06 July 2013

!!! शिव पूजन में बिल्वपत्र का महत्व क्यों? !!!


भगवान शिव को हमारे धर्म शास्त्रों में बहुत ही भोला-भाला कहा गया है इसीलिए उनका नाम भोलेनाथ भी है। भगवान शिव जितने भोले हैं उनके पूजन की विधि भी उतनी ही सरल है। शिव मात्र एक लोटे जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं तथा अपने भक्तों का उद्धार करते हैं। शिव महापुराण में भगवान शिव के पूजन की विधि विस्तारपूर्वक दी गई है।

पूजन विधि में बिल्व पत्र का विशेष महत्व तथा उससे प्राप्त होने वाले फलों के बारे में भी बताया गया है।शिव महापुराण के विद्येश्वरसंहिता के अनुसार बिल्ववृक्ष महादेव का ही रूप है। तीनों लोकों में जितने पुण्य-तीर्थ प्रसिद्ध हैं, वे संपूर्ण तीर्थ बिल्व के मूलभाग में निवास करते हैं। जो मनुष्य बिल्व के मूल में लिंगस्वरूप अविनाशी महादेवजी का पूजन करता है वह निश्चय ही शिवपद को प्राप्त होता है।

जो गंध, पुष्प आदि से बिल्व के मूल भाग का पूजन करता है है वह शिवलोक को प्राप्त होता है। जो बिल्व की जड़ के समीप दीपक जलाता है वह तत्वज्ञान से सम्पन्न हो जाता है और भगवान महेश्वर में मिल जाता है। जो बिल्ब की जड़ के समीप भगवान शिव के उपासक को भक्तिपूर्वक भोजन कराता है उसे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है।

जो बिल्व की जड़ के समीप शिवभक्त को खीर और घृत युक्त अन्न दान करता है वह कभी दरिद्र नहीं होता। जो बिल्व की शाखा थामकर हाथ से उसके नए-नए पल्लव उतारता है तथा उनसे उस बिल्व की पूजा करता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।

!!! नवग्रह स्तोत्र !!!



नवग्रह देवा नमःॐ जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ।।१ ।।

ॐ दधि-शंख-तुषाराभं क्षीरोदार्णवसंभवम् ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम् ।।२ ।।

ॐ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्कांतिसमप्रभम् ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ।।३ ।।

ॐ प्रियङ्गुलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम् ।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ।।४ ।।

ॐ देवानां चा ऋषीणां च गुरूं काञ्चनसंन्निभम् ।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ।।५ ।।

ॐ हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरूम् ।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ।।६ ।।

ॐ नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।७ ।।

ॐ अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम् ।
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ।।८ ।।

ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम् ।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ।।९ ।।

इति व्यासमुखोद्गीतं य: पठेत्सुसमाहित: ।।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिभविश्यति ।।१० ।।


नरनारीनृपाणां च भवेत् दु:स्वप्ननाशनम् ।।
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम् ।।११ ।।


ग्रहनक्षत्रजा: पीडातस्कराग्निसमुद्भवा: ।।
ता: सर्वाः प्रशमं यान्ति व्यासो ब्रूते न संशय: ।।१२ ।।

इति श्रीव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं संपूर्णम् ।







!!! शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्. !!!



आशुतोष शशांक शेखर चंद्रमौली चिदंबरा 
कोटि कोटि प्रणाम शंभो कोटि नमन दिगम्बरा 
निर्विकार ओंकार अविनाशी तुम्ही देवाधिदेव 
जगत सर्जक प्रलयकर्ता शिवम सत्यम सुंदरा 
निरंकार स्वरुप कालेश्वर महाजोगिश्वरा 
दयानिधि दानिश्वरा जय जटाधारी अभ्यंकरा 
शूलपाणी त्रिशूल धारी औघडी बाघम्बरी 
जय महेश त्रिलोचनाय विश्वनाथ विश्वम्भरा 
नाथ नागेश्वर हरो हर पाप शाप अभिशाप तम 
महादेव महान भोले सदाशिव शिव शंकरा 
जगतपति अनुरक्ति भक्ति सदैव तेरे चरण हो 
छमा हो अपराध सब जय जयति जय जगदिश्वरा
जन्म जीवन जगत का संताप सब मिटे सभी 
ओम नम: शिवाय मन जपता रहे पंचाकछरा ..................................
अथ शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्.......

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम:शिवाय ॥ 1 ॥
मंदाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय ।
मण्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम:शिवाय ॥ 2 ॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय बृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम:शिवाय ॥ 3 ॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम:शिवाय ॥ 4 ॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम:शिवाय ॥ 5 ॥
पञ्चाक्षरिमदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ 6 ॥................................
ॐ नमः पार्वती पतये.....हर....हर....महादेव.............

05 July 2013

!!! भज गोविन्दम' स्तोत्र !!!




'भज गोविन्दम' स्तोत्र की रचना शंकराचार्य ने की थी। यह मूल रूप से बारह पदों में सरल संस्कृत में लिखा गया एक सुंदर स्तोत्र है। इसलिए इसे द्वादश मंजरिका भी कहते हैं। 'भज गोविन्दम' में शंकराचार्य ने संसार के मोह में ना पड़ कर भगवान् कृष्ण की भक्ति करने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार, संसार असार है और भगवान् का नाम शाश्वत है। उन्होंने मनुष्य को किताबी ज्ञान में समय ना गँवाकर और भौतिक वस्तुओं की लालसा, तृष्णा व मोह छोड़ कर भगवान् का भजन करने की शिक्षा दी है। इसलिए 'भज गोविन्दम' को 'मोह मुगदर' यानि मोह नाशक भी कहा जाता है। शंकराचार्य का कहना है कि अन्तकाल में मनुष्य की सारी अर्जित विद्याएँ और कलाएँ किसी काम नहीं आएँगी, काम आएगा तो बस हरि नाम।

