24 July 2013

!!! शमी का पुष्प चढ़ाएं !!!

— "शमी" वृक्ष ही यज्ञ की समिधाओं के लिए उपयुक्त वृक्ष है. यह बबूल और कीकर जाति का ही वृक्ष है. शमी वृक्ष की फलियों को खाकर कई दिनों तक ऋषि-मुनि भूखे रह सकते थे. इसे खाने से उपवास क्षमता बढ़ती है. शरीर पर कोई अधिक प्रभाव भी नहीं पड़ता. चर्बी घट जाति है.यह राजस्थान का राज्य वृक्ष है; स्थानीय भाषा में इसे खेजडी कहते है तथा इसका वानष्पतिक नामप्रोसोपिस सिनरेरिया है. 


शमी शनि ग्रह का पेड़ है. राजस्थान में सबसे अधिक होता है . छोटे तथा मोटे काँटों वाला भारी पेड़ होता है. कृष्ण जन्मअष्टमी को इसकी पूजा की जाती है . बिस्नोई समाज ने इस पेड़ के काटे जाने पर कई लोगों ने अपनी जान दे दी थी. यह पेड़ बरसात में अपने आप पैदा होता है . इस पेड़ के फल को सांगर और साँगरी भी कहते है. 


कहा जाता है कि इसके लकड़ी के भीतर विशेष आग होती है जो रगड़ने पर निकलती है ... इसे शिंबा; सफेद कीकर भी कहते हैं. 


शमी अर्थात छोंकर या खेजड़ के वृक्ष का बल्लभ संप्रदाय में अधिक महत्व माना गया है। इस वृक्ष का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि इसकी जड़, तना, छड़े पत्तियां आदि सभी काम आते हैं, इस वृक्ष का महत्व केवल इस बात में भी नहीं है कि राजस्थानी किसान की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार यह वृक्ष है। खेजड़ के पेड़ का नाम ही शमी वृक्ष है जिस पर महाभारत के युद्ध के समय बभ्रुवाहन का सर टांगा था. 
खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है।

इसके अन्य नामों में घफ़ (संयुक्त अरब अमीरात), खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी (राजस्थान), जंड(पंजाबी), कांडी (सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं।

इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है।
खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है।
जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है।
इसकी लकडी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है।

इसकी जड़ से हल बनता है।

अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है।

सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे।
इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है।
साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
खेजड़ी का वृक्ष राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता 'मींझर' बहुत प्रसिद्द है है। यह थार के रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है।

[१] दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है
[२] रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है।
[३] पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं।
[४] इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।
[5] शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है।
[६] वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है।
[७] इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।






आज हम आपको बताते हैं कि शिवलिंग पर कौन सा पुष्प चढ़ाना चाहिए और वह कितना पुण्य देने वाला है| शास्त्रों ने कुछ फूलों के चढाने से मिलने वाले फल का महत्व बतलाया है | वैसे भी पूजा में कुदरती सामग्रियों के चढ़ावे का महत्व है। जिनमें अनेक तरह-तरह के पेड़-पौधों के पत्ते, फूल और फल शामिल होते हैं। शास्त्रों में भगवान शिव पर फूल चढाने का बहुत अधिक महत्व बताया गया है| 

एक फूल शिव पर चढ़ाना से सोने के दान के बराबर फल देता है वो है आक के फूल को चढाने से मिल जाता है , हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व-पत्र से मिल जाता है जिस तरह पापो के नाश के लिए शिव पर बिल्व पत्र से शिव खुश होते है|

हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी। हजार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हजार शमी के पत्तो के बराकर एक नीलकमल, हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

इसलिए भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए एक शमी का पुष्प चढ़ाएं क्योंकि यह फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है|







साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

राजस्थानी भाषा में कन्हैयालाल सेठिया की कविता 'मींझर' बहुत प्रसिद्द है है। यह थार के रेगिस्तान में पाए जाने वाले वृक्ष खेजड़ी के सम्बन्ध में है। इस कविता में खेजड़ी की उपयोगिता और महत्व का सुन्दर चित्रण किया गया है। [1] दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है|[2] रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते लूट कर लाने की प्रथा है जो स्वर्ण का प्रतीक मानी जाती है। इसके अनेक औषधीय गुण भी है। पांडवों द्वारा अज्ञातवास के अंतिम वर्ष में गांडीव धनुष इसी पेड़ में छुपाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी प्रकार लंका विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा शमी के वृक्ष की पूजा का उल्लेख मिलता है।[3] शमी या खेजड़ी के वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। वसन्त ऋतु में समिधा के लिए शमी की लकड़ी का प्रावधान किया गया है। इसी प्रकार वारों में शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है।



विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है। मान्यता है कि यह भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। 

आज भी कई स्थानों पर 'रावण दहन' के बाद घर लौटते समय शमी के पत्तेस्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटने की प्रथा हैं, इसके साथ ही कार्यों में सफलता मिलने कि कामना की जाती है।

महाभारत में महत्त्व

शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है। अपने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास में पांडवों ने अपने सारे अस्त्र शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था। कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा की थी और उससे शक्ति और विजय प्राप्ति की कामना की थी। तभी से यह माना जाने लगा है कि जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है -


शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी ।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी ॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया ।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता ॥


अनुवाद :

हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन काधनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की मैं भी करता हूँ। मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।


अन्य कथा

अन्य कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान की प्राप्ति की थी।


मान्यताएँ

शमी वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है। शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है। शनि देव को शान्त रखने के लिये भी शमी की पूजा करी जाती है। शमी को गणेश जीका भी प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं।


विभिन्न प्रांतों में बिहार, झारखण्ड और आसपास के कई राज्यों में भी इस वृक्ष को पूजा जाता है। यह लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है। किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है।

राजस्थान के विशनोई समुदाय के लोग शमी वृक्ष को अमूल्य मानते हैं।


ऋग्वेद के अनुसार:

शमी के पेड़ में आग पैदा करने कि क्षमता होती है और ऋग्वेद की ही एक कथा के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं (चंद्रवंशियों के पूर्वज) ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा की थी।

कवियों और लेखकों के लिये शमी बड़ा महत्व रखता है। हिन्दू धर्म में भगवान चित्रगुप्त को शब्दों और लेखनी का देवता माना जाता है और शब्द-साधक यम-द्वितीया को यथा-संभव शमी के पेड़ के नीचे उसकी पत्तियों से उनकी पूजा करते हैं।















!!! भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है !!!




सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥3॥
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंग है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।


ज्योतिर्लिंग स्थल, भारत के मानचित्र पर


1. श्री सोमनाथ काठियावाड़ (गुजरात) के अंतर्गत प्रभास क्षेत्र में विराजमान है।


सर्वप्रथम एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया । आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी । प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया । इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी । अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया ।

१०२४ के डिसम्बर महिनेमें मुहमद गजनवी ने कुछ ५,००० साथीयों के साथ लूट चलाकर स्वम इस मंदिर के लिंग के नाश करने में महत्व का भाग लिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोडकर पूजा अर्चना कर रहे थे ओर किसीने सामना नहीं किया। प्रायः सभी की कत्ल कर दी गई। लूट के माल के साथ लिंग के पत्थरों के टुकडे ग़ज़नी ले गया ओर मस्जिद में सीढ़ियों में लगवा दिये गये। [१][२]

इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया । सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया । मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया । इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया ।

2. श्रीशैल पर्वत आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर है, इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं। यहां श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं।


श्रीशैलम (श्री सैलम नाम से भी जाना जाता है) नामक ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाडी पर स्थित है। यहाँ शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है। मंदिर का गर्भगृह बहुत छोटा है और एक समय में अधिक लोग नही जा सकते। इस कारण यहाँ दर्शन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होती है। स्कंद पुराण में श्री शैल काण्ड नाम का अध्याय है। इसमें उपरोक्त मंदिर का वर्णन है। इससे इस मंदिर की प्राचीनता का पता चलता है। तमिल संतों ने भी प्राचीन काल से ही इसकी स्तुति गायी है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने जब इस मंदिर की यात्रा की, तब उन्होंने शिवनंद लहरी की रचना की थी। श्री शैलम का सन्दर्भ प्राचीन हिन्दू पुराणों और ग्रंथ महाभारत में भी आता है।

3. श्री महाकालेश्वर मालवा क्षेत्र (मध्यप्रदेश) में क्षिप्रा नदी के तटपर उज्जैन नगर में विराजमान है, उज्जैन को अवंतिकापुरी भी कहते हैं।


भारत के मध्यप्रदेश प्रान्त में स्थित उज्जैन नगर के दर्शनीय स्थलों में महाकालेश्वर का मंदिर प्रमुख है। यह देश के १२ ज्योतिर्लिगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। १२३५ ई. में अलतमस के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंश करने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया है इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् ११०७ से १७२८ ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग ४५०० वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन १६९० ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और २९ नवंबर १७२८ को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन १७३१ से १८०९ तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहां दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी- पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर िशवलिंग स्थापित है। मंदिर का क्षेत्रफल १०.७७ x १०.७७ वर्गमीटर और ऊंचाई २८.७१ मीटर है। महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा सा जलस्रोत है जिसे ``कोटितीर्थ`` कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि अलतमस ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन १९६८ के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया है। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया है। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा १९८० के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया गया है। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है।


