25 July 2013

!!! पंचगव्य !!!


गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि की मान्यता है। हिन्दुओं के कोई भी मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते।

पंचगव्य का चिकित्सकीय महत्व
पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर के रोगनिरोधक क्षमता को बढाकर रोगों को दूर किया जाता है। गोमूत्र में प्रति ऑक्सीकरण की क्षमता के कारण डीएनए को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। दही एवं घी के पोषण मान की उच्चता से सभी परिचित हैं। दूध का प्रयोग विभिन्न प्रकार से भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से होता आ रहा है। घी का प्रयोग शरीर की क्षमता को बढ़ाने एवं मानसिक विकास के लिए किया जाता है। दही में सुपाच्य प्रोटीन एवं लाभकारी जीवाणु होते हैं जो क्षुधा को बढ़ाने में सहायता करते हैं। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए।

पंचगव्य निर्माण
सूर्य नाड़ी वाली गायें ही पंचगव्य के निर्माण के लिए उपयुक्त होती हैं। देसी गायें इसी श्रेणी में आती हैं। इनके उत्पादों में मानव के लिए जरूरी सभी तत्त्व पाये जाते हैं। महर्षि चरक के अनुसार गोमूत्र कटु तीक्ष्ण एवं कषाय होता है। इसके गुणों में उष्णता, राष्युकता, अग्निदीपक प्रमुख हैं। गोमूत्र में नाइट्रोजन, सल्फुर, अमोनिया, कॉपर, लौह तत्त्व, यूरिक एसिड, यूरिया, फास्फेट, सोडियम, पोटेसियम, मैंगनीज, कार्बोलिक एसिड, कैल्सिअम, नमक, विटामिन बी, ऐ, डी, ई; एंजाइम, लैक्टोज, हिप्पुरिक अम्ल, कृएतिनिन, आरम हाइद्रक्साइद मुख्य रूप से पाये जाते हैं। यूरिया मूत्रल, कीटाणु नाशक है। पोटैसियम क्षुधावर्धक, रक्तचाप नियामक है। सोडियम द्रव मात्रा एवं तंत्रिका शक्ति का नियमन करता है। मेगनीसियम एवं कैल्सियम हृदयगति का नियमन करते हैं।


भारत में गाय को माता कहा जाता है। विश्व के दूसरे देशों में गाय को पूजनीय नहीं माना जाता। भारतीय गोवंश मानव का पोषण करता रहा है, जिसका दूध, गोमूत्र और गोबर अतुलनीय है। सुख, समृद्धि की प्रतीक रही भारतीय गाय आज गोशालाओं में भी उपेक्षित है। अधिक दूध के लिए विदेशी गायों को पाला जा रहा है जबकि भारतीय नस्ल की गायें आज भी सर्वाधिक दूध देती हैं। गोशाला में देशी गोवंश के संरक्षण, संवर्धन की परम्परा भी खत्म हो रही है। हमारी गोशालाएं ‘डेयरी फार्म’ बन चुकी हैं, जहां दूध का ही व्यवसाय हो रहा है और सरकार भी इसी को अनुदान देती है। वैसे गोशाला में दान देने वाले व्यक्तियों की भी कमी नहीं है। हमें देशी गाय के महत्व और उसके साथ सहजीवन को समझना जरुरी है। आज भारतीय गोशालाओं से भारतीय गोवंश सिमटता जा रहा है।

गाय की उत्पत्ति स्थल भी भारत ही है। गाय का उद्भव बास प्लैनिफ्रन्स के रूप में प्लाईस्टोसीन के प्रथम चरण (15 लाख वर्ष पूर्व) में हुआ। इस प्रकार इसका सर्वप्रथम विकास एशिया में हुआ। इसके बाद प्लाईस्टोसीन के अंतिम दौर (12 लाख वर्ष पूर्व) गाय अफ्रीका और यूरोप में फैली। विश्व के अन्य क्षेत्र उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड में तो 19वीं सदी में गोधन गया। गायों का विकास दुनिया के पर्यावरण, वहां की आबोहवा के साथ उनके भौतिक स्वरूप व अन्य गुणों में परिवर्तित हुआ। भारतीय ऋषि-मुनियों ने गाय को कामधेनु माना, जो समस्त भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करने वाली है। गाय का दूध अनमोल पेय रहा है। गोबर से ऊर्जा के लिए कंडे व कृषि के लिए उत्तम खाद तैयार होती है। गोमूत्र तो एक रामबाण दवा है, जिसका अब पेटेंट का हो चुका है।

विदेशी नस्ल की गाय को भारतीय संस्कृति की दृष्टि से गोमाता नहीं कहा जा सकता। जर्सी, होलस्टीन, फ्रिजियन, आस्ट्रियन आदि नस्ल की तुलना भारतीय गोवंश से नहीं हो सकती। आधुनिक गोधन जिनेटिकली इंजीनियर्ड है। इन्हें मांस व दूध उत्पादन अधिक देने के लिए सुअर के जींस से विलगाया गया है।

भारतीय नस्ल की गायें सर्वाधिक दूध देती थीं और आज भी देती हैं। ब्राजील में भारतीय गोवंश की नस्लें सर्वाधिक दूध दे रही हैं। अंग्रेजों ने भारतीयों की आर्थिक समृद्धि को कमजोर करने के लिए षडयंत्र रचा था। कामनवेल्थ लाइब्रेरी में ऐसे दस्तावेज आज भी रखे हैं। आजादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता प्रो. धर्मपाल ने इन दस्तावेजों का अध्ययन कर सच्चाई सामने रखी है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट में कहा गया है-‘ब्राजील भारतीय नस्ल की गायों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। वहां भारतीय नस्ल की गायें होलस्टीन, फ्रिजीयन (एचएफ) और जर्सी गाय के बराबर दूध देती हैं।

हमारे गोवंश की शारीरिक संरचना अदभुत है। इसलिए गोपालन के साथ वास्तु शास्त्र में भी गाय को विशेष महत्व दिया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भारतीय गोवंश की रीढ़ में सूर्य केतु नामक एक विशेष नाड़ी होती है। जब इस पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तब यह नाड़ी सूर्य किरणों के तालमेल से सूक्ष्म स्वर्ण कणों का निर्माण करती है। यही कारण है कि देशी नस्ल की गायों का दूध पीलापन लिए होता है। इस दूध में विशेष गुण होता है। विदेशी नस्ल की गायों का दूध त्याज्य है। ध्यान दें कि अनेक पालतू पशु दूध देते हैं, पर गाय का दूध को उसके विशेष गुण के कारण सर्वोपरी पेय कहा गया है। गाय के दूध, गोबर व मूत्र में अदभुत गुण हैं, जो मानव जीवन के पोषण के लिए सर्वोपरि हैं।

देशी गाय का गोबर व गोमूत्र शक्तिशाली है। रासायनिक विश्लेषण में देखें कि खेती के लिए जरुरी 23 प्रकार के प्रमुख तत्व गोमूत्र में पाए जाते हैं। इन तत्वों में कई महत्वपूर्ण मिनरल, लवण, विटामिन, एसिड्स, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट होते हैं।

गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश उनकी माता पार्वती को गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है। गौरी-गणेश के बाद ही पूजा कार्य होता है। गोबर में खेती के लिए लाभकारी जीवाणु, बैक्टीरिया, फंगल आदि बड़ी संख्या में रहते हैं। गोबर खाद से अन्न उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

गाय मानव जीवन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राणी है। भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति और परम्परा में गाय को इसीलिए पूज्यनीय ही माना जाता है। हम भारतीय गोवंश को अपनाकर उन्हें गोशाला में संरक्षित, संवर्धित कर सकते हैं, जिसका सर्वाधिक लाभ भी हमें ही मिलेगा। देशी गौवंश को हमारी गोशालाओं से हटाने की साजिश भी सफल हो रही है, जिस पर समय रहते ध्यान देना जरुरी है।




!!! महामृत्युंजय साधना का चमत्कार !!!

इस प्रकार वेदोक्त 'त्र्यम्बकं यजामहे' मंत्र में ॐ सहित विविध सम्पुट लगने से उपर्युक्त मंत्रों की रचना हुई है। उपर्युक्त तीन मंत्रों में मृतसंजीवनी मंत्र 

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः 
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्‌ 
ॐ स्वः भुवः ॐ सः जूं हौं ॐ। 

यह मंत्र सर्वाधिक प्रचलित एवं फल देने वाला माना गया है। कुछ लघु मंत्र भी प्रयोग में आते हैं, जैसे- त्र्यक्षरी अर्थात तीन अक्षरों वाला 

ॐ जूं सः पंचाक्षरी ॐ हौं जूं सः ॐ तथा ॐ जूं सः पालय पालय आदि। 

ॐ हौं जूं सः पालय पालय सः जूं हौं ॐ। हौं जूं सः पालय पालय सः जूं हौं ॐ।

इस मंत्र के 11 लाख अथवा सवा लाख जप का मृत्युंजय कवच यंत्र के साथ जप करने का विधान भी है। यंत्र को भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखकर पुरुष के दाहिने तथा स्त्री के बाएँ हाथ पर बाँधने से असाध्य रोगों से मुक्ति होती है। सर्वप्रथम यंत्र की सविधि विभिन्न पूजा उपचारों से पूजा-अर्चना करना चाहिए, पूजा में विशेष रूप से आंकड़े, एवं धतूरे का फूल, केसरयुक्त, चंदन, बिल्वपत्र एवं बिल्वफल, भांग एवं जायफल का नैवेद्य आदि।

मंत्र जप के पश्चात्‌ सविधि हवन, तर्पण एवं मार्जन करना चाहिए। मंत्र प्रयोग विधि सुयोग्य वैदिक विद्वान आचार्य के आचार्यत्व या मार्गदर्शन में सविधि सम्पन्न हो तभी यथेष्ठ की प्राप्ति होती है, अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने की आशंका हो सकती है।

जप विधि में साधक को नित्यकर्म से निवृत्त हो आचमन-प्राणायाम के साथ मस्तक पर केसरयुक्त चंदन के साथ रुद्राक्ष माला धारण कर प्रयोग प्रारंभ करना चाहिए। प्रयोग विधि में मृत्युंजय देवता के सम्मुख पवित्र आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर शरीर शुद्धि कर संकल्प करने का विधान प्रमुख है। संकल्प के साथ विनियोग न्यास एवं ध्यान जप विधि के प्रमुख अंग हैं। मृत्युंजय महादेवों त्राहिमाम्‌ शरणामम्‌। जन्म-मृत्यु जरारोगैः पीड़ितम्‌ कर्मबंधनैः के ध्यान के साथ जप निवेदन करना चाहिए। अनिष्टकारी योगों एवं असाध्य रोगों से मुक्ति की यह रामबाण महौषधि है।



!!! शिवलिंग की अर्द्ध-प्रदक्षिणा (अर्ध-परिक्रमा) क्यों की जाती है? !!!

श्री शिव महापुराण के अनुसार भगवान् शिव को प्रदक्षिणा अत्यंत प्रिय है और शिव पूजा भी शिव प्रदक्षिणा के बिना पूरी नहीं होती | शिव की प्रदक्षिणा के लिए शास्त्र का आदेश है की इनकी अर्द्ध-प्रदक्षिणा करनी चाहिए... 

[ दुर्गाजी की एक , सूर्य की सात, गणेश की तीन, विष्णु की चार, और शिव की आधी प्रदक्षिणा करनी चाहिए... नारद पुराण ] 

शिवलिंग की निर्मली (जल की नाली ) को कभी भूल कर भी नहीं लांघना चाहिए... इससे भारी दोष लगता है और शिव कुपित होते हैं | शिव निर्मली को "सोमसूत्र" भी कहा जाता है जिसे कभी नहीं लांघना चाहिए ... 


"अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत इति वाचनान्तरात" |

मुख्य द्वादश ज्योतिर्लिंगों में निर्मली 


(जहां से शिवलिंग पर जल चढ़ कर नीचे बहता है) के जल को वहीँ गड्ढा बना कर एकत्रित कर लेते हैं और वहाँ से निकाल कहीं जमीन में जाने देते हैं | यदि निर्मली ढकी हो और गुप्त रूप से बनी हो तो पूरी परिक्रमा करने पर भी दोष नहीं लगता | ऐसे में हम मंदिर के चारो ओर पूरी परिक्रमा कर सकते हैं | परन्तु जिन मंदिरों में निर्मली के निकास की समुचित व्यवस्था नहीं है, वहाँ उसे कदापि नहीं लांघना चाहिए |

मंदिर में स्थापित शिवलिंग साक्षात महादेव ही हैं... उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है शिव-लिंग में... अत: ऐसा माना जाता है कि अभिषेक का जल शिव के सहस्त्रार चक्र(मस्तक) से निकलने वाले अमृत से मिलकर अत्यंत पवित्र हो जाता है और देव-चेतना से भर जाता है... वही सोमसूत्र में प्रवाहित होता है | अत: उसे लांघना आराध्य का घोर अपमान करना है |

इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है... 