भज गोविन्दम श्री शंकराचार्य की एक बहुत ही खूबसूरत रचना है। इस स्तोत्र को मोहमुदगर भी कहा गया है जिसका अर्थ है- वह शक्ति जो आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दे। छः व्याख्यानों के द्वारा मैंने इन पर रौशनी डालने का प्रयास किया है। सारे व्याख्यान हिंदी में हैं । अपने व्याख्यानों के दौरान मैं स्तोत्र का उल्लेख अवश्य करता हूँ ताकि आप इन्हें पूर्ण रूप से समझ सकें और इनका आनंद उठा सकें।



भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। 
सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे, नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥1॥ 

हे भटके हुए प्राणी, सदैव परमात्मा का ध्यान कर क्योंकि तेरी अंतिम सांस के वक्त तेरा यह सांसारिक ज्ञान तेरे काम नहीं आएगा। सब नष्ट हो जाएगा। 

मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्। 
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥2॥ 

हम हमेशा मोह माया के बंधनों में फसें रहते हैं और इसी कारण हमें सुख की प्राप्ति नहीं होती। हम हमेशा ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश करते रहते हैं। सुखी जीवन बिताने के लिए हमें संतुष्ट रहना सीखना होगा। हमें जो भी मिलता है उसे हमें खुशी खुशी स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम जैसे कर्म करते हैं, हमें वैसे ही फल की प्राप्ति होती है। 

नारीस्तनभरनाभीनिवेशं, दृष्ट्वा-माया-मोहावेशम्।
एतन्मांस-वसादि-विकारं, मनसि विचिन्तय बारम्बाररम् ॥3॥ 

हम स्त्री की सुन्दरता से मोहित होकर उसे पाने की निरंतर कोशिश करते हैं। परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुन्दर शरीर सिर्फ हाड़ मांस का टुकड़ा है। 

नलिनीदलगतसलिलं तरलं, तद्वज्जीवितमतिशय चपलम्। 
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥4॥ 

हमारा जीवन क्षण-भंगुर है। यह उस पानी की बूँद की तरह है जो कमल की पंखुड़ियों से गिर कर समुद्र के विशाल जल स्त्रोत में अपना अस्तित्व खो देती है। हमारे चारों ओर प्राणी तरह तरह की कुंठाओं एवं कष्ट से पीड़ित हैं। ऐसे जीवन में कैसी सुन्दरता? 

यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावत् निज परिवारो रक्तः। 
पश्चात् धावति जर्जर देहे, वार्तां पृच्छति कोऽपि न गेहे ॥5॥

जिस परिवार पर तुम ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, जिसके लिए तुम निरंतर मेहनत करते रहे, वह परिवार तुम्हारे साथ तभी तक है जब तक के तुम उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हो। 

यावत्पवनो निवसति देहे तावत् पृच्छति कुशलं गेहे। 
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥6॥


तुम्हारे मृत्यु के एक क्षण पश्चात ही वह तुम्हारा दाह-संस्कार कर देंगे। यहाँ तक की तुम्हारी पत्नी जिसके साथ तुम ने अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारी, वह भी तुम्हारे मृत शरीर को घृणित दृष्टि से देखेगी। 


बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥7॥

सारे बालक क्रीडा में व्यस्त हैं और नौजवान अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में समय बिता रहे हैं। बुज़ुर्ग केवल चिंता करने में व्यस्त हैं। किसी के पास भी उस परमात्मा को स्मरण करने का वक्त नहीं।

का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयं अतीव विचित्रः। 
कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥8॥

कौन है हमारा सच्चा साथी? हमारा पुत्र कौन हैं? इस क्षण-भंगुर, नश्वर एवं विचित्र संसार में हमारा अपना अस्तित्व क्या है? यह ध्यान देने वाली बात है। 

सत्संगत्वे निःसंगत्वं, निःसंगत्वे निर्मोहत्वं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥9॥

संत परमात्माओ के साथ उठने बैठने से हम सांसारिक वस्तुओं एवं बंधनों से दूर होने लगते हैं। 
ऐसे हमें सुख की प्राप्ति होती है। सब बन्धनों से मुक्त होकर ही हम उस परम ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं। 

वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः। 
क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥10॥

यदि हमारा शरीर या मस्तिष्क स्वस्थ नहीं तो हमें शारीरिक सुख की प्राप्ति नहीं होगी। वह ताल ताल नहीं रहता यदि उसमें जल न हो। जिस प्रकार धन के बिखर जाने से पूरा परिवार बिखर जाता है, उसी तरह ज्ञान की प्राप्ति होते ही, हम इस विचित्र संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। 

मा कुरु धन-जन-यौवन-गर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वम्। 
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्म पदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥11॥

हमारे मित्र, यह धन दौलत, हमारी सुन्दरता एवं हमारा गुरूर, सब एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। कुछ भी अमर नहीं है। यह संसार झूठ एवं कल्पनाओं का पुलिंदा है। हमें सदैव परम ज्ञान प्राप्त करने की कामना करनी चाहिए।

दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः। 
कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चति आशावायुः ॥12॥ 

समय का बीतना और ऋतुओं का बदलना सांसारिक नियम है। कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता। मृत्यु के सामने हर किसी को झुकना पड़ता है। परन्तु हम मोह माया के बन्धनों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते हैं। 

का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता। 
त्रिजगति सज्जन संगतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥13॥ 