टीका टिप्पणी

वक्र: पंथा यदपि भवन प्रस्थिताचोत्तराशाम
सौधोत्संग प्रणयोविमखोमास्म भरूज्जयिन्या:।
विद्युद्दामेस्फरित चकितैस्त्र पौराड़गनानाम
लीलापांगैर्यदि न रमते लोचननैर्विंचितोसि।। - कालिदास

4. मालवा क्षेत्र में ही ॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के तट पर है। उज्जैन से खण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और अमलेश्वर के दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं।


ॐकारेश्वर एक हिन्दू मंदिर है। यह मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित है। यह नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगओं में से एक है। यह यहां के मोरटक्का गांव से लगभग 12 मील (20 कि.मी.) दूर बसा है। यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बना है। यहां दो मंदिर स्थित हैं।

* ॐकारेश्वर
* अमरेश्वर

ॐकारेश्वर का निर्माण नर्मदा नदी से स्वतः ही हुआ है। यह नदी भारत की पवित्रतम नदियों में से एक है, और अब इस पर विश्व का सर्वाधिक बड़ा बांध परियोजना का निर्माण हो रहा है।

जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है।

इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं तथा 2 ज्योतिस्वरूप लिंगों सहित 108 प्रभावशाली शिवलिंग हैं। मध्यप्रदेश में देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ममलेश्वर (अमलेश्वर) के रूप में विराजमान हैं।

देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से यहाँ नित्य मृत्तिका के 18 सहस्र शिवलिंग तैयार कर उनका पूजन करने के पश्चात उन्हें नर्मदा में विसर्जित कर दिया जाता है। ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम 'मान्धाता' है।

राजा मान्धाता ने यहाँ नर्मदा किनारे इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिवजी के प्रकट होने पर उनसे यहीं निवास करने का वरदान माँग लिया। तभी से उक्त प्रसिद्ध तीर्थ नगरी ओंकार-मान्धाता के रूप में पुकारी जाने लगी। जिस ओंकार शब्द का उच्चारण सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता विधाता के मुख से हुआ, वेद का पाठ इसके उच्चारण किए बिना नहीं होता है। इस ओंकार का भौतिक विग्रह ओंकार क्षेत्र है। इसमें 68 तीर्थ हैं। यहाँ 33 करोड़ देवता परिवार सहित निवास करते हैं।

नर्मदा क्षेत्र में ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। शास्त्र मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री देश के भले ही सारे तीर्थ कर ले किन्तु जब तक वह ओंकारेश्वर आकर किए गए तीर्थों का जल लाकर यहाँ नहीं चढ़ाता उसके सारे तीर्थ अधूरे माने जाते हैं। ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। शास्त्र मान्यता के अनुसार जमुनाजी में 15 दिन का स्नान तथा गंगाजी में 7 दिन का स्नान जो फल प्रदान करता है, उतना पुण्यफल नर्मदाजी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

ओंकारेश्वर तीर्थ क्षेत्र में चौबीस अवतार, माता घाट (सेलानी), सीता वाटिका, धावड़ी कुंड, मार्कण्डेय शिला, मार्कण्डेय संन्यास आश्रम, अन्नपूर्णाश्रम, विज्ञान शाला, बड़े हनुमान, खेड़ापति हनुमान, ओंकार मठ, माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव, गायत्री माता मंदिर, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, आड़े हनुमान, माता वैष्णोदेवी मंदिर, चाँद-सूरज दरवाजे, वीरखला, विष्णु मंदिर, ब्रह्मेश्वर मंदिर, सेगाँव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, नरसिंह टेकरी, कुबेरेश्वर महादेव, चन्द्रमोलेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं।

नर्मदा ही एक ऐसी नदी है जिसकी लाखों भक्तों द्वारा 1 हजार 780 मील की लंबी परिक्रमा की जाती है। नियम से उक्त परिक्रमा 108 दिनों में संपन्न की जाती है।

5. महाराष्ट्र के पासे परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग है। परंतु शिवपुराण में वैद्यनाथं चिताभूमौ ऐसा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगना (झारखंड) में जसीडीह स्टेशन के पासवाला वैद्यनाथ नामक ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से भी देवघर में ही श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग का प्रमाण मिलता है।


यह ज्*योतिर्लिंग झारखंड के देवघर नाम स्*थान पर है। कुछ लोग इसे वैद्यनाथ भी कहते हैं। देवघर अर्थात देवताओं का घर। बैद्यनाथ ज्*योतिर्लिंग स्थित होने के कारण इस स्*थान को देवघर नाम मिला है। यह ज्*योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इस लिंग को 'कामना लिंग' भी कहा जाता हैं।

इस लिंग स्थापना का इतिहास यह है कि एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही ािा शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-ज्यों कर दिये और फिर वरदान मांगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ कि यदि मार्ग में इस पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगां अंतोगत्वा वहीं हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला, पर मार्ग में यहा चिताभूमि में आने पर उसे लघुशंका निवृत्तिा की आवश्यकता हुई और वह उस लिंग को एक अहीर को थमा लघुशंका-निवृत्ता के लिये चला गया। इधर उस अहीर से उसे बहुत अधिक भारी अनुभवकर भूमिकर रख दिया। बस, फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अंगूठा गड़ाकर लंका को चला गयां इधर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की और शिवजी का दर्शन करके उनकी वहीं प्रतिष्ठा की और स्तुति करते हुए स्वर्ग चले गये। यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग महान् फलों का देनेवाला है।

बैद्यनाथ का मुख्य मंदिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मंदिर भी हैं। शिवजी का मंदिर पार्वती जी के मंदिर से जुड़ा हुआ है।

बैद्यनाथ की यात्रा श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) शुरु होती है। सबसे पहले तीर्थयात्री सुल्तानगढ़ में एकत्र होते हैं जहां वे अपने-अपने पात्रों में पवित्र जल भरते हैं। इसके बाद वे बैद्यनाथ और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते हैं। पवित्र जल लेकर जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह पात्र जिसमें जल है, वह कहीं भी भूमि से न सटे।

बासुकीनाथ अपने शिव मंदिर के लिए जाना जाता है। बैद्यनाथ मंदिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक बासुकीनाथ में दर्शन नहीं किए जाते। यह मंदिर देवघर से 42 किमी. दूर जरमुंडी गांव के पास स्थित है। यहां पर स्थानीय कला के विभिन्न रूपों को देखा जा सकता है। इसके इतिहास का संबंध नोनीहाट के घाटवाल से जोड़ा जाता है। बासुकीनाथ मंदिर परिसर में कई अन्य छोटे-छोटे मंदिर भी हैं।

बाबा बैद्यनाथ मंदिर परिसर के पश्चिम में देवघर के मुख्य बाजार में तीन और मंदिर भी हैं। इन्हें बैजू मंदिर के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों का निर्माण बाबा बैद्यनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी के वंशजों ने करवाया था। प्रत्येक मंदिर में भगवान शिव का लिंग स्थापित है।

23 July 2013

!!! शिव जी के दस प्रमुख अवतार !!!



शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के दस प्रमुख अवतार ।
यह दस अवतार इस प्रकार है जो मानव को सभी इच्छित फल प्रदान करने वाले हैं-

1. महाकाल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का महाकाल स्वरुप अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला परम कल्याणी हैं। इस अवतार की शक्ति मां महाकाली मानी जाती हैं।

2. तार- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दूसरा अवतार तार नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का तार स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति दोनों फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी जाती हैं।

3. बाल भुवनेश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में तीसरा अवतार बाल भुवनेश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बाल भुवनेश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना जाता हैं।

4.षोडश श्रीविद्येश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में चौथा अवतार षोडश श्रीविद्येश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का षोडश श्रीविद्येश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी षोडशी श्रीविद्या माना जाता हैं।

5. भैरव- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पांचवा अवतार भैरव नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का भैरव स्वरुप अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति भैरवी गिरिजा मानी जाती हैं।

6. छिन्नमस्तक- शिव के दस प्रमुख अवतारों में छठा अवतार छिन्नमस्तक नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का छिन्नमस्तक स्वरुप अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं।

7. धूमवान- शिव के दस प्रमुख अवतारों में सातवां अवतार धूमवान नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का धूमवान स्वरुप अपने भक्तों की सभी प्रकार से श्रेष्ठ फल देने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी धूमावती माना जाता हैं।

8. बगलामुख- शिव के दस प्रमुख अवतारों में आठवां अवतार बगलामुख नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बगलामुख स्वरुप अपने भक्तों को परम आनंद प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी बगलामुखी माना जाता हैं।

9. मातंग- शिव के दस प्रमुख अवतारों में नौवां अवतार मातंग के नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का मातंग स्वरुप अपने भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी मातंगी माना जाता हैं।

10. कमल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दसवां अवतार कमल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का कमल स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी कमला माना जाता हैं।

विद्वानो के मत से उक्त शिव के सभी प्रमुख अवतार व्यक्ति को सुख, समृद्धि, भोग, मोक्ष प्रदान करने वाले एवं व्यक्ति की रक्षा करने वाले हैं।



!!! चंद लम्हों का यह शिव मंत्र..सारी दिक्कतों का जल्द करे काम तमाम !!!



हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक त्रिदेवों में ब्रह्मदेव सृष्टि, विष्णु पालन तो शिव संहारक शक्ति के रूप में पूजनीय है। हालांकि त्रिदेव एक ही ईश्वर की तीन शक्तियां और कल्याणकारी स्वरूप माने जाते हैं। खासतौर पर शिव नाम का अर्थ और भाव ही कल्याण, शुभ और मंगल से हैं। जिसमें संकेत साफ है कि शिव नाम या भक्ति मन, वचन और कर्म में शुभ को स्थान देकर अशुभ से दूर ले जाते हैं।

शास्त्र कहते हैं कि शिव नाम बुरे भाव, विचार व इच्छाओं का अंत कर प्राणी को जगत के कल्याण का कारण बनाता है। शिव का तमोगुणी संहारक रूप भी असल में तामसी, पापी या बुरी शक्तियों का अंत कर कर धर्म व सद्गुणों का रक्षक है, जो जगत के लिए कल्याणकारी ही है। इसलिए वह शिव व शंकर यानी निराकार व साकार दोनों ही रूपों में वंदनीय है।

सांसारिक जीवन में भी अनेक अवसरों पर इच्छा या स्वार्थ के वशीभूत होने से हर इंसान के मन या विचारों में पैदा हुए दोष छोटी या बड़ी परेशानियों का कारण बनते हैं। शास्त्रों में बताए कुछ शिव मंत्र मन को पावनता से जोड़ सारी दिक्कतों का जल्द अंत करने वाले माने गए हैं।

खासतौर पर सोमवार या विशेष शिव तिथि पर यहां बताए जा रहे शिव मंत्र का स्मरण पाप व संकटनाशक माना गया है। सोमवार को शिव की सफेद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, सफेद फूल के साथ दूध से बनी सफेद रंग की मिठाईयों का भोग लगाएं। धूप व दीप लगाकर नीचे लिखा शिव मंत्र बोलें व शिव की आरती कर कष्ट व संकटमुक्ति की कामना करें -

नमो रुद्राय महते सर्वेशाय हितैषिणे।
नन्दी संस्थाय देवाय विद्याभकराय च।।
पापान्तकाय भर्गाय नमोनन्ताय वेधसे।
नमो मायाहरेशाय नमस्ते लोकशंकर।।


!!! बिल्वपत्र वृक्ष की इस मंत्र के साथ करें पूजा..खूब बरसेगी लक्ष्मी !!!


हिन्दू धर्मशास्त्रों के मुताबिक बिल्वपत्र में शिव का वास माना गया है। बिल्वपत्र से शिव की पूजा भी पापनाशक मानी गई है। वहीं एक पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक बिल्वपत्र की पूजा लक्ष्मी कृपा से ऐश्वर्य और धनसंपन्न बनाने वाली भी है। क्योंकि माना जाता है कि जब समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुई तो लक्ष्मी का स्वामी बनने को लेकर देव-दानवों में संघर्ष हुआ। उस दौरान देवी ने बिल्वपत्र वृक्ष में समय बिताया और बाद में श्रीहरि विष्णु को अपना स्वामी चुना। इसलिए बिल्वपत्र श्रीवृक्ष के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ।

यही कारण है कि देवी व शिव उपासना के विशेष दिनों नवमी व चतुर्दशी तिथि पर विशेष मंत्रों के साथ बिल्वपत्र पूजा पाप व दरिद्रता का अंत कर वैभवशाली बनाने वाली बताई गई है। यह पूजा लक्ष्मी कृपा की कामना से हर रोज भी शुभ है।

जानते हैं विशेष मंत्र के साथ बिल्वपत्र पूजा का आसान उपाय-

- सुबह स्नान के बाद लाल या सफेद वस्त्र पहन बिल्वपत्र के वृक्ष की पूजा में चंदन, फूल व फूल माला, फल, वस्त्र, तिल, अनाज अर्पित करें। धूप व दीप जलाकर नीचे लिखा मंत्र बोल बिल्वपत्र वृक्ष की पूजा करें -

श्रीनिवास नमस्तेस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ।
ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्रहरो भव।।

- मंत्र पूजा के बाद लक्ष्मी कृपा की कामना के साथ शिव आरती या लक्ष्मी आरती भी करें और बिल्वपत्र की परिक्रमा करें। यथासंभव इस दिन बिना नमक का भोजन कर मौन व्रत रखें।


!!! नव गृह वाटिका ​ !!!


प्राचीन काल से मानव भविष्य को जानने की इच्छा रखता हॆ ऒर भविष्य सुधारने को प्रयत्नशील शील रहता हॆ:समभ्वत: उसके मन में यह विचार रहता हो कि पूर्व ज्ञान होने से समस्या का बेहतर निदान हो सकता हॆ, आकाशीय पिन्ड मानव जीवन एवं उसके दिन प्रतिदिन के व्यवहार पप कितना प्रभाव डालते हॆं, विवादास्पद विषय हॆ;
परम्परागत रूप मे ज्योतिषीय आधार में नवग्रह माने गये हॆं, सात दिनों पर आधारित सात ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध वॄह्स्पति,शुक्र, शनि ऒर दो छाया ग्रह राहु व केतु, प्रत्येक ग्रह का एक एक प्रतिनिधि पॊधा या वॄक्ष होता हॆ.इन पॊधों के संरक्षण व संवर्धन से मानवता का ऒर जीव का कल्याण होता हॆ,ऎसा प्राचीन ग्रंथों में कहा गया हॆ. आइये बारी बारी से इन प्रतिनिधि पॊधों के विषय में जाने;

१ सूर्य: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ मदार या आक इसे क्षीर-पर्ण,व अर्क भी कहते हें यह पूरे भारत में पाया जाता हॆ यह जंगली रूप बिना किसी विशेष देखभाल के उगता हॆ.यह कॆलोट्रोपिस प्रोसीरा कहलाता हॆ ऒर इसकी फ़ॆमिली हॆ- एसक्लिपियेडेसी. इसकी पत्तियो ऒर तने मॆं एक विषॆले तत्व fकेलोट्रोपिनf ऒर fकेलोट्रोपेजेनिनf होते हॆं.इसकी पत्तियों व तने को तोडने पर निकलने वाले सफ़ेद दूध नुमा रस जिसे लेटेक्स कहते हॆं, मेंffमदारेलबमf ऒर fमदारफ़्लूविलf नामक तत्व पाये जाते हॆं , यह पॊधा कागज़ बनाने के काम भी आता हॆ,इसका रस सूखने पर,गादा होकर गटापार्चा जॆसा हो जाता हॆ. आत्म हत्या व गर्भपातमें इसका प्रयोग प्राय; होता हॆ.


ऒषधीय गुण;मदार की जड, प्राय: हाथी-पांव रोग,कोढ, पुराने एक्जिमा के अतिरिक्त दस्तों व पेचिश में भी प्रयोग में लाते हॆं.मिस्र मेंअरब घाटी इसके फ़लों का आकर छोटे आम जॆसा होता हॆ.

संस्कॄत में इसे क्षीर पर्ण या अर्क कहते हॆं, मदार की विशेषता यह भी हॆ कि मदार ग्रीष्म को विकट परिस्थितियों को बखूबी सह लेता हॆ, भीषण गर्मियों मे जब ऒर पॊधे मॄत प्राय हो जाते हॆं मदार में बहार रहती हॆ.वॆद्य मनोरमा में मदार की तुलना सूर्य से करते हुए लिखा हॆ कि तीक्ष्णता ऒर उज्ज्वलता में सूर्य भगवान के समान हे अर्क! मॆं आपका अभि नन्दन करता हूं, जहां आप यानि

मदार नहीं होंगे वह्म ,उस प्रदेश में में नहीं रहूंगा. ;तो यह हॆ रोमयुक्त मांसल पत्तियों ऒर बॆजनी फ़ूल वाले मदार क्षीर पर्ण की महिमा. होमियोपॆथी में आक का प्रयोग कोढ से सुन्न पडे अंगों में नई चेतना के संचार हेतु लाते हॆं.






२ चंद्र: का प्रतिनिधि पॊधा हॆ पलाश,जिसे सामान्य भाषा में किंशुक, टॆसू या ढाक भी कहते हॆं.,संस्कृत में इसे पलाश ही कहते हॆं.लॆटिन में यह ब्यूटिया फ़्रोंडोसा कहलाता हॆ.ऒर फ़ॆमिली हॆ-लॆग्यूमिनोसी.


एक कहावत प्रसिद्ध हॆ,-ढाक के तीन पात,,पलाश का पॊध बडा महत्वपूर्ण हॆ यह मध्यम ऊंचाई ,लगभग १५ मीटर का वॄक्ष हॆ.इसमें वसन्त ॠतु में,होली के आ आसपास सुन्दर गहरे लाल या नारंगी रंग के फूल आते हॆं.इन फ़ूलों से एक रंग भी तॆयार होता हॆ. एक कथा के अनुसार शिव पार्वती के एकान्त में बाधा पहुंचाने पर, पार्वती ने अग्नि देव को श्राप दे दिया जिसके फ़लस्वरूप यह पॊधा बना,अत: यह पलाश अग्नि का ही रूप हॆ. टेसऊ के बीज कामोत्तेजक होते हॆं. आयुर्वेद में इसका बहुत महत्व हॆ. ढाक गरीब की क्रोकरी हॆ,पत्तल व दॊने इसी से बनते हॆं. दक्षिण भारत में जो काम केले के पत्तों से लिया जाता हॆ, उत्तर में वही काम ढाक के पत्ते करते हॆं. इसके तने से एक गॊंद मिलता हॆ जिसे कमर-कस कहते हॆं. यह स्त्री रोगों में बहुत काम आता हॆ. नोबुल पुरस्कार विजेता,प्रसिद्ध भारतीय कवि श्री रवीन्द्र नाथ टॆगोर को पलाश के फूल बहुत पसन्द करते थे ऒर उन्होंने शांतिनिकेतन में अपनी कुटिया के चारों ओर पलाश के वॄक्ष ही लगवाए,ऒर कुटिया क नाम रखा-पलाशी;उनकी साहित्व साधना यहीं से होती थी.



