09 July 2013

!!! बीमारियो पर विजय पाने के लिए मंत्र !!!


असीम विद्या प्राप्ति के लिए और जल्दी याद करने के लिए मंत्र 

            ॐ ह्रीं भवाय विद्यां देहि एं ॐ 

शुगर की बीमारी  दूर भागने का मंत्र  

               ॐ हूं क्रां क्रां रं स्वाहा 

ब्लाद्प्रेसर दूर भागने का मंत्र 


ॐ बं ह्रीं बज्रहस्तायै नमः 

लकवा से निदान का मंत्र 

ॐ कलौं क्लौधिताम स्वाहा 

आकर्षण पाने का मंत्र 

ॐ ह्रीं सर्वाकर्षणाय फट 


सर्वत्र क्यों फेला हे दुख ???



स्थान कोई भी हो कारण एक ही है सच्चे देहधारी गुरू से दीक्षित न होना

दिव्य हिमालय श्री विष्णु का अंश है, पार्वती जगदम्बा का पिता है, संहारक श्री शंकर का ससुर है, ऋषि मुनियों की तपस्थली है। विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने , पुत्र प्राप्ति के लिए द्वारिका से आकर हिमालय में ब्राह्मण बालक उपमन्यु से "ऊॅ नम: शिवाय"मंत्र की दीक्षा लेकर, सद्गुरू उपमन्यु के समीप स्थित होकर सोलह महिनें तक उग्र तप किया तब प्रसन्न होकर प्रभू शिव तथा पार्वती ने ८-८ वरदान कृष्ण को दिये, जिस में मुख्य वरदान - पुत्र प्राप्ति और ब्राह्मणों का पूजन थे।(श्री शिवमहापुराण उमासंहिता अध्याय १ से ३ ) ऐसे दिव्य हिमालय के निवासी भी कई प्रकार से दु:खी है।

इस कलियुग में दिव्य नदी नर्मदा सर्वोत्तम तीर्थ है। जहॉं श्री विष्णु के अवतार राम, शेषावतार लक्ष्मण तथा रूद्रावतार हनुमान जी ने दैत्यों के वध के पश्चात् प्रायश्चित किया था।ऐसी दिव्य नदी नर्मदा के तट पर जन्मे व्यक्ति कई प्रकार से दु:खी है। । कई पीढि.यों से रह रहे है, नर्मदा तट पर ही जन्मे, पले, सात्विक, शाकाहारी, सन्तों महात्माओं की सेवा करने वाले, परिक्रमा-वासियों को भोजन कराने वाले, कन्या भोजन कराने वाले मनोहर लाल नामदेव कई प्रकार से दु:खी थे।

काशी-हिमालय-नर्मदा तट एवं उज्जैन इन सब दिव्य तीर्थों पर शिवलिंग ही शिवलिंग है और अधिकांश जनता इन्हीं शिवलिंगों का पूजन करती है फिर भी इन महानगरों के व्यक्ति कई प्रकार से दु:खी है।
कोलकत्ता महानगर में शिवमंदिर बनवाने वाले एक गुजराती ब्राह्मण जिनके काशी महानगरी में चार कपड़े के शो रूम बिक गये हैं और उनके परिवार वाले मजदूरी कर रहे हैं लाल ईमली धारीवाल के मालिक (अग्रवाल समाज के) जिनकी गणना दस मुख्य व्यक्तियों में थी आज वे धन की कमी और अन्य कई प्रकार से दु:खी हैं ।
लगातार ३० वर्षो तक हर वर्ष हिमालय स्थित श्री अमरनाथ का दर्शन- पूजन करने वाले की प्रकृति में तनिक भी सुधार नहीं हुआ। उनके सन्तान नहीं हुई और आर्थिक दृष्टि से भी कमजोर रहे।

अयोध्या धाम में जन्मे, पले, अयोध्या धाम का सेवन करने वाले, ब्रज चौरासी कोस की यात्रा करने वाले कई प्रकार से दु:खी क्यों है? तिरूपति बालाजी का नियम से कई वर्षो तक दर्शन करने वाले, वहॉं दान करने वाले कई प्रकार से दु:खी है। श्रीनाथजी का कई वर्षो से दर्शन करने वाले ,वहॉं दान करने वाले कई प्रकार से दु:खी है। श्री जगन्नाथपुरी के निवासी, रथयात्रा में भाग लेने वाले सभी प्रकार से सुखी क्यों नहीं है?

गुजरात में सूरत एक महानगर है। गुजराती समाज अधिकांश सात्विक है, शाकाहारी है, श्रीनाथजी के भक्त है। उस महानगर में सभी देवी-देवता विराजमान है, कई गुरू है। उस महानगर में प्लेग, भूकम्प, बाढ़ से अरबों रूपयों की हानि हुई। वहॉ के लोग कई प्रकार से दु:खी क्यों है?
पंजाब प्रान्त में अयोध्या की गद्दी वाले श्रीलाल जी का बहुत प्रभाव है। इस गद्दी के व्यक्ति कई प्रकार से दु:खी है।
हावड़ा-कोलकत्ता महानगर में श्री तारकेश्वर महादेव विराजमान है। श्री दुर्गा का काली मंदिर है। ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस देव का दक्षिणेश्वर मठ है, विवेकानन्द के अनुयायी है फिर भी कई प्रकार से दु:खी क्यों ?
सिक्ख धर्म को मानने वाले, नियमित गुरूद्वारे जाने वाले ,गुरूग्रन्थ साहिब का पाठ करने वाले, लंगर बनाने वाले तथा लंगर में दान देने वाले क्या सभी प्रकार से सुखी है? इस समाज का एक व्यक्ति................ जिसने सौ भण्डारे बनाने में नि:शुल्क सेवा की उसने इस आश्रम को बताया कि वह कई प्रकार से दु:खी है।
विश्नोई समाज के सभी सिद्धान्त सही है, मानव का कल्याण करने वाले है। इन सब सिद्धान्तों को मानने वाले भी कई प्रकार से दु:खी क्यों हैं?
आर्य समाज के सिद्धान्त सही है फिर भी इस धर्म को मानने वाले क्या हर प्रकार से सुखी है?
दिव्य नर्मदा तट पर एक महात्मा ने हर वर्ष यज्ञ करवाया। १२वर्ष तक लगातार यज्ञ करवाने पर भी उन महात्मा की प्रकृति में किञ््चित मात्र भी सात्विकता नहीं आई। ऐसे अनैकों उदाहरण है जहॉं पर सात्विक, धार्मिक, शाकाहारी, ईमानदार, मेहनती मनुष्य भी आर्थिक अभाव आदि के कारण कई प्रकार से दु:खी है।

हर हिन्दू के घर में दीपावली पर बहुत ही श्रद्धा भक्ति से लक्ष्मी पूजन होता है, पञ््ंचाग में अथवा समाचार पत्रों में लक्ष्मीपूजन का मूहुर्त भी प्रकाशित होता है, ऐसे कर्मकाण्डी ब्राह्मणों द्वारा जो कि कई पीढ़ियों से लक्ष्मी-पूजन करवाते आ रहे हैं उनके द्वारा लक्ष्मी-पूजन करवाया जाता है- ऐसे कर्मकाण्डी ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, दक्षिणादि से सन्तुष्ट किया जाता है, अखंड दीपक जलाते है, रात्रिभर जागरण करते है, द्वार भी खुला रखते है(ताकि लक्ष्मीजी को आने में सुगमता हो) फिर भी धन की वृद्धि क्यों नहीं होती ?