सांसारिक मोह माया, धन और स्त्री के बन्धनों में फंस कर एवं व्यर्थ की चिंता कर के हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा। क्यों हम सदैव अपने आप को इन चिंताओं से घेरे रखते हैं? क्यों हम महात्माओं से प्रेरणा लेकर उनके दिखाए हुए मार्ग पर नहीं चलते? संत महात्माओं से जुड़ कर अथवा उनके दिए गए उपदेशों का पालन कर के ही हम सांसारिक बन्धनों एवं व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त हो सकते हैं । 

जटिलो मुण्डी लुञ्चित केशः काषायाम्बर-बहुकृतवेषः। 
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदरनिमित्तं बहुकृत शोकः ॥14॥ 

इस संसार का हर व्यक्ति चाहे वह दिखने में कैसा भी हो, चाहे वह किसी भी रंग का वस्त्र धारण करता हो, निरंतर कर्म करता रहता है। क्यों? केवल रोज़ी रोटी कमाने के लिए। फिर भी पता नहीं क्यों हम सब कुछ जान कर भी अनजान बनें रहते हैं। 

अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशन विहीनं जातं तुण्डम्। 
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चति आशापिण्डम् ॥15॥ 

जिस व्यक्ति का शरीर जवाब दे चूका है, जिसके बदन में प्राण सिर्फ नाम मात्र ही बचे हैं, जो व्यक्ति बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता, वह व्यक्ति भी स्वयं को सांसारिक मोह माया से छुड़ाने में असमर्थ रहा है। 

अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः। 
करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चति आशापाशः ॥16॥ 

समय निरंतर चलता रहता है। इसे न कोई रोक पाया है और न ही कोई रोक पायेगा। सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी।


कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्। 
ज्ञानविहिनः सर्वमतेन मुक्तिः न भवति जन्मशतेन ॥17॥ 

हमें मुक्ति की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है। लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्त नहीं होगा।

सुर-मन्दिर-तरु-मूल-निवासः शय्या भूतलमजिनं वासः। 
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥18॥ 

जो इंसान संसार के भौतिक सुख सुविधाओं से ऊपर उठ चुका है, जिसके जीवन का लक्ष्य शारीरिक सुख एवं धन और समाज में प्रतिष्ठा की प्राप्ति मात्र नहीं है, वह प्राणी अपना सम्पूर्ण जीवन सुख एवं शांति से व्यतीत करता है।

योगरतो वा भोगरतो वा संगरतो वा संगविहीनः। 
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दति एव ॥19॥

चाहे हम योग की राह पर चलें या हम अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना ही बेहतर समझें, यदि हमने अपने आप को परमात्मा से जोड़ लें तो हमें सदैव सुख प्राप्त होगा।

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गंगा-जल-लव-कणिका-पीता। 
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥20॥

जो अपना समय आत्मज्ञान को प्राप्त करने में लगाते हैं, जो सदैव परमात्मा का स्मरण करते हैं एवं भक्ति के मीठे रस में लीन हो जाते हैं, उन्हें ही इस संसार के सारे दुःख दर्द एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। 
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥21॥

हे परम पूज्य परमात्मा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे इस संसार रूपी विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति दो ईश्वर।

रथ्याचर्पट-विरचित-कन्थः पुण्यापुण्य-विवर्जित-पन्थः। 
योगी योगनियोजित चित्तः रमते बालोन्मत्तवदेव ॥22॥ 

जो योगी सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर अपनी इन्द्रियों को वश में करने में सक्षम हो जाता है, उसे किसी बात का डर नहीं रहता और वह निडर होकर, एक चंचल बालक के समान, अपना जीवन व्यतीत करता है।

कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः। 
इति परिभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥23॥ 

हम कौन हैं? हम कहाँ से आये हैं? हमारा इस संसार में क्या है? ऐसी बातों पर चिंता कर के हमें अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। यह संसार एक स्वप्न की तरह ही झूठा एवं क्षण-भंगुर है।

त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्वसहिष्णुः। 
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥24॥ 

संसार के कण कण में उस परमात्मा का वास है। कोई भी प्राणी ईश्वर की कृपा से अछूता नहीं है। 

शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। 
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाछंसि अचिराद् यदि विष्णुत्वम्॥25॥

हमें न ही किसी से अत्यधिक प्रेम करना चाहिए और न ही घृणा। सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है। हमें सबको एक ही नज़र से देखना चाहिए और उनका आदर करना चाहिए क्योंकि तभी हम परमात्मा का आदर कर पाएंगे।

कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम्।
आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥26॥ 

हमारे जीवन का लक्ष्य कदापि सांसारिक एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं होना चाहिए। हमें उन्हें पाने के विचारों को त्याग कर, परम ज्ञान की प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। तभी हम संसार के कष्ट एवं पीडाओं से मुक्ति पा सकेंगे।

गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। 
नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥27॥

उस परम परमेश्वर का सदैव ध्यान कीजिए। उसकी महिमा का गुणगान कीजिए। हमेशा संतों की संगती में रहिए और गरीब एवं बेसहारे व्यक्तियों की सहायता कीजिए। 

सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। 
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥28॥ 

जिस शरीर का हम इतना ख्याल रखते हैं और उसके द्वारा तरह तरह की भौतिक एवं शारीरिक सुख पाने की चेष्टा करते हैं, वह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा। मृत्यु आने पर हमारा सजावटी शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। फिर क्यों हम व्यर्थ ही बुरी आदतों में फंसते हैं।

अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।
पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥29॥ 

संसार के सभी भौतिक सुख हमारे दुखों का कारण है। जितना ज्यादा हम धन या अन्य भौतिक सुख की वस्तुओं को इकट्ठा करते हैं, उतना ही हमें उन्हें खोने का डर सताता रहता है। सम्पूर्ण संसार के जितने भी अत्यधिक धनवान व्यक्ति हैं, वे अपने परिवार वालों से भी डरते हैं। 