ऒषधीय गुण धर्म;ढाक की छाल व पत्तियों में काइनोटॆनिक एसिड तथा गॆलिक एसिड होता हॆ ऒर बीजों में पलासोनिन पाया जाता हॆ. पलाश के फूल स्तम्भक, तॄष्णा शामक कोढ दूर करने वाला,कह च पित्त नाशक,भूख बढाने वाले होते हॆ. पत्ते यकॄत उत्तेजक होते हॆं. इसका गोंद भी स्तम्भक, अम्लानाशक,खासी निवारक व संग्रहणी को दूर करता हॆ.पलाश के पत्तों का काढा पीने से अफ़ारा व पेट दर्द दूर होता हॆ.,पलाश के बीजों के चूर्ण क एक एक चम्मच दो बार खाने से पेट के सब कीडे मर कर बाहर आ जाते हॆं. इसकी जड के रस के सेवन से अनॆच्छिक वीर्यस्राव रुकता हॆ,ऒर काम शक्ति प्रबल होही हॆ ज्डों के रस में गेहूं के दाणे तीन दिन भिगो कर खाने से यॊन रोग ठीक हो जाते हॆं व काम शक्ति में वॄद्धि होती हॆ.


३.मंगल: का प्रतिनिधि हॆ खॆर या कत्था,लॆटिन में इसे अकेसिआ कटॆचू कहते हॆं,इसकी फ़ॆमिली मिमोसी हॆ.यह मध्यम ऊंचाई वाला कांटे दार वॄक्ष हॆ इसके कांटे बिल्ली के पंजों की तरह होते हॆं, इसी से इसे कटेचू नाम दिया गया हॆ. इसके पत्ते व बीज प्रोतीन युक्त होते हॆं इसका स्वरस वात सम्बन्धी रोगों को व सूजन को ठीक करता हॆ. दस्त ऒर पेचिश को भी ठीक करता हॆ.इसके पत्ते व टहनियां बकरी एवं ऊंट बडे चाव से खाते हॆं उनके लिए यह विशेष उपयोगी हॆ.
इसकी लकडी भी बहुत उपयोगी होती हॆ.इमारती लकडी की तरह ही अन्य उपकरणो एवं हलों को बनाने मे इसका इस्तेमाल होता हॆ,लकडी का कोयला भी अति मूल्यवान होता हॆ विशेषत: सोने,चांदी पर काम करने वालों के लिए. व लोहारों के लिए. हल, चाकू छुरी,तलवार की मूठ व हत्थे,हुक्के की नली व गन्ने की पिराई मे भी इसका उपयोग होता हॆ इस पर पॊलिश भी आसानी से व अच्छी हो
जाती हॆक तथा कफ़,पित्त संशोधक हॆ.यह सूजन को हटाने वाला,कीडॊं को मारने वाला,रक्त शोधक,रक्त वर्धक,पसीना लाने वाला,पाचक हॆ. त्वचा रोगोंमें सर्प, बिच्छू ततॆयां,भ्रमरी आदि के दंश पर इसके पत्तों क लेप बहुत गुणकारी होता हॆ

आधा सीसी; इसके बीजों का चूर्ण सूघने मात्र सेमस्तक के अन्दर जमा हुवा कफ़ पतला होकर नाक के रास्ते बाहर निकल आता हॆ.
दांतों के रोगों में,इसकी ताजी जड की दातुन करने से दांत मोती की तरह चमकने लगते हॆं,दांतों का दर्द,मसूढो की कमजोरी मुंह से दुर्गन्ध आना,दांत का हिलना भी ठीक हो जाता हॆ.






४.बुध या मरकरी: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ;अपामार्ग, लटजीरा या,चिरचिटा; लॆटिन में इसे कहते हॆं एकिरेंथस एस्पेरा ऒर इसकी फॆमिली हॆ-एमेरेंथेसी. अपामार्ग का अर्थ हॆ,जो दोषों को संशोधित करे असाध्य रोगों का भी अंत करे.अपामार्ग एक ऎसा दिव्य पॊधा हॆ जो प्रसव काल से लेकर जीवन के अंत समय तक के रोगों को दूर करने की क्षमता रखता हॆ.


यह पॊधा भारत में सभी प्रांतों में जंगलीरूप में पाया जाता हॆ. वर्षा ऋतु में यह विशेषकर पाया जाता हॆ.अपामार्ग का पोधा १ से ३ फ़ुट ऊंचा होता हॆ.शाखाएं पतली पर गांठों पर मोटा होता हॆ. पत्ते अडाकार ऒर र्रोम युक्त होते हॆं पुष्प मन्जरी पत्तों के बीच से निकलती हॆ. अपामार्ग में पॊटेशियम की मात्रा बहुत अधिक होती हॆ.


श्वास रोग, अपामार्ग की जड में बलगम,खांसी ऒर दमा को दूर करने के चमत्कारी गुण हॆं,इस पॊधे की ८-१० सूखे पत्तों को हुक्के में रख कर पीने से सांस लेने में लाभ होता हॆ.बच्चों की काली खांसी इसके बीजों की राख को शहद के साथ चटाने से जल्दी ही ठीक हो जाती हॆ. सुख प्रसव;प्रसव पीडा प्रारम्भ होने से पहले अपामार्ग की जड को एक धागे से कमर में बांधने से आसानी से प्रसव होता हॆ.पर प्रसव के तुरन्त बाद उसे हटा लेना चाहिये. ८० वर्ष के वॄद्ध व्यक्ति भी अपामार्ग की जड से दातुन करें तो उनके दांत भी स्वस्थ देखे गये हॆं वॄद्धावस्था मे दांतों की मजबूती का यही रहस्य हॆ.








५.वॄहस्पति या गुरु जुपीटर: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ पीपल, या अश्वत्थ. लॆटिन में फ़ाइकस रॆलिजिओसा फ़ॆमिली हॆ-मोरेसी पीपल का वॄक्ष भारत में पवित्र माना जाता हॆ,एसा विश्वास हॆ कि इसी वॄक्ष के नीचॆ,गया में,भगवान बुद्ध ने कठिन तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया था.यह आज से बहुत पहले २८८बी.सी.में लगाया गया था, इस वॄक्ष को प्रसन्नता, स्मॄद्धि, दीर्ह्ग जीवन ऒर सॊभाग्य का प्रतीक माना गया हॆ. ऒषधीय गुण धर्म; .इस वॄक्ष की जड, छाल, पत्ते, फूल सभी उपयोगी होते हॆं.छाल प्रदर में उपयोगी,फल दस्तावर, ऒर बीज ठंडक देने वाले होते हॆं. पेड की छाल,बालों के कीदों को नष्ट करती हॆ.पत्तियां व नई कोंपलें पेट साफ़ करती हॆं.

इसके पेड घने व छायादार होतॆ हॆं, मन्द गति में भी हवा चले तो भी इसके पत्ते हिलने लगते हॆं,अत: इसके पत्ते अस्थिर चित्त का प्रतीक कहे गये हॆं उपमा दी जाती हॆ-पीपर पात सरिस मन डॊलाf अत: यह अस्थिर मन का प्रतीक भी हॆ.पीपल की ताजी टहनी प्रतिदिन दातुन करने से दांत मजबूत होते हॆं,मसूढों की सूजन व मुख कीदुर्ग>ध समाप्त हो जाती हॆ.पीपल के पत्ते गुड के साथ चबा कर खाने से पेट क दर्द खतम हो जाता हॆ. पीपल के पत्ते मिश्री के साथ घोट कर पीने से पीलिया रोग भी ठीक हो जाता हॆ.





६.शुक्र ,वीनस: का प्रतिनिधि वॄक्ष हॆ-गूलर,संस्कॄत मॆं इसे उदम्बर या उडम्बर कहते हॆं लॆटिन में फ़ाइकस रॆसीमोसा फ़ेमिली मोरेसी.,यह भी एकघना,छायादार ,पेड हॆ एक विशेष बात इसके बारे में यह हॆ कि प्राचीन ग्रथों में भी इसका वर्णन मिलता हॆ-खास कर अथर्व वेद में.जो लगभग २५०० साल पुराना हॆकहा जाता हॆ कि प्रसिध राजा हरिश्चन्द्र जो इक्षावाकु वंश के थे,उनका मुकुट उदम्बर वॄक्ष की टहनी से बना था जो सोने से जडी थी.ऒर उनका सिंहासन उदम्बर की ल्कडी से ही बना था.


अथर्ववेद के अनुसार गूलर का वॄक्ष पुष्टि देने में सर्व श्रेष्ठ कहागया हॆ. इसके फल का दूध घी के साथ सेवन करने से बूढा भी जवान हो जाता हॆ,ऒर कहा गया हॆ कि इंद्र देव की प्रेरणा से ही अपनी तेजस्विता के साथ यह ऒदुम्बर ,प्रजा व वॆभव के साथ हमे उपलब्ध हुआ हॆ..इसका तना लम्बा,मोटा तथा टेढा होता हॆ. इसमें फल सारे साल लगते रहते हॆं अत; इसे बारह मासी भी कहा जाता हॆ. इसमे फल गोलाकार १-२ इंच व्यास के,कच्ची अवस्था में हरे ऒर पकने पर हल्के लाल हो जाते हॆं.
इनमें टॆनिन,मोम व रबड तथा राख मॆं सिलिका ऒर फस्फोरिक एसिड पाये जाते हॆं.


ऒषधीय गुण धर्म: छाल व कच्चे फल स्तम्भन,प्रमेह नाशक ऒर दाह नाशक हॆ.पके फल श्लेश्म दूर करने वाले,मन को प्रसन्न करने वाले व दाह नाशक हॆ.५ग्रम गूलर के पत्तों के रस में शहद मिलाकर पिलाने से रक्तपित्त मिटता हॆ. इससे रक्तातिसार में भी तुरन्त लाभ होता हॆ. इसके दूध की ८-१० बूंदें दो बताशों मे भर कर रोज खिलाने से मूत्र रोग मिटते हॆं.



७.शनि: इसका प्रतिनिधि पॊधा हॆ-शमी,खिजरी या छ्योंकर,लॆटिन में- प्रोसोपिस स्पा सिजॆरा,इसका पर्याय हे प्रोसोपिस सिनेरेरिया,इसकि फ़ेमिली या कुल हॆ लॆग्यूमिनोसी. इसका इतिहास भी प्राचीन हॆ,प्रसिद्ध महाकाव्य महाभारत आठवीं पुस्तक में fकर्ण पर्वf में अध्याय ३०,श्लोक २४ में शमी,पीलू व करीर के वृक्षों का वर्णन हॆ.."विराट पर्व" में पांड्वों ने विराट की राजधानी मेम जाने से पूर्व अपने अस्त्रदि शमी वॄक्ष में ही छिपा के रखे थे.तमिल नाडु में इसे पवित्र पेड माना जाता हॆ ऒर भगवान शिव व श्री मुरुगन के मंदिरों के स्थल भी एसी वॄक्ष के नीचे होते हॆं.
शमी का वॄक्ष बडा उपयोगी होता हॆ.विशेष रूप से मरुस्थलीय क्षेत्र में क्यॊंकि वहां के वातावरण में यही पेड खूब फलता फूलता हॆ,रेत के टीलों एवं मिट्टी को इसकी जडॆ.बांध कर रखती हॆं इसकी पत्तियों को सभी मवेशी,भेढें, बकरियां, ऊंट,गधे, आदि के अतिरिक्त पश्चिमी राजस्थान में काला हिरन ऒर चिंकारा भी इसकी फलियों व पत्तियों पर निर्भर रहते हॆं.


ऒषधीय उपयोग व गुणधर्म;.

शमी के फूलों को पीस कर चीनी मिला कर खाने से गर्भावस्था के दॊरान गर्भपात नहीं होता.इसकी छाल को पानी में भिगो कर जो द्रव निकलता हॆ उसमें सूजन को दूर करने वाले गुण पाए जाते हशमी पॊधे से मई, जून के महीने मे एक गोंद प्राप्त होता हॆ. पेड की छाल कडवी,व तेज होती हॆ. कीडे मारने वाली,कोढ को ठीक करने वाली,पेचिश,अस्थमा,श्वास रोगों को मिटाने वाली,ल्यूकोडर्मा,मांसपेशियों के विकारों को ठीक करती हॆ. इसकी पत्तियों का धुआं नेत्रों को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि नेत्र रोगों को ठीक करता हॆ.वॄक्ष की छाल वात रोग,रोठिया,खांसी,सामान्य जुकाम,अस्थमा के साथ बिच्छू के काटे का भी इलाज होता हॆ, पंजाब में इससे सांप काटने का भी इलाज होता हॆ.


राजस्थान के बिशनोइ समाज "खेजरी वॄक्ष संरक्षण"पर भारत सरकार की सहायता से एकfअमॄता देवी बिशनोई वन्य जीवन संरक्षण राष्ट्रीय पुरस्कारfकी स्थापना की हॆ.




८.राहु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ दूब, राम घास,दूर्बा या,काली घास;संस्कॄत में इसे ध्रुव या हरितली व लॆटिन में इसे साइनोडोन डेक्टीलोन कहते हॆं.फ़ेमिली हॆ-पोएसी. नंगे पॆर चलना घास पर सेहत के लिए बहुत फ़ायदे मन्द होता हॆ.इससे नेत्र ज्योति बढ्ती हॆ ऒर शरीर की कई व्याधियां दूर हो जाती हॆं.


दूब घास विशेषता यह हॆ कि यह सूर्य के प्रकाश में हरा भरा रहता हॆ पर छाया में उतना नहीं.इसके विकास के लिये २४-३७.सी का तापमान सबसे उपयुक्त रहता हॆ.यह ४-१५ से.मी.तक लम्बा होता हॆ.इसकी जड बडी गहरी होती हॆ. ऒर सतह के नीचे २ मीटर तक फॆल सकती हॆ. गरम वातावरण मएं यह पूरे विश्व में पाया जाता हॆ.दूब घास ऒर घासों की तुलना में अधिक तेजी से फ़ेलता हॆ क्योंकि इसमे प्रतिकूल मॊसम को सहने की क्षमता हॆ.यह आक्रामक भी हॆ.इसी कारणसे इसे डेविल या शॆतान घास भी कहते हॆं. इसकी पत्तियां
भूरे हरे रंग की होती हं जिसमें से गुच्छॊं से ३-७ मन्जरी निकलती हॆं.




ऒषधीय गुण; दूब वाइरस ऒर बॆक्टीरिया प्रतिरोधी होता हॆ.इसे पानी में उबाल कर पानी के कुल्ले करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हॆं.दूब को चूने मे मिला कर पीस कर माथे पर लेप करने से सिर दर्द ठीकहो जाता हॆ.दूब का काढा वेदना नाशक हॆ मूत्र की जलन को शान्त करता हॆ,मूत्र नली के संक्रमण को दूर करने के अतिरिक्त यह प्रोस्ट्रेट ग्रन्थि, उपदंश व पेचिश के इलाज में भी काम आता हॆ


मधुमेह में व ग्लूकोज की कमी को दूर करने में भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ हॆ.प्रयोग शाला के चूहों पर इलाहाबाद विश्व विद्यालय के शोध कर्ताओ ने अपने शोध मे यह पाया हॆ.इस बात की प्रबल सम्भावना हॆ कि भविष्य में मधु मेह क इलाज दूब घास से हो. आंख दुखने पर इसके पत्तों को पीस कर पलकों पर बांधने से आराम मिलता हॆ. इसकी जड मस्सों से रक्त प्रवाह रोकती हे.इसके पत्तों क रस ताजे जख्मों ऒर घावों पर लगाते हॆ.पेचिश ऒर दस्त भी इसी से ठीक होते हॆं.

९.केतु: इस छाया ग्रह का प्रतिनिधि हॆ एक घास जेसे कहत्ते हॆं.- कुश,संस्कॄत में दर्भ,लॆटिन में इसे डॆस्मोस्टॆचिया बाइ-पिन्नेटा कहते हॆं. अथर्व वेद में इस दर्भ महिमा गायी गयी हॆ अथर्व वेद संहिता में लिखा हॆ कि जल वर्षक मेघ विद्युत के साथ गर्जना करते हें उससे स्वर्ण मय जल बिंदु ऒर कुश की उत्पत्ति हुई, ऒर पुरुषों को दीर्घ जीवन व तेजस्विता प्रदान करने के लिए दर्भ उनके शरीर से बांधा जाता हॆ. क्योंकि दर्भ शत्रु संहारक ऒर विद्वेशी शत्रुओं को संतप्त करने वाली हॆ. दर्भ पूरे भारत में गर्म व सुखे इलाकों में पाई जाती हॆ.




इसका तना मूत्र वर्धक,उत्तेजक तथा पेचिश में उपयोगी होता हॆ. नवीन तम खोजों से यह ज्ञात हुआ हॆ कि दर्भ के तने में पांच एल्केलायड पाए जाते हॆं जो किसी भी प्रकार के खून को बहने से रोकते की क्षमता रखते हॆं.

इस प्रकार हमने देखा कि सारे ग्रह ऒर उनके प्रतिनिधि पॊधे मानव जाति की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध हॆं. दूरस्थ ग्रह मनुष्य की कितनी रक्षा कर सकते हॆं यह तो हमें मालूम नहॆं पर ये प्रतिनिधि पॊधे अपने गुणॊ से हमें जरूर कई बीमारियों से बचा सकते हॆं.



!!! बिल्वपत्र से भी ज्यादा शुभ है शिव पूजा में इस फूल को चढ़ाना !!!

शिव की उपासना में बिल्वपत्र का चढ़ावा बहुत ही शुभ और पुण्य देने वाला माना जाता है। धार्मिक आस्था है कि बिल्वपत्र का शिव को चढ़ावा जन्म-जन्मान्तर के पाप और दोषों का नाश करता है। वैसे भी शिव की पूजा में कुदरती सामग्रियों के चढ़ावे का महत्व है। इनमें तरह-तरह के पेड़-पौधों के पत्ते, फूल और फल शामिल होते हैं।


शास्त्रों में भगवान् शिव शंकर पर फूल चढाने का बहुत अधिक महत्त्व बताया गया है ! अतः इसका उल्लेख करना आवश्यक है -


शास्त्रों ने कुछ फूलों के चढाने से मिलने वाले फल का तारतम्य बतलाया है , जैसे दस स्वर्ण - माप के बराबर स्वर्ण- दान का फल 



  •  एक आक के फूल को चढाने से मिल जाता है , 
  •  हज़ार आक के फूलों कि अपेक्षा एक कनेर का फूल, 
  •  हज़ार कनेर के फूलों के चढाने कि अपेक्षा एक बिल्व -पत्र से मिल जाता है 

  •  और हज़ार बिल्व-पत्रों कि अपेक्षा एक गूमा-फूल ( द्रोण -पुष्प ) , 
  • हज़ार गूमा से बढ़कर एक चिचिडा ( अपामार्ग) , 
  • हज़ार अपमार्गों से बढ़कर एक कुश का फूल , 
  • हज़ार कुश के फूलों से बढ़कर एक शमी का पत्ता , 
  • हज़ार शमी के पत्तों से बढ़कर एक नीलकमल , 
  • हज़ार नीलकमल से बढ़कर एक धतूरा , 
  • हज़ार धतूरों से बढ़कर एक शमी का फूल होता है ! 




* अंत में शास्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि फूलों कि प्रजाति में सबसे बढ़कर नीलकमल ही भगवान् शिव जी का सर्वाधिक प्रिय पुष्प है ! *


शास्त्रों के मुताबिक इन फूल-पत्तों में कुछ ऐसे भी हैं, जिनको शिव पूजा में चढ़ाना बिल्वपत्र से भी ज्यादा पुण्य और फल देने वाला माना गया है। धार्मिक महत्व के नजरिए से जानिए शिव को चढ़ाए जाने वाले कौन से हैं ये फूल और पत्ते -





- एक आंकड़े का फूल चढ़ाना सोने के दान के बराबर फल देता है,



- एक हजार आंकड़े के फूल के बराबर एक कनेर का फूल फलदायी,


- एक हजार कनेर के फूल के बराबर एक बिल्वपत्र फल देता है,


हजार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी,


- हजार गूमा के बराबर एक अपामार्ग, लटजीरा या,चिरचिटा या चिचिड़ा,


- हजार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल,


- हजार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता,



- हजार शमी के पत्तो के बराबर एक नीलकमल,


- 

हजार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा




- हजार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।



इस तरह शमी का फूल शिव को चढ़ाना शिव भक्ति से तमाम मनचाही कामनाओं को पाने का सबसे श्रेष्ठ उपाय है।




बाबा के प्रिय सावन माह के बारे आधिक जाने ..अपने धर्म को और करीब से माने : जय बाबा घुइसरनाथ जी

हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया।

सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है। एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्च्छित हो जाते हैं।
उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है। भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।
विष की उग्रता को कम करने के लिए अत्यंत ठंडी तासीर वाले हिमांशु अर्थात चन्द्रमा को धारण कर रखा है। और श्रावण मास आते-आते प्रचण्ड रश्मि-पुंज युक्त सूर्य ( वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ में किरणें उग्र आतपयुक्त होती हैं।) को भी अपने आगोश में शीतलता प्रदान करने लगते हैं। भगवान सूर्य और शिव की एकात्मकता का बहुत ही अच्छा निरूपण शिव पुराण की वायवीय संहिता में किया गया है। यथा-
'दिवाकरो महेशस्यमूर्तिर्दीप्त सुमण्डलः।
निर्गुणो गुणसंकीर्णस्तथैव गुणकेवलः।
अविकारात्मकष्चाद्य एकः सामान्यविक्रियः।
असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात्‌। एवं त्रिधा चतुर्द्धा च विभक्तः पंचधा पुनः।
चतुर्थावरणे षम्भोः पूजिताष्चनुगैः सह। शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिषतु मंगलम्‌।'


अर्थात् भगवान सूर्य महेश्वर की मूर्ति हैं, उनका सुन्दर मण्डल दीप्तिमान है, वे निर्गुण होते हुए भी कल्याण मय गुणों से युक्त हैं, केवल सुणरूप हैं, निर्विकार, सबके आदि कारण और एकमात्र (अद्वितीय) हैं।

सावन के प्रधान देवता शिव हैं । उन्हें सर्वाधिक प्रसन्न करने का सर्वोत्तम उपाय गंगाजल से जलाभिषेक है। सावन के सोमवार को शिव अर्चना का विशेष महत्व होता है। सावन में किस प्रकार शिव की आराधना विशेष फलादयी हो जाती है, सावन शिव को अत्यंत प्रिय क्यों है, धर्मग्रंथों में इसकी प्रसंगवश व्याख्या की गई है। सावन के महीने में शिवजी को रोजाना बिल्व पत्र चढ़ाए। बिल्व पत्र की संख्या 108 हो तो सबसे अच्छा परिणाम मिलता है।

शिवजी का पूजन कर निर्माल्य का तिलक लगाए तो भी जल्दी विवाह के योग बनते हैं। हर सोमवार खासतौर पर सावन माह के सोमवार को शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। कालसर्प दोष के निवारण के लिये नाग पंचमी के दिन शिव की पूजा कर चांदी के नाग का जोड़ा चढ़ाएं और एक जोड़ा चांदी का सर्प बहते जल में बहाएं। कालसर्प योग हो और जीवन में लगातार गंभीर बाधा आ रही हो तब किसी विद्वान ब्राह्मण से राहु और केतु के मंत्रों का जप कराया जाना चाहिए और उनकी सलाह से राहु और केतु की वस्तुओं का दान या तुलादान करना चाहिए।

सावन में हर राशि का व्यक्ति शिव पूजन से पहले काले तिल जल में मिलाकर स्नान करे। शिव पूजा में कनेर, मौलसिरी और बेलपत्र जरुर चढ़ावें। इसके अलावा जानते हैं कि किस राशि के व्यक्ति को किस पूजा सामग्री से शिव पूजा अधिक शुभ फल देती है...
मेष – इस राशि के व्यक्ति जल में गुड़ मिलाकर शिव का अभिषेक करें। शक्कर या गुड़ की मीठी रोटी बनाकर शिव को भोग लगाएं। लाल चंदन 
व कनेर के फूल चढ़ावें।
वृष- इस राशि के लोगों के लिए दही से शिव का अभिषेक शुभ फल देता है। इसके अलावा चावल, सफेद चंदन, सफेद फूल और अक्षत यानि चावल चढ़ावें।
मिथुन – इस राशि का व्यक्ति गन्ने के रस से शिव अभिषेक करे। अन्य पूजा सामग्री में मूंग, दूर्वा और कुशा भी अर्पित करें।
कर्क – इस राशि के शिवभक्त घी से भगवान शिव का अभिषेक करें। साथ ही कच्चा दूध, सफेद आंकड़े का फूल और शंखपुष्पी भी चढ़ावें।
सिंह – सिंह राशि के व्यक्ति गुड़ के जल से शिव अभिषेक करें। वह गुड़ और चावल से बनी खीर का भोग शिव को लगाएं। गेहूं और मंदार के फूल भी चढ़ाएं।
कन्या – इस राशि के व्यक्ति गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करें। शिव को भांग, दुर्वा व पान चढ़ाएं।
तुला – इस राशि के जातक इत्र या सुगंधित तेल से शिव का अभिषेक करें और दही, शहद और श्रीखंड का प्रसाद चढ़ाएं। सफेद फूल भी पूजा में शिव को अर्पित करें।
वृश्चिक – पंचामृत से शिव का अभिषेक वृश्चिक राशि के जातकों के लिए शीघ्र फल देने वाला माना जाता है। साथ ही लाल फूल भी शिव को जरुर चढ़ाएं।
धनु – इस राशि के जातक दूध में हल्दी मिलाकर शिव का अभिषेक करे। भगवान को चने के आटे और मिश्री से मिठाई तैयार कर भोग लगाएं। पीले या गेंदे के फूल पूजा में अर्पित करें।
मकर – नारियल के पानी से शिव का अभिषेक मकर राशि के जातकों को विशेष फल देता है। साथ ही उड़द की दाल से तैयार मिष्ठान्न का भगवान को भोग लगाएं। नीले कमल का फूल भी भगवान का चढ़ाएं।
कुंभ – इस राशि के व्यक्ति को तिल के तेल से अभिषेक करना चाहिए। उड़द से बनी मिठाई का भोग लगाएं और शमी के फूल से पूजा में अर्पित करें। यह शनि पीड़ा को भी कम करता है।
मीन – इस राशि के जातक दूध में केशर मिलाकर शिव पर चढ़ाएं। भात और दही मिलाकर भोग लगाएं। पीली सरसों और नागकेसर से शिव का चढ़ाएं।


17 July 2013

!!! रुद्राक्ष की महिमा और मंत्र !!!