सोमसुत्र में शक्ति-स्रोत होता है (देव-चेतना से परिपूरित ) | अत: उसे लांघते समय पैर फैलते हैं और वीर्य-निर्मित और ५ अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है | इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है | जिससे शरीर और मन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है | अत: शिवलिंग कि अर्द्ध चंद्राकार प्रदक्षिणा ही करने का शास्त्र का आदेश है 
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!!! आयुर्वेदिक पाक कार्यशाला !!!






आयुर्वेद एक संस्कृत शब्द है जो वास्तव में दो शब्दों: आयुर् अर्थात् जीवन एवं वेद अर्थात् ‌ ज्ञान का मेल है ।इसलिये आयुर्वेद ज्ञान की एक व्यवस्था है, न केवल एक चिकित्सात्मक ज्ञान बल्कि जीवन एवं आत्म के विषय में ज्ञान । आयुर्वेद आज जीवित है क्योंकि यह अनवरत रूप से पिछले 5,000 वर्षों से चलन में है । यह व्यक्ति को एक जीवन-शैली, भोजन के चुनाव एवं उसे पकाने की विधि की तरफ मर्गदर्शित करता है ।

आयुर्वेद के अनुसार, हम उन्हीं पंच तत्वों से निर्मित हैं जिनसे विश्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी एवं आकाश) । जब हम इन तत्वों के निकट रहते हैं या उनके और प्रकृति के साथ एक हो जाते हैं तो हमारे अन्दर ऊर्जाओं (दोषों) में संतुलन स्थापित होता है एवं हम अच्छे स्वास्थ्य का आनन्द लेते हैं।

हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करनेवाले सभी जटिल कारकों को वात (वायु), पित्त (अग्नि) एवं कफ (जल) कहे जानेवाले तीन मूलभूत संघटनात्मक प्रकारों में सरलीकृत किया जा सकता है । इन्हें "तीन दोष" कहा जाता है ।आयुर्वेदिक उपचार का मुख्य उद्देश्य इन तीन संघटनात्मक तत्वों में संतुलन स्थापित करना है, क्योंकि एक असंतुलन शारीरिक बीमारी का प्रत्यक्ष कारण उत्पन्न करता है । जब आप संतुलन में रहते हैं तो आप जीवन के प्रति अभिरूचि अनुभव करते हैं । आपको भूख अच्छी लगती है, आपके शारीरिक तंतु एवं प्रक्रियाएँ सामान्य ढ़ंग से काम करते हैं और आपका शरीर, मन एवं इन्द्रियाँ आनन्द से परिपूर्ण रहते हैं । हमारे चारों तरफ बाह्य जगत में ये तीन प्राकृतिक प्रभाव या दोष भी सक्रिय रहते हैं और हमारे पर्यावरण, हममें एवं हम जो भोजन करते हैं उसमें पाये जाते हैं । भौतिक शरीर एवं भोजन दोनों पाँच आवश्यक तत्वों; पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश से मिलकर निर्मित हैं । आयुर्वेदिक भोजन हमारे शरीर के अन्दर इन आवश्यक तत्वों के बीच संतुलन उत्पन करता है जब इसे छ: आयुर्वेदिक स्वादों;मीठा, नमकीन, खट्‌टा, तीखा, कसैला एवं कड़वा का सही मात्रा में प्रयोग कर तैयार किया जाता है । छ: स्वादों की अपनी अनुपम तात्विक संरचनाएँ होती हैं जो उन्हें विशेष उपचारिक गुण-धर्म प्रदान करती हैं । एक संतुलित आहार इनका स्वास्थ्यकर संयोजन होगा ।
मधुर स्वाद (पृथ्वी एवं जल तत्व

मधुर स्वादवाले खादपदार्थ सर्वाधिक पुष्टिकर माने जाते हैं । वे शरीर से उन महत्वपूर्ण विटामिनों एवं खनिज-लवणों को ग्रहण करते हैं जिसका प्रयोग शर्करा को पचाने के लिये किया जाता है ।इस श्रेणी में आनेवाले खादपदार्थों में समूचे अनाज के कण, रोटी, पास्ता, चावल, बीज एवं बादाम हैं ।अनेक फल एवं सब्जियाँ भी मीठे होते हैं । कुछ मीठा खाना हमारी तत्काल क्षुधा को तृप्त करता है; यह हमारे शरीर में ऊर्जा के स्तर को बढाता है और इसका शान्तिकारक प्रभाव भी होता है । लेकिन मीठे भोजन का अत्यधिक सेवन हमारे शरीर में इस चक्र को असंतुलित करता है एवं मोटापा तथा मधुमेह को जन्म देता है ।

खट्‌टा स्वाद (पृथ्वी एवं अग्नि तत्व)

इन वर्गों में आनेवाले खट्‌टे खद्पदार्थों में छाछ, खट्‌टी मलाई, दही एवं पनीर हैं I अधिकांश अधपके फल भी खट्‌टे होते हैं । खट्‌टे खाद्पदार्थ का सेवन करने से आपकी भूख बढ़ती है; यह आपके लार एवं पाचक रसों का प्रवाह तेज करती है । खट्‌टे भोजन का अति सेवन करने से हमारे शरीर में दर्द तथा ऐंठन की अधिक सम्भावना रहती है ।

नमकीन स्वाद ( जल एवं अग्नि तत्व)

प्राकृतिक रूप से समुद्री घास एवं समुद्री शैवाल हमारे शरीर को निर्मल करने तथा अधिवृक्क ग्रंथियों, गुर्दाओं, पुरस्थ एवं गलग्रंथि को मजबूत करने में मदद करता है । इसमें पोटैशियम, आयोदीन होता है जो सोडियम को संतुलित करने में मदद करता है । प्राकृतिक संतुलन करनेवाले तत्वों से रहित कृत्रिम नमक शरीर में द्रवों के धारण को बढा़ता है और इस प्रकार गुर्दा को प्रभावित करता है एवं रक्त-वाहिकाओं तथा सभी तंत्र व्यवस्थाओं को प्रभावित करता है । समग्र रूप से यह शारीर में जीव-विष को शरीर में धारण करने के लिये उत्पन्न कर सकता है ।


तीखा स्वाद (अग्नि एवं वायु तत्व)

तीखे खाद्पदार्थों में प्याज, चोकीगोभी, शोभांजन, अदरख, सरसों, लाल मिर्च चूर्ण एवं केश्वास शामिल हैं । तीखे खाद्पदार्थों में उच्च उपचारिक गुण होते हैं; उनका नमकीन भोजन के विपरीत प्रभाव होता है ।यह तंतुओं के द्रव की मात्रा को कम कर देता है, श्वाँस में सुधार लाता है एवं ध्यान केन्द्रित करने की शक्ति में सुधार लाता है । तीखी जड़ी-बूटियाँ मन को उत्तेजित करता है तथा मस्तिष्क में रक्त-संचार की वृद्धि करता है । तीखे स्वाद का अति सेवन अनिद्रा, बेचैनी तथा चिंता को बढ़ा सकता है ।


कड़वा स्वाद (वायु एवं आकाश तत्व)

कड़वे खाद्पदार्थ सामान्य रूप से हरी सब्जियों, चाय से संबंधित है । कड़वा भोजन पाचन एवं चयापचयी दर में सहायता करता है ।


कसैला स्वाद (वायु एवं पृथ्वी तत्व)

इस श्रेणी में आनेवाले खाद्पदार्थों में अजवाइन, खीरा, बैंगन, काहू, कुकुरमुत्ता हैं । सेव, रूचिरा, झड़बेरी, अंगूर एवं नाशपाती भी कसैले होते हैं । फल प्राय: शरीर के द्रवों, लसीका एवं पसीने की सफाई का काम करता है । यह केशिका छिद्र रोकने का भी काम करता है; 


त्वचा एवं बलगम झिल्ली का उपचार करता है ।

भोजन तीन प्रकार के हो सकते हैं - सात्विक, राजसिक एवं तामसिक । आयुर्वेद एक स्वस्थ जीवन के लिये सात्विक आहार पर बल देता है तथा शरीर एवं मन दोनों में आनन्दमय स्थिति का समर्थन करता है ।सात्विक आहार का मूल रूप से योग के अभ्यास एवं उच्चतर चेतना के लिये तैयार किया गया था । सात्विक भोजन मन को बेचैन कर या सुस्त कर उस पर अस्थिरकारी प्रभाव डालता है । राजसी भोजन प्याज, लाल मिर्च, शराब, लहसुन, लाल मांस एवं गर्म काली मिर्च के समान अत्यधिक मसालेदार, नमकीन एवं खट्‌टे होते हैं । तामसिक भोजन अतिक्रियाशीलता, आलस्य एवं अति निद्रा उत्पन्न करता है; वे इन्द्रियों को सुस्त करते हैं एवं आवेग को तीव्र तथा प्रभावशून्य रखते हैं । तामसी भोजन, बासी, पुराने, पुन: पकाये हुए, कृत्रिम, अति तले हुए, चर्बीदार या भारी भोजन होते हैं । इसमें सभी "मृत" भोजन जैसे मांस और मछली, खमीरयुक्त खादपदार्थ तथा मादक पदार्थ शामिल हैं । राजसी एवं तामसी खादपदार्थ दोनों में एक संतुलित, एक समान मन-शरीर अनुभव को अवलंबित करने की क्षमता नहीं है ।



तीन संघटनात्मक प्रकार: वात पित्त एवं कफ

संघटनात्मक प्रकारों की संकल्पना बताती है कि हम सभी एक समान हैं (आखिरकार हम सब एक ही उपजाति हैं), लेकिन हमारे बीच विभिन्नताएँ भी हैं । आयुर्वेदिक औषधि ने मानव जनसंख्या में अवलोकित किये गये भेद को दर्ज किया तथा यह ध्यान किया कि लोगों में विभिन्न स्थितियों में तीन मूल प्रवृत्तियाँ या आद्यप्ररूपीय प्रतिक्रयाएँ होती हैं । पूरे जीवन-काल में दो अन्य प्रतिक्रियाओं के प्रति एक प्रतिक्रिया से संघटनात्मक प्रकार प्राप्त होता है । तीन संघटनात्मक प्रकारों के अलग-अलग मनोभाव होते हैं । उनके तंत्रिका तंत्र विभिन्न खिंचावों पर स्थापित रहते हैं । वे भोजन को विभिन्न ढ़ंग से खाते एवं पचाते हैं। उनके पसन्द अलग-अलग होते हैं, और विव्भिन्न भोजन उन्हें परेशान कर देते हैं। जब वे परेशान रहते हैं तो उनमें विभिन्न मनोभवों को व्यक्त करने की प्रवृत्ति होती है । अधिकांश लोग विभिन्न प्रकारों के एक सम्मिश्रण होते हैं इसलिये किसी व्यक्ति में व्याप्त प्रत्येक प्रकार का निर्धारण करने के लिये कुछ अवलोकन की आवश्यकता होती है । कोई व्यक्ति कैसा है इसकी एक समझ उसकी बीमारी के पहले भी हो सकती है और कुछ निरोधक दृष्टिकोण भी सुझाये ज सकते हैं । एक बार यदि हम यह जान जान जाते हैं कि व्यक्ति किस संघटनात्मक प्रकार का है तो हम यह समझते हैं कि पर्यावरण के कौन से उत्प्रेरक, किस प्रकार के भोजन, पाक-तकनीक, रंग, पोशाक या निद्रा के स्वरूप उसके लिये बेहतर हैं । इनमें से कुछ प्रभाव एक प्रकार के लिये असंतुलनकारी होंगे किन्तु अन्य के लिये नहीं ।

आयुर्वेदिक भोजन प्राय: अपनी उपचारिक शक्तियों से जुड़ी रहती है जिनसे बीमारी की रोकथाम एवं इलाज के साथ चिकित्सा-स्वास्थ्य लाभ होता है । तथापि सही भोजन सम्मिश्रण का चुनाव करना कभी भी सरल नहीं रहा है । भोजन का मन, मनोभावों, शारीरिक एवं शरीर के प्रतिरक्षी अनुक्रियाओं पर एक सशक्त प्रभाव पड़ता है । एक विशिष्ट भोजन का व्यक्ति पर प्रभाव अनेक कारकों जैसे कि शरीर का भार, प्रत्यूर्जता आदि पर निर्भर करता है । आयुर्वेदिक पाक-विधि सरल पाचन एवं हमारे द्वारा सेवन किये जानेवाले भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित करने की शरीर की क्षमता पर ध्यान केन्द्रित करता है ।