प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेकविचारम्। 
जाप्यसमेत समाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥30॥ 

हमें सदैव इस बात को ध्यान में रखना चाहिए की यह संसार नश्वर है। हमें अपनी सांस, अपना भोजन और अपना चाल चलन संतुलित रखना चाहिए। हमें सचेत होकर उस ईश्वर पर अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर देना चाहिए।

गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः।
सेन्द्रियमानस नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ॥32॥

हमें अपने गुरु के कमल रूपी चरणों में शरण लेनी चाहिए।
तभी हमें मोक्ष की प्राप्ति होगी। यदि हम अपनी इन्द्रियों और अपने मस्तिष्क पर संयम रख लें तो हमारे अपने ही ह्रदय में हम ईश्वर को महसूस कर पायेंगे।



॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥



श्रीमच्छङ्करभगवत्पादाचार्यैः विरचितं
॥श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्॥

नागेन्द्रहाराय विलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥ १ ॥

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारमुख्यबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकारमहिताय नमः शिवाय ॥ २ ॥

शिवाय गौरीवदनाब्जबृन्द-
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥ ३ ॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥ ४ ॥

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥ ५ ॥

॥शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं संपूर्णम्॥

!!! श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम् !!!



शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,
यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||१||


यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?


कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं,
गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||२||


सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?


षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या,
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||३||


वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?


विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः,
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||४||


जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?


क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः,
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||५||


जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?


यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,
जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||६||


दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगांतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों,किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?


न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ,
न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||७||


जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?


अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,
न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||८||


जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारी अनासक्त्तियों का क्या लाभ?


गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही,
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही |
लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ||९||


जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशालीशरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है


!!! महा कालभैरव स्तोत्र -देवसुत !!!

|अउम|

यम् यम् यम् यक्ष रूपं, दश दिशी विदितम, भूमि कम्पायमानं |
सं सं संहार मूर्तिं, शिर मुकुट जटा शेखरं चन्द्र बिम्बं |
दम दम दम दीर्घ कायम विकृत नख मुखं , ज्वोर्ध्व रोमं कराळम् |
पं पं पं पाप नाशं, प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

रम् रम् रम् रक्त वर्णं, कटिकटिततनुं तीक्ष्ण दन्स्त्रा कराळम् |
घम् घम् घम् घोष घोषं घ घ घ घ घटितं घर्जरं घोर नादं |
कम् कम् कम् काल पाषं धृक धृक ध्रि कृतं ज्वालितम् कामदाहं |
तम् तम् तम् दिव्य देहं, प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं | 

लम् लम् लम् लम् वदन्तं ल ल ल ल ललितं दीर्घ जिव्हा कराळम् |
धूम धूम धूम धूम्र वर्णं स्फुट विकट मुखं भास्करं भीमरूपं |
रुम रुम रुम रून्दमालं रवितनुं नेयतं ताम्र नेत्रं कराळम् |
नम नम नम नग्नाभूषं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

वम् वम् वम् वायुवेगं नटजन सदयं ब्रह्म सारं परम् तम |
खम् खम् खम् खड्ग हस्तं त्रिभुवन विलयं भास्करं भीमरूपं |
चम् चम् चम् चलित्वा चल चल चलिता चालितम् भूमि चक्रं |
मम् मम् मम् मायी रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

शम् शम् शम् शङ्ख हस्तं ससि कर धवलं मूक्ष संपूर्ण तेजम |
मम् मम् मम् मम् महन्तं कुल मकुल कुलं मन्त्र गुप्तं सुनित्यं |
यम् यम् यम् भूतनादं किलि किलि किलितं बालकेली प्रधानं |
आम् आम् आम् आन्तरिक्षं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

खम् खम् खम् खड्ग भेदं विष मामृत मयं काल कालं कराळम् |
क्षम् क्षम् क्षम् क्षेप्र वेगं दह दह धनं तप्त संदीप्य मानं|
हौम् हौम् हौम्कार नादं प्रकटित गहनं गर्जितै भूमि कम्पं |
वम् वम् वम् वाल लीलम् प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

सम् सम् सम् सिद्धि योगं सकल गुण मखं देव देवं प्रसन्नं |
पम् पम् पम् पद्मनाभं हरिहर मयं चन्द्र सूर्याग्नि नेत्रं |
ऐम् ऐम् ऐश्वर्य नादं सत त भय हरं पूर्वदेव स्वरूपम् |
रौम् रौम् रौम् रौद्र रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

हम् हम् हम् हंसयानं हपितकल हकं मुक्तयोगत्त हासं |
धम धम धम नेत्र रूपं शिरमुकुट जटाबन्ध बन्धाग्र हस्तं |
टम टम टान्क नाधम त्रिद सलत ल टम काम गर्वाप हरं |
भ्रूं भ्रूं भ्रूं भूतनादं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालं |

|अउम|

!!! शिव स्तुति (भैरवरूप शिव-स्तुति) !!!



शंकरं, शंप्रदं, सज्जनानंददं, शैल-कन्या-वरं, परमरम्यं। 
काम-मद-मोचनं, तामरस-लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं।।
कंबु-कुंदेंदु-कर्पूर-गौरं शिवं, सुंदरं, सच्चिदानंदकंदं। 
सिंद्ध-सनकादि-योगीन्द्र-वृंदारका, विष्णु-विधि-वन्द्य चरणारविंदं।।
ब्रह्म-कुल-वल्लभं, सुलभ मति दुर्लभं, विकट-वेषं, विभुं, वेदपारं।
नौमि करूणाकरं, गरल-गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं, निर्विकारं।।
लोकनाथं, शोक-शूल-निर्मूलिनं, शूलिनं मोह-तम-भूरि-भानुं। 
कालकालं, कलातीतमजरं, हरं, कठिन-कलिकाल-कानन-कृशानुं।।
तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं।
प्रचुर-भव-भंजनं, प्रणत-जन-रंजनं, दास तुलसी शरण सानुकूलं।।


!!! ब्रह्ममुरारी सुरार्चित लिंगं !!!