श्री कृष्ण, श्री विष्णु के अवतार है, पाण्डवों के संबंधी है फिर भी पाण्डव लोग जुऍं में हारे और तेरह वर्ष (राजकुमार होते हुए भी) वनवास में भीख मॉंगकर रहे। श्री कृष्ण ने पाण्डवों की सहायता के लिए दुर्योधन का हाथ स्तम्भित क्यों नहीं किया?
हिन्दू समाज में यज्ञ की बड़ी महिमा है। शास्त्र में भी इसके महत्व का वर्णन है। सनातन धर्मी, आर्य समाजी, नामधारी सिक्ख आज भी यज्ञ करते है। हम सब के प्रथम पिता ( ब्रह्मा के पुत्र, सती जगदम्बा के पिता, संहारक शंकर के ससुर) दक्ष प्रजापति ने सत्युग में, समस्त विश्व का कल्याण हो ऐसी शुभकामना से यज्ञ जैसा शुभ कर्म प्रारंभ किया था। इस यज्ञ में श्री विष्णु अध्यक्ष थे जो कि सृष्टि के पालन करने वाले है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा भी उपस्थित थें। सती जगदम्बा भी आ गई थी, अग्नि देवता हजार मुख बनाकर स्वयं आहुतियांॅ स्वीकार करने के लिए उपस्थित थे। ८८००० हजार वेदों के जानकार ऋषि एक साथ आहुतियॉं डालते थे। इन्द्र-अग्निऱ्यम-नैऋति-वरूण- वायु -कुबेर-ईशान-लोकपाल आयुध लेकर उस यज्ञ की रक्षा कर रहे थे।पृथ्वी के सभी देवता(पत्नियों सहित )अष्टलोकपाल, सभी राजा, ऋषि-मुनि उपस्थित थे केवल एक संहारक शंकर जी ही नहीं थे।(जबकि संहारक की यज्ञ में कोई आवश्यकता भी नहीं है) सारा प्रयत्न करने पर भी यज्ञ विध्वंस हो गया, दक्ष प्रजापति मारे गए।
शुभ कर्म आज भी शुभ फल क्यों नहीं दे रहा है ? गरीब को रोटी-कपडा,बीमार को औषधि, दूध-फल देना, अस्पताल निर्माण, विद्यालय निर्माण , छात्रावास निर्माण ,गरीब छात्रों को भोजन वस्त्र, पाठ्य पुस्तकें आदि देना, तलाब, कुऑं प्याऊ आदि निर्माण, मंदिर निर्माण, धर्मशाला निर्माण, श्मशान निर्माण, दाहकर्म हेतु लकड़ियों का दान, यज्ञ में भाग लेना, कोढ़ियों की सहायता, अन्धों की सेवा, गऊसेवा, चारों धाम-सातों पुरियों की यात्रा, वहॉं पूजा-पाठ और दान करना, भण्डारें करना, छायादार पेड़ लगाना, पूजा के पुष्पों के बाग लगाना, कन्यादान इत्यादि शुभ कर्म करने वाले व्यक्ति कई प्रकार से दु:खी क्यों है?

!!! शिवलिंग पूजा का महत्व !!!


श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,शंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।

सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"


प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )


(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )


(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुॅचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )


(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।


(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। प्रभू शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है। श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जॉंचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है। पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभू शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।


(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा। तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभू शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभू शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हॅूॅ।तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।


श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभू शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)

!!! शिव ही सत्य है !!!


प्रयाग राज में ज्ञानी ऋषि मुनि यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे तब वहा सूतजी पधारे। ऋषि-मुनियों ने जन कल्याण के लिए कलियुग के भ्रष्ट ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, स्त्रियों तथा संतान के पापों का नाश जिससे शीघ्र हो जाये, ऐसा छोटा सा उपाय पूछा।सूतजी ने श्री शिव महापुराण के श्रवण, कीर्तन और मनन को सर्वोत्तम बताया।सर्वप्रथम सद्गुरू के मुख से श्री शिव-महापुराण का श्रवण करना चाहिए। श्री शिव ने यह सर्वोत्तम उपाय नन्दी जी को बताया, नन्दी जी ने यह ज्ञान ब्रह्मा के प्रथम पुत्र सनत्कुमार को दिया, सनत्कुमार से वेदव्यास को दिया, वेदव्यास ने दीक्षा पद्धति से सूतजी को दिया, सूतजी ने शौनक आदि ऋषियों को दिया और गुरू परम्परा से यह ज्ञान हमको प्राप्त हुआ।जो सही सद्गुरू से दीक्षा लेकर श्री शिव महापुराण का श्रवण करने में अभागे है, उनको श्री शिवलिंग की स्थापना करके नित्य विधिवत पूजा करनी चाहिए( श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अ०१ से ५ पृष्ठ २५ से ३४)अन्य देवताओं की मूल की पूजा केवल सुख भोगों को ही देती है परन्तु शिवलिंग की पूजा सुख-भोग तथा मोक्ष भी प्रदान करती है। (श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता ५ पृष्ठ ३४) जब ब्रह्मा और विष्णु आपस में शस्त्रों के साथ युद्ध कर रहे थे तब निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने उन दोनों के बीच आदि अंत रहित ज्योति स्तम्भ प्रकट किया। उस ज्योति स्तम्भ के प्रकट होते ही ब्रह्मा-विष्णु के आयुध उसी में विलीन हो गये। तब प्रभु शिव ही एक ऋषि के रूप में प्रकट होकर, यह ज्योति स्तम्भ ही निर्गुण ब्रह्म है, ऐसा परिचय दिया। तब प्रभु शिव बोले -"मुझ गुरू के वचन तुम्हारे लिये बार-बार प्रमाण है। इस गुप्त ब्रह्म तत्व को तुम लोगों के प्रति प्रेम होने के कारण मैं कह रहा हॅू। मैं ही परब्रह्म हॅू, मैरा ही स्वरूप सगुण और निर्गुण है। ब्रह्म होने के कारण में ईश्वर हॅू और मेरा कार्य समस्त चराचर सृष्टि के प्रति अनुग्रह करना आदि है। मैं अज्ञात रूप से रहता हॅू, तुम दोनों को दर्शन देने के लिए मैने अपना सगुण ईश्वर रूप तत्काल धारण किया। यह आदि अंत रहित ज्योति स्तम्भ मैं जनकल्याण के लिए छोटा कर देता हॅू। यह शिवलिंग रूप से प्रसिद्ध होगा। किसी भी दु:ख में इस शिवलिंग का पूजन करने से दु:खों का नाश होगा।"( प्रमाण श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अ०६ से १० पृष्ठ ३४ से ४२ एवं सृष्टि खंड अध्याय ६ से १० पृष्ठ १०५-११६)

यह सारा संसार परमात्मा उमा-महेश्वर की ही मूर्तियॉं है।(उपमन्यु का श्री कृष्ण को उपदेश श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय २-७ पृष्ठ ८८२-८९२) भगवान शिव का देवताओं को, प्रभु शिव का सूर्य में दर्शन-पूजन विधि समझाना( श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ८ पृष्ठ ८९२-८९४)

पार्वती जगदम्बा ने प्रभु शिव से पूछा, जो मनुष्य कर्म के अयोग्य तथा सब प्रकार से पतित हो तो वह कैसे मुक्त हो सकता है ? प्रभु शिव बोले, "देहधारी गुरू से ज्ञान प्राप्त कर ही, मेरी(शिव की)शिवलिंग में पूजा तथा मेरे पंचाक्षर मंत्र(नम: शिवाय)का जप करे।( श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय १३-१४ पृष्ठ ९०१-९०५)
सद्गुरू उपमन्यु काश्री कृष्ण को पंचाक्षर मंत्र(नम: शिवाय) की दीक्षा का विधान तथा शिष्य का गुरू के प्रतिधन का अभाव हो, संतान न हो रही हो, पति परदेश चला गया हो, मंद भाग्य हो, भूत-प्रेतादि की बाधा हो, खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त करना हो देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर, श्री गणेश की नित्य प्रथम विधिवत पूजा करके श्री शिव का पूजन करना अनिवार्य है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण कुमारखंड अध्याय १३-२० )(प्रमाण श्री शिवमहापुराण वायुसंहिता उत्तरभाग अध्याय ३१ )

कर्तव्य क्या होना चाहिए ? सद्गुरू को शिष्य की एक से तीन वर्ष तक परीक्षा करनी चाहिए तथा प्रभु शिव का पंचावरण पूजन।( श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय १५-३० पृष्ठ ९०६-९३५)

आापके पास जो सम्पत्ति है(धन-पुत्र आदि)वह सब प्रभु की ही है और प्रभु की कृपा से ही आपके पास है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता राजा अम्बरीष के पितामह, इक्ष्वाकु कुल के राजा नभग का चरित्र अध्याय २९ ) आप यदि अपनी सारी सम्पत्ति, प्रभु की ही समझते हैं तो आपका यह जीवन भी सुधरेगा और अगला जन्म भी सुधरेगा। सती जगदम्बा ने अपने पति (प्रभु शिव) से जन कल्याण के लिए सबसे सरल उपाय पूछा था कि विषयी अर्थात सांसारिक भोगों में लिप्त व्यक्ति बिना प्रयास के सद्गति प्राप्त कर ले , ऐसा सरल उपाय बतलाइये।

परम दयालु, अकारण करूणा वरूणालय प्रभु शिव ने सती जगदम्बा की प्रार्थना से रहस्य बताया कि उनकी (शिव की) नवधा भक्ति से विषयी जीव भी सरलता से संसार - सागर से पार हो सकता है। इस नवधा भक्ति से स्वत: ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, जिससे मनुष्य मुक्त हो जाता है। इस नवधा भक्ति का अन्तिम चरण है आत्म समर्पण। आत्म समर्पण का अर्थ है मैं और मेरा (मेरा शरीर, मेरी सम्पत्ति, मेरी पत्नी पुत्रादि)सभी प्रभु शिव की सेवा में अर्पित कर देना और आने वाले अगले दिन की भी चिन्ता न करना (प्रमाण श्री शिवमहापुराण सतीखंड अध्याय २३)

स्कन्द पुराण के माहेश्वर खंड के कुमारिका उपखंड में ऋषि कात्यायन और सारस्वत मुनि का संवाद प्रसिद्ध है।ऋषि कात्यायन ने पूछा " धर्म का सार क्या है?" सारस्वत मुनि बोले, "धर्म का सार है भगवान शंकर की विधिवत (देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर) भगवान शंकर की पूजा और भगवान शंकर के लिए दान। प्रभु शिव के लिए दान प्रथम स्थान पर आता है और प्रभु शिव की पूजा दूसरे स्थान पर आती है।