यदि किसी का आहार असंतुलित है तो वात, पित्त एवं कफ का मूल प्रभाव असंतुलित हो जाता है । सही भोजन, मसालों एवं तैयारी के साथ कोई अपने आहार में सुधार ला सकता है एवं किसी भोजन में वात, पित्त एवं कफ के प्रभावों में संतुलन बनाये रख सकता है ।मसालों के एक मूल सम्मिश्रण जो शरीर में सभी तीन प्रभावों वात, पित्त एवं कफ को संतुलित करते है वे हल्दी, जीरा एवं धनिया हैं ।ये तीन मूल मसाले एक स्वादिष्ट सब्जी मसाले को तैयार करते हैं जिसे आप किसी भी भाजी में प्रयोग कर सकते हैं । इनके अनुपात हैं हल्दी 1 भाग, जीरा 2 भाग, धनिया 3 भाग । ताजे अदरक या धनिया, धनिया पौधे के ताजे पत्ते के साथ समूचे बीज से ताजे पिसे हुए इन मसालों के प्रयोग से कोई भी भोजन आनन्दमय एवं संतुलित अनुभव देता है ।

शरीर को ऋतुओं के अनुसार अनुकूल बनाने के लिये आयुर्वेद विभिन्न ऋतुओं के लिये विभिन्न आहारों की सलाह देता है । उदाहरण के लिये, ग्रीष्म ऋतु में, जो कि पित्त ऋतु है, जब किसी के लिये मुँहासे एवं छाले होने की संभावना अधिक रहती है तो पित्त दोष के असंतुलन से मदद के लिये हल्के ठंढ़े फल एवं सलाद खाने की सलाह दी जाती है ।

आयुर्वेदिक पाक-विधि ताजे भोजन खाने की सलाह देता है क्योंकि यह अधिकतम मात्रा में ऊर्जा प्रदान करता है, यह रोज की आदत के रूप में बचा-खुचा या संसाधित खाद्य खाने को बढ़ावा नहीं देता है क्योंकि उनमें आवश्यक ऊर्जा का अभाव होता है । आयुर्वेदिक पाक सिद्धांत यह भी सलाह देता है कि सब्जियों को पका कर खाना चाहिये बनिस्बत कच्चा खाने के चूँकि पकाने से पाचन में सुधार होता है ।

आनंद भी एक पूर्ण संतुलित आहार के लिये एक आवश्यक घटक है । ताजे मौसमी समूचे खाद्य पदार्थ, जड़ी-बूटियाँ एवं मसालों का प्रयोग कर एक स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाने से इसका हमारे स्वास्थ्य एवं तंदुरूस्ती पर एक बड़ा अनुकूल प्रभाव पड़ता है । भोजन में सभी छ: स्वादों का होना एवं सभी पाँच इन्द्रियों का संतुष्ट होना पाचन क्रिया को सक्रिय बना देता है जिससे कि हम खाये जानेवाले अपने भोजन को पूर्णत: पचाकर शरीर में मिला सकते हैं । वस्तुत: भिन्नता जीवन का मसाला है । विभिन्न प्रकार के स्वाद, बनावट, रंग, भोजन के प्रकार एवं मसाले, ये सभी वात, पित्त एवं कफ में संतुलन बनाये रखने के लिये जीवतत्व को पोषण प्रदान करते हुए पाचन प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। एक आयुर्वेदिक बावर्ची के रूप में भोजन पकाते समय हमें जो सबसे महत्वपूर्ण मसाला प्रदान करना चाहिये वह है हमारा अपना सुखद प्रेममय लक्ष्य । जब हम किसी के लिये कुछ बनाते हैं तो हम कुछ वह देते हैं जो कि अपना होता है । यह वस्तुत: एक ईश्वरीय उपहार हो सकता है । हमारा प्रेम एवं आनंद हमारे द्वारा तैयार किये जानेवाले भोजन में प्रत्यक्षत: जाता है एवं जो इसका आनंद उठाते हैं उनमें सजीव हो जाता है ।



!!! जैसा भोजन है वैसा ही मन है !!!

तामसिक भोजन


सात्विक भोजन


हमारे भोजन का हम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। ये पुरानी कहावतें बिल्कुल सच है-जैसा आहार वैसा विचार और जैसा अन्न वैसा मन। भोजन तीन प्रकार के होते है- राजसिक, तामसिक और सात्विक। तीनों का अपना-अपना, अलग-अलग प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है।

प्रथम स्थान पर आता है-

राजसिक भोजन- ये हमारे मन को बहुत चंचल बनाता है तथा उसे संसार की ओर प्रवृत करता है। इसमें अण्डे, मछली, केसर, पेस्ट्री, नमक, मिर्च, मसाले आदि तथा सब उतेजक पदार्थ जैसे चाय, काफी, गरम दूध और ज्यादा मात्रा में खाया गया खाना आता है।

दूसरे स्थान पर आता है-

तामसिक भोजन- ये हमारे अंदर आलस, क्रोध,आदि उत्पन्न करता है। इसमें मांस, शराब, तम्बाकू, मादक पदार्थ, भारी और बासी खाना आते हैं। वास्तव में किसी भी भोजन की बहुत ज्यादा मात्रा तामसिक प्रभाव रखती है।

तीसरे स्थान पर आता है-

सात्विक भोजन- ये हमारे मन को शांति प्रदान करता है और पवित्र विचार उत्पन्न होते हैं। इसमें फल, सब्जियां, दूध (कम मात्रा में और ज्यादा गरम नहीं), मक्खन, पनीर, शहद, बादाम, जौ, गेंहू, दालें, चावल आदि शामिल हैं। इसमें सब सादे और हलके पदार्थ, जोकि कम मात्रा में खायें जाएं आते है।

राजसिक और तामसिक भोजन से बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। सात्विक भोजन से शुद्ध विचार आते हैं। शुद्ध विचारों से चरित्र अच्छा बनता है और परमात्मा के प्रेम के लिए अच्छा चरित्र बहुत जरूरी है। परमात्मा के प्रेम के बिना कोई आत्मिक उन्नित नहीं हो सकती।

सदा शुद्ध सात्विक भोजन करें। सात्विक भोजन नेकी और ईमानदारी से कमाया जाना चाहिए और उस कमाई में से बुजुर्गों को और दूसरे सब लोगों को उनका उचित हिस्सा दे दिया जाना चाहिए। खाना सादा और हल्का होना चाहिए और उसे प्रसन्नचित होकर खाना और पकाना चाहिए। कम खाना चाहिए और खाने से पहले,परमात्मा का शुकर गुजार होना चाहिए।

मेहनत से कमाए हुए धन से खरीदी हुई सब्जी और अनाज आदि से सात्विक भोजन तैयार करना चाहिए। सात्विक भोजन बनाने वाला भी सात्विक स्वभाव का हो। उस सात्विक स्वभाव का असर भोजन और उसके खाने वाले पर होता है। ऐसे आहार के खाने से मन शांत होगा और चित मालिक की याद में लगेगा।

हम जैसा भी भोजन करते हैं वह अपनी प्रकृति के अनुसार हमारे तन-मन दोनों पर प्रभाव डालता है। 
इसी लिए आयुर्वेद ने भोजन को तीन भागों – 

सात्विक, राजसिक और तामसिक – में बांटा है। इन तीन गुणों वाले भोजन की कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं होती। ऐसे भोजन के मिश्रित मिश्रित गुण हो सकते हैं या विभिन्न अनुपातों में हो सकते हैं जो उसे तैयार करने की विधि व प्रक्रिया पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए अधिक पकाया या अधिक मसाले वाला भोजन बहुत समय बाद खाया जाए तो वह शरीर पर तामसिक प्रभाव डालेगा। इसी तरह अधिक मात्रा में लिया गया किसी का भोजन तामसिक प्रभाव डालेगा।
सात्विक भोजन: कम आंच में पका भोजन, ताजे फल, बादाम, अंकुरित अनाज और हरी व पत्तेदार सब्जियां सात्विक भोजन के तहत आते हैं। इसी तरह मसालों में हल्दी, अदरक, इलाइची, कालीमिर्च , सौंफ, जीरा व दालमिर्च सात्विक माने जाते हैं।


सात्विक भोजन हमारे शरीर को उत्तेजना और मन को चंचलता से बचाता है। इस तरह का भोजन सुपाच्य होने के कारण हमारे किडनी और लीवर पर अतिरिक्त बोझ नहीं डालता। फलतः हम अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं। यह भोजन हमारे शरीर के वजन को संतुलित रखता है।

राजसिक भोजन: वह सात्विक भोजन जिसमे नमक, तेल, मिर्च, मसाले आदि की अधिक मात्रा पाई जाती है और अत्यधिक तला व पका हुआ भोजन राजसिक भोजन कहलाता है। शक्कर एवं मावे की अधिकता वाला मीठा भोजन भी राजसिक भोजन होता है। बिरयानी, नूडल्स, पित्ज़ा, बर्गर, मसालेदार सब्जियां, मिठाइयां, पूरी-पराठे आदि सभी राजसिक भोजन की श्रेणी में आते हैं।

तामसिक भोजन: इस प्रकार के भोजन में मांसाहारी व बासी, सड़ा हुआ, नींद लाने वाले दुर्गन्धयुक्त भोजन आता है। प्याज, तेल, चर्बीवाले खाद्य पदार्थ, डिब्बाबंद भोजन, शराब, दवाइयां, काफी, तम्बाकू भी इसी श्रेणी में आते हैं। अत्यधिक रासायनिक खाद दाल के उपजाए अनाज और फलों और सब्जियों को भी इस श्रेणी में डाला जा सकता है।

भगवान! क्या हमें किसी अनुशासन या विनियमों का अपनी खाने की आदत में पालन करना चाहिये? क्या वह हमारे आध्यात्मिक प्रयास के लिये आवश्यक है? सम्पूर्ण विश्व के साईं भक्त आपकी शिक्षाओं के कारण शाकाहारी हो गये हैं, यह आश्चर्यजनक है। आज हमारे बीच हमारे भोजन की आदतों से सम्बन्धित विषयों को बताने वाला कोई अन्य नहीं है। कृपया हमें निर्देशित करें।


भगवान-

जैसा भोजन है वैसा ही मन है, 
जैसा मन है, वैसे ही हमारे विचार है, 
जैसे विचार हैं, वैसे ही कर्म हैं, 
जैसे कर्म हैं वैसे ही परिणाम हैं। 

इसलिये परिणाम भोजन पर निर्भर है जो तुम खाते हो। सप्रयास और बिना गलती किये तुम्हें अपने खाने की आदतों में अनुशासन का पालन करना चाहिये। भोजन, सर (Head) और ईश्वर को इस क्रम में देखना चाहिये। जैसा तुम्हारा खाना होगा वैसा ही तुम्हारा सर (Head), जैसी दशा तुम्हारे सर (Head) की होगी वैसा ही तुम में ईश्वर का प्रकटीकरण होता है।

तुम्हें बहुत अधिक नहीं खाना चाहिये। तुम्हें खाना जीने के लिये लेना चाहिये न कि जीना खाने के लिये। अत्यधिक मात्रा में भोजन लेना तामसिक गुण है। यदि तुम दिन में एक बार खाते हो, तुम योगी हो, यदि तुम दिन में दो बार खाते हो, तुम रोगी हो। यदि तुम सात्विक, मुलायम और सन्तुलित भोजन मध्यम मात्रा में लेते हो, तुम सात्विक, मन विकसित करते हो और यदि तुम राजसिक, मसालेदार, गरम भोजन लोगे तो तुम में राजसिक गुण, भावुकता, उत्तेजित मन आदि होगा और यदि तुम तामसिक भोजन, मांस शराब आदि लेते हो, तुम में तामसिक या पशुजनित गुण, आलस्य, निष्क्रिय एवं निश्चेष्ट मन होगा। अत: यह भोजन है जो मन को आकार देता है और इस पर ही तुम्हारे कर्म निर्भर है जो तुम्हें उसी प्रकार के परिणाम देते हैं।

तुम्हें ``पात्र शुद्धी´´ उपयोग में आने वाले बड़े व छोटे बर्तनों की स्वच्छता, ``पदार्थ शुद्धी´´ खाद्य पदार्थो की शुद्धता, ``पाक शुद्धी´´ खाना पकाने का शुद्ध तरीका और ``भाव शुद्धी´´ उस व्यक्ति के विचारों की शुद्धता जो भोजन बना रहा है, पर भी ध्यान देना चाहिए। तुम्हें कहीं भी दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।

कुछ वर्ष पूर्व एक सन्यासी था, जिसने एक व्यापारी के निमन्त्रण पर उसके आवास पर भोजन किया। यह सन्यासी, एक ब्रह्मचारी और आध्यात्मिक जिज्ञासु पूरी रात सो नहीं सका। किसी प्रकार वह बहुत देर में सोया और स्वप्न में उसने एक सोलह साल की लड़की को रोते हुए देखा। तब यह सन्यासी अपने गुरू के पास गया और स्वप्न के बारे में उन्हें बताया। गुरू ने कुछ देर ध्यान लगाया और स्वप्न का कारण बताया कि उस दिन जब व्यापारी ने उसे भोजन के लिये बुलाया था, वह उसकी 16 वर्षीय पत्नी की मृत्यु का ग्यारहवां दिन था और वह परम्परागत विशेष अनुष्ठान कर रहा था। चूंकि सन्यासी ने उस अवसर के लिये तैयार किये भोजन को खाया, इसलिये वह लड़की जो मर चुकी थी, उसके स्वप्न में आंसू बहाते दिखाई दी। लड़की का पिता बहुत गरीब था, मुश्किल से अपना परिवार पाल रहा था। अत: लड़की की इच्छा के विपरीत उसने इस बूढ़े व्यापारी के साथ विवाह कर दिया। निराशा में उसने कुयें में कूद कर आत्महत्या कर ली। व्यापारी को परम्परागत अत्येष्टि क्रिया करना ही था, उसे ग्यारहवें दिन करते हुये उसने सन्यासी से भोजन करने हेतु घर आने का निवेदन किया था। यह सम्पूर्ण कहानी है सन्यासी के स्वप्न की। इसलिये बिना सोचे विचारे तथा बिना जाने तुम्हें किसी के भी द्वारा दिया गया भोजन नहीं खाना चाहिये।

ऐसा ही एक बार स्वामी नित्यानन्द के शिष्य के साथ घटित हुआ। एक दिन वह आश्रम के बाहर गया और बाहर खाना खाया। लौटते हुये उसने एक घर से एक चांदी का गिलास चुरा लिया और आश्रम में ले आया। लेकिन शीघ्र ही वह अपनी इस दशा पर दुखी हुआ, क्यों कि उसने चांदी के गिलास की चोरी जैसा अपराध किया था। वह रोया और पश्चाताप किया। दूसरी सुबह वह अपने गुरू के पास गया और सब कुछ स्वीकार कर लिया, क्योंकि अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा नित्यानन्द कारण जान सकते थे। उन्होंने शिष्य से कहा ``खाना जो तुमने आश्रम के बाहर खाया, वह कभी रहे एक चोर द्वारा पकाया गया था, जिसके परिणाम स्वरूप तुम में चोरी की भावना उत्पन्न हुई।´´ इसलिये रसोइये के विचार भी शुद्ध होने चाहिये।

इसके अतिरिक्त, तुम्हें अपना शरीर भोजन के बाद उतना ही हल्का महसूस होना चाहिये जितना खाने के पूर्व था। आधा पेट खाली रखना सर्वोत्तम है। शेष आधा पानी तथा अन्य खाद्य पदार्थो से भरना चाहिये। तुम्हें शुद्ध दूध नहीं पीना चाहिये। तुम्हें दूध में पानी मिलाकर पीना चाहिये। तुम्हें दो भोजन के बीच कम से कम चार घन्टे का अन्तर रखना चाहिये। तुम्हें वह खाना खाना चाहिये जो तुम्हारे शरीर को आवश्यक पर्याप्त कैलोरी प्रदान करें। तुम्हें अत्यधिक तैलीय और भुनी हुई सब्जी नहीं खाना चाहिये। मध्याह्न भोजन के बाद थोड़ा सो लेना और रात्रि भोजन के बाद थोड़ा टहलना चाहिये। तुम्हे कठोर श्रम और भलीभांति भोजन करना चाहिये।

तामसिक खाना वो होता है जिसमें जिव्हा की लोलुपता को महत्व दिया जाता है और सात्विक खाना वो होता है जिसमें शरीर के पोषण का ध्यान रखा जाता है और हम लोग अक्सर तामसिक भोजन पर ज्यादा ध्यान देते है और तरह तरह बीमारियों को न्योता देते रहते है ॥ हरी ॐ ॥ श्यामगढ़ मे दो मित्र रहते थे एक बार एक मित्र ने दूसरे मित्र को खाने पर घर बुलाया मित्र को खिलाने के लिए उसने तरह तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए तय समय पर मित्र उसके घर पहुँच गया इसके बाद दोनों ने साथ मिलकर भरपेट भोजन किया जब दूसरा मित्र जाने को हुआ तो पहले मित्र ने उससे पूछा कहो भाई भोजन कैसा लगा यह सुनकर अतिथि मित्र ने जवाब दिया तुम्हारे इस सवाल का जवाब मैं आज नही बल्कि सातवें दिन दूँगा जब तुम मेरे यहाँ खाना खाने आओगे इतना कहकर उसने मेजबान मित्र को सातवें दिन अपने घर आने का और साथ भोजन करने का निमंत्रण दे दिया और रवाना हो गया सातवें दिन मित्र खाना खाने के लिए तो पहले वाले मित्र ने कहा अब तो मेरे सवाल का जवाब दो की खाना कैसा लगा था ? तो दूसरे मित्र ने कहाँ की पहले भोजन करते है फिर मे उस सवाल का जवाब दे दूँगा दोनों ने भोजन किया भोजन करने के बाद फिर पहले मित्र ने कहा अब तो भोजन भी हो गया अब तो बोलो तो दूसरा मित्र हँसते हुए बोला क्यों तुम्हें जवाब नही मिला पहला मित्र आश्चर्यचकित होते हुए बोला अगर मिल जाता तो फिर मे तुमसे वापस क्यो पूछता इस पर दूसरा मित्र बोला बेशक तुम्हारे यहाँ का भोजन बेहद स्वादिष्ट था और मेने छककर दावत उड़ाई पर जानते हो उसका नतीजा क्या हुआ पहले मित्र ने अनभिज्ञता जाहिर की इस पर दूसरा मित्र बोला यही की घर आकर मुझे पूरे एक घंटे तक सोना पड़ा आलस्य के कारण शाम तक कोई काम न कर सका पर मेरे यहाँ तुमने जो खाना खाया है उसमें तुम्हें ऐसी कोई समस्या नही होने वाली है तुम सीधे काम पर जा सकते हो पहले मित्र ने अनुभव किया की उसका कहना सच है उसने जो अपने घर पर खाना बनाया था वह तामसिक था उसमें जिव्हा की लोलुपता को महत्व दिया था और जो मित्र के यहाँ खाना खाया है वह सात्विक था उसमें शरीर के पोषण का ध्यान रखकर बनाया गया था वह समझ गया था अपना उत्तर

भोजन जीवन का आधार है। आधार हमेशा मजबूत होना चाहिए न कि मजबूरी, लापरवाही, अज्ञान अथवा अविवेक पूर्ण आचरण का भोजन कितना ही संतुलित, पौष्टिक, सुपाच्य, स्वास्थ्यवर्धक क्यों न हों, परन्तु यदि खिलानें वाले का व्यवहार अच्छा न हों, उपेक्षापूर्ण हों, वाणी में व्यंग और भाषा में अपमानजनक शब्दावली हों तो ऐसा भोजन भी अपेक्षित लाभ नहीं पहुँचा सकता। भोजन को प्रसाद की भांति खाना चाहिए। खाया हुआ भोजन तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल भाग मल बनता है, पोष्टिक तत्त्वों से शरीर के अवयवों का निर्माण होता है। अन्न के भावांश से मन बनता है। पेट तो भोजन से भर सकता है, परन्तु मन तो भोजन बनाने और खिलाने वालों के भावों से ही भरता है। इसी कारण होटल के स्वादिष्ट खाने से पेट तो भर सकता है, परन्तु मन नहीं।

आधुनिक खान-पान की एक और विसंगति है कि जब शरीर श्रम करता है, तब उसे कम आहार दिया जाता है परन्तु जब वह विश्राम की अवस्था में होता है, तब उसे अधिक मात्रा में कैलोरीयुक्त आहार दिया जाता है। जैसे दिन का समय जो मेहनत परिश्रम का होता है तब तो हल्का भोजन, नाश्ता, चाय, काफी, ठंड़े पेय आदि कम कैलोरी वाले आहार करता है और रात्रि में जो विश्राम का समय होता है, प्रायः अधिकांश व्यक्ति गरिष्ठ भोजन करते हैं, जो स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों के विपरीत होता है।


स्वाद के वशीभूत हो हम कभी-कभी अनावश्यक हानिकारक वस्तुएँ खाते हुए भी संकोच नहीं करते। भूख एवं आवश्यकता से ज्यादा भोजन कर लेते हैं। जीभ के स्वादवश अधिक आहार हो जाता है तो कभी अतिव्यस्तता के कारण भोजन ही छूट जाता है। अधिक खाना और न खाना दोनों स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। तामसिक भोजन करने वाला तामसिक वृत्तियों वाला होता है। तामसिक व्यक्ति शरीर के लिए जीता है। राजसिक भोजन से मन और बुद्धि चंचल होती है। राजसिक प्रवृत्ति वाले अत्यधिक महत्वकांक्षी होते हैं। अतः उन्हें उत्तेजना पैदा करने वाला भोजन अच्छा लगता है। सात्विक भोजन ही संतुलित होने से सर्व श्रेष्ठ होता है। भोजन के सम्बन्ध में हमारी प्राथमिकता क्या हो? जिस प्रकार बिना कपड़े पहने आभूषण पहिनने वालों पर दुनियाँ हँसती है। ठीक उसी प्रकार शरीर की पौष्टिकता के नाम पर मन, भाव और आत्मा को विकारी बनाने वाला भोजन अदूरदर्शितापूर्ण आचरण ही होता है।

अतः प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी सजग व्यक्ति को भोजन कब, क्यों, कितना, कहाँ, कैसा करना चाहिए और कब, कहाँ, कैसा, कितना भोजन नहीं करना चाहिए का विवेक रखना चाहिए।

!!! ऐसा भोजन करें जो मन को शांति दे !!!

क्या हमारे खाने का संबंध हमारे मन के शांत रहने या व्यग्र रहने से है? तो जवाब है- हां है। भारतीय परंपरा में सदा से ये बात मानी जाती रही है कि हम जो खाते हैं उसका संबंध तन से ही नहीं, मन से भी है। इस अनुसार तामसिक भोजन क्रोध और उद्वेग पैदा करता है। राजसी भोजन आलस्य लाता है। सात्विक भोजन मन के लिए शांति और तप के लिए ऊर्जाकारक होता है।



बहुत से नए वैज्ञानिक अनुसंधान इस बात की ताकीद करते हैं। वे भोजन को ठीक इन्हीं तीन प्रकारों में तो विभक्त नहीं करते, मगर यह जरूर बताते हैं कि हम जिस प्रकार का भोजन करते हैं उसका असर हमारे भावनात्मक उद्वेगों पर जरूर पड़ता है।

एक महिला को पैनिक अटैक आते थे। यानी जब यह अटैक आता तब व्यग्रता बहुत बढ़ जाती, ऐसा लगने लगता धड़कन बहुत बढ़ गई है, पसीना आने लगता और घबराहट होने लगती। सारे लक्षण हृदयाघात जैसे मगर हृदयाघात नहीं। तब मनोचिकित्सक ने इस महिला को दवाइयां तो दीं ही मगर साथ ही में एक भोजन-योजना भी बनाकर दी। इस भोजन योजना के अनुसार उन्हें समय पर भोजन करना था। सादा मगर संपूर्ण और पौष्टिक भोजन करना था। डॉक्टर का कहना था- इससे मस्तिष्क भी शांत रहेगा, व्यग्रता के दौरे नहीं आएंगे।

अनाज और दालों से हमें लो ग्लाईकेमिक इंडेक्स वाला भोजन मिल जाता है। यह भोजन शरीर में धीरे-धीरे शर्करा रिलीज करता है। इससे शरीर में लगातार ऊर्जा बनी रहती है, मस्तिष्क शांत रहता है और अधिक समय तक पेट भरे रहने का एहसास होता है। हमारा रोज का भोजन, जिसमें अन्ना, दालें, सब्जियां और दूध होता है, इसी उत्तम भोजन की श्रेणी में आता है।

वहीं भोजन में प्रोटीन हो तो वह हमें ऊर्जा देता है। मगर जब हम हाई ग्लाईकेमिक इंडेक्स वाली चीजें खाते हैं जैसे रिफाइंड शकर, मैदा आदि तो रक्त में शर्करा का स्तर एकदम उछलता है और गिरता है। जब गिरता है तो शरीर और शकर मांगता है। बार-बार और जल्दी-जल्दी भूख लगती है। कचौड़ी, पकौड़ी, बर्गर, पित्जा, पेस्ट्री, गुलाब जामुन आदि इसी गरिष्ठ भोजन की श्रेणी में आते हैं जो व्यक्ति को लद्दू, उत्तेजित और मोटा बनाते हैं। अतः समय पर सामान्य भोजन करने से इस स्त्री को बेहद राहत मिली। वर्ना या तो वह भूखी रहती थी, दुबले होने के लिए कुछ खाती-पीती नहीं थी, या फिर भूख सहन न होने पर तला हुआ, गरिष्ठ जो हाथ पड़ा वह खा लेती थी। यह सब मस्तिष्क में हार्मोनों के उतार-चढ़ाव के जरिए उसके व्यग्रता रोग में और बढ़ोतरी कर रहा था।

दरअसल, अंट-शंट खाने के साथ ही भूख को दबाना भी अवसाद पैदा करता है। अच्छी भूख लगना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी मानी गई है। मगर वेट-वॉच कर रही स्त्रियां भूख लगने से डरती हैं। वेट-वॉच इंडस्ट्री भूख दबाने की गोलियां बेचती है। इसका उल्टा असर होता है। भूख दबाने से वजन घटता नहीं बढ़ता है, क्योंकि इससे पाचक रसों का स्रतवन चक्र बिगड़ जाता है, चयापचय धीमा हो जाता है।

नतीजा यह कि शरीर आपातकाल के लिए वसा जमा करने लगता है। इससे वजन बढ़ता है, सुस्ती बढ़ती है। ग्लूकोज की पूर्ति न होने से एकाग्रता घटती है। अतः तन और मन दोनों की राहत के लिए जरूरी है समय पर, संतुलित, संपूर्ण, सादा, स्वादिष्ट, पौष्टिक भोजन करना। आजकल मनोरोगों के इलाज में भी यह धारा काम कर रही है। मनोचिकित्सक भी मरीज को बताने लगे हैं कि दवाइयों के साथ ही भोजन और व्यायाम की भूमिका उनके जीवन में क्या होनी चाहिए।
श्रावण मास में मंत्रों के जपने से भोले भंडारी शिव जी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। मनोकामना पूर्ति, जीवन में सफलता-सुख-शांति और सिद्धी के लिए इनका अवश्य पाठ करना चाहिए। प्रस्तुत है शिव के सरल मंत्र जिनका प्रतिदिन रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिए।

शिव के सरल मं‍त्र
* ॐ नमः शिवाय ।
* प्रौं ह्रीं ठः ।
* ऊर्ध्व भू फट् ।
* इं क्षं मं औं अं ।
* नमो नीलकण्ठाय ।
* ॐ पार्वतीपतये नमः ।
* ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय ।
* ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा ।



!!! घर में लगाएं धन समृद्घि का पौधा !!!

घर के सामने कुछ पेड़-पौधे भी मकान और मनुष्य के भाग्य को बदल देते हैं। कुछ पेड़ पौधों का प्रभाव ऐसा होता है कि आप पतन के गर्त में चले जाते हैं। इसीलिए घर के सामने पेड़-पौधे सोच-समझकर लगाएं। घर के सामने कांटेदार पेड़ पौधे, जैसे कि बेर या करौंदा के पेड़ नहीं लगाने चाहिए। यह बेवजह कलह को आमंत्रित करते हैं। अगर घर के सामने तुलसी, आंवला, मेहंदी, आम, शमी, हरसिंगार आदि शुभ पौधा हो, तो लक्ष्मी आती है। घर के पास भारी-भरकम वृक्ष नहीं होने चाहिए। ध्यान रहे कि ईशान कोण में तो बिल्कुल नहीं होने चाहिए। घर के सामने ईशान कोण में आंवला, शमी, श्वेतार्क, तुलसी, हरसिंगार, आम अवश्य लगाने चाहिए। घर के अंदर केले के पेड़ को न लगाएं। कैक्टस भी न रखें। प्रतिदिन सभी पौधों और पेड़ों की देखभाल करनी चाहिए। इससे देवता और पितर प्रसन्न होते हैं। घर के मुख्य द्वार या फिर चारों तरफ देवदार के पेड़ भी इस तरह लगाने चाहिए कि मुख्यद्वार पर उनसे आड़ न हो।

शमी से खुश रहते हैं शनि


नवग्रहों में शनि महाराज को न्यायाधीश का स्थान प्राप्त है। इसलिए जब शनि की दशा आती है तब अच्छे बुरे कर्मों का पूरा फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि शनि के कोप से लोग भयभीत रहते हैं। शनि को खुश करने के लिए कई उपाय है जिनमें एक उपाय है वृक्ष पूजा।

पीपल और शमी दो ऐसे वृक्ष हैं जिन पर शनि का प्रभाव होता है। कहते हैं कि इनकी पूजा से शनि प्रसन्न हो जाते हैं। पीपल का वृक्ष बहुत बड़ा होता है इसलिए इसे घर में नहीं लगाया जा सकता है।

बोनसाई वृक्ष उन्नति का मार्ग अवरोध करता है इसलिए बोनसाई पीपल भी नहीं लगाना चाहिए। ऐसे में शमी का पौधा ही घर में लगाकर शनि को प्रसन्न किया जा सकता है।

वास्तु विज्ञान के अनुसार नियमित शमी वृक्ष की पूजा की जाए और इसके नीचे सरसो तेल का दीपक जलाएं तो शनि दोष से कुप्रभाव से बचाव होता है। नवरात्र में विजयादशमी के दिन शमी की पूजा करने से घर में धन दौलत का आगमन होता है।

शमी का पौधा नकारात्मक प्रभाव को दूर करता है। टोने-टोटके के कारण प्रगति में आने वाले अवरोध को भी शमी शमन करता है।



24 July 2013

!!! कीमती रत्नों का काम करती है पेड़-पौधों की जड़ें !!!

कई लोग ज्योतिष से इसलिए भी घबराते हैं क्योंकि कई ज्योतिषी व्यक्ति को ऊंची कीमतों वाले रत्न पहनने का सुझाव देते हैं। ज्योतिष में ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए केवल महंगे रत्न पहनना आवश्यक नहीं है। कई अन्य तरीके भी हैं जिससे बिना ज्यादा खर्च किए, बिना महंगे रत्न पहने भी ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। ऐसा ही एक तरीका
यदि आपकी कुंडली में कोई ग्रह खराब फल दे रहा हो या अशुभ है तो, ज्योतिषी उस ग्रह के अनुसार रत्न पहनने की सलाह देते है लेकिन यदि किसी कारण से आप रत्न नहीं पहन सकते या पहनना नहीं चाहते हैं तो, आप उस ग्रह से संबंधित पेड़-पौधों की जड़ को पहन कर संबंधित ग्रह को अपने अनुकूल कर सकते है। किस ग्रह के लिए कौन सी जड़? - यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य अशुभ प्रभाव दे रहा हो और सूर्य के लिए माणिक रत्न एफोर्ड नहीं कर सकते हैं तो, विकल्प के रूप में सूर्य को बल देने के लिए बेलपत्र की जड़ लाल या गुलाबी धागे में रविवार को धारण करें।


- चंद्र के शुभ प्रभाव के लिए सोमवार को सफेद वस्त्र में खिरनी की जड़ सफेद धागे के साथ धारण करें। - मंगल को बलवान बनाने के लिए अनंत मूल या खेर की जड़ को लाल वस्त्र के साथ लाल धागे में मंगलवार को धारण करें। - बुधवार के दिन हरे वस्त्र के साथ विधारा (आंधीझाड़ा) की जड़ को हरे धागे में पहनने से बुध देव प्रसन्न होते है। - गुरु को बल देने के लिए केले की जड़ गुरुवार को पीले धागे में धारण करें। - गुलर की जड़ को सफेद वस्त्र में लपेट कर शुक्रवार को सफेद धागे के साथ गले में धारण करने से शुक्र देव प्रसन्न होते हैं।-शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शमी पेड़ की जड़ को शनिवार के दिन नीले वस्त्र में धारण करना चाहिए।-राहु को बल देने के लिए सफेद चंदन का टुकड़ा नीले धागे में बुधवार के दिन धारण करें।- केतु के शुभ प्रभाव के लिए अश्वगंधा की जड़ नीले धागे में गुरुवार के दिन धारण करें।


!!! शमी का पुष्प चढ़ाएं !!!

— "शमी" वृक्ष ही यज्ञ की समिधाओं के लिए उपयुक्त वृक्ष है. यह बबूल और कीकर जाति का ही वृक्ष है. शमी वृक्ष की फलियों को खाकर कई दिनों तक ऋषि-मुनि भूखे रह सकते थे. इसे खाने से उपवास क्षमता बढ़ती है. शरीर पर कोई अधिक प्रभाव भी नहीं पड़ता. चर्बी घट जाति है.यह राजस्थान का राज्य वृक्ष है; स्थानीय भाषा में इसे खेजडी कहते है तथा इसका वानष्पतिक नामप्रोसोपिस सिनरेरिया है. 


शमी शनि ग्रह का पेड़ है. राजस्थान में सबसे अधिक होता है . छोटे तथा मोटे काँटों वाला भारी पेड़ होता है. कृष्ण जन्मअष्टमी को इसकी पूजा की जाती है . बिस्नोई समाज ने इस पेड़ के काटे जाने पर कई लोगों ने अपनी जान दे दी थी. यह पेड़ बरसात में अपने आप पैदा होता है . इस पेड़ के फल को सांगर और साँगरी भी कहते है. 


कहा जाता है कि इसके लकड़ी के भीतर विशेष आग होती है जो रगड़ने पर निकलती है ... इसे शिंबा; सफेद कीकर भी कहते हैं. 


शमी अर्थात छोंकर या खेजड़ के वृक्ष का बल्लभ संप्रदाय में अधिक महत्व माना गया है। इस वृक्ष का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि इसकी जड़, तना, छड़े पत्तियां आदि सभी काम आते हैं, इस वृक्ष का महत्व केवल इस बात में भी नहीं है कि राजस्थानी किसान की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार यह वृक्ष है। खेजड़ के पेड़ का नाम ही शमी वृक्ष है जिस पर महाभारत के युद्ध के समय बभ्रुवाहन का सर टांगा था. 
खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है।

इसके अन्य नामों में घफ़ (संयुक्त अरब अमीरात), खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी (राजस्थान), जंड(पंजाबी), कांडी (सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं।

इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है।
खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है।
जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है।
इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है।

इसकी जड़ से हल बनता है।

अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है।

सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे।
इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।
साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
खेजड़ी का वृक्ष राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता 'मींझर' बहुत प्रसिद्द है है। यह थार के रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है।

[१] दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है
[२] रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है।
[३] पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
[४] इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।
[5] शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है।
[६] वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है।
[७] इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।






आज हम आपको बताते हैं कि शिवलिंग पर कौन सा पुष्प चढ़ाना चाहिए और वह कितना पुण्य देने वाला है| शास्त्रों ने कुछ फूलों के चढाने से मिलने वाले फल का महत्व बतलाया है | वैसे भी पूजा में कुदरती सामग्रियों के चढ़ावे का महत्व है। जिनमें अनेक तरह-तरह के पेड़-पौधों के पत्ते, फूल और फल शामिल होते हैं। शास्त्रों में भगवान शिव पर फूल चढाने का बहुत अधिक महत्व बताया गया है| 

एक फूल शिव पर चढ़ाना से सोने के दान के बराबर फल देता है वो है आक के फूल को चढाने से मिल जाता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व-पत्र से मिल जाता है जिस तरह पापो के नाश के लिए शिव पर बिल्व पत्र से शिव खुश होते है|

हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी। हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराकर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है|







साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता 'मींझर' बहुत प्रसिद्द है है। यह थार के रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है। [1] दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है|[2] रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।[3] शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।



विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। मान्यता है कि यह भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। 

आज भी कई स्थानों पर 'रावण दहन' के बाद घर लौटते समय शमी के पत्तेस्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है।

महाभारत में महत्त्व

शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है। अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवों ने अपने सारे अस्त्र शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी और उससे शक्ति और विजय प्राप्ति की कामना की थी। तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है -


शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया ।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ॥


अनुवाद :

हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन काधनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।


अन्य कथा

अन्य कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।


मान्यताएँ

शमी वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये भी शमी की पूजा करी जाती है। शमी को गणेश जीका भी प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं।


विभिन्न प्रांतों में बिहार, झारखण्ड और आसपास के कई राज्यों में भी इस वृक्ष को पूजा जाता है। यह लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है।

राजस्थान के विशनोई समुदाय के लोग शमी वृक्ष को अमूल्य मानते हैं।


ऋग्वेद के अनुसार:

शमी के पेड़ में आग पैदा करने कि क्षमता होती है और ऋग्वेद की ही एक कथा के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं (चंद्रवंशियों के पूर्वज) ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी।

कवियों और लेखकों के लिये शमी बड़ा महत्व रखता है। हिन्दू धर्म में भगवान चित्रगुप्त को शब्दों और लेखनी का देवता माना जाता है और शब्द-साधक यम-द्वितीया को यथा-संभव शमी के पेड़ के नीचे उसकी पत्तियों से उनकी पूजा करते हैं।















!!! भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है !!!




सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।


ज्योतिर्लिंग स्थल, भारत के मानचित्र पर


1. श्री सोमनाथ काठियावाड़ (गुजरात) के अंतर्गत प्रभास क्षेत्र में विराजमान है।


सर्वप्रथम एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया । आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी । प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया । इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी । अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया ।

१०२४ के डिसम्बर महिनेमें मुहमद गजनवी ने कुछ ५,००० साथीयों के साथ लूट चलाकर स्वम इस मंदिर के लिंग के नाश करने में महत्व का भाग लिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोडकर पूजा अर्चना कर रहे थे ओर किसीने सामना नहीं किया। प्रायः सभी की कत्ल कर दी गई। लूट के माल के साथ लिंग के पत्थरों के टुकडे ग़ज़नी ले गया ओर मस्जिद में सीढ़ियों में लगवा दिये गये। [१][२]

इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया । सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया । मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया । इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया ।

2. श्रीशैल पर्वत आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर है, इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं। यहां श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं।


श्रीशैलम (श्री सैलम नाम से भी जाना जाता है) नामक ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाडी पर स्थित है। यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है। मंदिर का गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते। इस कारण यहाँ दर्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। स्कंद पुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।

3. श्री महाकालेश्वर मालवा क्षेत्र (मध्यप्रदेश) में क्षिप्रा नदी के तटपर उज्जैन नगर में विराजमान है, उज्जैन को अवंतिकापुरी भी कहते हैं।


भारत के मध्यप्रदेश प्रान्त में स्थित उज्जैन नगर के दर्शनीय स्थलों में महाकालेश्वर का मंदिर प्रमुख है। यह देश के १२ ज्योतिर्लिगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। १२३५ ई. में अलतमस के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंश करने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया है इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् ११०७ से १७२८ ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग ४५०० वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन १६९० ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और २९ नवंबर १७२८ को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन १७३१ से १८०९ तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहां दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी- पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर िशवलिंग स्थापित है। मंदिर का क्षेत्रफल १०.७७ x १०.७७ वर्गमीटर और ऊंचाई २८.७१ मीटर है। महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा सा जलस्रोत है जिसे ``कोटितीर्थ`` कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि अलतमस ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन १९६८ के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया है। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया है। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा १९८० के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया गया है। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है।


टीका टिप्पणी

वक्र: पंथा यदपि भवन प्रस्थिताचोत्तराशाम
सौधोत्संग प्रणयोविमखोमास्म भरूज्जयिन्या:।
विद्युद्दामेस्फरित चकितैस्त्र पौराड़गनानाम
लीलापांगैर्यदि न रमते लोचननैर्विंचितोसि।। - कालिदास

4. मालवा क्षेत्र में ही ॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के तट पर है। उज्जैन से खण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और अमलेश्वर के दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं।


ॐकारेश्वर एक हिन्दू मंदिर है। यह मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है। यह नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगओं में से एक है। यह यहां के मोरटक्का गांव से लगभग 12 मील (20 कि.मी.) दूर बसा है। यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बना है। यहां दो मंदिर स्थित हैं।

* ॐकारेश्वर
* अमरेश्वर

ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। यह नदी भारत की पवित्रतम नदियों में से एक है, और अब इस पर विश्व का सर्वाधिक बड़ा बांध परियोजना का निर्माण हो रहा है।

जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है।

इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं तथा 2 ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं। मध्यप्रदेश में देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ममलेश्वर (अमलेश्वर) के रूप में विराजमान हैं।

देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से यहाँ नित्य मृत्तिका के 18 सहस्र शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन करने के पश्चात उन्हें नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता है। ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम 'मान्धाता' है।

राजा मान्धाता ने यहाँ नर्मदा किनारे इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिवजी के प्रकट होने पर उनसे यहीं निवास करने का वरदान माँग लिया। तभी से उक्त प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओंकार-मान्धाता के रूप में पुकारी जाने लगी। जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।

नर्मदा क्षेत्र में ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। शास्त्र मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहाँ नहीं चढ़ाता उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। शास्त्र मान्यता के अनुसार जमुनाजी में 15 दिन का स्नान तथा गंगाजी में 7 दिन का स्नान जो फल प्रदान करता है, उतना पुण्यफल नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं।

नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसकी लाखों भक्तों द्वारा 1 हजार 780 मील की लंबी परिक्रमा की जाती है। नियम से उक्त परिक्रमा 108 दिनों में संपन्न की जाती है।

5. महाराष्ट्र के पासे परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग है। परंतु शिवपुराण में वैद्यनाथं चिताभूमौ ऐसा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगना (झारखंड) में जसीडीह स्टेशन के पासवाला वैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से भी देवघर में ही श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग का प्रमाण मिलता है।


यह ज्*योतिर्लिंग झारखंड के देवघर नाम स्*थान पर है। कुछ लोग इसे वैद्यनाथ भी कहते हैं। देवघर अर्थात देवताओं का घर। बैद्यनाथ ज्*योतिर्लिंग स्थित होने के कारण इस स्*थान को देवघर नाम मिला है। यह ज्*योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस लिंग को 'कामना लिंग' भी कहा जाता हैं।

इस लिंग स्थापना का इतिहास यह है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही ािा शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-ज्यों कर दिये और फिर वरदान मांगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ कि यदि मार्ग में इस पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगां अंतोगत्वा वहीं हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला, पर मार्ग में यहा चिताभूमि में आने पर उसे लघुशंका निवृत्तिा की आवश्यकता हुई और वह उस लिंग को एक अहीर को थमा लघुशंका-निवृत्ता के लिये चला गया। इधर उस अहीर से उसे बहुत अधिक भारी अनुभवकर भूमिकर रख दिया। बस, फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अंगूठा गड़ाकर लंका को चला गयां इधर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की और शिवजी का दर्शन करके उनकी वहीं प्रतिष्ठा की और स्तुति करते हुए स्वर्ग चले गये। यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग महान् फलों का देनेवाला है।

बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मंदिर भी हैं। शिवजी का मंदिर पार्वती जी के मंदिर से जुड़ा हुआ है।

बैद्यनाथ की यात्रा श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) शुरु होती है। सबसे पहले तीर्थयात्री सुल्तानगढ़ में एकत्र होते हैं जहां वे अपने-अपने पात्रों में पवित्र जल भरते हैं। इसके बाद वे बैद्यनाथ और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते हैं। पवित्र जल लेकर जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह पात्र जिसमें जल है, वह कहीं भी भूमि से न सटे।

बासुकीनाथ अपने शिव मंदिर के लिए जाना जाता है। बैद्यनाथ मंदिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक बासुकीनाथ में दर्शन नहीं किए जाते। यह मंदिर देवघर से 42 किमी. दूर जरमुंडी गांव के पास स्थित है। यहां पर स्थानीय कला के विभिन्न रूपों को देखा जा सकता है। इसके इतिहास का संबंध नोनीहाट के घाटवाल से जोड़ा जाता है। बासुकीनाथ मंदिर परिसर में कई अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी हैं।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर के पश्चिम में देवघर के मुख्य बाजार में तीन और मंदिर भी हैं। इन्हें बैजू मंदिर के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों का निर्माण बाबा बैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के वंशजों ने करवाया था। प्रत्येक मंदिर में भगवान शिव का लिंग स्थापित है।

23 July 2013

!!! शिव जी के दस प्रमुख अवतार !!!



शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के दस प्रमुख अवतार ।
यह दस अवतार इस प्रकार है जो मानव को सभी इच्छित फल प्रदान करने वाले हैं-

1. महाकाल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का महाकाल स्वरुप अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला परम कल्याणी हैं। इस अवतार की शक्ति मां महाकाली मानी जाती हैं।

2. तार- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दूसरा अवतार तार नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का तार स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति दोनों फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी जाती हैं।

3. बाल भुवनेश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में तीसरा अवतार बाल भुवनेश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बाल भुवनेश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना जाता हैं।

4.षोडश श्रीविद्येश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में चौथा अवतार षोडश श्रीविद्येश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का षोडश श्रीविद्येश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी षोडशी श्रीविद्या माना जाता हैं।

5. भैरव- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पांचवा अवतार भैरव नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का भैरव स्वरुप अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति भैरवी गिरिजा मानी जाती हैं।

6. छिन्नमस्तक- शिव के दस प्रमुख अवतारों में छठा अवतार छिन्नमस्तक नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का छिन्नमस्तक स्वरुप अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं।

7. धूमवान- शिव के दस प्रमुख अवतारों में सातवां अवतार धूमवान नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का धूमवान स्वरुप अपने भक्तों की सभी प्रकार से श्रेष्ठ फल देने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी धूमावती माना जाता हैं।

8. बगलामुख- शिव के दस प्रमुख अवतारों में आठवां अवतार बगलामुख नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बगलामुख स्वरुप अपने भक्तों को परम आनंद प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी बगलामुखी माना जाता हैं।

9. मातंग- शिव के दस प्रमुख अवतारों में नौवां अवतार मातंग के नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का मातंग स्वरुप अपने भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी मातंगी माना जाता हैं।

10. कमल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दसवां अवतार कमल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का कमल स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी कमला माना जाता हैं।

विद्वानो के मत से उक्त शिव के सभी प्रमुख अवतार व्यक्ति को सुख, समृद्धि, भोग, मोक्ष प्रदान करने वाले एवं व्यक्ति की रक्षा करने वाले हैं।



!!! चंद लम्हों का यह शिव मंत्र..सारी दिक्कतों का जल्द करे काम तमाम !!!



हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक त्रिदेवों में ब्रह्मदेव सृष्टि, विष्णु पालन तो शिव संहारक शक्ति के रूप में पूजनीय है। हालांकि त्रिदेव एक ही ईश्वर की तीन शक्तियां और कल्याणकारी स्वरूप माने जाते हैं। खासतौर पर शिव नाम का अर्थ और भाव ही कल्याण, शुभ और मंगल से हैं। जिसमें संकेत साफ है कि शिव नाम या भक्ति मन, वचन और कर्म में शुभ को स्थान देकर अशुभ से दूर ले जाते हैं।

शास्त्र कहते हैं कि शिव नाम बुरे भाव, विचार व इच्छाओं का अंत कर प्राणी को जगत के कल्याण का कारण बनाता है। शिव का तमोगुणी संहारक रूप भी असल में तामसी, पापी या बुरी शक्तियों का अंत कर कर धर्म व सद्गुणों का रक्षक है, जो जगत के लिए कल्याणकारी ही है। इसलिए वह शिव व शंकर यानी निराकार व साकार दोनों ही रूपों में वंदनीय है।

सांसारिक जीवन में भी अनेक अवसरों पर इच्छा या स्वार्थ के वशीभूत होने से हर इंसान के मन या विचारों में पैदा हुए दोष छोटी या बड़ी परेशानियों का कारण बनते हैं। शास्त्रों में बताए कुछ शिव मंत्र मन को पावनता से जोड़ सारी दिक्कतों का जल्द अंत करने वाले माने गए हैं।

खासतौर पर सोमवार या विशेष शिव तिथि पर यहां बताए जा रहे शिव मंत्र का स्मरण पाप व संकटनाशक माना गया है। सोमवार को शिव की सफेद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, सफेद फूल के साथ दूध से बनी सफेद रंग की मिठाईयों का भोग लगाएं। धूप व दीप लगाकर नीचे लिखा शिव मंत्र बोलें व शिव की आरती कर कष्ट व संकटमुक्ति की कामना करें -

नमो रुद्राय महते सर्वेशाय हितैषिणे।
नन्दी संस्थाय देवाय विद्याभकराय च।।
पापान्तकाय भर्गाय नमोनन्ताय वेधसे।
नमो मायाहरेशाय नमस्ते लोकशंकर।।


!!! बिल्वपत्र वृक्ष की इस मंत्र के साथ करें पूजा..खूब बरसेगी लक्ष्मी !!!


हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक बिल्वपत्र में शिव का वास माना गया है। बिल्वपत्र से शिव की पूजा भी पापनाशक मानी गई है। वहीं एक पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक बिल्वपत्र की पूजा लक्ष्मी कृपा से ऐश्वर्य और धनसंपन्न बनाने वाली भी है। क्योंकि माना जाता है कि जब समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुई तो लक्ष्मी का स्वामी बनने को लेकर देव-दानवों में संघर्ष हुआ। उस दौरान देवी ने बिल्वपत्र वृक्ष में समय बिताया और बाद में श्रीहरि विष्णु को अपना स्वामी चुना। इसलिए बिल्वपत्र श्रीवृक्ष के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।

यही कारण है कि देवी व शिव उपासना के विशेष दिनों नवमी व चतुर्दशी तिथि पर विशेष मंत्रों के साथ बिल्वपत्र पूजा पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाली बताई गई है। यह पूजा लक्ष्मी कृपा की कामना से हर रोज भी शुभ है।

जानते हैं विशेष मंत्र के साथ बिल्वपत्र पूजा का आसान उपाय-

- सुबह स्नान के बाद लाल या सफेद वस्त्र पहन बिल्वपत्र के वृक्ष की पूजा में चंदन, फूल व फूल माला, फल, वस्त्र, तिल, अनाज अर्पित करें। धूप व दीप जलाकर नीचे लिखा मंत्र बोल बिल्वपत्र वृक्ष की पूजा करें -

श्रीनिवास नमस्तेस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ।
ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्रहरो भव।।

- मंत्र पूजा के बाद लक्ष्मी कृपा की कामना के साथ शिव आरती या लक्ष्मी आरती भी करें और बिल्वपत्र की परिक्रमा करें। यथासंभव इस दिन बिना नमक का भोजन कर मौन व्रत रखें।


!!! नव गृह वाटिका ​ !!!


प्राचीन काल से मानव भविष्य को जानने की इच्छा रखता हॆ ऒर भविष्य सुधारने को प्रयत्नशील शील रहता हॆ:समभ्वत: उसके मन में यह विचार रहता हो कि पूर्व ज्ञान होने से समस्या का बेहतर निदान हो सकता हॆ, आकाशीय पिन्ड मानव जीवन एवं उसके दिन प्रतिदिन के व्यवहार पप कितना प्रभाव डालते हॆं, विवादास्पद विषय हॆ;
परम्परागत रूप मे ज्योतिषीय आधार में नवग्रह माने गये हॆं, सात दिनों पर आधारित सात ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध वॄह्स्पति,शुक्र, शनि ऒर दो छाया ग्रह राहु व केतु, प्रत्येक ग्रह का एक एक प्रतिनिधि पॊधा या वॄक्ष होता हॆ.इन पॊधों के संरक्षण व संवर्धन से मानवता का ऒर जीव का कल्याण होता हॆ,ऎसा प्राचीन ग्रंथों में कहा गया हॆ. आइये बारी बारी से इन प्रतिनिधि पॊधों के विषय में जाने;

१ सूर्य: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ मदार या आक इसे क्षीर-पर्ण,व अर्क भी कहते हें यह पूरे भारत में पाया जाता हॆ यह जंगली रूप बिना किसी विशेष देखभाल के उगता हॆ.यह कॆलोट्रोपिस प्रोसीरा कहलाता हॆ ऒर इसकी फ़ॆमिली हॆ- एसक्लिपियेडेसी. इसकी पत्तियो ऒर तने मॆं एक विषॆले तत्व fकेलोट्रोपिनf ऒर fकेलोट्रोपेजेनिनf होते हॆं.इसकी पत्तियों व तने को तोडने पर निकलने वाले सफ़ेद दूध नुमा रस जिसे लेटेक्स कहते हॆं, मेंffमदारेलबमf ऒर fमदारफ़्लूविलf नामक तत्व पाये जाते हॆं , यह पॊधा कागज़ बनाने के काम भी आता हॆ,इसका रस सूखने पर,गादा होकर गटापार्चा जॆसा हो जाता हॆ. आत्म हत्या व गर्भपातमें इसका प्रयोग प्राय; होता हॆ.


ऒषधीय गुण;मदार की जड, प्राय: हाथी-पांव रोग,कोढ, पुराने एक्जिमा के अतिरिक्त दस्तों व पेचिश में भी प्रयोग में लाते हॆं.मिस्र मेंअरब घाटी इसके फ़लों का आकर छोटे आम जॆसा होता हॆ.

संस्कॄत में इसे क्षीर पर्ण या अर्क कहते हॆं, मदार की विशेषता यह भी हॆ कि मदार ग्रीष्म को विकट परिस्थितियों को बखूबी सह लेता हॆ, भीषण गर्मियों मे जब ऒर पॊधे मॄत प्राय हो जाते हॆं मदार में बहार रहती हॆ.वॆद्य मनोरमा में मदार की तुलना सूर्य से करते हुए लिखा हॆ कि तीक्ष्णता ऒर उज्ज्वलता में सूर्य भगवान के समान हे अर्क! मॆं आपका अभि नन्दन करता हूं, जहां आप यानि

मदार नहीं होंगे वह्म ,उस प्रदेश में में नहीं रहूंगा. ;तो यह हॆ रोमयुक्त मांसल पत्तियों ऒर बॆजनी फ़ूल वाले मदार क्षीर पर्ण की महिमा. होमियोपॆथी में आक का प्रयोग कोढ से सुन्न पडे अंगों में नई चेतना के संचार हेतु लाते हॆं.






२ चंद्र: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ पलाश,जिसे सामान्य भाषा में किंशुक, टॆसू या ढाक भी कहते हॆं.,संस्कृत में इसे पलाश ही कहते हॆं.लॆटिन में यह ब्यूटिया फ़्रोंडोसा कहलाता हॆ.ऒर फ़ॆमिली हॆ-लॆग्यूमिनोसी.


एक कहावत प्रसिद्ध हॆ,-ढाक के तीन पात,,पलाश का पॊध बडा महत्वपूर्ण हॆ यह मध्यम ऊंचाई ,लगभग १५ मीटर का वॄक्ष हॆ.इसमें वसन्त ॠतु में,होली के आ आसपास सुन्दर गहरे लाल या नारंगी रंग के फूल आते हॆं.इन फ़ूलों से एक रंग भी तॆयार होता हॆ. एक कथा के अनुसार शिव पार्वती के एकान्त में बाधा पहुंचाने पर, पार्वती ने अग्नि देव को श्राप दे दिया जिसके फ़लस्वरूप यह पॊधा बना,अत: यह पलाश अग्नि का ही रूप हॆ. टेसऊ के बीज कामोत्तेजक होते हॆं. आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व हॆ. ढाक गरीब की क्रोकरी हॆ,पत्तल व दॊने इसी से बनते हॆं. दक्षिण भारत में जो काम केले के पत्तों से लिया जाता हॆ, उत्तर में वही काम ढाक के पत्ते करते हॆं. इसके तने से एक गॊंद मिलता हॆ जिसे कमर-कस कहते हॆं. यह स्त्री रोगों में बहुत काम आता हॆ. नोबुल पुरस्कार विजेता,प्रसिद्ध भारतीय कवि श्री रवीन्द्र नाथ टॆगोर को पलाश के फूल बहुत पसन्द करते थे ऒर उन्होंने शांतिनिकेतन में अपनी कुटिया के चारों ओर पलाश के वॄक्ष ही लगवाए,ऒर कुटिया क नाम रखा-पलाशी;उनकी साहित्व साधना यहीं से होती थी.



ऒषधीय गुण धर्म;ढाक की छाल व पत्तियों में काइनोटॆनिक एसिड तथा गॆलिक एसिड होता हॆ ऒर बीजों में पलासोनिन पाया जाता हॆ. पलाश के फूल स्तम्भक, तॄष्णा शामक कोढ दूर करने वाला,कह च पित्त नाशक,भूख बढाने वाले होते हॆ. पत्ते यकॄत उत्तेजक होते हॆं. इसका गोंद भी स्तम्भक, अम्लानाशक,खासी निवारक व संग्रहणी को दूर करता हॆ.पलाश के पत्तों का काढा पीने से अफ़ारा व पेट दर्द दूर होता हॆ.,पलाश के बीजों के चूर्ण क एक एक चम्मच दो बार खाने से पेट के सब कीडे मर कर बाहर आ जाते हॆं. इसकी जड के रस के सेवन से अनॆच्छिक वीर्यस्राव रुकता हॆ,ऒर काम शक्ति प्रबल होही हॆ ज्डों के रस में गेहूं के दाणे तीन दिन भिगो कर खाने से यॊन रोग ठीक हो जाते हॆं व काम शक्ति में वॄद्धि होती हॆ.


३.मंगल: का प्रतिनिधि हॆ खॆर या कत्था,लॆटिन में इसे अकेसिआ कटॆचू कहते हॆं,इसकी फ़ॆमिली मिमोसी हॆ.यह मध्यम ऊंचाई वाला कांटे दार वॄक्ष हॆ इसके कांटे बिल्ली के पंजों की तरह होते हॆं, इसी से इसे कटेचू नाम दिया गया हॆ. इसके पत्ते व बीज प्रोतीन युक्त होते हॆं इसका स्वरस वात सम्बन्धी रोगों को व सूजन को ठीक करता हॆ. दस्त ऒर पेचिश को भी ठीक करता हॆ.इसके पत्ते व टहनियां बकरी एवं ऊंट बडे चाव से खाते हॆं उनके लिए यह विशेष उपयोगी हॆ.
इसकी लकडी भी बहुत उपयोगी होती हॆ.इमारती लकडी की तरह ही अन्य उपकरणो एवं हलों को बनाने मे इसका इस्तेमाल होता हॆ,लकडी का कोयला भी अति मूल्यवान होता हॆ विशेषत: सोने,चांदी पर काम करने वालों के लिए. व लोहारों के लिए. हल, चाकू छुरी,तलवार की मूठ व हत्थे,हुक्के की नली व गन्ने की पिराई मे भी इसका उपयोग होता हॆ इस पर पॊलिश भी आसानी से व अच्छी हो
जाती हॆक तथा कफ़,पित्त संशोधक हॆ.यह सूजन को हटाने वाला,कीडॊं को मारने वाला,रक्त शोधक,रक्त वर्धक,पसीना लाने वाला,पाचक हॆ. त्वचा रोगोंमें सर्प, बिच्छू ततॆयां,भ्रमरी आदि के दंश पर इसके पत्तों क लेप बहुत गुणकारी होता हॆ

आधा सीसी; इसके बीजों का चूर्ण सूघने मात्र सेमस्तक के अन्दर जमा हुवा कफ़ पतला होकर नाक के रास्ते बाहर निकल आता हॆ.
दांतों के रोगों में,इसकी ताजी जड की दातुन करने से दांत मोती की तरह चमकने लगते हॆं,दांतों का दर्द,मसूढो की कमजोरी मुंह से दुर्गन्ध आना,दांत का हिलना भी ठीक हो जाता हॆ.






४.बुध या मरकरी: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ;अपामार्ग, लटजीरा या,चिरचिटा; लॆटिन में इसे कहते हॆं एकिरेंथस एस्पेरा ऒर इसकी फॆमिली हॆ-एमेरेंथेसी. अपामार्ग का अर्थ हॆ,जो दोषों को संशोधित करे असाध्य रोगों का भी अंत करे.अपामार्ग एक ऎसा दिव्य पॊधा हॆ जो प्रसव काल से लेकर जीवन के अंत समय तक के रोगों को दूर करने की क्षमता रखता हॆ.


यह पॊधा भारत में सभी प्रांतों में जंगलीरूप में पाया जाता हॆ. वर्षा ऋतु में यह विशेषकर पाया जाता हॆ.अपामार्ग का पोधा १ से ३ फ़ुट ऊंचा होता हॆ.शाखाएं पतली पर गांठों पर मोटा होता हॆ. पत्ते अडाकार ऒर र्रोम युक्त होते हॆं पुष्प मन्जरी पत्तों के बीच से निकलती हॆ. अपामार्ग में पॊटेशियम की मात्रा बहुत अधिक होती हॆ.