शिवपुराण के मुताबिक शिव संसार को रचने वाले भी हैं तो दूसरी ओर बुरी शक्तियों के विनाशक भी। इस तरह शिव की शक्तियों व गुण का सार कल्याणकारी ही है। ठीक किसी कल्पवृक्ष की तरह हर इच्छाओं को पूरा करने वाला। 


शास्त्रों के मुताबिक शिव के निराकार रूप शिव लिंग की उपासना व दर्शन कामनासिद्धी का अचूक उपाय है। इंसान की ऐसी ही कामनाओं में एक है - सफलता।

अगर आप भी किसी भी क्षेत्र में जल्द कामयाबी की चाहत रखते हैं तो यहां बताई जा रही शिव मंत्र स्तुति, जो लिगांष्टक के रूप में प्रसिद्ध है, शिव के गंगाजल या दूध से स्नान और पंचोपचार पूजा में धतूरा या बिल्वपत्र चढ़ाने के बाद जरूर करें –


ब्रह्ममुरारी सुरार्चित लिंगं, बुद्धी विवरधन कारण लिंगं।
संचित पाप विनाशन लिंगं, दिनकर कोटी प्रभाकर लिंगं।
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगं ।1।

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गम् कामदहम् करुणाकर लिङ्गम्। 
रावणदर्पविनाशनलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ।2।

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गम् बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्। 
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ।3।

कनकमहामणिभूषितलिङ्गम् फनिपतिवेष्टित शोभित लिङ्गम्। 
दक्षसुयज्ञ विनाशन लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ।4।

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गम् पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम।5।

देवगणार्चित सेवितलिङ्गम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्।6।

अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गम् सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्। 
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्।7।

सुरगुरुसुरवरपूजित लिङ्गम् सुरवनपुष्प सदार्चित लिङ्गम्।
परात्परं परमात्मक लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् ।8।

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ। 
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।9।

04 July 2013

!!! दुर्गा सप्तशती – सप्तशती पाठ विधि !!!


दुर्गा सप्तशती पाठ विधि:-

नवरात्र घट स्थापना (
ऐच्छिक)

नवरात्र का श्रीगणेश शुक्ल पतिपदा को प्रात:काल के शुभमहूर्त में घट स्थापना से होता है। घट स्थापना हेतु मिट्टी अथवा साधना के अनुकूल धातु का कलश लेकर उसमे पूर्ण रूप से जल एवं गंगाजल भर कर कलश के उपर (मुँह पर) नारियल(छिलका युक्त) को लाल वस्त्र/चुनरी से लपेट कर अशोक वृक्ष या आम के पाँच पत्तो सहित रखना चाहिए। पवित्र मिट्टी में जौ के दाने तथा जल मिलाकर वेदिका का निर्माण के पश्चात उसके उपर कलश स्थापित करें। स्थापित घट पर वरूण देव का आह्वान कर पूजन सम्पन्न करना चाहिए। फिर रोली से स्वास्तिक बनाकर अक्षत एवं पुष्प अर्पण करना चाहिए।

कुल्हड़ में जौ बोना (ऐच्छिक):-

नवरात्र के अवसर पर नवरात्रि करने वाले व्यक्ति विशेष शुद्ध मिट्टी मे, मिट्टी के किसी पात्र में जौ बो देते है। दो दिनो के बाद उसमे अंकुर फुट जाते है। यह काफी शुभ मानी जाती है।

मूर्ति या तसवीर स्थापना(ऐच्छिक):-

माँ दुर्गा, श्री राम, श्री कृष्ण अथवा हनुमान जी की मूर्ती या तसवीर को लकड़ी की चौकी पर लाल अथवा पीले वस्त्र(अपनी सुविधानुसार) के उपर स्थापित करना चाहिए। जल से स्नान के बाद, मौली चढ़ाते हुए, रोली अक्षत(बिना टूटा हुआ चावल), धूप दीप एवं नैवेध से पूजा अर्चना करना चाहिए।

अखण्ड ज्योति(ऐच्छिक):-

नवरात्र के दौरान लगातार नौ दिनो तक अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित की जाती है। किंतु यह आपकी इच्छा एवं सुविधा पर है। आप केवल पूजा के दौरान ही सिर्फ दीपक जला सकते है।

आसन:-

लाल अथवा सफेद आसन पूरब की ओर बैठकर नवरात्रि करने वाले विशेष को पूजा, मंत्र जप, हवन एवं अनुष्ठान करना चाहिए।
नवरात्र पाठ:-

माँ दुर्गा की साधना के लिए श्री दुर्गा सप्तशती का पूर्ण पाठ अर्गला, कवच, कीलक सहित करना चाहिए। श्री राम के उपासक को ‘राम रक्षा स्त्रोत’, श्री कृष्ण के उपासक को ‘भगवद गीता’ एवं हनुमान उपासक को‘सुन्दरकाण्ड’ आदि का पाठ करना चाहिए।

भोगप्रसाद:- प्रतिदिन देवी एवं देवताओं को श्रद्धा अनुसार विशेष अन्य खाद्द्य पदार्थो के अलावा हलुए का भोग जरूर चढ़ाना चाहिए।

कुलदेवी का पूजन:- हर परिवार मे मान्यता अनुसार जो भी कुलदेवी है उनका श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा अर्चना करना चाहिए।

विसर्जन:- विजयादशमी के दिन समस्त पूजा हवन इत्यादि सामग्री को किसी नदी या जलाशय में विसर्जन करना चाहिए।

पूजा सामग्री:- कुंकुम, सिन्दुर, सुपारी, चावल, पुष्प, इलायची, लौग, पान, दुध, घी, शहद, बिल्वपत्र, यज्ञोपवीत, चन्दन, इत्र, चौकी, फल, दीप, नैवैध(मिठाई), नारियल आदि।

मंत्र सहित पूजा विधि:- स्वयं को शुद्ध करने के लिए बायें हाथ मे जल लेकर, उसे दाहिने हाथ से ढ़क लें। मंत्रोच्चारण के साथ जल को सिर तथा शरीर पर छिड़क लें।

“ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोsपिवा।
य: स्मरेत पुंडरीकाक्षं स: बाह्य अभ्यंतर: शुचि॥
ॐ पुनातु पुण्डरीकाक्ष: पुनातु पुण्डरीकाक्ष पुनातु॥“

आचमन:- तीन बार वाणी, मन व अंत:करण की शुद्धि के लिए चम्मच से जल का आचमन करें। हर एक मंत्र के साथ एक आचमन किया जाना चाहिए।

ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
ॐ अमृताविधानमसि स्वाहा।
ॐ सत्यं यश: श्रीमंयी श्री: श्रयतां स्वाहा।

प्राणायाम:- श्वास को धीमी गति से भीतर गहरी खींचकर थोड़ा रोकना एवं पुन: धीरे-धीरे निकालना प्राणायाम कहलाता है। श्वास खीचते समय यह भावना करे किं प्राण शक्ति एवं श्रेष्ठता सॉस के द्वारा आ रही है एवं छोड़ते समय यह भावना करे की समस्त दुर्गण-दुष्प्रवृतियां, बुरे विचार, श्वास के साथ बाहर निकल रहे है। प्राणायाम निम्न मंत्र के उच्चारण के उपरान्त करें:

ॐ भू: ॐ भुव: ॐ स्व: ॐ मह:।
ॐ जन: ॐ तप: ॐ सत्यम।
ॐ तत्सवितुर्ररेण्यं भर्गो देवस्य धीमही धियो यो न: प्रचोदयात।
ॐ आपोज्योतिरसोअमृतं बह्मभुर्भुव स्व: ॐ।

गणपति पूजन:- लकड़ी के पट्टे या चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर एक थाली रखें। इस थाली में कुंकुम से स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उस पर पुष्प आसन लगाकर गण अपति की प्रतिमा या फोटो(तस्वीर) स्थापित कर दें या सुपारी पर लाल मौली बांधकर गणेश के रूप में स्थापित करना चाहिए। अब अक्षत, लाल पुष्प(गुलाब), दूर्वा(दुवी) एवं नेवैध गणेश जी पर चढ़ाना चाहिए। जल छोड़ने के पश्चात निम्न मंत्र का 21 बार जप करना चाहिए:-
“ॐ गं गणपतये नम:”

मंत्रोच्चारण के पश्चात अपनी मनोकामना पूर्ती हेतु निम्न मंत्र से प्रार्थना करें:-

विध्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय।
लम्बोदराय सकलाय जगद्विताय॥
नागाननाय श्रुति यज्ञ विभूषिताय।
गौरी सुताय गण नाथ नमो नमस्ते॥
भक्तार्त्तिनाशन पराय गणेश्वराय।
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय॥
विद्याधराय विकटाय च वामनाय।
भक्त प्रसन्न वरदाय नमो नमस्ते॥
संकल्प:- दाहिने हाथ मे जल, कुंकुम, पुष्प, चावल साथ मे ले

“ॐ विष्णु र्विष्णु: श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञाया प्रवर्तमानस्य, अद्य, श्रीबह्मणो द्वितीय प्ररार्द्धे श्वेत वाराहकल्पे जम्बूदीपे भरत खण्डे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते, मासानां मासोत्तमेमासे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे (अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्रोत्पन्न: (अपने नाम का उच्चारण करें) नामा: अहं (सपरिवार/सपत्नीक) सत्प्रवृतिसंवर्धानाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याण्य, ………..(अपनी कामना का उच्चारण करें) कामना सिद्दयर्थे दुर्गा पूजन विद्यानाम तथा साधनाम करिष्ये।“

जल को भूमि पर छोड़ दे। अगर कलश स्थापित करना चाहते है तो अब इसी चौकी पर स्वास्तिक बनाकर बाये हाथ की ओर कोने में कलश(जलयुक्त) स्थापित करें। स्वास्तिक पर कुकंम, अक्षत, पुष्प आदि अर्पित करते हुए कलश स्थापित करें। इस कलश में एक सुपारी कुछ सिक्के, दूब, हल्दी की एक गांठ डालकर, एक नारियल पर स्वस्तिक बनाकर उसके उपर लाल वस्त्र लपेटकर मौली बॉधने के बाद कलश पर स्थापित कर दें। जल का छींटा देकर, कुंकम, अक्षत, पुष्प आदि से नारियल की पूजा करे। वरूण देव को स्मरण कर प्रणाम करे। फिर पुरब, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण में(कलश मे) बिन्दी लगाए।
दुर्गा सप्तशती मंत्र :

शारदीय नवरात्र आदिशक्ति की पूजा-उपासना का महापर्व होता है, नवरात्र में पूजा के अवसर पर दुर्गासप्तशती का पाठ श्रवण करने से देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं. सप्तशती का पाठ करने पर उसका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है. श्रीदुर्गासप्तशती, भगवती दुर्गा का ही स्वरूप है. इस पुस्तक का पाठ करने से पूर्व इस मंत्र द्वारा पंचोपचारपूजन करें-

नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनम:। नम: प्रकृत्यैभद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

यदि दुर्गासप्तशती का पाठ करने में असमर्थ हों तो सप्तश्लोकी दुर्गा को पढें. इन सात श्लोकों में सप्तशती का संपूर्ण सार समाहित होता है.
अथ सप्तश्लोकी दुर्गा
शिव उवाच :

देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।

कलौ कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥
देव्युवाच :

श्रृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्ट्साधनम् ।

मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥
विनियोग :

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ॠषिः, अनुष्टुप

छन्दः, श्रीमहाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वत्यो देवताः, श्री दुर्गाप्रीत्यथं

सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ।

1 – ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १ ॥

2 – दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः

स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या

सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥ २ ॥

3 – सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ३ ॥

4 – शरणागतदीनार्तपरित्राणे ।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ॥ ४ ॥

5 – सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।

भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते ॥ ५ ॥

6 – रोगानशेषानपहंसि तुष्टा

रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां

7 – त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्र्यन्ति ॥ ६ ॥

सर्वबाधाप्रश्मनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।

एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ७ ॥
॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण ॥

नवरात्रके प्रथम दिन कलश (घट) की स्थापना के समय देवी का आवाहन इस प्रकार करें. भक्त प्राय: पूरे नवरात्र उपवास रखते हैं. सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में असमर्थ लोगों के लिए सप्तरात्र,पंचरात्र,युग्मरात्रऔर एकरात्रव्रत का विधान भी है. प्रतिपदा से सप्तमी तक उपवास रखने से सप्तरात्र-व्रत का अनुष्ठान होता है. अष्टमी के दिन माता को हलुवा और चने का भोग लगाकर कुंवारी कन्याओं को खिलाते हैं तथा अन्त में स्वयं प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण (पूर्ण) करते हैं.

नवरात्रके नौ दिन साधना करने वाले साधक प्रतिपदा तिथि के दिन शैलपुत्री की, द्वितीया में ब्रह्मचारिणी, तृतीया में चंद्रघण्टा, चतुर्थी में कूष्माण्डा, पंचमी में स्कन्दमाता, षष्ठी में कात्यायनी, सप्तमी में कालरात्रि, अष्टमी में महागौरी तथा नवमी में सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं. तथा दुर्गा जी के 108 नामों को मंत्र रूप में उसका अधिकाधिक जप करें.

अब एक दूसरी स्वच्छ थाली में स्वस्तिक बनाकर उस पर पुष्प का आसन लगाकर दुर्गा प्रतिमा या तस्वीर या यंत्र को स्थापित करें। अब निम्न प्रकार दुर्गा पूजन करे:-

स्नानार्थ जलं समर्पयामि (जल से स्नान कराए)
स्नानान्ते पुनराचमनीयं जल समर्पयामि (जल चढ़ाए)
दुग्ध स्नानं समर्पयामि (दुध से स्नान कराए)
दधि स्नानं समर्पयामि (दही से स्नान कराए)
घृतस्नानं समर्पयामि (घी से स्नान कराए)
मधुस्नानं समर्पयामि (शहद से स्नान कराए)
शर्करा स्नानं समर्पयामि (शक्कर से स्नान कराए)
पंचामृत स्नानं समर्पयामि (पंचामृत से स्नान कराए)
गन्धोदक स्नानं समर्पयामि (चन्दन एवं इत्र से सुवासित जल से स्नान करावे)
शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि (जल से पुन: स्नान कराए)
यज्ञोपवीतं समर्पयामि (यज्ञोपवीत चढ़ाए)
चन्दनं समर्पयामि (चंदन चढ़ाए)
कुकंम समर्पयामि (कुकंम चढ़ाए)
सुन्दूरं समर्पयामि (सिन्दुर चढ़ाए)
बिल्वपत्रै समर्पयामि (विल्व पत्र चढ़ाए)
पुष्पमाला समर्पयामि (पुष्पमाला चढ़ाए)
धूपमाघ्रापयामि (धूप दिखाए)
दीपं दर्शयामि (दीपक दिखाए व हाथ धो लें)
नैवेध निवेद्यामि (नेवैध चढ़ाए(निवेदित) करे)
ऋतु फलानि समर्पयामि (फल जो इस ऋतु में उपलब्ध हो चढ़ाए)
ताम्बूलं समर्पयामि (लौंग, इलायची एवं सुपारी युक्त पान चढ़ाए)
दक्षिणा समर्पयामि (दक्षिणा चढ़ाए)

इसके बाद कर्पूर अथवा रूई की बाती जलाकर आरती करे।

आरती के नियम:- प्रत्येक व्यक्ति जानकारी के अभाव में अपनी मन मर्जी आरती उतारता रहता है। विशेष ध्यान देने योग्य बात है कि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारना चाहिए। चार बार चरणो पर से, दो बार नाभि पर से, एकबार मुख पर से तथा सात बार पूरे शरीर पर से। आरती की बत्तियाँ 1, 5, 7 अर्थात विषम संख्या में ही बत्तियाँ बनाकर आरती की जानी चाहिए।
दुर्गा जी की आरती:-

प्रदक्षिणा:-

“यानि कानि च पापानी जन्मान्तर कृतानि च।
तानी सर्वानि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥
प्रदक्षिणा समर्पयामि।“

प्रदक्षिणा करें (अगर स्थान न हो तो आसन पर खड़े-खड़े ही स्थान पर घूमे)

क्षमा प्रार्थना:- पुष्प सर्मपित कर देवी को निम्न मंत्र से प्रणाम करे।

“नमो दैव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नम: प्रकृतयै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम॥
या देवी सर्व भूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