इस सूत्र के आधार पर ही दिव्य नदी नर्मदा, नाभि क्षेत्र के दक्षिण तट पर श्री विमलेश्वर आश्रम स्थापित है जहॉं पर ऐसे गुरू परम्परा से दीक्षित नित्य व्रत रखने वाले कर्मकाण्डी ब्राह्मणों द्वारा श्री शिव का दान प्रयोग करवाने पर आपको उपर्युक्त सभी सांसारिक सुख और परलोक मुक्ति का लाभ प्राप्त हो सकता है। श्री शिवमहापुराण की विद्येश्वर संहिता के अध्याय १३ श्लोक नं० ७२ से ७७ में प्रभु का अंश की मात्रा वर्णित है। श्लोक क्रंमाक ७७ में स्पष्ट है कि अपनी सम्पन्नता के लिए ब्राह्मणों को बुलाकर दान देना चाहिए। श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता केे अध्याय सं० ६-७ का नित्य पाठ करने से प्रभु शिव की कृपा प्राप्त होती है। इनकी पूजा विधि जानने के लिए आश्रम से सम्पर्क करे।

खेती का १० प्रतिशत,नौकरी का १७ प्रतिशत, व्यापार के शुद्ध लाभ का १७ प्रतिशत पण्डिताई कर्म का २५ प्रतिशत, एकायक प्राप्त धन जैसे लॉटरी-वसीयत-मुआवजा आदि का ५० प्रतिशत यह शिवजी का अंश दिव्य नदी नर्मदा के तट पर शिव कर्मकाण्ड़ी ब्राह्मणों की परीक्षा लेकर ही दान करना चाहिये। आप अपने शेष धन का प्रयोग अपनी इच्छानुसार परोपकार-दान में लगा सकते हैं।



08 July 2013

!!! हिंदू धर्म में सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग !!!


हिंदू धर्म में सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग देवताओं के पूजन का विधान बताया गया है जिनसे मनचाहे फल की प्राप्ति संभव है। शिवमहापुराण में इस संदर्भ में विस्तृत वर्णन मिलता है। शिवमहापुराण के अनुसार किस दिन कौन से देवता का पूजन करना चाहिए व उसका क्या फल मिलता है 

  • शिव महापुराण के अनुसार रविवार को सूर्य की पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराने से समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • शिव महापुराण के अनुसार सोमवार को लक्ष्मी की पूजा करने तथा ब्राह्मणों को सपत्नीक घी से पका हुआ भोजन कराने से धन-सम्पत्ति का लाभ होता है।
  • शिव महापुराण के अनुसार मंगलवार को काली मां की पूजा करने तथा उड़द, मूंग एवं अरहर की दाल आदि अन्नों से युक्त भोजन ब्राह्मण को कराने से सभी रोगों समाप्त हो जाते हैं।
  • - शिव महापुराण के अनुसार बुधवार को दही युक्त अन्न से भगवान विष्णु का पूजन करने से पुत्र सुख मिलता है।
  • शिव महापुराण के अनुसार गुरुवार को वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा घी मिश्रित खीर से देवताओं का पूजन करने से लंबी आयु प्राप्त होती है।
  • - शिव महापुराण के अनुसार शुक्रवार को एकाग्रचित्त होकर देवताओं का पूजन करने तथा यथासंभव ब्राह्मणों को अन्न दान करने से समस्त प्रकार के भोगों की प्राप्ति होती है।
  • - शिव महापुराण के अनुसार शनिवार अकाल मृत्यु का निवारण करने वाला है। इस दिन भगवान रुद्र की पूजा तथा तिल से होम करने, दान से देवताओं को संतुष्ट करके ब्राह्मणों को तिलमिश्रित भोजन कराने से अकाल मृत्यु नहीं होती।

!!! कौन हैं वेद व्यास और सूतजी ???


सूतजी- पुराणों में सूतजी को परम ज्ञानी ऋषि कहा गया है। वे भागवत की कथा सुनाते हैं। कथा सुनने वालों में शौनक सहित 84 हजार ऋषि शामिल हैं। शौनक- ये भी ऋषि हैं। जिज्ञासु और भागवत कथा के रसिक हैं। वे सूतजी से कथा सुनते हैं।

वेद व्यास- ये विष्णु के अंशावतार माने गए हैं। उन्होंने ब्रह्मासूत्र, महाभारत के अलावा भागवत सहित 18 पुराण लिखे। इन्होंने ही वेदों का विभाजन किया। इसलिए इन्हें वेद व्यास कहा जाता है |



जवान मां के बूढ़े बच्चे हैं ये

यह सुनने में अजीब लगता है लेकिन सत्य है। श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा यहीं से शुरू होती है। ये कथा भागवत का महात्म्य है। हर ग्रंथ के शुरुआत में उसका महात्म्य होता है। भागवत के इसी महात्म्य में यह कथा है, 

जब नारद मृत्युलोक यानी पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं और उन्हें एक युवती रोती दिखाई देती है। उसकी गोद में सिर रख दो बूढ़े पुरुष सो रहे हैं, दोनों बहुत कमजोर और बीमार दिखाई दे रहे हैं। जब नारद उस युवती से पूछते हैं तो वह बताती है कि दोनों बूढ़े पुरुष उसके पुत्र हैं। यह सुनकर नारद को बड़ा आश्चर्य होता है, एक जवान स्त्री के बच्चे इतने बूढ़े कैसे हो सकते हैं। 

तब वह युवती बताती है कि वह भक्ति है और उसके दोनों बूढ़े पुत्र पहले स्वस्थ्य और जवान थे लेकिन कलियुग में उनकी यह दुर्दशा हो गई है। दोनों पुत्रों के नाम थे ज्ञान और वैराग्य। तब नारद भक्ति को श्रीमद् भागवत का श्रवण करने का उपाय बताते हैं, 


जिससे उसके बूढ़े बच्चे ज्ञान और वैराग्य फिर स्वस्थ्य और जवान हो गए। कथा यह बताती है कि कलियुग यानी आधुनिक युग में लोगों में भक्ति तो होगी लेकिन ज्ञान और वैराग्य का अभाव होगा। ज्ञान इसलिए नहीं होगा क्योंकि लोग धर्म शास्त्रों का अध्ययन करना छोड़ देंगे। ज्ञान नहीं होगा तो मन में वैराग्य का भाव नहीं आएगा। भक्ति अधूरी ही रहेगी, ज्ञान और वैराग्य के बिना। परम ज्ञान के लिए भागवत का अध्ययन सबसे श्रेष्ठ उपाय है। इससे हमें सारी सृष्टि का ज्ञान होता है और जीवन को नई दृष्टि मिलती है।

भक्ति सिखाती है भागवत


श्रीमद् भागवत कथा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को स्थापित करती है। नारदजी कहते हैं अनेक जन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं तो सत्संग मिलता है जिससे मनुष्य का मोह-मद का अंधकार हट जाता है तथा विवेक का उदय होता है। भागवत में धुंधुकारी प्रसंग बताता है कि किस तरह मनुष्य वेश्यारूपी पांच इंद्रियों की इच्छाएं पूरी करने में जीवन नष्ट कर देता है और अंत में वह प्रेत बन जाता है, जिसे भागवत कथा सुनने के बाद मुक्ति मिलती है। 

भागवत के पहले स्कंध में प्रमुख रूप से कलियुग से प्रभावित राजा परीक्षित की मुक्ति का प्रसंग हमें संदेश देता है कि जीवन का मुख्य लक्ष्य जीवन-मरण के चक्कर से मुक्ति पाना है। जीवन का जो समय बचा है उसे इस दिशा में ले जाएं।

भागवत में स्कंध-दर-स्कंध आगे बढ़ती कथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से यही समझाया गया है कि इस संसार के पहले भी एकमात्र ईश्वर था और इस दिखाई देने वाले सारे संसार में वही ईश्वर है। जब यह संसार खत्म होगा तो यही ईश्वर शेष रह जाएगा। 


प्राणियों के शरीर के रूप में पंचभूत (आकाश, पृथ्वी, वायु, जल और अग्नि) ईश्वर हैं तो आत्मा के रूप में ईश्वर है। कहने का तात्पर्य यही है कि संपूर्ण संसार में एकमात्र ईश्वर ही है। ईश्वर ही वास्तविकता है। इसलिए हमें सभी में ईश्वर को ही देखना चाहिए।


श्रीमद् भागवत हमें ईश्वर को समझने के लिए पहले भक्ति सिखाती है, फिर इसका ज्ञान देती है। भक्ति और ज्ञान से जब हम ईश्वर की सत्ता को समझ लेते हैं तो मन वैराग्य की ओर मुड़ जाता है। इस स्थिति में श्रीमद् भागवत हमें वास्तविक वैराग्य से परिचित कराती है।