श्वास रोग, अपामार्ग की जड में बलगम,खांसी ऒर दमा को दूर करने के चमत्कारी गुण हॆं,इस पॊधे की ८-१० सूखे पत्तों को हुक्के में रख कर पीने से सांस लेने में लाभ होता हॆ.बच्चों की काली खांसी इसके बीजों की राख को शहद के साथ चटाने से जल्दी ही ठीक हो जाती हॆ. सुख प्रसव;प्रसव पीडा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग की जड को एक धागे से कमर में बांधने से आसानी से प्रसव होता हॆ.पर प्रसव के तुरन्त बाद उसे हटा लेना चाहिये. ८० वर्ष के वॄद्ध व्यक्ति भी अपामार्ग की जड से दातुन करें तो उनके दांत भी स्वस्थ देखे गये हॆं वॄद्धावस्था मे दांतों की मजबूती का यही रहस्य हॆ.








५.वॄहस्पति या गुरु जुपीटर: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ पीपल, या अश्वत्थ. लॆटिन में फ़ाइकस रॆलिजिओसा फ़ॆमिली हॆ-मोरेसी पीपल का वॄक्ष भारत में पवित्र माना जाता हॆ,एसा विश्वास हॆ कि इसी वॄक्ष के नीचॆ,गया में,भगवान बुद्ध ने कठिन तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया था.यह आज से बहुत पहले २८८बी.सी.में लगाया गया था, इस वॄक्ष को प्रसन्नता, स्मॄद्धि, दीर्ह्ग जीवन ऒर सॊभाग्य का प्रतीक माना गया हॆ. ऒषधीय गुण धर्म; .इस वॄक्ष की जड, छाल, पत्ते, फूल सभी उपयोगी होते हॆं.छाल प्रदर में उपयोगी,फल दस्तावर, ऒर बीज ठंडक देने वाले होते हॆं. पेड की छाल,बालों के कीदों को नष्ट करती हॆ.पत्तियां व नई कोंपलें पेट साफ़ करती हॆं.

इसके पेड घने व छायादार होतॆ हॆं, मन्द गति में भी हवा चले तो भी इसके पत्ते हिलने लगते हॆं,अत: इसके पत्ते अस्थिर चित्त का प्रतीक कहे गये हॆं उपमा दी जाती हॆ-पीपर पात सरिस मन डॊलाf अत: यह अस्थिर मन का प्रतीक भी हॆ.पीपल की ताजी टहनी प्रतिदिन दातुन करने से दांत मजबूत होते हॆं,मसूढों की सूजन व मुख कीदुर्ग>ध समाप्त हो जाती हॆ.पीपल के पत्ते गुड के साथ चबा कर खाने से पेट क दर्द खतम हो जाता हॆ. पीपल के पत्ते मिश्री के साथ घोट कर पीने से पीलिया रोग भी ठीक हो जाता हॆ.





६.शुक्र ,वीनस: का प्रतिनिधि वॄक्ष हॆ-गूलर,संस्कॄत मॆं इसे उदम्बर या उडम्बर कहते हॆं लॆटिन में फ़ाइकस रॆसीमोसा फ़ेमिली मोरेसी.,यह भी एकघना,छायादार ,पेड हॆ एक विशेष बात इसके बारे में यह हॆ कि प्राचीन ग्रथों में भी इसका वर्णन मिलता हॆ-खास कर अथर्व वेद में.जो लगभग २५०० साल पुराना हॆकहा जाता हॆ कि प्रसिध राजा हरिश्चन्द्र जो इक्षावाकु वंश के थे,उनका मुकुट उदम्बर वॄक्ष की टहनी से बना था जो सोने से जडी थी.ऒर उनका सिंहासन उदम्बर की ल्कडी से ही बना था.


अथर्ववेद के अनुसार गूलर का वॄक्ष पुष्टि देने में सर्व श्रेष्ठ कहागया हॆ. इसके फल का दूध घी के साथ सेवन करने से बूढा भी जवान हो जाता हॆ,ऒर कहा गया हॆ कि इंद्र देव की प्रेरणा से ही अपनी तेजस्विता के साथ यह ऒदुम्बर ,प्रजा व वॆभव के साथ हमे उपलब्ध हुआ हॆ..इसका तना लम्बा,मोटा तथा टेढा होता हॆ. इसमें फल सारे साल लगते रहते हॆं अत; इसे बारह मासी भी कहा जाता हॆ. इसमे फल गोलाकार १-२ इंच व्यास के,कच्ची अवस्था में हरे ऒर पकने पर हल्के लाल हो जाते हॆं.
इनमें टॆनिन,मोम व रबड तथा राख मॆं सिलिका ऒर फस्फोरिक एसिड पाये जाते हॆं.


ऒषधीय गुण धर्म: छाल व कच्चे फल स्तम्भन,प्रमेह नाशक ऒर दाह नाशक हॆ.पके फल श्लेश्म दूर करने वाले,मन को प्रसन्न करने वाले व दाह नाशक हॆ.५ग्रम गूलर के पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से रक्तपित्त मिटता हॆ. इससे रक्तातिसार में भी तुरन्त लाभ होता हॆ. इसके दूध की ८-१० बूंदें दो बताशों मे भर कर रोज खिलाने से मूत्र रोग मिटते हॆं.



७.शनि: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ-शमी,खिजरी या छ्योंकर,लॆटिन में- प्रोसोपिस स्पा सिजॆरा,इसका पर्याय हे प्रोसोपिस सिनेरेरिया,इसकि फ़ेमिली या कुल हॆ लॆग्यूमिनोसी. इसका इतिहास भी प्राचीन हॆ,प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत आठवीं पुस्तक में fकर्ण पर्वf में अध्याय ३०,श्लोक २४ में शमी,पीलू व करीर के वृक्षों का वर्णन हॆ.."विराट पर्व" में पांड्वों ने विराट की राजधानी मेम जाने से पूर्व अपने अस्त्रदि शमी वॄक्ष में ही छिपा के रखे थे.तमिल नाडु में इसे पवित्र पेड माना जाता हॆ ऒर भगवान शिव व श्री मुरुगन के मंदिरों के स्थल भी एसी वॄक्ष के नीचे होते हॆं.
शमी का वॄक्ष बडा उपयोगी होता हॆ.विशेष रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में क्यॊंकि वहां के वातावरण में यही पेड खूब फलता फूलता हॆ,रेत के टीलों एवं मिट्टी को इसकी जडॆ.बांध कर रखती हॆं इसकी पत्तियों को सभी मवेशी,भेढें, बकरियां, ऊंट,गधे, आदि के अतिरिक्त पश्चिमी राजस्थान में काला हिरन ऒर चिंकारा भी इसकी फलियों व पत्तियों पर निर्भर रहते हॆं.


ऒषधीय उपयोग व गुणधर्म;.

शमी के फूलों को पीस कर चीनी मिला कर खाने से गर्भावस्था के दॊरान गर्भपात नहीं होता.इसकी छाल को पानी में भिगो कर जो द्रव निकलता हॆ उसमें सूजन को दूर करने वाले गुण पाए जाते हशमी पॊधे से मई, जून के महीने मे एक गोंद प्राप्त होता हॆ. पेड की छाल कडवी,व तेज होती हॆ. कीडे मारने वाली,कोढ को ठीक करने वाली,पेचिश,अस्थमा,श्वास रोगों को मिटाने वाली,ल्यूकोडर्मा,मांसपेशियों के विकारों को ठीक करती हॆ. इसकी पत्तियों का धुआं नेत्रों को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि नेत्र रोगों को ठीक करता हॆ.वॄक्ष की छाल वात रोग,रोठिया,खांसी,सामान्य जुकाम,अस्थमा के साथ बिच्छू के काटे का भी इलाज होता हॆ, पंजाब में इससे सांप काटने का भी इलाज होता हॆ.


राजस्थान के बिशनोइ समाज "खेजरी वॄक्ष संरक्षण"पर भारत सरकार की सहायता से एकfअमॄता देवी बिशनोई वन्य जीवन संरक्षण राष्ट्रीय पुरस्कारfकी स्थापना की हॆ.




८.राहु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ दूब, राम घास,दूर्बा या,काली घास;संस्कॄत में इसे ध्रुव या हरितली व लॆटिन में इसे साइनोडोन डेक्टीलोन कहते हॆं.फ़ेमिली हॆ-पोएसी. नंगे पॆर चलना घास पर सेहत के लिए बहुत फ़ायदे मन्द होता हॆ.इससे नेत्र ज्योति बढ्ती हॆ ऒर शरीर की कई व्याधियां दूर हो जाती हॆं.


दूब घास विशेषता यह हॆ कि यह सूर्य के प्रकाश में हरा भरा रहता हॆ पर छाया में उतना नहीं.इसके विकास के लिये २४-३७.सी का तापमान सबसे उपयुक्त रहता हॆ.यह ४-१५ से.मी.तक लम्बा होता हॆ.इसकी जड बडी गहरी होती हॆ. ऒर सतह के नीचे २ मीटर तक फॆल सकती हॆ. गरम वातावरण मएं यह पूरे विश्व में पाया जाता हॆ.दूब घास ऒर घासों की तुलना में अधिक तेजी से फ़ेलता हॆ क्योंकि इसमे प्रतिकूल मॊसम को सहने की क्षमता हॆ.यह आक्रामक भी हॆ.इसी कारणसे इसे डेविल या शॆतान घास भी कहते हॆं. इसकी पत्तियां
भूरे हरे रंग की होती हं जिसमें से गुच्छॊं से ३-७ मन्जरी निकलती हॆं.




ऒषधीय गुण; दूब वाइरस ऒर बॆक्टीरिया प्रतिरोधी होता हॆ.इसे पानी में उबाल कर पानी के कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हॆं.दूब को चूने मे मिला कर पीस कर माथे पर लेप करने से सिर दर्द ठीकहो जाता हॆ.दूब का काढा वेदना नाशक हॆ मूत्र की जलन को शान्त करता हॆ,मूत्र नली के संक्रमण को दूर करने के अतिरिक्त यह प्रोस्ट्रेट ग्रन्थि, उपदंश व पेचिश के इलाज में भी काम आता हॆ


मधुमेह में व ग्लूकोज की कमी को दूर करने में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ हॆ.प्रयोग शाला के चूहों पर इलाहाबाद विश्व विद्यालय के शोध कर्ताओ ने अपने शोध मे यह पाया हॆ.इस बात की प्रबल सम्भावना हॆ कि भविष्य में मधु मेह क इलाज दूब घास से हो. आंख दुखने पर इसके पत्तों को पीस कर पलकों पर बांधने से आराम मिलता हॆ. इसकी जड मस्सों से रक्त प्रवाह रोकती हे.इसके पत्तों क रस ताजे जख्मों ऒर घावों पर लगाते हॆ.पेचिश ऒर दस्त भी इसी से ठीक होते हॆं.

९.केतु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ एक घास जेसे कहत्ते हॆं.- कुश,संस्कॄत में दर्भ,लॆटिन में इसे डॆस्मोस्टॆचिया बाइ-पिन्नेटा कहते हॆं. अथर्व वेद में इस दर्भ महिमा गायी गयी हॆ अथर्व वेद संहिता में लिखा हॆ कि जल वर्षक मेघ विद्युत के साथ गर्जना करते हें उससे स्वर्ण मय जल बिंदु ऒर कुश की उत्पत्ति हुई, ऒर पुरुषों को दीर्घ जीवन व तेजस्विता प्रदान करने के लिए दर्भ उनके शरीर से बांधा जाता हॆ. क्योंकि दर्भ शत्रु संहारक ऒर विद्वेशी शत्रुओं को संतप्त करने वाली हॆ. दर्भ पूरे भारत में गर्म व सुखे इलाकों में पाई जाती हॆ.




इसका तना मूत्र वर्धक,उत्तेजक तथा पेचिश में उपयोगी होता हॆ. नवीन तम खोजों से यह ज्ञात हुआ हॆ कि दर्भ के तने में पांच एल्केलायड पाए जाते हॆं जो किसी भी प्रकार के खून को बहने से रोकते की क्षमता रखते हॆं.

इस प्रकार हमने देखा कि सारे ग्रह ऒर उनके प्रतिनिधि पॊधे मानव जाति की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हॆं. दूरस्थ ग्रह मनुष्य की कितनी रक्षा कर सकते हॆं यह तो हमें मालूम नहॆं पर ये प्रतिनिधि पॊधे अपने गुणॊ से हमें जरूर कई बीमारियों से बचा सकते हॆं.