ततपश्चात देवी से क्षमा प्रार्थना करे कि जाने अनजाने में कोई गलती या न्यूनता-अधिकता यदि पूजा में हो गई हो तो वे क्षमा करें। इस पूजन के पश्चात अपने संकल्प मे कहे हुए मनोकामना सिद्धि हेतु निम्न मंत्र का यथाशक्ति श्रद्धा अनुसार 9 दिन तक जप करें:-

”ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥“

इस मंत्र के बाद दुर्गा सप्तशती के सभी अध्यायो का पाठ 9 दिन मे पूर्ण करें।

नवरात्री की समाप्ति पर यदि कलश स्थापना की हो तो इसके जल को सारे घर मे छिड़क दें। इस प्रकार पूजा सम्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति विशेष उपरांकित विधि का पालन करने मे असमर्थ है तो नवरात्रि के दौरान दुर्गा चालीसा का पाठ करें।

दुर्गा सप्तशती की महिमा

मार्कण्डेय पुराण में ब्रह्माजी ने मनुष्यों की रक्षा के लिए परमगोपनीय, कल्याणकारी देवी कवच के पाठ आर देवी के नौ रूपों की आराधना का विधान बताया है, जिन्हें नव दुर्गा कहा जाता है। आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक देवी के इन रूपों की साधना उपासना से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता है, क्योंकि यह कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी है। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। यह देवी माहात्म्य धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है। सप्तशती में कुछ ऐसे भी स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत्‌ पाठ से वांछित फल की प्राप्ति होती है।

सर्वकल्याण के लिए -

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्येत्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥

बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन-धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय॥

आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्‌।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥



|| श्री दुर्गा कवच ||


अथ देव्याः कवचम्

ॐ अस्य श्री चण्डी कवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । चामुण्डादेवता अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् । दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् ।। श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।।

ॐ नमश्चण्डिकायै
मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ।। १।।

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ।। २।।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। ३।।

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। ४।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।। 
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।। ५।।

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।। विषमे दुर्गमे चैव भयात्तार्म शरणं गताः ।। ६।।

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ।। ७।।

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ।। ८।।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ।। ९।।

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरि प्रिया ।। १०।।

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ।। ११।।

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोग समन्विताः ।। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नो पशोभिताः ।। १२।।

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।। १३।।

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शाङ्गर्मायुधमुत्तमम् ।। १४।।

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ।। १५।।

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।। १६।।

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवद्धिर्नि ।। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।। १७।।

दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋर्त्यां खड्गधारिणी ।। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ।। १८।।

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।। ऊध्वर्म ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ।। १९।।

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।। २०।।

अजिता वाम पाश्वेर् तु दक्षिणे चापराजिता ।। शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूध्निर् व्यवस्थिता ।। २१।।

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।। २२।।

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोद्वार्रवासिनी ।। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ।। २३।।

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।। २४।।

दन्तान् रक्षतु कौमरी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।। २५।।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला ।। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। २६।।

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।। स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। २७।।

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौरक्षेत्कुलेश्वरी ।। २८।।

स्तनौरक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। २९।।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।। ३०।।

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ।। ३१।।

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।। ३२।।

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोध्वर्केशिनी ।। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ।। ३३।।

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ।। ३४।।

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ।। ३५।।

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ।। ३६।।

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।। ३७।।

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ।। ३८।।

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।। ३९।।

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।। ४०।।

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।। ४१।।

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।। ४२।।

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।। कवचेना वृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।। ४३।।

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।। ४४।।

निर्भयो जायते मत्यर्म:: संग्रामेष्वपराजितः ।।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।। ४५।।

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।। यः 
पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। ४६।।

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। ४७।।

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। ४८।।

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।। भूचराः खेचराश्चैवजलजाश्चोपदेशिकाः ।। ४९।।

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।। ५०।।

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कुष्माण्डा भैरवादयः ।। ५१।।

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।। ५२।।

यशसा वद्धर्ते सोऽपि कीर्ति मण्डितभूतले ।। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। ५३।।

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्र पौत्रिकी ।। ५४।।

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ।। ५५।।

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। ५६।।


!!! २ प्रकार के श्री शिव चालीसा !!!


अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। 
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥ 

आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार। 
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥ 

पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। 
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥ 

पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। 
ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥ 

जय शिव शङ्कर औढरदानी। 
जय गिरितनया मातु भवानी॥ 

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥ 
सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥ 
पराशक्ति -पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति॥ 

सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥ 
अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥ 

वृषवाहन नंदीगणनायक। अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥ 
व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥ 
कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥ 

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥ 

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर। गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥ 

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी॥ 

तुम हो नित्य दया के सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर॥ 

अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सबके मंगलकारी॥ 

सती-पार्वती के प्राणेश्वर। स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥ 

हरि-हर एक रूप गुणशीला। करत स्वामि-सेवक की लीला॥ 

रहते दोउ पूजत पुजवावत। पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥ 

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥ 

जग-जित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकंठ वर॥ 

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥ 

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥ 

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परमहित॥ 

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी। ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥ 

अर्जुन संग लडे किरात बन। दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥ 

भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥ 

शङ्खचूड जालन्धर मारे। दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥ 

अन्धकको गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥ 

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥ 

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥ 

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥ 

काशी मरत जंतु अवलोकी। देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥ 

भक्त भगीरथ की रुचि राखी। जटा बसी गंगा सुर साखी॥ 

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥ 

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥ 

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥ 

अति उदार करुणावरुणालय। हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥ 

तुम्हरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥ 

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥ 

भेदशून्य तुम सबके स्वामी। सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥ 

जो जन शरण तुम्हारी आवत। सकल दुरित तत्काल नशावत॥ 

|| दोहा ||

बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। 

गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार॥ 

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय। 

तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥ 

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। 

कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥ 

कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र। 

राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥ 



श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