॥ श्री सुवर्णमालास्तुतिः ॥


॥ॐ ह्रीं गं ह्रीं महागणेशाय नमः स्वाहा॥

ईश गिरीश नरेश परेश महेश बिलेशय भूषण भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥

उमया दिव्य सुमङ्गल विग्रह यालिङ्गित वामाङ्ग विभो।
ऊरी कुरु मामज्ञमनाथं दूरी कुरु मे दुरितं भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥१॥


ऋषिवर मानस हंस चराचर जनन स्थिति लय कारण भो।
अन्तःकरण विशुद्धिं भक्तिं च त्वयि सतिं प्रदेहि विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥२॥


करुणावरुणालयमयिदास उदासस्तवोचितो न हि भो।
जय कैलाश निवास प्रमथ गणाधीश भू सुरार्चित भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥३॥

झनुतक झङ्किणु झनुतत्किटतट शब्दैर्नटसि महानट भो।
धर्मस्थापन दक्ष त्रयक्ष गुरो दक्ष यज्ञ शिक्षक भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥४॥


बलमारोग्यं चायुस्त्वद्गुण रुचितां चिरं प्रदेहि विभो।
भगवन् भर्ग भयापह भूतपते भूतिभूषिताङ्ग विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥५॥

शर्व देव सर्वोत्तम सर्वद दुर्वृत्तगर्वहरण विभो।
षड् रिपु षडूर्मि षड्विकार हर सन्मुख षन्मुख जनक विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥६॥


सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मे त्येतत्लक्षण लक्षित भो।
हाऽहाऽहूऽहू मुख सुरगायक गीता पदान पद्य विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगं॥७॥

॥ इति श्री शङ्कराचार्य कृत सुवर्णमालास्तुतिः॥


॥ महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रं ॥



अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनी विश्वविनोदिनी नन्दनुते
गिरिवर विन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिश्नुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुंबिनि भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरदर्शिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्विषमोषिणि घोषरते।
दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥२॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते।
निज भुज दण्ड निपाथित चण्ड विपाथित मुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥३॥

धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके
कनकपिशंग पृषत्कनिषंग रसद्‌भटशृंग हताबटुके।
कृत चतुरङ्ग बलक्षिति रङ्ग घटद्‌बहुरङ्ग रटद्‌बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥४॥

जय जय जप्य जयेजय शब्द परस्तुति तत्पर विश्वनुते
झन्झण झिञ्झिमि झिंकृत नूपुर सिंजित मोहित भूतपते।
नटित नटार्धनटीनटनायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥५॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांतियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्रवृते।
सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥६॥

सहित महाहव मल्लम तल्लिक मल्लित रल्लिक मल्लरते
सिरचित वल्लिक पल्लिक मल्लिक चिल्लिक भिल्लिक वर्गवृते।
सितकृत फुल्लिसमुल्लसितारुण तल्लजपल्लवसललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥७॥

कमलदलामल कोमलकांति कला ललितामल भाललते
सकल विलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।
अलिकुल सङ्कुल कुंवलय मण्डल मौलिमिलद्‌बकुलाधि कुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥८॥

अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृंग निजालय मध्यगते।
मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ९॥

कर मुरलीरववीजित कूजित लज्जित कोकिल मञ्जुरते
मिलित मिलिन्द मनोहर गुञ्जित रंजितशैलनिकुञ्जगते।
निजगण भूत महाशबरीगण रंगण संमृत केलिरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥१०॥

अयि मयी दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननीति यथाऽसि तथाऽसि ममाममतासिरमे ।
यदुचितमत्र भवत्युररि कुरुतादुरुतापमपातुरमे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥११॥

॥ॐ साम्बसदाशिवाय नमः॥

॥ श्री गणेश अथर्वशीर्ष॥

॥ शान्ति पाठ॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयां देवः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥१॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु ॥२॥
ॐ शान्तिः॥ शान्तिः॥ शान्तिः॥

॥ अथ श्री गणेश अथर्वशीर्षं व्याख्यस्यामः॥

ॐ नमस्ते गणपतये॥

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि॥ त्वमेव केवलं कर्ताऽसि॥
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि॥ त्वमेव केवलं हर्ताऽसि॥
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि॥ त्वं सक्षादात्मसि नित्यं॥ १॥

॥ स्वरूप तत्त्व॥

ऋतं वच्मि
सत्यम् वच्मि॥ २॥

अव त्वं माम्॥ अव वक्तारं॥
अव श्रोतारं॥ अव दातारं॥
अव धातारं॥ अवानूचानवम शिष्यं॥
अव पुरस्तात्॥ अवो उत्तरातात्॥
अव दक्षिणातात्॥ अव चोर्ध्वातात्॥
अवाधरातात्॥ सर्वतो मां पाहि पाहि समंतात्॥ ३॥

त्वं वाङ्ग्मयस्त्वं चिन्मयः॥
त्वंआनन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः॥
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितियोसि॥
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि॥
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥ ४॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जयते॥
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति॥
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति॥
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलोऽ नभः॥
त्वं चत्वारि वाक्पदानि॥ ५॥

त्वं गुणत्रयातीतः॥ त्वं देहत्रयातीतः॥
त्वं कालत्रयातीतः॥ त्वं अवस्थात्रयातीतः॥
त्वं मूलाधार स्थितोसिनित्यं॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः॥
त्वं योगिनो ध्यायन्ति नित्यं॥
त्वं ब्रह्मस्त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं
अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमस्त्वं
ब्रह्मभूर्भुवस्वरोम्॥ ६॥

॥ गणेश मन्त्र॥

गणादिं पूर्वमुच्चारय वर्णादिं तदनन्तरं॥
अनुस्वारः परतरः॥ अर्धेन्दुलसितं॥
तारेण ऋद्धं॥ एतत्त्व मनुस्वरूपं॥
गकारः पूर्वरुपं॥ अकारो मध्यं रूपं॥
अनुस्वारश्चान्त्य रूपं॥ बिन्दुरुत्तररूपं॥
नादानुसन्धानं॥ संहिता सन्धिः॥
सैषा गणेशविद्या॥ गणक ऋषिः॥
निचृद्गायत्रि छन्दः॥ गणपतिर्देवता॥
ॐ गं गणपतये नमः॥ ७॥

॥ गणेश गायत्री॥

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥ ८॥

॥ गणेश रूप॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमं कुशधारिणं॥
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजं॥

रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससं॥
रक्तं गन्धानुलिप्तान्गं रक्तपुष्पैहि सुपूजितं॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतं॥
अविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परं
एवं धायेयति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥ ९॥

॥ अष्ट नाम गणपति॥

नमो व्रातपतये॥ नमो गणपतये॥
नमो प्रमथपतये॥
नमस्ते अस्तु लम्बोदराय
एकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय
श्री वरदमूर्तये नमो नमः॥ १०॥

॥फल श्रुति॥

एतदथर्वशीर्षं योधीऽते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्वविघ्नैर्ण बाध्यते। स सर्वतः सुखमेधते।
स पञ्चमहापापत् प्रमुच्यते।
सायमधीयनो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रत्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रातः प्रयुंजानो अपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय ना देयं।
यो यदि मोहाद्दास्यति। स पापीयान् भवति।
सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते।
तं तमनेन साधयेत्॥ ११॥

अनेन गणपतिमभिषिंचति स वाग्मि भवति॥
चतुर्थ्यामनश्नन जपति स विद्यावान् भवति॥
स यशोवान् भवति॥
इत्यर्थवर्णवाक्यं। ब्रह्माद्याचरणं विद्यात्।
न बिभेति कदाचनेति॥ १२॥

यो दूर्वांकुरैर्यजति॥ स वैश्रवणोपमो भवति॥
यो लाजैर्यजति॥ स यशोवान् भवति॥
स मेधावान् भवति॥
यो मोदकसहस्त्रेण यजति। स वाञ्छितफलंवाप्नोति॥
यः साज्यसमिद्भिर्यजति।
स सर्वं लभते स सर्वं लभते॥१३॥

अष्टौ ब्रह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वि भवति।
सूर्यगृहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ
वा जपत्वा सिद्धमन्त्रो भवति॥
महाविघ्नात् प्रमुच्यते॥ महादोषात् प्रमुच्यते॥
महापापात् प्रमुच्यते॥
स सर्वविद्भवति। स सर्वविद्भवति॥
य एवं वेद इत्युपनिषत्॥१४॥

॥शान्ति मन्त्र॥

ॐ सहनाववतु॥ सहनौभुनक्तु॥
सह वीर्यं करवावहै॥
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः श्रुणुयां देवः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥१॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥
स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु ॥२॥
ॐ शान्तिः॥ शान्तिः॥ शान्तिः ॥

