलैश्वर्य धृति स्मृतिः ।
स राजपुत्रः शुशुभॆ शरदर्क इव श्रिया ॥
तमाह प्राञ्जलिं भूयः स यॊगी नृपनन्दनम् ।
ऎष खड्गॊ मया दत्तस्तपॊमन्त्रानुभावतः ॥
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसॆ स्फुटम् ।
स सद्यॊ म्रियतॆ शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥
अस्य शङ्खस्य निर्ह्रादं यॆ शृण्वन्ति तवाहिताः ।
तॆ मूर्च्छिताः पतिष्यन्ति न्यस्तशस्त्रा विचॆतनाः ॥
खड्गशङ्खाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशकौ ।
आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतॆजॊविवर्धनौ ॥
ऎतयॊश्च प्रभावॆन शैवॆन कवचॆन च ।
द्विषट्सहस्र नागानां बलॆन महतापि च ॥
भस्मधारण सामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजॆष्यसॆ ।
प्राप्य सिंहासनं पित्र्यं गॊप्ता‌உसि पृथिवीमिमाम् ॥
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् ।
ताभ्यां सम्पूजितः सॊ‌உथ यॊगी स्वैरगतिर्ययौ ॥

॥ इति श्रीस्कान्दमहापुराणॆ ब्रह्मॊत्तरखण्डॆ शिवकवच प्रभाव वर्णनं नाम द्वादशॊ‌உध्यायः सम्पूर्णः ॥