ऊँ ह्रीं नम:।।

रुद्राक्ष की माला रुद्राक्ष को एक अकेले दाने के रूप में या माला के रूप में भी धारण किया जा सकता है। एक ही माला के सभी दाने एक ही प्रकार के भी हो सकते हैं और विभिन्न प्रकार के भी हो सकते हैं। रुद्राक्ष की माला अनेक प्रकार से फलदायिनी होती है। इसमें गुण ही गुण होते हैं तथा इसमें कोई अवगुण नहीं पाया जाता। रुद्राक्ष की माला पर जप करने से अनेक रोगों का इलाज किया जा सकता है। रुद्राक्ष की माला पर किसी भी देवी देवता का जप किया जाये तो वे शीध्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। रुद्राक्ष की माला रुद्राक्ष के दानों से बनाई जाती है। इसमें दानों की संख्या ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ ली जाती है जैसे कि 108, 54, 27. इनमें से 1’ वाले दाने को सुमेरू कहा जाता है जो कि जप के समय पार नहीं किया जाता. लेकिन माला को 108, 54 या 27रुद्राक्षों की माला ही कहा जाता है।

एक मुखी रुद्राक्ष मुष्किल से मिलता है और बहुत शक्तिषाली होता है। 5 मुखी रुद्राक्ष की माला पूजा के काम आती है। 16 रुद्राक्ष के दानों की माला माथे पर, 26 रुद्राक्ष के दानों की माला सिर पर और 50 रुद्राक्ष के दानों की माला हृदय पर पहनी जाती है। एक ही माला जप व पहनने दोनो कामों में उपयोग नहीं की जा सकती परंतु इस विषय पर अपवाद भी मिलते हैं। कुछ संत लोग तो जप की हुई माला ही पहनना लाभदायक समझते हैं। जप करते समय माला अनामिका और मध्यमा उंगलियों के बीच में रहती है। केवल रुद्राक्ष की माला ही ऐसी माला होती है जिसे किसी भी प्रकार के जप के लिये उपयोग किया जा सकता है। रुद्राक्ष की माला की इतनी खूबियों के कारण ही आज यह अमेरिका, जापान, जर्मनी, इंगलैंड आदि पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय है। ग्रंथों में कहा गया है कि रुद्राक्ष की माला को मंत्रों के द्वारा शुद्ध, पवित्र और ऊर्जावान करके ही पहना जा सकता है। तब रुद्राक्ष निश्चय ही काम करता है और अगर यह शुद्धता की कसौटी पर भी खरा उतरा हो तो यह और भी अधिक शक्तिषाली और प्रभावी हो सकता है बशर्ते कि निरंतर जप और हवन से इसकी ऊर्जा और शक्ति को बढाया जाये। रुद्राक्ष के मुखों की संख्या के अनुसार मंत्र

1 मुखी – ऊँ नमः षिवाय् , ॐ ह्रीं नमः
2 मुखी - श्री गौरी शंकराय नमः, ॐ नमः
3 मुखी - ॐ क्लीं नमः, ॐ नमः शिवाय
4 मुखी - ॐ ह्रीं नमः 5 मुखी - ॐ नमः शिवाय् , ॐ ह्रीं नमः
6 मुखी - स्वामी कार्तिकेयाय नमः, ॐ ह्रीं हं नमः
7मुखी - ॐ महालक्ष्म्यै नमः, ॐ हं नमः
8 मुखी -ॐ हं नमः, ऊँ गणेशाय् नमः
9 मुखी - नव दुर्गाय् नमः, ॐ ह्रीं हं नमः
10 मुखी - श्री नारायणाय नमः, श्री वैष्णवाय नमः, ॐ ह्रीं नमः
11 मुखी -ॐ श्री रूद्राय नमः, ॐ ह्रीं हं नमः
12 मुखी - श्री सूर्याय नमः 13 मुखी - ॐ ह्रीं नमः
14 मुखी - ॐ नमः शिवाय 

उपरोक्त सभी मंत्रों के बाद महामृत्युंजय मंत्र का 9 बार जाप किया जाता है जो इस प्रकार है - ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ऊर्वारूकमिव बंधनानमृत्र्योमुक्षीय मामृतात् ।

रुद्राक्ष की उपयोगिता और लाभ.....

1 मानसिक तनाव से मुक्ति पाने में रुद्राक्ष रामबाण की तरह से काम करता है।

2 एषिया के विभिन्न साधु व सन्यासियों के अनुसार मात्र रुद्राक्ष धारण करने से ही उन्हें तपस्या करने के लिये घ्यान केंद्रित करने में और विचारशील मन को काबू करने में अत्यन्त मदद मिलती है।

3 रुद्राक्ष शरीर, मन और आत्मा के लाभ के लिये अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। यह शरीर को बल प्रदान करता है और बीमारियों से लडने में मदद करता है। आयुर्वेद के अनुसार रुद्राक्ष शारीरिक सरंचना में सुधार लाता है। यह रक्त की अशुद्धियों को दूर कर शरीर को निरोगी बनाता है.

4 यह मानव शरीर के अंदर के साथ-साथ शरीर के बाहर की वायु में भी जीवाणुओं का नाश करता है।

5 यह तनाव, चिंता और डिप्रेशन का प्रभाव भी कम करता है। रुद्राक्ष सिरदर्द,खांसी, लकवा, और मातृत्व की रूकावटों को दूर करने में भी मदद करता है।

6 मेडिकल साइंस के अनुसार भी यह सिद्ध हो गया है कि रुद्राक्ष को धारण करने से ही हृदय गति में सुधार आ जाता है तथा उच्च रक्तचाप ठीक होने लगता है।

7. वे जातक जिनको उच्च रक्त चाप की शिकायत है, उन्हें रुद्राक्ष का लाभ निम्न तरीके से लेना चाहिये - ‘‘पांच मुखी रुद्राक्ष के दो दाने रात को एक गिलास पानी में रख दें व सुबह खाली पेट उस जल को पी लें। गिलास ताम्बे के अतिरिक्त किसी भी धातु का हो सकता है।’’ 40 दिन तक नियमित लेने से फर्क महसूस किया जा सकता है।

8 वे जातक जो हमेशा चिंता में रहते है, अथवा जिनका आत्मविष्वास खो-सा गया होता है या जो कांपते ज्यादा हैं - उन्हें रुद्राक्ष का लाभ निम्न तरीके से लेना चाहिये: ‘‘ ऐसे जातक एक पांच मुखी रुद्राक्ष हमेशा अपने पास रखें और जब जब वे जरूरत महसूस करें, उस रुद्राक्ष को अपनी दांयी हथेली में जोर से भींच लें और इस प्रकार से दस मिनट तक रहें। इससे उनका आत्मविष्वास वापिस आ जायेगा और उनका शरीर भी स्थिर हो जायेगा।’’

9 रुद्राक्ष को पहनने से चेहरे पर तेज आता है जो व्यक्तित्व को निखारने के काम आता है।

10 यह व्यक्ति की यादाश्त को बढाने में भी उपयोगी है।

11रुद्राक्ष जीवन की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करता है, सुख-शांति प्रदान कर मान-सम्मान में वृद्धि करता है।

12 रुद्राक्ष शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ आत्मा की उन्नति के लिये भी लाभदायक है। रुद्राक्ष को धारण करने से पूर्वजन्म के उन पापों से मुक्ति मिलती है जो कि इस जन्म में भी रूकावटें पैदा कर सकते हैं।

13 अगर कोई व्यक्ति अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पाना चाहता है और शुद्धता का जीवन जीना चाहता है तो उसे रुद्राक्ष की माला पहननी चाहिये, निष्चित रूप से लाभ मिलता है।

14 रुद्राक्ष अशुभ ग्रहों के प्रभाव को भी कम करने में उपयोगी होता है। ब्रह्मांड में 27 नक्षत्र हैं जो कि 9 ग्रहों को चलाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र किसी न किसी रुद्राक्ष से जुडा होता है जो कि संबंधित ग्रह से ऊर्जा प्राप्त करता है। यह केवल ऊर्जा प्राप्त ही नहीं करता बल्कि इसका वितरण भी करता है। यह निष्चित है कि रुद्राक्ष ग्रहों के बल से ऊंची और प्रभावशाली वस्तु है। तभी तो विभिन्न मुखी रुद्राक्ष विभिन्न ग्रहों की शांति के लिये काम में लिये जाते हैं। जो ग्रह जातक के लिये अशुभ है, उस ग्रह से संबंधित रुद्राक्ष ही धारण कर उस अशुभ ग्रह की शांति की जा सकती है।

15 प्रत्येक रुद्राक्ष किसी न किसी देवता या देवी से संबंधित होता है। यही धनात्मक बल रुद्राक्ष के धारक को नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं से बचाता है।

16 रुद्राक्ष जीवन की अति आवश्यक वस्तु है क्योंकि यह भगवान शिव से संबंधित है औरसही शिव देवों के देव महादेव हैं। अतः रुद्राक्ष पहनने वाले को अगर रुद्राक्ष से अधिक से अधिक लाभ लेना है तो उसमें श्रद्धा और विष्वास होना बहुत जरूरी है।



16 July 2013

!!! हर दिन बोलें ये मात्र 12 अक्षरी गणेश मंत्र !!!


हर इंसान दैनिक जीवन में सुख-सफलता से जुड़े अनेक कामों व मकसद में सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत करता है। किंतु अनेक अवसरों पर क्षणिक स्वार्थ, लालसा या मन की चंचलता से पैदा बुद्धि दोष न केवल अपयश देकर सफलता से वंचित करता है, बल्कि मकसद पूरा करने में भी रोड़ा बन जाता है। 

ऐसे दोष, विकारों से मुक्त होकर यशस्वी व सफल बने रहने के लिए ही मंगलमूर्ति श्री गणेश की उपासना का महत्व बताया गया है। क्योंकि श्री गणेश बुद्धिदाता, विघ्रविनाशक देवता माने जाते हैं। इसलिए किसी भी कार्य, नौकरी, परीक्षा व लक्ष्य में सफलता व बेहतर नतीजों को पाने के लिए शास्त्रों में हर दिन यहां बताए जा रहे मात्र 12 अक्षरी गणेश मंत्र के स्मरण का महत्व बताया गया है।

जानिए यह मंगलकारी व आसान गणेश मंत्र व सरल गणेश पूजा विधि -

- सुबह स्नान के बाद श्री गणेश की मूर्ति को भी पंचामृत स्नान के बाद सिंदूर, अक्षत, दूर्वा, पीला वस्त्र और भोग में मोदक या लड्डू अर्पित करें। वह पीले आसन पर बैठ मूंगे की माला से इस गणेश मंत्र का काम व लक्ष्य विशेष में सफलता की कामना से कम से कम 108 बार यथाशक्ति जप करें। आखिर में श्री गणेश की पूजा धूप, दीप व कर्पूर आरती करें -

ॐ नमो भगवते गजाननाय 

- किसी परेशानी या अचानक आए संकट की घड़ी में भी इस मंत्र का मन ही मन ध्यान भी अनिष्ट व अशुभ प्रभावों से रक्षा करने वाला माना गया है।


15 July 2013

!!! शिवस्तुति: !!!



श्रीगणेशाय नम: ॥ 

स्फुटं स्फटिकसप्रभंस्फुटितहारकश्रीजटं शशांकदलशेखरं कपिलफुल्लनेत्रत्रयम् । तरक्षुवरकृत्तिमद्‍भुजगभूषणं भूमिमत्कदा नु शितिकंठ ते वपुरवेक्षते वीक्षणम् ॥१॥ 

त्रिलोचन विलोचने लसति ते ललामायितेस्मरोनियमघस्मरोनियमिनामभूद्भस्मसात् 

स्वभक्तिलतया वशीकृतवती सतीयं सती स्वभक्तवशतो भवानपि वशी प्रसीद प्रभो ॥ २ ॥ 

महेश महितोऽसि तत्पुरुष पूरुषाग्र्योभवानघोर रिपुघोर तेऽनवम 

वामदेवाञ्जलि: । नम:सपदि जातवे त्वमिति पंचरूपोचितप्रपञ्चचयपचवृन्मम मनस्तमस्ताडय ॥ ३ ॥ 

रसाघनरसानलानिलावियद्विवस्वदिधुप्रयष्ट्टषु निविष्ट मित्यज भजामि मूर्त्यष्टकम् । प्रशांतमुत भीषणं भुवनमोहनं चेत्यहो वपूंषि गुणपूंषि तेऽहमहमात्मनोऽहं भिदे ॥ ४ ॥ 

विमुक्ति परमाध्वनां तव षडध्वनामास्पदं पदं निगमवेदिनो जगति वामदेवादय: । कथञ्चिदुपशिक्षिता भगवतैव संविद्रते वयं तु विरलान्तरा: कथमुमेश तन्मन्महे ॥ ५ ॥ 

कठोरितकुठारया ललितशूलया वाहया रणड्डमरुणा स्फुरद्धरिणयासखट्वाङ्गया । चलाभिरचलाभिरप्यगणि ताभिरुन्नृत्यतिश्‍चतुर्दश जगंति ते जयजयेत्ययुर्विस्मयम् ॥ ६ ॥ 

पुरा त्रिपुररंधनं विविधदैत्यविध्वंसनं पराक्रमपरंपराअपि परा नते विस्मय: । अमर्षिबलहर्षितक्षुइतवृत्तनेत्रोज्ज्वलज्ज्वलज्ज्वलनहेलया शलभितं हि लोकत्रयम् ॥ ७ ॥ 

सह्स्रनयनो गुह: सहसहस्ररश्मिर्विधुर्बुहस्पतिरुतप्पति: ससुरसिद्धविद्याधरा: । भवत्पदपरायणा: श्रियामिमां ययु: प्रार्थितां भवान् सुरतरुर्भृशं शिव शिवां शिवावल्लभ ॥ ८ ॥ 

तव प्रियतमादितिप्रियतमं सदैवांतरं पयस्युपहितं भृतं स्वयमिव श्रियोवल्लभम् । 

विबुध्य लघुबुद्धय: स्वपरपक्षलक्ष्यायितं पठंति हिलुठंति ते शठह्रद:शुचा शुंठिता ॥ ९ ॥ 

निवासनिलयोचित्ता तव शिरस्ततिर्मालिका कपालमपि ते करे त्वमशिवोऽस्यनन्तर्धियाम् । तथापि भवत: पदं शिवशिवेत्यदो जल्पतामकिञ्चन न किञ्चन वृजिनमस्ति 

भस्मीभवेत् ॥ १० ॥ 

त्वमेव किल कामधुक्‍ सकल काममापूरयन् सदात्रिनयनो भवान् वहति चार्चिनेत्रोद्भवम् । विषं विषधरान् दधत् पिबसि तेन चानन्दवान्विरुद्धचरितोचिता जगदधीश ते 

भिक्षुता ॥ ११ ॥ 

नम: शिव शिवाशिवशिवशिवार्थकृत्ताशिवं नमो हरहराहराहरहरान्तरीं मे दृशम् । नमोभवभवाभवप्रभवभूतये मे भवान्नमो मृड नमो नमो नम उमेश 

तुभ्यं नम: ॥ १२ ॥ 

सतां श्रवपद्धतिं सरतु सन्नतोक्‍तेत्यसौ शिवस्य करुणांकुरात्प्रतिकृतात्सदा सोचिता । इति प्रथितमानसो व्यधित नाम नारायण: शिवस्तुतिमिमां शिवांलिकुचिसूरिसूनु: सुधी: ॥ १३ ॥ 

इति श्रीमल्लिकुचिसूरिसूनुनारायणपंडिताचार्यविरचिता शिवस्तुति:संपूर्णा ।


!!! शिव की स्तुति में रुद्राष्टक की रचना !!!


जब शिव भक्ति के घमण्ड में चूर काकभुशुण्डि गुरु का उपहास करने पर भगवान शंकर के शाप से अजगर बने। तब गुरु ने ही अपने शिष्य को शाप से मुक्त कराने के लिए शिव की स्तुति में रुद्राष्टक की रचना की। गुरु के तप व शिव भक्ति के प्रभाव से यह शिव स्तुति बड़ी ही शुभ व मंगलकारी शक्तियों से सराबोर मानी जाती है। साथ ही मन से सारी परेशानियों की वजह अहंकार को दूर कर विनम्र बनाती है।


शिव की इस स्तुति से भी भक्त का मन भक्ति के भाव और आनंद में इस तरह उतर जाता है कि हर रोज व्यावहारिक जीवन में मिली नकारात्मक ऊर्जा, तनाव, द्वेष, ईर्ष्या और अहं को दूर कर देता है।

सरल शब्दों में यह पाठ इसलिए किसी भी दिन रुद्राष्टक का पाठ धर्म और व्यवहार के नजरिए से शुभ फल ही देता है।

यह स्तुति सरल, सरस और भक्तिमय होने से शिव व शिव भक्तों को बहुत प्रिय भी है। धार्मिक नजरिए से शिव पूजन के बाद इस स्तुति के पाठ से शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं।


नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌ ।
अजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥

निराकार मोंकार मूलं तुरीयं, गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌ ।
करालं महाकाल कालं कृपालुं, गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌ ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌ ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा, लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसु नेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम्‌ ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌ ।
त्रय:शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजे अहं भवानीपतिं भाव गम्यम्॥

कलातीत-कल्याण-कल्पांतकारी, सदा सज्जनानन्द दातापुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी, प्रसीद-प्रसीद प्रभो मन्माथारी॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नाराणम्।
न तावत्सुखं शांति संताप नाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभुताधिवासम् ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजा, न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भू तुभ्यम्‌ ।
जरा जन्म दु:खौद्य तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥
रूद्राष्टक इदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये,
ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शम्भु प्रसीदति ॥

शिव स्वरूप व महिमा का ध्यान मंत्र

वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्मकारणम्।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम्।
वन्दे सूर्यशंशाकवह्निनयनं वन्दे मुकंदप्रियम्।
वन्दे भक्तजनायं च वरदं शिवं शंकरम्।।


11 July 2013

!!! मंत्र-भगवान शिव !!!


भगवान भोलेनाथ की पूजा के दौरान इस मंत्र के द्वारा शिवजी को स्नान समर्पण करना चाहिए-

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य सकम्भ सर्ज्जनीस्थो |
वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद् ||

भगवान शिव की पूजा करते समय इस मंत्र के द्वारा उन्हें यज्ञोपवीत समर्पण करना चाहिए-

ॐ ब्रह्म ज्ज्ञानप्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेन आवः |
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ||


शिवजी की पूजा में इस मंत्र के द्वारा भगवान भोलेनाथ को गंध समर्पण करना चाहिए-

ॐ नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः |
शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च ||

भगवान भोलेनाथ की पूजा के दौरान इस मंत्र के द्वारा त्रिलोचनाय भगवान शिव को पुष्प समर्पण करना चाहिए-

ॐ नमः पार्याय चावार्याय च नमः प्रतरणाय चोत्तरणाय च |
नमस्तीर्थ्याय च कूल्याय च नमः शष्प्याय च फेन्याय च ||