॥ श्री हनुमान वडवानलस्तोत्रम् ॥

॥श्रीगणेशाय नमः॥

ॐ अस्य श्री हनुमान वडवानलस्तोत्रमन्त्रस्य
श्रीरामचन्द्र ऋषिः, श्रीवडवानलहनुमान देवता,
मम समस्तरोगप्रशमनार्थं, आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्ध्यर्थं,
समस्तपापक्षयार्थं, सीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थं
हनुमान वडवानलस्तोत्रजपमहं करिष्ये॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्री महाहनुमते प्रकटपराक्रम
सकलदिग्मण्डलयशोवितान धवलीकृतजगत्त्रितय वज्रदेह
रुद्रावतार लङ्कापुरीदहन उमामयमन्त्र उदधिबन्धन
दशशिरःकृतान्तक सीताश्वसन वायुपुत्र अञ्जनीगर्भसम्भूत
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकर कपिसैन्यप्राकार सुग्रीवसाह्य
रणपर्वतोत्पाटन कुमारब्रह्मचारिन् गभीरनाद
सर्वपापग्रहवारण सर्वज्वरोच्चाटन डाकिनीविध्वंसन॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीरवीराय सर्वदुःखनिवारणाय
ग्रहमण्डल सर्वभूतमण्डल सर्वपिशाचमण्डलोच्चाटन
भूतज्वर एकाहिकज्वर द्वाहिकज्वर त्र्याहिकज्वर चातुर्थिकज्वर-
सन्तापज्वर विषमज्वरतापज्वर माहेश्वरवैष्णवज्वरान् छिन्धि छिन्धि
यक्षब्रह्मराक्षसभूतप्रेतपिशाचान् उच्चाटय उच्चाटय॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हं औं सौं एहि एहि
ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहाहनुमते
श्रवणचक्षुर्भूतानां शाकिनीडाकिनीनां विषमदुष्टानां
सर्वविषं हर हर आकाशभुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय
मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय
प्रहारय प्रहारय सकलमायां भेदय भेदय॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महाहनुमते सर्व ग्रहोच्चाटन
परबलं क्षोभय क्षोभय सकलबन्धनमोक्षणं कुरु कुरु
शिरःशूलगुल्मशूलसर्वशूलान्निर्मूलय निर्मूलय
नागपाशानन्तवासुकितक्षककर्कोटककालियान्
यक्षकुलजलगतबिलगतरात्रिञ्चरदिवाचर
सर्वान्निर्विषं कुरु कुरु स्वाहा॥

राजभय चोरभय परमन्त्र परयन्त्र परतन्त्र परविद्याः छेदय छेदय
स्वमन्त्र स्वयन्त्र स्वतन्त्र स्वविद्याः प्रकटय प्रकटय
सर्वारिष्ट नाशय नाशय सर्वशत्रुः नाशय नाशय
असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा॥

॥ इति श्रीविभीषणकृतं हनुमद्वडवानलस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥


॥ उमामहेश्वर स्तोत्रम् ॥


नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्याम्‌
परस्पराश्लिष्ट व पूः धराभ्याम्‌।
नागेन्द्रकन्या वृषकेतनाभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ १॥

नमः शिवाभ्यां सरसोत्सवाभ्याम्‌
नमस्कृताभीष्ट वरप्रदाभ्याम्‌।
नारायणेनार्चित पादुकाभ्यां
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ २॥

नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्याम्‌
विरञ्चि विष्णु इन्द्र सुपूजिताभ्याम्
विभूतिपाटीर विलेपनाभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ३॥

नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्याम्
जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम्‌।
जम्भारिमुख्यै अभिवन्दिताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ४॥

नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्याम्‌
पञ्चाक्षरी पञ्जररञ्जिताभ्याम्‌।
प्रपञ्चसृष्टिस्थिति संहृताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ५॥

नमः शिवाभ्याम् अतिसुन्दराभ्याम्‌
अत्यन्तम् आसक्त हृदम्बुजाभ्याम्‌।
अशेषलोकैक हितङ्कराभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ६॥

नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्याम्‌
कङ्कालकल्याण व पूः धराभ्याम्‌।
कैलासशैलस्थित देवताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ७॥

नमः शिवाभ्याम् अशुभापहाभ्याम्‌
अशेषलोकैक विशेषिताभ्याम्‌।
अकुण्ठिताभ्याम्‌ स्मृतिसंभृताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ८॥

नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्याम्‌
रवीन्दुवैश्वानर लोचनाभ्याम्‌।
राकाशशाङ्काभ मुखाम्बुजाभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ९॥

नमः शिवाभ्यां जटिलन्धरभ्याम्‌
जरामृतिभ्यां च विवर्जिताभ्याम्‌।
जनार्दनाब्जोद्भव पूजिताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ १०॥

नमः शिवाभ्यां विषमेक्षणाभ्याम्‌
बिल्वच्छदा मल्लिकदामभृद्भ्याम्‌।
शोभावती शान्तवतीश्वराभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ ११॥

नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्याम्‌
जगत् रयी रक्षण बद्धहृद्भ्याम्‌।
समस्त देवासुरपूजिताभ्याम्‌
नमो नमः शङ्करपार्वतीभ्याम्‌॥ १२॥

स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीभ्याम्‌ भक्त्या पठेद्द्वादशकं नरो यः।
स सर्वसौभाग्य फलानि भुङ्क्ते शतायुरान्ते शिवलोकमेति॥

॥इति उमामहेश्वरस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌॥


॥ श्री शिवषड्क्षर स्तोत्रम् ॥

॥ॐ गं गणपतये नमः॥

॥श्री शिवषड्क्षर स्तोत्रम्॥

ॐकारं बिन्दु संयुक्तं नित्यम् ध्यायन्ति योगिनः
कामदम् मोक्षदम् चैव ॐकारय नमो नमः ॥१॥

नमन्ति ऋषियो देव नमन्ति अप्सरसांगणाः
नरा नमन्ति देवेशम् नकारय नमो नमः ॥२॥

महादेवम् महात्मानम् महाध्यानपरायणम्
महापाप हरम् देवम् मकारय नमो नमः ॥३॥ 

शिवम् शान्तम् जग्नन्नाथम् लोकानुग्रह कारकम्
शिवमेकपदम् नित्यम् शिकारय नमो नमः ॥४॥ 

वाहनम् वृषभोयस्य वासुकि कन्ठ भूषणम्
वामे शक्ति धरं देवम् वकारय नमो नमः॥५॥

यत्र यत्र स्थितो देव सर्व व्यापि महेश्वरः
यो गुरुः सर्व देवानाम् यकारय नमो नमः॥६॥ 

॥ षडक्षरमिदम् स्तोत्रम् यः पठे शिव सन्निधौ शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

॥ इति श्री रुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे षडक्षरस्तोत्रं संपूर्णम्॥

07 July 2013

!!! जानें, क्या है शिव की महिमा और कैसे मनाएं शिवरात्रि !!!




कौन हैं शिव

शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।

क्या है शिवलिंग

शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।

शिव, शंकर, महादेव...

शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।

अर्द्धनारीश्वर क्यों

शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। दरअसल, यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं। आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है।

नीलकंठ क्यों

अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर 
रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

भोले बाबा

शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।

शिव स्वरूप

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :

  • जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
  • चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
  • त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।
  • सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
  • त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
  • डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
  • मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
  • छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
  • भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
  • वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं।

इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

महामृत्युंजय मंत्र

शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के जरिए किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है। यह मंत्र यों हैं : ओम् त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

(भावार्थ : हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी उसी तरह से जैसे एक खरबूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।)


क्या है महाशिवरात्रि
  • - भगवान शिव हिंदुओं के प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें हिंदू बड़ी ही आस्था और श्रद्धा के साथ स्वीकारते और पूजते हैं।
  • - यूं तो शिव की उपासना के लिए सप्ताह के सभी दिन अच्छे हैं, फिर भी सोमवार को शिव का प्रतीकात्मक दिन कहा गया है। इस दिन शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है।
  • - हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
  • - शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं।
  • - माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्मा से रुद के रूप में) अवतरण हुआ था।
  • - ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्री शिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।
  • - ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंदमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है।
  • - प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है।
  • - इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शिव जी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

!!! कहानी नंदी की !!!




पुराणों में यह कथा मिलती है कि शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। शिलाद निरंतर योग तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे अतः उन्होंने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। इंद्र ने इसमें असर्मथता प्रकट की तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। तब शिलाद ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया और उनके ही समान मृत्युहीन तथा दिव्य पुत्र की माँग की।


भगवान शंकर ने स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद भूमि जोतते समय शिलाद को एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। उसको बड़ा होते देख भगवान शंकर ने मित्र और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम में भेजे जिन्होंने नंदी को देखकर भविष्यवाणी की कि नंदी अल्पायु है। नंदी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह महादेव की आराधना से मृत्यु को जीतने के लिए वन में चला गया। वन में उसने शिव का ध्यान आरंभ किया। भगवान शिव नंदी के तप से प्रसन्न हुए व दर्शन वरदान दिया- वत्स नंदी! तुम मृत्यु से भय से मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो। मेरे अनुग्रह से तुम्हे जरा, जन्म और मृत्यु किसी से भी भय नहीं होगा।"

भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए। मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ। भगवान शंकर का वरदान है कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा। तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है।

शिवजी का वाहन नंदी पुरुषार्थ अर्थात परिश्रम का प्रतीक है। नंदी का एक संदेश यह भी है कि जिस तरह वह भगवान शिव का वाहन है। ठीक उसी तरह हमारा शरीर आत्मा का वाहन है। जैसे नंदी की दृष्टि शिव की ओर होती है, उसी तरह हमारी दृष्टि भी आत्मा की ओर होनी चाहिये। हर व्यक्ति को अपने दोषों को देखना चाहिए। हमेशा दूसरों के लिए अच्छी भावना रखना चाहिए। नंदी यह संकेत देता है कि शरीर का ध्यान आत्मा की ओर होने पर ही हर व्यक्ति चरित्र, आचरण और व्यवहार से पवित्र हो सकता है। इसे ही सामान्य भाषा में मन का स्वच्छ होना कहते हैं। जिससे शरीर भी स्वस्थ होता है और शरीर के निरोग रहने पर ही मन भी शांत, स्थिर और दृढ़ संकल्प से भरा होता है। इस प्रकार संतुलित शरीर और मन ही हर कार्य और लक्ष्य में सफलता के करीब ले जाते हुए मनुष्य अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

धर्म शास्त्रों में उल्लेख है कि जब शिव अवतार नंदी का रावण ने अपमान किया तो नंदी ने उसके सर्वनाश को घोषणा कर दी थी। रावण संहिता के अनुसार कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह थोड़ी देर कैलाश पर्वत पर रुका था। वहाँ शिव के पार्षद नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने उसका उपहास किया। नंदी ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दिया कि मेरे जिस पशु स्वरूप को देखकर तू इतना हँस रहा है। उसी पशु स्वरूप के जीव तेरे विनाश का कारण बनेंगे।

नंदी का एक रूप सबको आनंदित करने वाला बी है। सबको आनंदित करने के कारण ही भगवान शिव के इस अवतार का नाम नंदी पड़ा। शास्त्रों में इसका उल्लेख इस प्रकार है-

त्वायाहं नंन्दितो यस्मान्नदीनान्म सुरेश्वर।
तस्मात् त्वां देवमानन्दं नमामि जगदीश्वरम।। 
-शिवपुराण शतरुद्रसंहिता ६/४५

अर्थात नंदी के दिव्य स्वरूप को देख शिलाद मुनि ने कहा तुमने प्रगट होकर मुझे आनंदित किया है। अत: मैं आनंदमय जगदीश्वर को प्रणाम करता हूं।

नासिक शहर के प्रसिद्ध पंचवटी स्थल में गोदावरी तट के पास एक ऐसा शिवमंदिर है जिसमें नंदी नहीं है। अपनी तरह का यह एक अकेला शिवमंदिर है। पुराणों में कहा गया है कि कपालेश्वर महादेव मंदिर नामक इस स्थल पर किसी समय में भगवान शिवजी ने निवास किया था। यहाँ नंदी के अभाव की कहानी भी बड़ी रोचक है। यह उस समय की बात है जब ब्रह्मदेव के पाँच मुख थे। चार मुख वेदोच्चारण करते थे, और पाँचवाँ निंदा करता था। उस निंदा से संतप्त शिवजी ने उस मुख को काट डाला। इस घटना के कारण शिव जी को ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उस पाप से मुक्ति पाने के लिए शिवजी ब्रह्मांड में हर जगह घूमे लेकिन उन्हें मुक्ति का उपाय नहीं मिला। एक दिन जब वे सोमेश्वर में बैठे थे, तब एक बछड़े द्वारा उन्हें इस पाप से मुक्ति का उपाय बताया गया। कथा में बताया गया है कि यह बछड़ा नंदी था। वह शिव जी के साथ गोदावरी के रामकुंड तक गया और कुंड में स्नान करने को कहा। स्नान के बाद शिव जी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो सके। नंदी के कारण ही शिवजी की ब्रह्म हत्या से मुक्ति हुई थी। इसलिए उन्होंने नंदी को गुरु माना और अपने सामने बैठने को मना किया।

आज भी माना जाता है कि पुरातन काल में इस टेकरी पर शिवजी की पिंडी थी। अब तक वह एक विशाल मंदिर बन चुकी है। पेशवाओं के कार्यकाल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। मंदिर की सीढि़याँ उतरते ही सामने गोदावरी नदी बहती नजर आती है। उसी में प्रसिद्ध रामकुंड है। भगवान राम में इसी कुंड में अपने पिता राजा दशरथ के श्राद्ध किए थे। इसके अलावा इस परिसर में काफी मंदिर है। लेकिन इस मंदिर में आज तक कभी नंदी की स्थापना नहीं की गई।


!!! शिव पुराण !!!


शिव का अर्थ है कल्याण। शिव के महात्मय से ओत-प्रोत से यह पुराण शिव महापुराण के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान शिव पापों का नाश करने वाले देव हैं तथा बड़े सरल स्वभाव के हैं। इनका एक नाम भोला भी है। अपने नाम के अनुसार ही बड़े भोले-भाले एवं शीघ्र ही प्रसन्न होकर भक्तों को मनवाँछित फल देने वाले हैं। 18 पुराणों में कहीं शिव पुराण तो कहीं वायु पुराण का वर्णन आता है। शिव पुराण में 12 संहितायें हैं।


1. विघ्नेश्वर संहिता 2. रौद्र संहिता 3. वैनायक संहिता

4. भौम संहिता 5. मात्र संहिता 6. रूद्रएकादश संहिता

7. कैलाश संहिता 8. शत् रूद्र संहिता 9. कोटि रूद्र संहिता

10. सहस्र कोटि रूद्र संहिता 11. वायवीय संहिता 12. धर्म संहिता



विघ्नेश्वर तथा रौद्रं वैनायक मनुत्तमम्। भौमं मात्र पुराणं च रूद्रैकादशं तथा।

कैलाशं शत्रूद्रं च कोटि रूद्राख्यमेव च। सहस्रकोटि रूद्राख्यंवायुवीय ततःपरम्

धर्मसंज्ञं पुराणं चेत्यैवं द्वादशः संहिता। तदैव लक्षणमुदिष्टं शैवं शाखा विभेदतः

इन संहिताओं के श्रवण करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। शिव पुराण के अनुसार भगवान नारायण जब जल में शयन कर रहे थे तभी उनकी नाभि से एक सुन्दर एवं विशाल कमल प्रकट हुआ। उस कमल में ब्रह्मा जी उत्पन्न हुये। माया के वश में होने के कारण ब्रह्मा जी अपनी उत्पत्ति के कारण को नहीं जान सके। 


चारों ओर उन्हें जल ही जल दिखायी पड़ा तब आकाशवाणी हुयी, ‘‘तपस्या करो’’। बारह वर्षों तक तपस्या करने के पश्चात् भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में उन्हें दर्शन दिये और कहा मैंनें तुम्हें सत्व गुण से निर्माण किया है लेकिन मायावश ब्रह्मा जी विष्णुजी के स्वरूप को न जानकर उनसे युद्ध करने लगे। तब दोनों के विवाद को शान्त करने के लिये एक अद्भुत ज्योर्तिलिंग का अर्विभाव हुआ। दोनों बड़े आश्चर्य के साथ इस ज्योर्तिलिंग को देखते रहे और इसका स्वरूप जानने के लिये ब्रह्मा हंस स्वरूप बनाकर ऊपर की ओर और विष्णु वाराह स्वरूप धारण कर नीचे की ओर गये। लेकिन दोनों ही ज्योर्तिलिंग के आदि-अन्त का पता नहीं कर सके।



इस प्रकार 100 वर्ष बीत गये। इसके पश्चात् ज्योर्तिलिंग से उन्हें ओंकार शब्द का नाद सुनायी पड़ा और पँचमुखी एक मुर्ति दिखायी पड़ी। ये ही शिव थे। ब्रह्मा और विष्णु ने उन्हें प्रणाम किया, तब शिव ने कहा, ‘‘कि तुम दोनों मेरे ही अंश से उत्पन्न हुये हो।’’ और ब्रह्मा को सृष्टि की रचना एवं विष्णु को सृष्टि का पालन करने की जिम्मेदारी प्रदान की। शिव पुराण में 24000 श्लोक हैं। इसमें तारकासुर वध, मदन दाह, पार्वती की तपस्या, शिव-पावती विवाह, कार्तिकेय का जन्म, त्रिपुर का वध, केतकी के पुष्प शिव पुजा में निषेद्य, रावण की शिव-भक्ति आदि प्रसंग वर्णित हैं।



भगवान शंकर पूजन से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिवजी अपने भक्तों को कष्ट में नहीं देख सकते और अभिष्ट फल प्रदान करते हैं। भगवान शंकर का एक नाम नीलकंठ महादेव भी है। जब देवता और असुर लोगों ने मिलकर समुद्र से अमृत निकालने के लिये समुद्र-मंथन किया लेकिन अभी दूर-दूर तक अमृत का कोई नामो-निशान नहीं था कि समुद्र से भयंकर विष निकल पड़ा। जिससे समस्त देवता, दानव-मानव, सभी झुलसने लगे। तब भगवान शंकर ने ही प्राणियों एवं जीव-जगत की रक्षा हेतु उस हलाहल विष का पान कर अपने कण्ठ में धारण किया। तब से भगवान शंकर का एक नाम नीलकण्ठ महादेव पड़ गया।

शिवपुराण सुनने का फल:-


शिवपुराण में वर्णन आया है कि जो भी श्रद्धा से शिव पुराण कथा का श्रवण करता है वह जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है और भगवान शंकर के परम धाम को प्राप्त करता है। अन्य देवताओं की अपेक्षा भगवान शंकर जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़ी सी पूजा का बहुत-बड़ा फल प्रदान करते हैं।
एक बार भष्मासुर ने भगवान शंकर की तपस्या कर इच्छित वर माँग लिया कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखुँ वह भष्म हो जाये। भगवान शंकर इतने भोले-भाले कि बिना सोचे-समझे उन्होंनें भष्मासुर को तथास्तु कहकर इच्छित वर प्रदान किया। भष्मासुर ने सोचा कि पहले शंकर जी को ही भष्म करके देखता हूँ। भष्मासुर भगवान शंकर के पीछे दौड़ पड़े। भगवान शंकर दौड़ते हुये भगवान विष्णु के पास जा पहुँचे। सो भगवान विष्णु ने मोहिनी स्वरूप धारण कर भष्मासुर का हाथ उसके अपने सिर पर रखवा कर भगवान शंकर की रक्षा की।

इसलिये भगवान शंकर की थोड़ी भी पूजा कर दी जाये तो वह प्रसन्न हो बहुत ज्यादा फल देते हैं। जो शिव पुराण की कथा श्रवण करते हैं उन्हें कपिला गायदान के बराबर फल मिलता है। पुत्रहीन को पुत्र, मोक्षार्थी को मोक्ष प्राप्त होता है तथा उस जीव के कोटि जन्म पाप नष्ट हो जाते हैं और शिव धाम की प्राप्ति होती है। इसलिये शिव पुराण कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिये।

शिव पुराण करवाने का मुहुर्त:-

शिव पुराण कथा करवाने के लिये सर्वप्रथम विद्वान ब्राह्मणों से उत्तम मुहुर्त निकलवाना चाहिये। शिव पुराण के लिये श्रावण-भाद्रपद, आश्विन, अगहन, माघ, फाल्गुन, बैशाख और ज्येष्ठ मास विशेष शुभ हैं। लेकिन विद्वानों के अनुसार जिस दिन शिव पुराण कथा प्रारम्भ कर दें, वही शुभ मुहुर्त है।


शिव पुराण का आयोजन कहाँ करें?:-

शिव पुराण करवाने के लिये स्थान अत्यधिक पवित्र होना चाहिये। जन्म भूमि में शिव पुराण करवाने का विशेष महत्व बताया गया है - जननी जन्मभूमिश्चः स्वर्गादपि गरियशी - इसके अतिरिक्त हम तीर्थों में भी शिव पुराण का आयोजन कर विशेष फल प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी जहाँ मन को सन्तोष पहुँचे, उसी स्थान पर कथा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

शिव पुराण करने के नियम:-

शिव पुराण का वक्ता विद्वान ब्राह्मण होना चाहिये। उसे शास्त्रों एवं वेदों का सम्यक् ज्ञान होना चाहिये। शिव पुराण में सभी ब्राह्मण सदाचारी हों और सुन्दर आचरण वाले हों। वो सन्ध्या बन्धन एवं प्रतिदिन गायत्री जाप करते हों। ब्राह्मण एवं यजमान दोनों ही सात दिनों तक उपवास रखें। केवल एक समय ही भोजन करें। भोजन शुद्ध शाकाहारी होना चाहिये। स्वास्थ्य ठीक न हो तो भोजन कर सकते हैं।

शिव पुराण में कितना धन लगता है?:-

इस भौतिक युग में बिना धन के कुछ भी सम्भव नहीं एवं बिना धन के धर्म भी नहीं होता। पुराणों में वर्णन है कि पुत्री के विवाह में जितना धन लगे उतना ही धन शिव पुराण में लगाना चाहिये और पुत्री के विवाह में जितनी खुशी हो उतनी ही खुशी मन से शिव पुराण को करना चाहिये।

‘‘विवाहे यादष्शं वित्तं तादष्श्यं परिकल्पयेत’’



!!! घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य !!!

घर में पारद शिवलिंग सौभाग्य, शान्ति, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए अत्यधिक सौभाग्यशाली है। दुकान, ऑफिस व फैक्टरी में व्यापारी को बढाऩे के लिए पारद शिवलिंग का पूजन एक अचूक उपाय है। शिवलिंग के मात्र दर्शन ही सौभाग्यशाली होता है। इसके लिए किसी प्राणप्रतिष्ठा की आवश्कता नहीं हैं। पर इसके ज्यादा लाभ उठाने के लिए पूजन विधिक्त की जानी चाहिए।

पूजन की विधि यहाँ पर दी जा रही है।

सर्वप्रथम शिवलिंग को सफेद कपड़े पर आसन पर रखें।
स्वयं पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ जाए।
अपने आसपास जल, गंगाजल, रोली, मोली, चावल, दूध और हल्दी, चन्दन रख लें।

सबसे पहले पारद शिवलिंग के दाहिनी तरफ दीपक जला कर रखो।
थोडा सा जल हाथ में लेकर तीन बार निम्न मन्त्र का उच्चारण करके पी लें।

प्रथम बार ॐ मुत्युभजाय नम:
दूसरी बार ॐ नीलकण्ठाय: नम:
तीसरी बार ॐ रूद्राय नम:
चौथी बार ॐशिवाय नम:

हाथ में फूल और चावल लेकर शिवजी का ध्यान करें और मन में ''ॐ नम: शिवाय`` का 5 बार स्मरण करें और चावल और फूल को शिवलिंग पर चढ़ा दें।


इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करते रहे।

फिर हाथ में चावल और पुष्प लेकर ''ॐ पार्वत्यै नम:`` मंत्र का उच्चारण कर माता पार्वती का ध्यान कर चावल पारा शिवलिंग पर चढ़ा दें।
इसके बाद ॐ नम: शिवाय का निरन्तर उच्चारण करें।
फिर मोली को और इसके बाद बनेऊ को पारद शिवलिंग पर चढ़ा दें।
इसके पश्चात हल्दी और चन्दन का तिलक लगा दे।
चावल अर्पण करे इसके बाद पुष्प चढ़ा दें।
मीठे का भोग लगा दे।


भांग, धतूरा और बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ा दें।
फिर अन्तिम में शिव की आरती करे और प्रसाद आदि ले लो।
जो व्यक्ति इस प्रकार से पारद शिवलिंग का पूजन करता है इसे शिव की कृपा से सुख समृद्धि आदि की प्राप्ति होती है।


!!! वैदिक १६ संस्कार !!!


वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार निम्न सोलह संस्कार होते हैं:

1. गर्भाधान संस्कारः उत्तम सन्तान की प्राप्ति के लिये प्रथम संस्कार।
2. पुंसवन संस्कारः गर्भस्थ शिशु के बौद्धि एवं मानसिक विकास हेतु गर्भाधान के पश्चात् दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला द्वितीय संस्कार।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कारः माता को प्रसन्नचित्त रखने के लिये, ताकि गर्भस्थ शिशु सौभाग्य सम्पन्न हो पाये, गर्भाधान के पश्चात् आठवें माह में किया जाने वाला तृतीय संस्कार।

4. जातकर्म संस्कारः नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना हेतु किया जाने वाला चतुर्थ संस्कार।

5. नामकरण संस्कारः नवजात शिशु को उचित नाम प्रदान करने हेतु जन्म के ग्यारह दिन पश्चात् किया जाने वाला पंचम संस्कार।


6. निष्क्रमण संस्कारः शिशु के दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करने की कामना के लिये जन्म के तीन माह पश्चात् चौथे माह में किया जाने वला षष्ठम संस्कार।


7. अन्नप्राशन संस्कारः शिशु को माता के दूध के साथ अन्न को भोजन के रूप में प्रदान किया जाने वाला जन्म के पश्चात् छठवें माह में किया जाने वाला सप्तम संस्कार।


8. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कारः शिशु के बौद्धिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास की कामना से जन्म के पश्चात् पहले, तीसरे अथवा पाँचवे वर्ष में किया जाने वाला अष्टम संस्कार।


9. विद्यारम्भ संस्कारः जातक को उत्तमोत्तम विद्या प्रदान के की कामना से किया जाने वाला नवम संस्कार।


10. कर्णवेध संस्कारः जातक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा की कामना से किया जाने वाला दशम संस्कार।


11. यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कारः जातक की दीर्घायु की कामना से किया जाने वाला एकादश संस्कार।


12. वेदारम्भ संस्कारः जातक के ज्ञानवर्धन की कामना से किया जाने वाला द्वादश संस्कार।


13. केशान्त संस्कारः गुरुकुल से विदा लेने के पूर्व किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार।


14. समावर्तन संस्कारः गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला चतुर्दश संस्कार।


15. पाणिग्रहण संस्कारः पति-पत्नी को परिणय-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार।


16. अन्त्येष्टि संस्कारः मृत्योपरान्त किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार।


उपरोक्त सोलह संस्कारों में आजकल नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म (मुण्डन), यज्ञोपवीत (उपनयन), पाणिग्रहण और अन्त्येष्टि संस्कार ही चलन में बाकी रह गये हैं।


!!! कलियुग का आगमन की कथा !!!

धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव पाँचों पाण्डव महापराक्रमी परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतु उत्तराखंड की ओर चले गये और वहाँ जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुये। राजा परीक्षित धर्म के अनुसार तथा ब्राह्नणों की आज्ञानुसार शासन करने लगे। उत्तर नरेश की पुत्री इरावती के साथ उन्होंने अपना विवाह किया और उस उत्तम पत्नी से उनके चार पुत्र उत्पन्न हुये। आचार्य कृप को गुरु बना कर उन्होंने जाह्नवी के तट पर तीन अश्वमेघ यज्ञ किये। उन यज्ञों में अनन्त धन राशि ब्रह्मणों को दान में दी और दिग्विजय हेतु निकल गये।

उन्हीं दिनों धर्म ने बैल का रूप बना कर गौरूपिणी पृथ्वी से सरस्वती तट पर भेंट किया। गौरूपिणी पृथ्वी की नेत्रों से अश्रु बह रहे थे और वह श्रीहीन सी प्रतीत हो रही थी। धर्म ने पृथ्वी से पूछा - "हे देवि! तुम्हारा मुख मलिन क्यों हो रहा है? किस बात की तुम्हें चिन्ता है? कहीं तुम मेरी चिन्ता तो नहीं कर रही हो कि अब मेरा केवल एक पैर ही रह गया है या फिर तुम्हें इस बात की चिन्ता है कि अब तुम पर शूद्र राज्य करेंगे?"

पृथ्वी बोली - "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो! सत्य, पवित्रता, क्षमा, दया, सन्तोष, त्याग, शम, दम, तप, सरलता, क्षमता, शास्त्र विचार, उपरति, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य, शौर्य, तेज, ऐश्वर्य, बल, स्मृति, कान्ति, कौशल, स्वतन्त्रता, निर्भीकता, कोमलता, धैर्य, साहस, शील, विनय, सौभाग्य, उत्साह, गम्भीरता, कीर्ति, आस्तिकता, स्थिरता, गौरव, अहंकारहीनता आदि गुणों से युक्त भगवान श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के कारण घोर कलियुग मेरे ऊपर आ गया है। मुझे तुम्हारे साथ ही साथ देव, पितृगण, ऋषि, साधु, सन्यासी आदि सभी के लिये महान शोक है। भगवान श्रीकृष्ण के जिन चरणों की सेवा लक्ष्मी जी करती हैं उनमें कमल, वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि के चिह्न विराजमान हैं और वे ही चरण मुझ पर पड़ते थे जिससे मैं सौभाग्यवती थी। अब मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है।" जब धर्म और पृथ्वी ये बातें कर ही रहे थे कि मुकुटधारी शूद्र के रूप में कलियुग वहाँ आया और उन दोनों को मारने लगा।

राजा परीक्षित दिग्विजय करते हुये वहीं पर से गुजर रहे थे। उन्होंने मुकुटधारी शूद्र को हाथ में डण्डा लिये एक गाय और एक बैल को बुरी तरह पीटते देखा। वह बैल अत्यन्त सुन्दर था, उसका श्वेत रंग था और केवल एक पैर था। गाय भी कामधेनु के समान सुन्दर थी। दोनों ही भयभीत हो कर काँप रहे थे। महाराज परीक्षित अपने धनुषवाण को चढ़ाकर मेघ के समान गम्भीर वाणी में ललकारे - "रे दुष्ट! पापी! नराधम! तू कौन है? इन निरीह गाय तथा बैल क्यों सता रहा है? तू महान अपराधी है। तेरे अपराध का उचित दण्ड तेरा वध ही है।" उनके इन वचनों को सुन कर कलियुग भय से काँपने लगा।

महाराज ने बैल से पूछा कि हे बैल तुम्हारे तीन पैर कैस टूटे गये हैं। तुम बैल हो या कोई देवता हो। हे धेनुपुत्र! तुम निर्भीकतापूर्वक अपना अपना वृतान्त मुझे बताओ। हे गौमाता! अब तुम भयमुक्त हो जाओ। मैं दुष्टों को दण्ड देता हूँ। किस दुष्ट ने मेरे राज्य में घोर पाप कर के पाण्डवों की पवित्र कीर्ति में यह कलंक लगाया है? चाहे वह पापी साक्षात् देवता ही क्यों न हो मैं उसके भी हाथ काट दूँगा। तब धर्म बोला - "हे महाराज! आपने भगवान श्रीकृष्ण के परमभक्त पाण्डवों के कुल में जन्म लिया है अतः ये वचन आप ही के योग्य हैं। हे राजन्! हम यह नहीं जानते कि संसार के जीवों को कौन क्लेश देता है। शास्त्रों में भी इसका निरूपण अनेक प्रकार से किया गया है। जो द्वैत को नहीं मानता वह दुःख का कारण अपने आप को ही स्वीकार करता हैं। कोई प्रारब्ध को ही दुःख का कारण मानता है और कोई कर्म को ही दुःख का निमित्त समझता है। कतिपय विद्वान स्वभाव को और कतिपय ईश्वर को भी दुःख का कारण मानते हैं। अतः हे राजन्! अब आप ही निश्चित कीजिये कि दुःख का कारण कौन है।"

सम्राट परीक्षित उस बैल के वचनों को सुन कर बोले - "हे वृषभ! आप अवश्य ही बैल के रूप में धर्म हैं और यह गौरूपिणी पृथ्वी माता है। आप धर्म के मर्म को भली-भाँति जानते हैं। आप किसी की चुगली नहीं कर सकते इसीलिये आप दुःख देने वाले का नाम नहीं बता रहे हैं। हे धर्म! सतयुग में आपके तप, पवित्रता, दया और सत्य चार चरण थे। त्रेता में तीन चरण रह गये, द्वापर में दो ही रह गये और अब इस दुष्ट कलियुग के कारण आपका एक ही चरण रह गया है। यह अधर्मरूपी कलियुग अपने असत्य से उस चरण को भी नष्ट करने का प्रयत्न कर रहा है। भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के स्वधाम गमन से दुष्ट पापी शूद्र राजा लोग इस गौरूपिणी पृथ्वी को भोगेंगे इसी कारण से यह माता भी दुःखी हैं।"
इतना कह कर राजा परीक्षीत ने उस पापी शूद्र राजवेषधारी कलियुग को मारने के लिये अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। कलियुग ने भयभीत होकर अपने राजसी वेष को उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और त्राहि-त्राहि कहने लगा। राजा परीक्षित बड़े शरणागत वत्सल थे, उनहोंने शरण में आये हुये कलियुग को मारना उचित न समझा और कलियुग से कहा - "हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है इसलिये मैंने तुझे प्राणदान दिया। किन्तु अधर्म, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। अतः तू मेरे राज्य से तुरन्त निकल जा और लौट कर फिर कभी मत आना।"

राजा परीक्षित के इन वचनों को सुन कर कलियुग ने कातर वाणी में कहा - "हे राजन्! आपका राज्य तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर है, आपके राज्य से बाहर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ पर कि मैं निवास कर सकूँ। हे भूपति! आप बड़े दयालु हैं, आपने मुझे शरण दिया है। अब दया करके मेरे निवास का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध आपको करना ही होगा।"

कलियुग इस तरह कहने पर राजा परीक्षित सोच में पड़ गये। फिर विचार कर के उन्होंने कहा - "हे कलियुग! द्यूत, मद्यपान, परस्त्रीगमन और हिंसा इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। इन चार स्थानों में निवास करने की मैं तुझे छूट देता हूँ।" इस पर कलियुग बोला - "हे उत्तरानन्दन! ये चार स्थान मेरे निवास के लिये अपर्याप्त हैं। दया करके कोई और भी स्थान मुझे दीजिये।" कलियुग के इस प्रकार माँगने पर राजा परीक्षित ने उसे पाँचवा स्थान 'स्वर्ण' दिया। कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यक्षतः तो वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृष्य रूप में वापस आकर राजा परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा।