25 October 2012

घरेलू नुस्खे........


* कमजोरी को दूर करने का सरल उपाय
एक-एक चम्मच अदरक व आंवले के रस को दो कप पानी में उबाल कर छान लें। इसे दिन में तीन बार पियें। स्वाद के लिये काला नमक या शहद मिलाएँ।



* हृदय रोग में आँवले का मुरब्बा
आँवले का मुरब्बा दिन में तीन बार सेवन करने से यह दिल की कमजोरी, धड़कन का असामान्य होना तथा दिल के रोग में अत्यंत लाभ होता है, साथ ही पित्त, ज्वर, उल्टी, जलन आदि में भी आराम मिलता है।

* मधुमेह के लिये आँवला और करेला
एक प्याला करेले के रस में एक बड़ा चम्मच आँवले का रस मिलाकर रोज पीने से दो महीने में मधुमेह के कष्टों से आराम मिल जाता है।

* माइग्रेन और सिरदर्द के लिये सेब-
सिरदर्द और माइग्रेन से परेशान हों तो सुबह खाली पेट एक सेब नमक लगाकर खाएँ इससे आराम आ जाएगा।

* खाँसी में प्याज
अगर बच्चों या बुजुर्गों को खांसी के साथ कफ ज्यादा गिर रहा हो तो एक चम्मच प्याज के रस को चीनी या गुड मिलाकर चटा दें, दिन में तीन चार बार ऐसा करने पर खाँसी से तुरंत आराम मिलता है।


24 October 2012

!!! रुद्राक्ष का सत्य !!!



रुद्राक्ष के वृक्ष भारत समेत विश्व के अनेक देशों में पाए जाते हैं. यह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों तथा मैदानी इलाकों में भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. रुद्राक्ष का पेड़ किसी अन्य वृक्ष की भांति ही होता है, इसके वृक्ष 50 से लेकर 200 फीट तक पाए जाते हैं तथा इसके पत्ते आकार में लंबे होते हैं. रुद्राक्ष के फूलों का रंग सफेद होता है तथा इस पर लगने वाला फल गोल आकार का होता है जिसके अंदर से गुठली रुप में रुद्राक्ष प्राप्त होता है.

रुद्राक्ष का फल खाने में अधिक स्वादिष्ट नहीं होता इसके फलों का स्वाद कुछ खटा या फिर कसैला सा होता है. इसके हरे फल पकने के पश्चात स्वयं ही गिर जाते हैं और जब उनका आवरण हटता है तो एक उसमे से अमूल्य रुद्राक्ष निकलते हैं. यह इन फलों की गुठली ही होती है. रुद्राक्ष में धारियां सी बनी होती है जो इनके मुखों का निर्धारण करती हैं. रुद्राक्ष को अनेक प्रकार की महीन सफाई प्रक्रिया द्वारा उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है जिसे उपयोग में लाकर सभी लाभ उठाते हैं.

भारत के विभिन्न प्रदेशों में रुद्राक्ष |

रुद्राक्ष भारत, के हिमालय के प्रदेशों में पाए जाते हैं. इसके अतिरिक्त असम, मध्य प्रदेश, उतरांचल, अरूणांचल प्रदेश, बंगाल, हरिद्वार, गढ़वाल और देहरादून के जंगलों में पर्याप्त मात्र में यह रुद्राक्ष पाए जाते हैं. इसके अलावा दक्षिण भारत में नीलगिरि और मैसूर में तथा कर्नाटक में भी रुद्राक्ष के वृक्ष देखे जा सकते हैं. रामेश्वरम में भी रुद्राक्ष पाया जाता है यहां का रुद्राक्ष काजु की भांति होता है. गंगोत्री और यमुनोत्री के क्षेत्र में भी रुद्राक्ष मिलते हैं.

नेपाल और इंडोनेशिया से प्राप्त रुद्राक्ष |

नेपाल, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि प्रमुख रूप से रुद्राक्ष के बहुत बड़े उत्पादक रहे हैं और भारत सबसे बडा़ ख़रीदार रहा है. नेपाल में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में काफी बडे़ होते हैं, लेकिन इंडोनेशिया और मलेशिया में पाए जाने वाले रुद्राक्ष आकार में छोटे होते हैं. भारत में रुद्राक्ष भारी मात्रा में नेपाल और इंडोनेशिया से मंगाए जाते हैं और रुद्राक्ष का कारोबार अरबों में होता है. सिक्के के आकार का रुद्राक्ष, जो ‘इलयोकैरपस जेनीट्रस’ प्रजाति का होता है, बेहद दुर्लभ होता जो नेपाल से प्राप्त होता है.

विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष |

भारत के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों में रुद्राक्ष की खेती की जाती है तथा इसके वृक्ष पाए जाते हैं. नेपाल, जावा, इंडोनेशिया, मलाया जैसे देशों में रुद्राक्ष उत्पन्न होता है. नेपाल ओर इंनेशिया में मिलने वाले रुद्राक्ष भारत में मिलने वाले रुद्राक्षों से अलग होते हैं. नेपाल में बहुत बडे़ आकार का रुद्राक्ष पाया जाता है तथा यहां पर मिलने वाले रुद्राक्ष की किस्में भी बहुत अच्छी मानी गई हैं. नेपाल में एक मुखी रुद्राक्ष बेहतरीन किस्म का होता है.

रुद्राक्ष के समान ही एक अन्य फल होता है जिसे भद्राक्ष कहा जाता है, और यह रुद्राक्ष के जैसा ही दिखाई देता है इसलिए कुछ लोग रुद्राक्ष के स्थान पर इसे भी नकली रुद्राक्ष के रुप में बेचते हैं. भद्राक्ष दिखता तो रुद्राक्ष की भांति ही है किंतु इसमें रुद्राक्ष जैसे गुण नहीं होते.

माना जाता है कि भारत में बिकने वाले 80 फीसदी रुद्राक्ष फर्जी होते हैं और उन्हें तराश कर बनाया जाता है. इसलिए रुद्राक्ष को खरीदने से पहले इसके गुणवत्ता को देखना बेहद आवश्यक है. अपने औषधीय और आध्यात्मिक गुणों के कारण रुद्राक्ष का प्रचलन बहुत है. रुद्राक्ष के गुणों के कारण ही सदियों से ऋषि-मुनि इसे धारण करते आए हैं.


23 October 2012

!!! मृत्यु के करीब होने का अनुभव !!!



ये देखो, ये सब लोग मुझे लेने आए हुए हैं। सामने अद्भुत रोशनी की सुरंग 

नजर आ रही है। यहां मेरे सारे आत्मीय जन मेरे स्वागत में खडे हुए हैं। मेरा शरीर फूल की तरह... इन शब्दों केसाथ ही पिता जी की चेतना गुम हो चुकी थी। यह बहुत पहले की घटना है। मेरे पिता रामेश्वर दयाल बहुत बीमार थे। उन्हें तुरंत होली फेमिली अस्पताल ले जाया गया। पिताजी अचेत थे। अस्पताल में उन्हें कुछ देर के लिए होश आया। तभी उन्होंने ये बातें कहीं। इसके बाद उनका देहांत हो गया। मेरा पूरा परिवार धर्म-कर्म को मानने वाला परिवार है तथा मां संतोषी माता की अनन्य भक्त थीं। बडी विचित्र घटना हुई जब पिताजी को दो बार संतोषी मां के दर्शन हुए। जबकि उनकी पूजा मां किया करती थीं। हमारे पिताजी अत्यंत खुशहाल, सुलझे हुए तथा मन व आत्मा से शुद्ध रहने वाले व्यक्ति थे। झूठ-फरेब उनके 

जीवन में कहीं नहीं था।
विश्लेषण

स्व.रामेश्वर दयाल का अनुभव मृत्यु के करीब होने वाले अनुभव का ही एक उदाहरण है। इस प्रकार के अनुभव कोई नई बात नहीं हैं। इसका विस्तृत विश्लेषण 8 वी सेंचुरी में लिखी गई तिब्बतियन बुक ऑफ डेड में मिलता है। इसे एक समय मृत्यु शैया के विजन (डेथ बेड विजन) भी कहा जाता था। आज यह चर्चा का विषय है तथा इस पर गहन शोध भी हो रहे हैं कि क्या वास्तव में ऐसा अनुभव होता है?

उल्लेखनीय है कि इस अनुभव के पश्चात् कुछ व्यक्तियों के जीवन में बदलाव आते देखे गए। यदि मृत्यु के निकट जाकर किसी को जीवन मिला है तो उनमें संवेदनशीलता बढ गई। कई भूले-बिसरे गुण सामने आ गए थे। कई मामलों में पूरी लाइफस्टाइल ही बदल गई थी। 

नियर डेथ एक्सपीरियंस के अनुभव के समय जब व्यक्ति मृत्यु के एकदम करीब होता है और आत्मा अचानक शरीर छोड देती है। ज्यादातर इस प्रकार के अनुभव ऑपरेशन टेबल पर हुए हैं। घटनाओं का चलचित्र की तरह दिखना, रोशनी की सुरंग, अद्भुत प्रेम का एहसास कराने वाली अलौकिक रोशनी का अनुभव। इन लोगों के मृत्यु के बारे में विचार बदल जाते हैं। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट (एस्कॅा‌र्ट्स) डा.भावना बर्मी के अनुसार एन. डी. ई. एक प्रकार की संवेदनशील अनुभूति है, जो उन व्यक्तियों को होती है जो क्लिनिकली मर कर दोबारा जी जाते हैं, चाहे कुछ देर के लिए।


!!! मृत्‍यु की ठीक-ठीक भविष्‍य वाणी !!!


’सक्रिय व निष्‍क्रिय या लक्षणात्‍मक वह विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्‍यु की ठीक-ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।‘’ 

सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपारान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभये वा।

तो इसे दो प्रकार से जाना जा सकता है। या तो प्रारब्‍ध को देखकर या फिर कुछ लक्षण और पूर्वाभास है जिन्‍हें देख कर जाना जा सकता है।
उदाहरण के लिए, जब कोई व्‍यक्‍ति मरता है तो मरने के ठीक नौ महीने पहले कुछ न कुछ होता है। साधारणतया हम जागरूक नहीं होते है। और वह घटना बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। मैं नौ महीने कहता हूं—क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति में इसमे थोड़ी भिन्‍नता होती है। यह निर्भर करता है: समय का जो अंतराल गर्भधारण और जन्‍म के बीच मौजूद रहता है।उतना ही समय मृत्‍यु को जानने का रहेगा। अगर कोई व्‍यक्‍ति गर्भ में नौ महीने रहने बाद जन्‍म लेता है, तो उसे नौ महीने पहले मृत्‍यु का आभास होगा। अगर कोई दस महीने गर्भ में रहता है तो उसे दस महीने पहले मृत्‍यु का अहसास होगा, कोई सात महीने पेट में रहता है तो उसे सात महीने पहले उसे मृत्‍यु का एहसास होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भधारण और जन्‍म के समय के बीच कितना समय रहा।


मृत्‍यु के ठीक उतने ही महीने पहले हार में, नाभि चक्र में कुछ होने लगता है। हारा सेंटर को क्‍लिक होना ही पड़ता है। क्‍योंकि गर्भ में आने और जन्‍म के बीच नौ महीने का अंतराल था: जन्‍म लेने में नौ महीने का समय लगा, ठीक उतना ही समय मृत्‍यु के लिए लगेगा। जैसे जन्‍म लेने के पूर्व नौ महीने मां के गर्भ में रहकर तैयार होते हो, ठीक ऐसे ही मृत्‍यु की तैयारी में भी नौ महीने लगेंगे। फिर वर्तुल पूरा हो जायेगा। तो मृत्‍यु के नौ महीने पहले नाभि चक्र में कुछ होने लगता है।

जो लोग जागरूक है, सजग है, वे तुरंत जान लेंगे कि नाभि चक्र में कुछ टूट गया है; और अब मृत्‍यु निकट ही है। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग नौ महीने लगते है। या फिर उदाहरण के लिए, मृत्‍यु के और भी कुछ अन्‍य लक्षण तथा पूर्वाभास होते है, कोई आदमी मरने से पहले, अपने मरने के ठीक छह महीने पहले, अपनी नाक की नोक को देखने में धीरे-धीरे असमर्थ हो जाता है। क्‍योंकि आंखें धीरे-धीरे ऊपर की और मुड़ने लगती है। मृत्‍यु में आंखे पूरी तरह ऊपर की और मुड़ जाती है। लेकिन मृत्‍यु के पहल ही लौटने की यात्रा का प्रारंभ हो जाता है। ऐसा होता है: जब एक बच्‍चा जन्‍म लेता है, तो बच्‍चे की दृष्‍टि थिर होने में करीब छह महीने लगते है। साधारणतया ऐसा ही होता है। लेकिन इसमे कुछ अपवाद भी हो सकते है—

बच्‍चे की दृष्‍टि ठहरने में छह महीने लगते है। उससे पहले बच्‍चे की दृष्‍टि थिर नहीं होती। इसी लिए तो छह महीने का बच्‍चा अपनी दोनों आंखें एक साथ नाक के करीब ला सकता है। और फिर किनारे पर भी आसानी से ला सकता है। इसका मतलब है बच्‍चे की आंखे अभी थिर नहीं हुई है। जिस दिन बच्‍चे की आंखे थिर हो जाती है। फिर वह दिन छह महीने के बाद का हो। या दस महीने के बाद का हो, ठीक उतना ही समय लगेगा फिर उतने ही समय के पूर्व आंखें शिथिल होने लगेंगी। और ऊपर की और मुड़ने लगेंगी। 

इसीलिए भारत में गांव के लोग कहते है, निश्‍चित रूप से इस बात की खबर उन्‍हें योगियों से मिली होगी—कि मृत्‍यु आने के पूर्व व्‍यक्‍ति अपनी ही नाक की नोक को देख पाने में असमर्थ हो जाता है।

और भी बहुत सी विधियां है, जिनके माध्‍यम से योगी निरंतर अपनी नाक की नोक पर ध्‍यान देते है। वह नाक की नोक पर अपने को एकाग्र करते है। जो लोग नाक की नोक पर एकाग्र चित होकर ध्‍यान करते है, अचानक एक दिन वे पाते है कि वे अपनी ही नाक की नोक को देख पाने में असमर्थ है, वे अपनी नाक की नोक नहीं देख सकते है। इस बात से उन्‍हें पता चल जाता है कि मृत्‍यु अब निकट ही है।

योग के शरीर विज्ञान के अनुसार व्‍यक्‍ति के शरीर में सात चक्र होत है। पहला चक्र है मूलाधार, और अंतिम चक्र है सहस्‍त्रार, जो सिर में होता है। इन दोनों के बीच में पाँच चक्र और होते है। जब भी व्‍यक्‍ति कि मृत्‍यु होती है; तो वह किसी एक निश्‍चित चक्र के द्वारा अपने प्राण त्यागता है।

व्‍यक्‍ति ने किस चक्र से शरीर छोड़ा है, वह उसके इस जीवन के विकास को दर्श देता है। साधारणतया तो लोग मूलाधार से ही मरते है। क्‍योंकि जीवन भर लोग काम-केंद्र के आसपास ही जीते है। वे हमेशा सेक्‍स के बारे ही सोचते है, उसी की कल्‍पना करते है, उसी के स्‍वप्‍न देखते है, उनका सभी कुछ सेक्‍स को लेकर ही होता है—जैसे कि उनका पूरा जीवन काम केंद्र के आसपास ही केंद्रित हो गया हो। ऐसे लोग मूलाधार से काम केंद्र से ही प्राण छोड़ते है। लेकिन अगर कोई व्‍यक्‍ति प्रेम का उपलब्‍ध हो जाता है। और कामवासना के पार चला जाता है। तो वह ह्रदय केंद्र से प्राण को छोड़ता है। और अगर कोई व्‍यक्‍ति पूर्णरूप से विकसित हो जाता है, सिद्ध हो जाता है तो वह अपनी ऊर्जा को, अपने प्राणों को सहस्‍त्रार से छोड़ेगा।

और जिस केंद्र से व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु होती है, वह केंद्र खुल जाता है। क्‍योंकि तब पूरी जीवन ऊर्जा उसी केंद्र से निर्मुक्‍त होती है.....


जिस केंद्र से व्‍यक्‍ति प्राणों को छोड़ता है, व्‍यक्‍ति का निर्मुक्‍ति देने वाला बिंदू स्‍थल खुल जाता है। उस बिंदु स्‍थल को देखा जा सकता है। किसी दिन जब पश्‍चिमी चिकित्‍सा विज्ञान योग के शरीर विज्ञान के प्रति सजग हो सकेगा। तो वह भी पोस्‍टमार्टम का हिस्‍सा हो जाएगा। कि व्‍यक्‍ति कैसे मरा। अभी तो चिकित्‍सक केवल यही देखता है कि व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु स्‍वाभाविक हुई है, या उसे जहर दिया गया है। या उसकी हत्‍या की गयी है, या उसके आत्‍महत्‍या की है—यही सारी साधारण सी बातें चिकित्‍सक देखते है। सबसे आधारभूत और महत्‍वपूर्ण बात की चिकित्‍सक चूक जाते है। जो कि उनकी रिपोर्ट में होनी चाहिए—कि व्‍यक्‍ति के प्राण किस केंद्र से निकले है: काम केंद्र से निकले है, ह्रदय केंद्र से निकले है, या सहस्‍त्रार से निकले है। किसी केंद्र से उसकी मृत्‍यु हुई है। और इसकी संभावना है, 

क्‍योंकि योगियों ने इस पर बहुत काम किया है। और इसे देखा जा सकता है। क्‍योंकि जिस केंद्र से प्राण-ऊर्जा निर्मुक्‍त होती है। वही विशेष केंद्र टूट जाता है। जैसे कि कोई अंडा टूटता है और कोई चीज उससे बहार आ जाती है। ऐसे ही जब कोई विशेष केंद्र टूटता है, तो ऊर्जा वहां सक निर्मुक्‍त होती है।

जब कोई व्‍यक्‍ति संयम को उपल्‍बध हो जाता है। तो मृत्‍यु के ठीक तीन दिन पहले वह सजग हो जाता है, कि उसे कौन से केंद्र से शरीर छोड़ना है। अधिकतर तो वह सहस्‍त्रार से ही शरीर को छोड़ता है। मृत्‍यु के तीन दिन पहले एक तरह की हलन-चलन, एक तरह की गति, ठीक सिरा के शीर्ष भाग पर होने लगती है।

यह संकेत हमे मृत्‍यु को कैसे ग्रहण करना, इसके लिए तैयार कर सकते है। और अगर हम मृत्‍यु को उत्‍सवपूर्ण ढंग से, आनंद से, अहो भाव से नाचते गाते कैसे ग्रहण करना है, यह जान लें—तो फिर हमारा दूसरा जन्‍म नहीं होता। तब इस संसार की पाठशाला में हमारा पाठ पूरा हो गया। इस पृथ्‍वी पर जो कुछ भी सीखने को है उसे हमने सीख लिया। अब हम तैयार है किसी महान लक्ष्‍य महान जीवन और अनंत-अनंत जीवन के लिए। अब ब्रह्मांड में संपूर्ण अस्‍तित्‍व में समाहित होने के लिए हम तैयार है। और इसे हमने अर्जित कर लिया है।

इस सूत्र के बारे में एक बात और क्रिया मान कर्म, दिन प्रतिदिन के कर्म, वे तो बहुत ही छोटे-छोटे कर्म होते है। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में हम इसे चेतन कह सकते है। इसके नीचे होता है प्रारब्‍ध कर्म। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में हम इसे ‘’अवचेतन’’ कह सकते है। उससे भी नीचे होता है, संचित कर्म; आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में इसे हम अचेतन कह सकते है।


साधारणतया तो आदमी अपनी प्रतिदिन की गतिविधियों के बारे में सजग ही नहीं होता, तो फिर प्रारब्‍ध या संचित कर्म के बारे में कैसे सचेत हो सकता है। यह लगभग असंभव ही है। तो तुम दिन प्रतिदिन की छोटी-छोटी गतिविधियों में सजग होने का प्रयास करना। अगर सड़क पर चल रह हो, तो सड़क पर सजग होकर, होश पूर्वक चलना। अगर भोजन कर रहे हो तो सजगता पूर्वक करना। दिन में जो कुछ भी करो, उसे होश पूर्वक सजगता से करना। कुछ कार्य करो, उस कार्य पूरी तरह से डूब जाना। उसके साथ एक हो जाना। फिर कर्ता और कृत्‍य अलग-अलग न रहें। फिर मन इधर-उधर ही नहीं भागता रहे। जीवित लाश की भांति कार्य मत करना। जब सड़क पर चलो तो ऐसे मत चलना जैसे कि किसी गहरे सम्‍मोहन में चल रहे हो। कुछ भी बोलों वह तुम्‍हारे पूरे होश सजगता से आए, ताकि तुम्‍हें फिर कभी पीछे पछताना न पड़े।

अगर तुम इस प्रथम चरण को उपलब्‍ध कर लेते हो, तो फिर दूसरा चरण अपने से सुलभ हो जाता है, तब तुम अवचेतन में उतर सकते हो।
तो फिर जब कोई तुम्‍हारा अपमान करता है, तो जिस समय तुम्‍हें क्रोध आया, जागरूक हो जाओ। तब किसी ने तुम्‍हारा अपमान किया—और क्रोध की एक छोटी सी तरंग, जो कि बहुत ही सूक्ष्‍म होती है। तुम्‍हारे अस्‍तित्‍व के अवचेतन की गहराई में उतर जाती है। अगर तुम संवेदनशील और जागरूक नहीं हो, तो तुम उस उठी हई सूक्ष्‍म तरंग को पहचान न सकोगे। जब तक कि वह चेतन में न आ जाए, तुम उसे नहीं जान सकोगे। वरना, धीरे-धीरे तुम सूक्ष्‍म बातों को, भावनाओं को सूक्ष्‍म तरंगों के प्रति सचेत होने लगोगे—वही है प्रारब्‍ध, वहीं है अवचेतन। और जब अवचेतन के प्रति सजगता आती है। तो तीसरा चरण भी उपलब्‍ध हो जाता है। जितना अधिक व्‍यक्‍ति का विकास होता है, उतने ही अधिक विकास की संभावना के द्वार खुलते चले जाते है। तीसरे चरण को, अंतिम चरण को देखना संभव है। जो कर्म अतीत में संचित हुए थे। अब उनके प्रति सजग हो पाना संभव है। जब व्‍यक्‍ति अचेतन में उतरता है। तो इसका अर्थ है कि वह चेतन के प्रकाश को अपने अस्‍तित्‍व की गहराईयों में ले जा रहा है। व्‍यक्‍ति संबोधि को उपलब्‍ध हो जाएगा। संबुद्ध होने का अर्थ यही है, कि अब कुछ भी अंधकार में नहीं है। व्‍यक्‍ति का अंतस्‍तल का कोना-कोना प्रकाशित हो गया। तब वह जीता भी है, कार्य भी करता है, लेकिन फिर भी किसी तरह के कर्म का संचय नहीं होता।


आखिर मृत्यु क्या है मृत्यु के बाद आत्मा कहा जाती है ????



दुनिया के हर इंसान के मन में कभी न कभी यह प्रश्र अवश्य उठता है कि आखिर जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है? जब भी मन में मृत्यु का ख्यालआता है या किसी शवयात्रा को गुजरते हुए देखते हैं तो रोमांचित हो जाते हैं।आखिर यह मृत्यु है क्या? क्या होता है मरने के बाद? मृत्यु के विषय में दुनियाभर में अलग-अलग तरह की बातें और मान्यताएं प्रचलित हैं। 

इस तरह कि मान्यताओं और धारणाओं में से अधिकांश काल्पनिक,मनघढ़ंत एवं झूंटी होती हैं। किन्तु समय-समय पर इस दुनिया में कुछ ऐसे ररत्नों,तत्वज्ञानियों एवं योगियों ने जन्म लिया है जिन्होंने अपने जीवन काल में ही इस महत्वपूर्णगुत्थी को सुलझाया है। ऐसे आत्मज्ञानी महापुरुष समाधि के उच्च स्तर पर पहुंचकर समय के बंधन से मुक्त हो जाते हैं यानि कि कालातीत हो जाते हैं।इस कालातीत अवस्था में पहुंचकर वे यह आसानी से जान जाते हैं कि मृत्यु से पहले जीवन क्या था? और मृत्यु के बाद जीवन की गति क्या होती है। ऐसे ही पहुंचे हुए सिद्ध योगियों का स्पष्ट कहना है कि काल की तरह जीवन भी असीम ओर अनंत है। जीवन का न तो कभी प्रांरभ होता है और न ही कभी अंत। लोग जिसे मृत्यु कहते हैं वह मात्र उस शरीर का अंत है जो प्रकृति केपांच तत्वों (पृथ्वी,जल,वायु,अग्री और आकाश)  से मिलकर बना था।

आखिर मृत्यु के बाद आत्मा जाती कहां है?


human soul


ऐसा माना जाता है कि मानव शरीर नश्वर है, जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन अपने प्राण त्यागने ही पड़ते हैं. भले ही मनुष्य या कोई अन्य जीवित प्राणी सौ वर्ष या उससे भी अधिक क्यों ना जी ले लेकिन अंत में उसे अपना शरीर छोड़कर वापस परमात्मा की शरण में जाना ही होता है.

यद्यपि इस सच से हम सभी भली-भांति परिचित हैं लेकिन मृत्यु के पश्चात जब शव को अंतिम विदाई दे दी जाती है तो ऐसे में आत्मा का क्या होता है यह बात अभी तक कोई नहीं समझ पाया है. एक बार अपने शरीर को त्यागने के बाद वापस उस शरीर में प्रदार्पित होना असंभव है इसीलिए मौत के बाद की दुनियां कैसी है यह अभी तक एक रहस्य ही बना हुआ है.

किस्से-कहानियों या फिर अफवाहों में तो मौत के पश्चात आत्मा को मिलने वाली यात्नाएं या फिर विशेष सुविधाओं के बारे में तो कई बार सुना जा चुका है लेकिन पुख्ता तौर पर अभी तक कोई यह नहीं जान पाया है कि क्या वास्तव में इस दुनियां के बाद भी एक ऐसी दुनियां है जहां आत्मा को संरक्षित कर रखा जाता है अगर नहीं तो जीवन का अंत हो जाने पर आत्मा कहां चली जाती है?

गीता के उपदेशों में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि आत्मा अमर है उसका अंत नहीं होता, वह सिर्फ शरीर रूपी वस्त्र बदलती है. वैसे तो कई बार आत्मा की अमर यात्रा के विषय में सुना जा चुका है लेकिन फिर यह सबसे अधिक रोमांच और जिज्ञासा से जुड़ा मसला है.


शरीर त्यागने के बाद कहां जाती है आत्मा ?

soul

गरूड़ पुराण जो मरने के पश्चात आत्मा के साथ होने वाले व्यवहार की व्याख्या करता है उसके अनुसार जब आत्मा शरीर छोड़ती है तो उसे दो यमदूत लेने आते हैं. मानव अपने जीवन में जो कर्म करता है यमदूत उसे उसके अनुसार अपने साथ ले जाते हैं. अगर मरने वाला सज्जन है, पुण्यात्मा है तो उसके प्राण निकलने में कोई पीड़ा नहीं होती है लेकिन अगर वो दुराचारी या पापी हो तो उसे पीड़ा सहनी पड़ती है. गरूड़ पुराण में यह उल्लेख भी मिलता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को यमदूत केवल 24 घंटों के लिए ही ले जाते हैं और इन 24 घंटों के दौरान आत्मा को दिखाया जाता है कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किए हैं. इसके बाद आत्मा को फिर उसी घर में छोड़ दिया जाता है जहां उसने शरीर का त्याग किया था. इसके बाद 13 दिन के उत्तर कार्यों तक वह वहीं रहता है. 13 दिन बाद वह फिर यमलोक की यात्रा करता है.

पुराणों के अनुसार जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्याग कर यात्रा प्रारंभ करती है तो इस दौरान उसे तीन प्रकार के मार्ग मिलते हैं. उस आत्मा को किस मार्ग पर चलाया जाएगा यह केवल उसके कर्मों पर निर्भर करता है. ये तीन मार्ग हैं अर्चि मार्ग, धूम मार्ग और उत्पत्ति-विनाश मार्ग. अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए होता है, वहीं धूममार्गपितृलोक की यात्रा पर ले जाता है और उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है.


अचानक नहीं आएगी मौत, ये उपाय हर शनिवार करते रहें..

जीवन का अंतिम अटल सत्य है मृत्यु। जिस व्यक्ति ने इस धरती पर जन्म लिया है उसे एक दिन अवश्य ही इस नश्वर शरीर देह को त्यागना पड़ता है। श्रीमदभागवत में श्रीकृष्ण ने भी यही संदेश दिया है कि आत्मा अमर है और यह देह नश्वर है। कभी-कभी कुछ लोगों को असमय ही मृत्यु का शिकार होना पड़ता है,असमय मृत्यु से बचने के लिए शिव पुराण में कई उपाय बताए गए हैं।

शिव पुराण के अनुसार असमय या अचानक होने वाली मृत्यु से बचने के लिए शनि आराधना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। शनि देव असमय मृत्यु से बचाने में सक्षम हैं। शनि देव को प्रसन्न करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है शनिवार। इस दिन भगवान शनि के निमित्त पूजन करने वाले व्यक्ति को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है। इसके साथ ही ज्योतिष संबंधी कुंडली के कई दोष भी इनकी आराधना से शांत हो जाते हैं।


सबसे क्रूर माने जाने वाले शनि से कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार के दिन विशेष पूजन करें। शनि के निमित्त शनि की वस्तुओं का दान करें। इसके अतिरिक्त भगवान शिव को जल में तिल डालकर अर्पित करें। शिवजी के साथ ही शनिदेव की आराधना से व्यक्ति अकाल मृत्यु से बच सकता है। 

इस प्रकार प्रत्येक शनिवार को यह उपाय करने से अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है और व्यक्ति को लंबी आयु प्राप्त होती है। यह उपाय शिव पुराण में दिया गया है अत: इसमें शंका और संदेह न करें अन्यथा इस उपाय का उचित पुण्य प्राप्त नहीं हो सकेगा। 



मृत्यु के बाद पुत्र ही क्यों देता है मुखाग्नि?

मृतक चाहे स्त्री हो या पुरुष अंतिम क्रिया पुत्र की संपन्न करता है। इस संबंध में हमारे शास्त्रों में उल्लेख है कि पुत्र पुत नामक नर्क से बचाता है अर्थात् पुत्र के हाथों से मुखाग्नि मिलने के बाद मृतक को स्वर्ग प्राप्त होता है। इसी मान्यता के आधार पर पुत्र होना कई जन्मों के पुण्यों का फल बताया जाता है।

पुत्र माता-पिता का अंश होता है। इसी वजह से पुत्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता की मृत्यु उपरांत उन्हें मुखाग्नि दे। इसे पुत्र के लिए ऋण भी कहा गया है।

अंत समय का एहसास करवाते हैं मृत्यु पूर्वाभास !!

बहुत से लोगों का यह मत है कि मृत्यु एक सच है लेकिन यह कब और कहां होगी इसका पता लगा पाना संभव नहीं है. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भले ही कोई यह ना जान पाए कि मृत्यु कहां होगी लेकिन यह कब होगी इसका अनुमान लगा पाना मुमकिन है. अगर हम इसे अनुमान ना कहकर सटीक और सत्य कहें तो भी शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पराविज्ञान के अनुसार मृत्यु से पहले ही कुछ संकेतकों की सहायता से व्यक्ति पहले ही यह जान सकता है कि उसकी मृत्यु होने वाली है. परवैज्ञानिकों की मानें तो सामान्यत: यह संकेत मृत्यु से नौ महीने पहले ही मिलने शुरू हो जाते हैं (अगर कोई व्यक्ति अपनी मां के गर्भ में दस महीने तक रहा है तो यह समय दस महीने हो सकता है और वैसे ही सात महीने रहने वाले व्यक्ति को सात महीने पहले ही संकेत मिलने लगते हैं). ध्यान रहे कि मृत्यु के पूर्वाभास से जुड़े लक्षणों को किसी भी लैब टेस्ट या क्लिनिकल परीक्षण से सिद्ध नहीं किया जा सकता बल्कि ये लक्षण केवल उस व्यक्ति को महसूस होते हैं जिसकी मृत्यु होने वाली होती है. मृत्यु के पूर्वाभास से जुड़े निम्नलिखित संकेत व्यक्ति को अपना अंत समय नजदीक होने का आभास करवाते हैं:


समय बीतने के साथ अगर कोई व्यक्ति अपनी नाक की नोक देखने में असमर्थ हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि जल्द ही उसकी मृत्यु होने वाली है. क्‍योंकि उसकी आंखें धीरे-धीरे ऊपर की ओर मुड़ने लगती हैं और मृत्‍यु के समय आंखें पूरी तरह ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं.


मृत्यु से कुछ समय पहले व्यक्ति को आसमान में मौजूद चांद खंडित लगने लगता है. व्यक्ति को लगता है कि चांद बीच में से दो भागों में बंटा हुआ है, जबकि ऐसा कुछ नहीं होता.

सामान्य तौर पर व्यक्ति जब आप अपने कान पर हाथ रखते हैं तो उन्हें कुछ आवाज सुनाई देती है लेकिन जिस व्यक्ति का अंत समय निकट होता है उसे किसी भी प्रकार की आवाजें सुनाई देनी बंद हो जाती हैं.

व्यक्ति को हर समय ऐसा लगता है कि उसके सामने कोई अनजाना चेहरा बैठा है. 

मृत्यु का समय नजदीक आने पर व्यक्ति की परछाई उसका साथ छोड़ जाती है.

जीवन का सफर पूरा होने पर व्यक्ति को अपने मृत पूर्वजों के साथ रहने का अहसास होता है.

किसी साये का हर समय साथ रहने जैसा आभास व्यक्ति को अपनी मृत्यु के दो-तीन पहले ही होने लगता है.

मृत्यु से पहले मानव शरीर में से अजीब सी गंध आने लगती है, जिसे मृत्यु गंध का नाम दिया जाता है.

दर्पण में व्यक्ति को अपना चेहरा ना दिख कर किसी और का चेहरा दिखाई देने लगे तो स्पष्ट तौर पर मृत्यु 24 घंटे के भीतर हो जाती है.

नासिका के स्वर अव्यस्थित हो जाने का लक्षण अमूमन मृत्यु के 2-3 दिनों पूर्व प्रकट होता है.


22 October 2012

क्या आप जानते हैं कि..... नवरात्र का मतलब क्या होता है.???


नवरात्र का वैज्ञानिक आधार क्या है ...?????

दरअसल.... नवरात्र शब्द से "नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध" होता है.... और, इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है..... क्योंकि... "रात्रि" शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है...।

जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि....भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने.... रात्रि को दिन की अपेक्षा अधि

क महत्व दिया है...... यही कारण है कि... दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है...।

यदि , रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता,... तो, ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता..... परन्तु , दिलचस्प है कि... नवरात्र के दिन.... नवदिन नहीं कहे जाते हैं....।

लेकिन... नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले... हम थोडा नवरात्र को समझ लेते हैं....!

मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है..... मतलब कि.... विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक...।

और, इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् ...... आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है.. ।

लेकिन, फिर भी ..... सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है.... और, इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं...... !
यहाँ तक कि... कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है...... और, जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते...... वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

हालाँकि.... आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं..... बल्कि, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं।

यहाँ तक कि....सामान्य भक्त ही नहीं.... अपितु , पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते... और, ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है।

आज कल.. . बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं...!

जबकि... मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया.... और, अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि.... रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं........ और, हमारे ऋषि - मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे.....।

जैसा कि.... आपने भी देखा ही होगा कि..... अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है , किंतु यदि रात्रि को आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है.....।

इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा..... एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि..... दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं....।

रेडियो इस बात का जीता - जागता उदाहरण है... जहाँ आपने खुद भी महसूस किया होगा कि.... कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है ........जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।

इसका... वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि..... सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ..... ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है......!

इसीलिए ऋषि - मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है.....।

मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर - दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है।

यही... रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है...... जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं , उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

हालाँकि..... आजकल नवरात्र को नवरात्रि.... भी कहा जाता है .... परन्तु , संस्कृत व्याकरण के अनुसार "नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण" है .... क्योंकि, नौ रात्रियों का समाहार.... अर्थात, समूह होने और द्वन्द सामास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप ""नवरात्र"" में ही शुद्ध है।
नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह कि....

पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियाँ हैं... जिनमे से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है.... और, ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं.... अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए... तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ""नवरात्र"" है।

अब सवाल है कि.... नवरात्र में.... नौ दिन या नौ रात को गिना जाना चाहिए....????

तो.... मैं यहाँ बता दूँ कि.....अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी ""नवरात्र"" नाम सार्थक है। चूँकि.... यहाँ रात गिनते हैं.... इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है...।

रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है.. और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है...।
इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है... और, इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन.... नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

हालाँकि.... शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं ....किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए.... हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है.... जिसमे , सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है... क्योंकि, स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्र में नौ देवियाँ या नव देवी इस प्रकार हैं.....

नौ दिन यानि हिन्दी माह चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की पड़वा.... अर्थात पहली तिथि से नौवी तिथि तक प्रत्येक दिन की एक देवी..... मतलब नौ द्वार वाले दुर्ग के भीतर रहने वाली जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-
1. शैलपुत्री
2. ब्रह्मचारिणी
3. चंद्रघंटा
4. कूष्माण्डा
5. स्कन्दमाता
6. कात्यायनी
7. कालरात्रि
8. महागौरी
9. सिध्दीदात्री

इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीजों से भी सम्बंध है.....जिन्हे नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-
1. कुट्टू (शैलान्न)
2. दूध-दही,
3. चौलाई (चंद्रघंटा)
4. पेठा (कूष्माण्डा)
5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
6. हरी तरकारी (कात्यायनी)
7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
8. साबूदाना (महागौरी)
9. आंवला(सिध्दीदात्री)

और.... क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।

अष्टमी या नवमी....????
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है... और, भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार...... बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए.....।

अथ नवरात्र कथा...

जय माँ भवानी...

जय महाकाल...!!!

नोट: मेरे सभी मित्रो और उनके परिवारजनों को मेरी और से आज महाष्टमी की बहुत बहुत हार्दिक शुभकामनाएँ...!

21 October 2012

क्या आप सच में शाकाहारी है ?????


भारत मे कुल 3600 बड़े कत्लखाने है जिनके पास पशुओ को काटने का लाईसेंस है !! जो सरकार ने दे रखा है ! इसके इलावा 35000 से अधिक छोटे मोटे कत्लखाने है जो गैर कानूनी ढंग से चल रहे है ! कोई कुछ पूछने वाला नहीं ! हर साल 4 करोड़ पशुओ का कत्ल किया जाता है ! जिसने गाय ,भैंस ,

सूअर,बकरा ,बकरी ,ऊंट,आदि शामिल है ! मुर्गीया कितनी काटी जाती है इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है !

गाय का कतल होने के बाद मांस उत्पन्न होता है और मांसाहारी लोग उसे भरपूर खाते है | भारत के 20% लोग मांसाहारी है जो रोज मांस खाते है और सब तरह का मांस खाते है | मांस के इलावा दूसरी जो चीज प्राप्त की जाती है वो है तेल ! उसे tellow कहते है जैसे गाय के मांस से जो तेल निकलता है उसे beef tellow और सूअर की मांस से जो तेल निकलता है उसे pork tellow कहते है |

इस तेल का सबसे ज़्यादातर उपयोग चेहरे में लगाने वाली क्रीम बनाने में होता है जैसे Fair & Lovely , Ponds , Emami इत्यादि | ये तेल क्रीम बनाने वाली कंपनियो द्वारा खरीदा जाता है ! और जैसा कि आप जानते है मद्रास high court मे श्री राजीव दीक्षित जी ने विदेशी कंपनी fair and lovely के खिलाफ case जीता था जिसमे कंपनी ने खुद माना था कि हम इस fair and lovely मे सूअर की चर्बी का तेल मिलाते हैं !
आप यहाँ click कर देख सकते है !
http://www.youtube.com/watch?v=tzdbFhKkxoI&feature=plcp

तो क्त्ल्खानों मे मांस और तेल के बाद जानवरो का खून निकाला जाता है ! कसाई गाय और दूसरे पशुओ को पहले उल्टा रस्सी से टांग देते हैं फिर तेज धार वाले चाकू से उनकी गर्दन पर वार किया जाता है और एक दम से खून बहने लगता है नीचे उन्होने एक ड्रम रखा होता है जिसने खून इकठा
किया जाता है यहाँ click कर देख सकते हैं !
http://www.youtube.com/watch?v=tgQuXz5kVHc&feature=plcp

तो खून का सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है अँग्रेजी दवा (एलोपेथि दवा) बनाने मे ! गाय के शरीर से निकला हुआ खून ,मछ्ली के शरीर से निकला हुआ खून बैल ,बछड़ा बछड़ी के शरीर से निकला हुआ खून से जो एक दवा बनाई जाती है उसका नाम है dexorange ! बहुत ही popular दवा है और डाक्टर इसको खून की कमी के लिए महिलाओ को लिखते है खासकर जब वो गर्भावस्था मे होती है क्यूंकि तब महिलाओ मे खून की कमी आ जाती है और डाक्टर उनको जानवरो के खून से बनी दवा लिखते है क्यूंकि उनको दवा कंपनियो से बहुत भारी कमीशन मिलता है !

इसके इलावा रक्त का प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर lipstick बनाने मे होता है ! इसके बाद रक्त एक और प्रयोग चाय बनाने मे बहुत सी कंपनिया करती है ! अब चाय तो पोधे से प्राप्त होती है ! और चाय के पोधे का size उतना ही होता है जितना गेहूं के पोधे का होता है ! उसमे पत्तिया होती है उनको तोड़ा जाता है और फिर उसे सुखाते हैं ! तो पत्तियों को सूखाकर पैकेट मे बंद कर बेचा जाता हैं !

और पतितयो को नीचे का जो टूट कर गिरता है जिसे डेंटरल कहते हैं आखिरी हिस्सा !लेकिन ये चाय नहीं है ! चाय तो वो ऊपर की पत्ती है ! तो फिर क्या करते है इसको चाय जैसा बनाया जाता है ! अगर हम उस नीचले हिस्से को सूखा कर पानी मे डाले तो चाय जैसा रंग नहीं आता ! तो ये विदेशी कपनिया brookbond,ipton,आदि क्या करती है जानवरो के शरीर से निकला हुआ खून को इसमे मिलकर सूखा कर डिब्बे मे बंद कर बेचती है ! तकनीकी भाषा मे इसे tea dust कहते है !तो tea dust को जी चाय बनाकर बेचने के लिए काफी कंपनिया जानवरो के खून का प्रयोग करती हैं !इसके इलवा कुछ कंपनिया nail polish बनाने ने प्रयोग करती है !!

मांस,तेल ,खून ,के बाद क्त्ल्खानों मे पशुओ कि हड्डीया निकलती है ! और इसका प्रयोग toothpaste बनाने वाली कंपनिया करती है colgate,close up,pepsodent cibaca,आदि आदि ! सबसे पहले जानवरो कि हड्डियों को इकठा किया जाता है ! उसे सुखाया जाता है फिर एक मशीन आती है bone crasher ! इसमे इसको डालकर इसका पाउडर बनाया जाता है और कंपनियो को बेचा जाता है !shiving cream बनाने वाली काफी कंपनिया भी इसका प्रयोग करती हैं !

और आजकल इन हड्डियों का प्रयोग जो होने लगा है टेल्कम powder बनाने मे ! नहाने के बाद लोग लागाते हैं उसमे इसका प्रयोग होता है ! क्यूंकि ये थोड़ा सस्ता पड़ता है ! वैसे टेल्कम powder पथर से बनता है! और 60 से 70 रुपए किलो मिलता है और गाय की हड्डियों का powder 25 से 30 रुपए मिल जाता है !! इस लिए कंपनिया हड्डियों का प्रयोग करती हैं !

इसके बाद गाय ऊपर की जो चमड़ी है उसका सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है cricket के ball बनाने मे ! लाल रंग की ball होती है आज कल सफ़ेद रंग मे भी आती है ! जो गाय की चमड़ी से बनाई जाती है !गाय के बछड़े की चमड़ी का प्रयोग ज्यादा होता है ball बनाने मे ! दूसरी एक ball होती है foot ball ! cricket ball तो छोटी होती है ! पर foot ball बड़ी होती है इसमे और ज्यादा प्रयोग होता है गाय के चमड़े का !!

आजकल और एक उद्योग मे इस चमड़े का बहुत प्रयोग हो रहा है !जूते चप्पल बनाने मे ! अगर आप बाजार से कोई ऐसा जूता चप्पल खरीदते है ! जो चमड़े का है और बहुत ही soft है तो वो 100 % गाय के बछड़े के चमड़े का बना है ! और अगर hard है तो ऊंट और घोड़े के चमड़े का ! इसके इलवा चमड़े के प्रयोग पर्स ,बेल्ट जो बांधते है ! इसके इलवा आजकल सजावट के समान ने इन का प्रयोग किया जाता है !!
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तो गाय और गाय जैसे जानवरो आदि का कत्ल होता है ! तो 5 वस्तुए निकलती है !!

1) मांस निकला ------जो मांसाहारी लोग खाते है !

2)चर्बी का तेल ----जो cosmatic बनाने मे प्रयोग हुआ !

3) खून निकाला ------ जो अँग्रेजी एलोपेथी दवाइया ,चाय बनाने मे ! nailpolish lipstick मे !

4)हडडिया निकली ------ इसका प्रयोग toothpaste, tooth powder,shiving cream मे !aur टेलकम powder

5) चमड़ा निकला !------ इसका प्रयोग cricket ball,foot ball जूते, चप्पल, बैग ,belt आदि !

जैसा ऊपर बताया 35000 क्तलखाने है और 4 करोड़ गाय ,भैंस ,बछड़ा ,बकरी ,ऊंट आदि काटे जाते है !
तो इनसे जितना मांस उतपन होता है वो बिकता है ! चर्बी का तेल बिकता है !खून बिकता है हडडिया और चमड़ा बिकता है !!
तो निकलने वाली इन पाँच वस्तुओ का भरपूर प्रयोग है और एक बहुत बड़ा बाजार है इस देश मे!!
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इसके इलवा गाय के शरीर के अंदर के कुछ भाग है ! उनका भी बहुत प्रयोग होता है !जैसे गाय मे बड़ी आंत होती है !! जैसे हमारे शरीर मे होती है ! ऐसे गाय के शरीर मे होती है ! तो जब गाय के काटा जाता है ! तो बड़ी आंत अलग से निकली जाती है ! और इसको पीस कर gelatin बनाई जाती है !जिसका बहुत जादा प्रयोग आइसक्रीम, चोकोलेट,आदि
इसके इलवा Maggi . Pizza , Burger , Hotdog , Chawmin के base matirial बनाने मे भरपूर होता है | और एक jelly आती red orange color की उसमे gelatin का बहुत प्रयोग होता है ! chewgum तो gelatin की बिना बन ही नहीं सकती !!gelatin बनाने के google पर आप काफी link देख सकते है !!maggi ,i चाकलेट वाली कंपनिया सबसे ज्यादा धोखा दे रही हैं !
आजकल जिलेटिन का उपियोग साबूदाना में होने लगा है | जो हम उपवास मे खाते है !
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तो ये सब वस्तुओ जो जानवरो के कत्ल के बाद बनाई जाती है ! और हम जाने अनजाने मे इन का प्रयोग अपने जीवन मे कर रहे है ! और कुछ लोग अपने आप को 100 टका हिन्दू कहते है ! शाकाहारी कहते है !और कहीं न कहीं इस मांस का प्रयोग कर रहे है ! और अपना धर्म भ्रष्ट कर रहे है !

तो आप इन सबसे बचे ! और अपना धर्म भ्रष्ट होने से बचाये !एक बात हमेशा yaad रखे टीवी पर देखाये जाने वाले विज्ञापन (ads) को देख अपने घर मे कोई वस्तु न लाये ! इनमे ही सबसे बड़ा धोखा है !
जैसे चाकलेट का विगयापन आता है केडबरी nestle आदि !! coke pepsi का आता है ! fair and lovely आदि क्रीमे ! colgate closeup pepsodent आदि आदि toothpaste !!

तो आप अपने दिमाग से काम ले इन सब चीजों से बचे !! क्यूंकि विज्ञापन उनी वस्तुओ का दिखाया जाता है जिनमे कोई क्वाल्टी नहीं होती !! देशी गाय का घी बिना विज्ञापन के बिकता है नीम का दातुन बिना विज्ञापन के बिकता है गन्ने का रस बिना विज्ञापन के बिकता है !!

विज्ञापन का सिद्धांत है गंजे आदमी को भी कघा बेच दो !! एक ही बात को बार-बार,बार-बार दिखाकर आपका brain wash करना !! ताकि आप सुन सुन कर एक दिन उसे अपने घर मे उठा लाये !!

आपने पूरी post पढ़ी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !!
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और हमे अब इस देश मे ऐसी सरकार लानी है जो पहला काम यही करे कि अंग्रेज़ो के समय से चल रहे ये सारे क्त्लखानों को बंद करने का बिल संसद मे लाये और इसे पास करे !!

आपके मन मे जानवरो के प्रति थोड़ा भी दया का भाव तो इस link पर click कर देखे !!
http://www.youtube.com/watch?v=tgQuXz5kVHc&feature=plcp


वन्देमातरम

जय गौ माता !!


गन्ना (SUGARCANE )




इसे ईख या साठा भी कहते हैं !

सुश्रुत संहिता के अनुसार गन्ने को दाँतों से चबाकर उसका रस चूसने पर वह दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं। अतः गन्ना चूस कर खाना चाहिए।

भावप्रकाश निघण्टु के अनुसार गन्ना रक्तपित्त नामक व्याधि को नष्ट करने वाला, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, कफकारक, पाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, भारी, मूत्रवर्धक व शीतल होता है। ये सब पके हुए गन्ने के गुण हैं।

पथरी
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ईख चूसते रहने से पथरी टुकड़े -टुकड़े हो कर निकल जाती है ! गन्ने का रस भी लाभदायक है !
रक्त विकार
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खाने के बाद एक गिलास गन्ने का रस पीने से रक्त साफ होता है ! गन्ना नेत्रों के लिए भी हितकर है !
पीलिया
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जौ का सत्तू खाकर ऊपर से गन्ने का रस पियें ! एक सप्ताह में पीलिया ठीक हो जायेगा !

हिचकी
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गन्ने का रस पीने से हिचकी बंद हो जाती है !

शक्तिवर्धक
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ईख भोजन पचाता है ! शक्तिदाता है ! पेट की गर्मी , हृदय की जलन को दूर करता है !!!!!

विशेषः यकृत की कमजोरी वाले, हिचकी, रक्तविकार, नेत्ररोग, पीलिया, पित्तप्रकोप व जलीय अंश की कमी के रोगी को गन्ना चूसकर ही सेवन करना चाहिए। इसके नियमित सेवन से शरीर का दुबलापन दूर होता है और पेट की गर्मी व हृदय की जलन दूर होती है। शरीर में थकावट दूर होकर तरावट आती है। पेशाब की रुकावट व जलन भी दूर होती है।

सावधानीः मधुमेह, पाचनशक्ति की मंदता, कफ व कृमि के रोगवालों को गन्ने के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। कमजोर मसूढ़ेवाले, पायरिया व दाँतों के रोगियों को गन्ना चूसकर सेवन नहीं करना चाहिए। एक मुख्य बात यह है कि बाजारू मशीनों द्वारा निकाले गये रस से संक्रामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस निकलवाते समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।


20 October 2012

बैंगन को ना समझे बिना गुण वाला इसे खाने के ये हैं बड़े फायदे


बैंगन एक बहुत ही पौष्टिक सब्जी है लेकिन कुछ लोग इसे बिना गुण वाली सब्जी मानते हैं। अगर आप भी उन्हीं लोगों में से एक है और बैंगन की सब्जी नहीं खाते हैं तो आज हम आपको अवगत करवाते हैं बैंगन के ऐसे गुणों से जिन्हें जानने के बाद आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी। वैसे बैंगन के रंग का प्रभाव भी उसके गुणों पर पड़ता है। विटामिन 'सी' की उपस्थिति बैंगन के छिलके के रंग पर निर्भर करती है। गहरे रंग के छिलके वाले बैंगन में अधिक विटामिन 'सी' रहता है जबकि हल्के रंग के छिलके वाले बैंगन में विटामिन 'सी'की मात्रा कम रहती है। वसा, प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट्स ये तीनों ही पोषक तत्व बैंगन में कम पाए जाते हैं।

100 ग्राम बैंगन में नीचे लिखे पोषक तत्व पाए जाते हैं 

प्रोटीन - 1.4 ग्राम वसा- 0.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स -4.0ग्राम कैल्शियम - 18 ग्राम फस्फोरस - 47 (मि. ग्राम) लौह तत्व - 0.38(मि.ग्राम) विटामिन सी - 12(मि.ग्राम) पोटेशियम - 20(मि.ग्राम) -मैग्नीशियम - 16(मि.ग्राम)

रूखी त्वचा के लिए बैंगन- बैंगन स्किन को मॉइश्चर प्रदान करता है। इसीलिए अगर आपकी स्किन ड्राय या बाल ड्राय हो तो बैंगन जरूर खाएं।

कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है- बैंगन के सेवन से रक्त में बैंगन के सेवन से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर गिरता है। इस तरह के प्रभाव का प्रमुख कारण है। बैंगन में पोटेशियम व मैंगनीशियम की अधिकता। बैंगन की पत्तियों के रस का सेवन करने से भी रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम किया जा सकता है।

हाईब्लडप्रेशर के रोगियों के लिए- उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिये यही कारण है कि बैंगन उपयोगी माना जाता है।

दांत के दर्द में- बैंगन का रस दांत के दर्द में लाभदायक प्रभाव दिखलाता है। बैंगन की पुल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं। अस्थमा के उपचार के लिये बैंगन की जड़ें प्रयुक्त की जाती हैं।

दिल की बीमारियों में- इससे रक्त संचार सही रहता है। इसी कारण यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है और बैंगन का सेवन करने वालों को दिल की बीमारियों से बचाता है।

कब्ज से राहत- बैंगन में फाइबर अधिक मात्रा में पाए जाते हैं इसीलिए इसे सेवन करने वालों को कब्ज नहीं होती है।


सेंधा नमक


= नमक हमारे शरीर के लिये बहुत जरूरी है। इसके बावजूद हम सब घटिया किस्म का नमक खाते है। यह शायद आश्चर्यजनक लगे , पर यह एक हकीकत है ।

= नमक विशेषज्ञ एन के भारद्वाज का कहना है कि भारत मे अधिकांश लोग समुद्र से बना नमक खाते है । श्रेष्ठ प्रकार का नमक सेंधा नमक है, जो पहाडी नमक है ।

= प्रख्यात वैद्य मुकेश पानेरी कहते है कि आयुर्वेद की बहुत सी दवाईयों मे सेंधा नमक का उपयोग होता है।आम तौर से उपयोग मे लाये जाने वाले समुद्री नमक से उच्च रक्तचाप का भय रहता है । इसके विपरीत सेंधा नमक के उपयोग से रक्तचाप पर नियन्त्रण रहता है । इसकी शुध्धता के कारण ही इसका उपयोग व्रत के भोजन मे होता है ।

= सेंधा नमक की सबसे बडी समस्या है कि भारत मे यह काफ़ी कम मात्रा मे होता है , और वह भी शुद्ध नही होता है। भारत मे ८० प्रतिशत नमक समुद्री है, १५ प्रतिशत जमीनी और केवल पांच प्रतिशत पहाडी यानि कि सेंधा नमक । सबसे अधिक सेंधा नमक पाकिस्तान की मुल्तान की पहडियों मे है।

= ऐतिहासिक रूप से पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को 'सेंधा नमक' या 'सैन्धव नमक' कहा जाता है जिसका मतलब है 'सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ'। अक्सर यह नमक इसी खान से आया करता था। सेंधे नमक को 'लाहौरी नमक' भी कहा जाता है क्योंकि यह व्यापारिक रूप से अक्सर लाहौर से होता हुआ पूरे उत्तर भारत में बेचा जाता था।

= समुद्री और सेंधा नमक के दाम मे इतना अधिक अंतर है जिसके कारण लोग समुद्री नमक खरीद्ते हैं । समुद्री नमक जहां नौ रु किलो है तो सेंधा नमक का दाम रु ४० प्रति किलो है । सेंधा नमक समुद्री नमक से कम नमकीन होता है । साफ़ है कि इसका अधिक उपयोग करना पडता है ।और इसीलिये लाख उपयोगी होने के बावजूद लोग इसकी जगह समुद्री नमक से ही चला लेते है । पर अगर उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियाँ हुई तो इसके इलाज में जो हज़ारो रुपये खर्च होंगे ; इसकी तुलना में दाम का ये फर्क कुछ भी नहीं ।

= सिर्फ आयोडीन के चक्कर में ज्यादा नमक खाना समझदारी नहीं है, क्योंकि आयोडीन हमें आलू, अरवी के साथ-साथ हरी सब्जियों से भी मिल जाता है।

= यह सफ़ेद और लाल रंग मे पाया जाता है । सफ़ेद रंग वाला नमक उत्तम होता है।

= यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मददरूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़्ते हैं।

= रक्त विकार आदि के रोग जिसमे नमक खाने को मना हो उसमे भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

= यह पित्त नाशक और आंखों के लिये हितकारी है ।

= दस्त, कृमिजन्य रोगो और रह्युमेटिज्म मे काफ़ी उपयोगी होता है ।
सेंधा नमक के विशिष्ठ योग

= हिंगाष्ठक चूर्ण, लवण भास्कर और शंखवटी इसके कुछ विशिष्ठ योग हैं

= नमक आवश्यक है पर उसे कम से कम मात्रा में खाना चाहिए ।


19 October 2012

कावेरी - ‘दक्षिण की गंगा’


पवित्र नदी कावेरी को दक्षिण भारत में वही स्थान प्राप्त है जो उत्तर भारत में गंगा को। उद्गम स्थान से लेकर समुद्र में गिरने के स्थान तक कावेरी के तट पर दर्जनों बड़े-बड़े नगर और उपनगर बसे हैं। बीसियों तीर्थ-स्थान हैं
 

अनगिनत प्राचीन मन्दिर हैं। कावेरी के पवित्र जल ने कितने ही संतों, कवियों, राजाओं, दानियों और प्रतापी वीरों को जन्म दिया है। इसी कारण कावेरी को ‘माता’ और ‘दक्षिण की गंगा’ कहा जाता है।

भारत में स्थित 'पश्चिमी घाट' पर्वतमाला के उत्तरी भाग में एक सुन्दर क्षेत्र है, कुर्ग। यह कर्नाटक राज्य में है। कुर्ग के ‘ब्रह्मगिरी’ (सह्या) पर्वत पर 'तालकावेरी' नामक तालाब है। यही तालाब कावेरी नदी का उदगम-स्थान है। पहाड़ के भीतर से फूट निकलने वाली यह सरिता पहले इस तालाब में गिरती है, फिर एक झरने के रुप में बाहर निकलती है। 

इस तालाब के पश्चिमी तट पर एक मन्दिर है। मन्दिर के भीतर एक तरुणी की सुन्दर मूर्ति स्थापित है जिसके सामने एक दीप लगातार जलता रहता है। देवी कावेरी की मूर्ति की यहां पर नित्य पूजा होती है। 


यहीं पर अगस्त्य ऋषि और गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है।
कावेरी के जन्म के बारे में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार अगस्त्य ऋषि कावेरी को कैलाश पर्वत से लेकर आये थे। कथा इस प्रकार है- एक बार भयंकर सूखा पड़ा जिससे दक्षिण भारत में स्थिति बहुत ख़राब हो गयी। यह देखकर अगस्त्य ऋषि बहुत दुखी हुए और मानव जाति को बचाने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा की अगर वे कैलाश पर्वत से बर्फीला पानी लेकर जाएँ तो दक्षिण में नदी का उद्गम कर सकतें हैं। 

अगस्त्य ऋषि कैलाश पर्वत पर गए, वहां से बर्फीला पानी अपने कमंडल में लिया और दक्षिण दिशा की और लौट चले। वें नदी के उद्गम स्थान की खोज करते हुए कुर्ग पहुंचे। उचित उद्गम स्थान की खोज करते-करते ऋषि थक गए और अपना कमंडल भूमि पर रखकर विश्राम करने लगे। तभी वहां पर एक कौवा उड़ते हुए आया और कमंडल पर बैठने लगा। कौवे के बैठते ही कमंडल उलट गया और उसका पानी भूमि पर गिर गया। जब ऋषि ने यह देखा तो उन्हें बहुत क्रोध आया। लेकिन तभी वहां गणेश जी प्रकट हुए और उन्होंने ऋषि से कहा कि मैं ही कौवे का रूप धारण करके आपकी मदद के लिए आया था। कावेरी के उद्गम के लिए यही स्थान उचित है। यह सुनकर ऋषि प्रसन्न हुए और भगवान गणेश अंतर्ध्यान हो गए।

कावेरी के उदगम-स्थान पर हर साल तुला सक्रांति (17 अक्टूबर) के दिन उत्सव मनाया जाता है। उस दिन कावेरी की मूर्ति की विशेष पूजा होती है। ‘तालकावेरी’ में सब लोग स्नान करते हैं। इस दिन माता कावेरी लोगों को दर्शन देती हैं और वहां स्थित झरने का स्तर स्वतः ही ऊपर उठ जाता है। कावेरी कर्नाटक में कुर्ग से निकलकर दक्षिण पूर्व की ओर बहती है और तमिलनाडु के एक विशाल प्रदेश को हरा-भरा बनाकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। कुर्ग की पहाड़ियों से लेकर समुद्र तक कावेरी की लंबाई 772 कि.मी. है।

कर्नाटक में सिंचाई के लिए कावेरी पर बने हुए बांधों में सबसे बड़ा कण्णम्बाड़ी का बांध है। इस बांध के कारण जो विशाल जलाशय बना है, उसी को ‘कृष्णराज सागर’ कहते हैं। यह मैसूर नगर से थोड़ी ही दूरी पर बना है। इसी जलाशय के पास वृन्दावन नाम का एक विशाल उपवन भी है। इस उपवन की सुन्दरता और रात के समय वहां जगमगानेवाली रंग-बिरंगी बिजली की बत्तियां आदि को देखकर भ्रम होता है कि हम कहीं इन्द्रपुरी में तो नहीं आ गये हैं। इस सारे सौंदर्य और जगमगाहट का आधार कावेरी का पवित्र जल ही है।

मैसूर नगर से करीब 55 कि.मी. उत्तर-पूर्व में शिवसमुद्रम नामक प्राचीन स्थान है। यहां पर कावेरी का जल एक विशाल झील की तरह दिखाई देता है। इसी झील से थोड़ी दूर आगे माता कावेरी तीन सौ अस्सी फुट की ऊंचाई से जल-प्रपात के रुप में गिरती है। शिवसमुद्रम की इसी स्वाभाविक झील से नहरों द्वारा कावेरी का जल 3 कि.मी. दूर तक ले जाया गया है जहां पर बिजलीघर बनाया गया है।

कर्नाटक से विदा होकर कावेरी शेलम और कोयम्बुत्तूर जिलों की सीमा पर तमिलनाडु में प्रवेश करती है। इसी सीमाप्रदेश में ‘होगेनगल’ नाम का विख्यात जल-प्रपात है। यहां पर कावेरी इतने प्रचंड वेग से चट्टानों पर गिरती है कि उससे छितरानेवाले छींटे धुएं की तरह आकाश में फैल जाते हैं। धुंए का यह बादल कई मील दूर तक दिखाई देता है। इसी कारण कन्नड़ भाषा में इस जल-प्रपात को होगेनगल कहा जाता है, जिसका अर्थ है- धुएं का प्रपात। होगेनगल जल-प्रपात के पास एक गहरा जलाशय स्वाभाविक रुप से बना है। इसको ‘यागकुंडम’ यानी ‘यज्ञ की वेदी’ कहते हैं।

यहां तक कावेरी पहाड़ी इलाकों में बहती रही। अब वह समतल मैदान में बहने लगती है। शेलम और कोयम्बुत्तूर जिलों की सीमा पर वह दो पहाड़ों के बीच में बहती है। इन्हीं दो पहाड़ों के बीच एक विशाल बांध बना है, जो ‘मेटटूर बांध’ के नाम से प्रसिद्ध है। कावेरी नदी पर बने अनेक बंधों में मेटटूर का बांध सबसे बड़ा है। बांध के बीच में बिजलीघर है। इससे पैदा की जानेवाली बिजली से दूर-दूर तक के शहर और गांव लाभ उठाते हैं। मेटटूर के जलाशय से निकाली गयी छोटी बड़ी नहरें तिरुचि और तंजाऊर जिलों के खेतों को सींचती हैं।

कर्नाटक और तमिलनाडु की सुख-समृद्धि को बढ़ाने वाली माता कावेरी ने सैकड़ो साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते देखा है। कर्नाटक में 'गंग' और 'होयसला' इसी नदी के बल पर पनपे और फूले-फले थे। उनकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम कावेरी के तट पर ही बसी थी। 15 वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना और विस्तार इस नदी ने देखा। इसी कावेरी के तट पर टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की थी।

तमिलभाषी प्रदेश में कावेरी ने ऐसे प्रातापी वीर और संत देखे हैं, जिन्होंने देश का मस्तक ऊंचा किया था। इसी कावेरी के तट पर 'चोल' साम्राज्य बना और फैला। चोल-राजा करिकालन के समय समुद्रतट पर कावेरी के संगम-स्थल पर 'पुहार' नामक विशाल बंदरगाह बना। वहां से रोम, यूनान, चीन और अरब को तिजारती जहाज जाते-आते थे। तमिल के प्राचीन ग्रन्थों में पुहार नगर का वर्णन पढ़कर गर्व से माथा ऊंचा हो जाता है। यूनान के इतिहास में भी इस नगर का वर्णन मिलता है। यूनानी लोग इस नगर को ‘कबेरस’ कहते थे। कबेरस कावेरी शब्द से बना है।

ईसा की नवीं सदी में राजराजन नाम का एक प्रतापी राजा इसी कावेरी के प्रदेश में हुआ। उसने श्री लंका पर विजय पाई और बर्मा, मलाया, जावा और सुमात्रा को भी अपने अधीन कर लिया। इन देशों में राजराजन के समय में बने कितने ही मन्दिर आजतक विद्यमान हैं। राजराजन के पास एक विशाल नौसेना थी। तंजावूर में राजराजन ने शिवजी का जो सुन्दर मन्दिर बनवाया था, उसकी शिल्पकला को देखकर विदेशी भी दांतों तले उंगली दबाते हैं। इस राजराजन की एक उपाधि है’ पोन्निविन शेलवन’ जिसका अर्थ है ‘सुनहरी कावेरी का लाडला बेटा।’

कावेरी के पुण्य-जल ने धर्म-वृक्ष को भी सींचा, और आज भी सींच रहा है। कावेरी के तीन दोआबों में भगवान विष्णु के तीन प्रसिद्ध मन्दिर बने हैं। तीनों में अनंतनाग पर शयन करने वाले भगवान विष्णु की मूर्ति बनी है, इस कारण इनको श्रीरंगम कहा जाता है। इनमें कर्नाटक की प्राचीन राजधानी श्रीरंगपट्रणम ‘आदिरंगम’ कहलाता है। शिवसमुद्रम के दोआब पर मध्यरंगम नाम का दूसरा मन्दिर है और तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नामक नगर के पास तीसरा मन्दिर है। यही तीसरा मंदिर श्रीरंगम के नाम से विख्यात है, और इसी को वैष्णव लोग सबसे अधिक महत्व का मानते हैं।

इसी प्रकार कावेरी के तट पर शैव धर्म के भी कितने ही तीर्थ हैं। चिदम्बरम का मन्दिर कावेरी की ही देन है। श्रीरंगम के पास बना हुआ जंबुकेश्वरम का प्राचीन मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है। तिरुवैयारु, कुंभकोणम, तंजावूर शीरकाल आदि और भी अनेक स्थानो पर शिवजी के मन्दिर कावेरी के तट पर बने हैं। कावेरी नदी के तट पर बसा हुआ कुंभकोणम् नगर दक्षिण भारत का प्रमुख पावन तीर्थ है। यहां प्रति बारहवें वर्ष कुम्भ का मेला लगता है। तिरुचिरापल्ली शहर के बीच में एक ऊंचे टीले पर बना हुआ मातृभूतेश्वर का मन्दिर और उसके चारों ओर का किला विख्यात है।

एक जमाने में तिरुचिरापल्ली जैन धर्म का भी केंन्द्र माना जाता था। शैव और वैष्णव संप्रदाय के कितने ही आचार्य और संत कवि कावेरी के तट पर हुए हैं। विख्यात वैष्णव आचार्य श्री रामानुज को आश्रय देनेवाला श्रीरंगपट्रणम का राजा विष्णुवर्द्धन था। तिरुमंगै आलवार और कुछ अन्य वैष्णव संतों को कावेरी-तीर ने ही जन्म दिया था। सोलह वर्ष की आयु में शैव धर्म का देश-भर में प्रचार करनेवाले संत कवि ज्ञानसंबंधर कावेरी-तट पर ही हुए थे।

महाकवि कंबन ने तमिल भाषा में अपनी विख्यात रामायण की रचना इसी कावेरी के तट पर की थी। तमिल भाषा के कितने ही विख्यात कवियों को माता कावेरी ने पैदा किया है। दक्षिण संगीत को नये प्राण देनेवाले संत त्यागराज, श्यामा शास्त्री और मुत्तय्य दीक्षित इसी कावेरी तट के निवासी थे। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दक्षीण की संस्कृति कावेरी माता की देन है।


पेठे के गुण



* पेठा या कुम्हडा व्रत में भी लिया जा सकता है .

* आयुर्वेद ग्रंथों में पेठे को बहुत उपयोगी माना गया है। यह पुष्टिकारक, वीर्यवर्ध्दक, भारी, रक्तदोष तथा वात-पित्त को नष्ट करने वाला है।

* कच्चा पेठा पित्त को समाप्त करता है लेकिन जो पेठा अधिक कच्चा भी न हो और अधिक पका भी न हो, वह कफ पैदा करता है किन्तु पका हुआ पेठा बहुत ठंडा, ग्राही, स्वाद खारी, अग्नि बढ़ाने वाला, हल्का, मूत्राशय को शुध्द करने वाला तथा शरीर के सारे दोष दूर करता है।

* यह मानसिक रोगों में जैसे मिरगी, पागलपन आदि में तो बहुत लाभ पहुंचाता है। मानसिक कमजोरी-मानसिक विकारों में विशेषकर याद्दाश्त की कमजोरी में पेठा बहुत उपयोगी रहता है। ऐसे रोगी को 10-20 ग्राम गूदा खाना चाहिए अथवा पेठे का रस पीना चाहिए।

* शरीर में जलन-पेठे के गूदे तथा पत्तों की लुगदी बनाकर लेप करें। साथ-साथ बीजों को पीसकर ठंडाई बनाकर प्रयोग करें। इससे बहुत लाभ होगा।

* नकसीर फूटना- पेठे का रस पीएं या गूदा खाएं। सिर पर इसके बीजों का तेल लगाएं। बहुत लाभ होगा।

* दमा रोग – दमे के रोगियों को पेठा अवश्य खिलाएं। इससे फेफड़ों को शांति मिलती है। खांसी तथा बुखार- पेठा खाने से खांसी तथा बुखार रोग भी ठीक होते हैं।

* पेशाब के रोग- पेठे का गूदा तथा बीज मूत्र विकारों में बहुत उपयोगी है। यदि मूत्र रूक-रूककर आता हो अथवा पथरी बन गई हो तो पेठा तथा उसके बीज दोनों का प्रयोग करें। लाभ होगा।

* वीर्य कि कमी- इस रोग में पेठे का सेवन अति उपयोगी है।

* कब्ज तथा बवासीर-पेठे के सेवन से कब्ज दूर होती है। इसी कारण बवासीर के रोगियों के लिए यह बहुत लाभकारी है। इससे बवासीर में रक्त निकलना भी बंद हो जाता है। भूख न लगना- जिन लोगों की आंतों में सूजन आ गई है, भूख नहीं लगती, वे सुबह दो कप पेठे का रस पीएं। भूख लगने लगेगी और आंतों की सूजन भी ठीक हो जाएगी।

* खाली पेट पेठा खाने से शारीर में लचीलापन और स्फूर्ति बनी रहती है .


कोका कोला - पेप्सी आदि कोल्ड ड्रिंक का सच



एक पेय पदार्थ है जिसको हम कोल्ड ड्रिंक के नाम से जानते हैं, इस क्षेत्र में अमेरिका की दो कंपनियों का एकाधिकार है, एक का नाम है पेप्सी और दूसरी है कोका कोला। 1990 -91 में दोनों कंपनियों का संयुक्त रूप से जो विदेशी पूंजी निवेश था भारत में, उसे सुनकर आश्चर्य करेंगे आप, दोनों ने मिलकर लगभग 10 करोड़ की पूंजी लगाई थी भारत में, कुल जमा 10 करोड़ रुपया (डौलर नहीं)। 

आप हैरान हो जायेंगे ये जानकर कि 70 पैसे का जो ये लागत है इनका वो एक्साइज ड्यूटी देने के बाद की है, यानि एक्स-फैक्ट्री कीमत है ये | अगर एक बोतल 10 रुपया में बिक रहा है तो लगभग 1500% का लाभ ये कंपनी एक बोतल पर कमा रही है 1500% का आम भाषा मे अर्थ है 1 रूपये की चीज़ को 1500 रुपये मे बेचना !

भारत के कई वैज्ञानिकों ने पेप्सी और कोका कोला पर रिसर्च करके बताया कि इसमें मिलाते क्या हैं | पेप्सी और कोका कोला वालों से पूछिये तो वो बताते नहीं हैं, कहते हैं कि ये फॉर्मूला टॉप सेक्रेट है, ये बताया नहीं जा सकता | लेकिन आज के युग में कोई भी सेक्रेट को सेक्रेट बना के नहीं रखा जा सकता | तो उन्होंने अध्ययन कर के बताया कि इसमें मिलाते क्या हैं, तो वैज्ञानिको का कहना है इसमे कुल 21 तरह के जहरीले कैमिकल मिलाये जाते हैं !

कुछ नाम बताता हूँ !इसमें पहला जहर जो मिला होता है - सोडियम मोनो ग्लूटामेट, और वैज्ञानिक कहते हैं कि ये कैंसर करने वाला रसायन है, फिर दूसरा जहर है - पोटैसियम सोरबेट - ये भी कैंसर करने वाला है, तीसरा जहर है - ब्रोमिनेटेड वेजिटेबल ऑइल (BVO) - ये भी कैंसर करता है | चौथा जहर है - मिथाइल बेन्जीन - ये किडनी को ख़राब करता है, पाँचवा जहर है - सोडियम बेन्जोईट - ये मूत्र नली का, लीवर का कैंसर करता है, फिर इसमें सबसे ख़राब जहर है - एंडोसल्फान - ये कीड़े मारने के लिए खेतों में डाला जाता है और ऊपर से होता है ऐसे करते करते इस में कुल 21 तरह के जहर मिलये जाते हैं !

ये 21 तरह के जहर तो एक तरफ है और हमारे देश के पढ़े लिखे लोगो के दिमाग का हाल देखिये -बचपन से उन्हे किताबों मे पढ़ाया जाता है ! की मनुष्य को प्राण वायु आक्सीजन अंदर लेनी चाहिए और कार्बन डाईऑक्साइड बाहर निकलनी चाहिए ये जानने के बावजूद भी गट गट कर उसे पे रहे हैं !और पीते ही एक दम नाक मे जलन होती और वो सीधा दिमाग तक जाती है !और फिर दूसरा घूट भरते है गट गट गट !
और हमारा दिमाग इतना गुलाम हो गया है ! 

आज हम किसी बिना coke pepsi के जहर के किसी भी शादी विवाह पार्टी के बारे मे सोचते भी नही !कार्बन डाईऑक्साइड - जो कि बहुत जहरीली गैस है और जिसको कभी भी शरीर के अन्दर नहीं ले जाना चाहिए और इसीलिए इन कोल्ड ड्रिंक्स को "कार्बोनेटेड वाटर" कहा जाता है | और इन्ही जहरों से भरे पेय का प्रचार भारत के क्रिकेटर और अभिनेता/अभिनेत्री करते हैं पैसे के लालच में, उन्हें देश और देशवाशियों से प्यार होता तो ऐसा कभी नहीं करते |


पहले अमीर खान ये जहर बिकवाता था अब उसका भांजा बिकवाता है ! अमिताभ बच्चन,शरूखान ,रितिक रोशन लगभग सबने इस कंपनी का जहर भारत मे बिकवाया है !क्यूंकि इनके लिए देश से बड़ा पैसा है !


पूरी क्रिकेट टीम इस दोनों कंपनियो ने खरीद रखी है ! और हमारी क्रिकेट टीम की कप्तान धोनी जब नय नय आये थे! तब मीडिया मे ऐसे खबरे आती थी ! जो 2 लीटर दूध पीते हैं धोनी ! ये दूध पीकर धोनी बनने वाला धोनी आज पूरे भारत को पेप्सी का जहर बेच रहा है ! और एक बात ध्यान दे जब भी क्रिकेट मैच की दौरान water break होती है तब इनमे से कोई खिलाड़ी pepsi coke क्यूँ नहीं पीता ??? ?? क्यूँ कि ये सब जानते है ये जहर है ! इन्हे बस ये देश वासियो को पिलाना है !

ज्यादातर लोगों से पूछिये कि "आप ये सब क्यों पीते हैं ?" तो कहते हैं कि "ये बहुत अच्छी क्वालिटी का है" | अब पूछिये कि "अच्छी क्वालिटी का क्यों है" तो कहते हैं कि "अमेरिका का है" | और ये उत्तर पढ़े-लिखे लोगों के होते हैं |


पेप्सी-कोक के बारे में आपको एक और जानकारी देता हूँ - स्वामी रामदेव जी इसे टॉयलेट क्लीनर कहते हैं, आपने सुना होगा (ठंडा मतलब टाइलेट कालीनर )तो वो कोई इसको मजाक में नहीं कहते या उपहास में नहीं कहते हैं,देश के पढ़े लिखे मूर्ख लोग समझते है कि ये बात किसी ने ऐसे ही बना दी है !


इसके पीछे तथ्य है, ध्यान से पढ़े !तथ्य ये कि टॉयलेट क्लीनर harpic और पेप्सी-कोक की Ph value एक ही है | मैं आपको सरल भाषा में समझाने का प्रयास करता हूँ | Ph एक इकाई होती है जो acid की मात्रा बताने का काम करती है !और उसे मापने के लिए Ph मीटर होता है | शुद्ध पानी का Ph सामान्यतः 7 होता है ! और (7 Ph) को सारी दुनिया में सामान्य माना जाता है, और जब पानी में आप हाईड्रोक्लोरिक एसिड या सल्फ्यूरिक एसिड या फिर नाइट्रिक एसिड या कोई भी एसिड मिलायेंगे तो Ph का वैल्यू 6 हो जायेगा, और ज्यादा एसिड मिलायेंगे तो ये मात्रा 5 हो जाएगी, और ज्यादा मिलायेंगे तो ये मात्रा 4 हो जाएगी, ऐसे ही करते-करते जितना acid आप मिलाते जाएंगे ये मात्रा कम होती जाती है | जब पेप्सी-कोक के एसिड का जाँच किया गया तो पता चला कि वो 2.4 है और जो टॉयलेट क्लीनर होता है उसका Ph और पेप्सी-कोक का Ph एक ही है, 2.4 का मतलब इतना ख़राब जहर कि आप टॉयलेट में डालेंगे तो ये झकाझक सफ़ेद हो जायेगा | इस्तेमाल कर के देखिएगा |

और हम लोगो का हाल ये है ! घर मे मेहमान को आती ये जहर उसके आगे करते है ! दोस्तो हमारी महान भारतीय संस्कृति मे कहा गया है ! अतिथि देवो भव ! मेहमान भगवान का रूप है ! और आप उसे टॉइलेट साफ पीला रहे हैं !!

* पेप्सी कोला बनाने में चीनी के स्थान पर Aspertem का प्रयोग किया जाता है जिससे मूत्रनली का कैंसर होता हैं। लगातार पेप्सी- कोला का सेवन करने से हड्डियों में Osteoporosis, Osteopenia नामक बीमारियाँ होती हैं जिसमे हड्डियाँ बहुत कमजोर हो जाती हैं।

इन सबके बावजूद हमारी सरकार इनपर कोई प्रतिबंध नहीं लगा रही है और इनकी बिक्री धड़ल्ले से हो रही है। साथ ही हमारे क्रिकेटर और अभिनेता, अभिनेत्री इनके विज्ञापन कर कर के बिक्री में इजाफा करवा रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इस जागरूकता के लिए एक नेता बन जाना चाहिए। केवल यह हमारे देश को गंभीर आर्थिक संकट से बचाने का सबसे अच्छा तरीका है। आपको अपनी जीवन शैली देने की जरूरत नहीं है।
टायलेट साफ़ करने वाला हार्पिक और कोक पेप्सी में कैसे बराबर का जहर है...... राजीव भाई कहते है ...अगर स्कूल कालेज के विद्यार्थी न माने तो उनके सामने उनकी सामने स्कूल कालेज कि टायलेट साफ़ करवाकर दिखला दो ....एक मिनट में मान जाएँगे ....!


राजीव जी ने एक बात बताई आप भी पढिए::


एक प्रतियोगिता मुंबई विश्वविद्यालय मे आयोजित की गयी जिसमे यह शर्त रखी गयी की जो सबसे ज्यादा पेप्सी या कोका कोला पिएगा वो जीत जाएगा तो एक लड़के ने 8 बोतल पी और उसकी किडनी एक महीने के अंदर खराब हो गयी और एक लड़के ने सबसे ज्यादा 12 बोतल पी और वो तुरंत मर गया उस लड़के की मौत का कारण था की ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उसके रक्त में मिल गयी थी जो की बहुत ही खतरनाक है जबकि रक्त में ऑक्सिजन ही रहना चाहिए।
तब से मुंबई विश्वविद्यालय में पेप्सी और कोका कोला जैसे पेयों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

भारतीय बनने के लिए भारतीय खरीदें - हम विदेशी उत्पादों के खिलाफ है।

पान से करें इलाज, जानें इसके बारे में और भी कुछ खास



खाना खाने के बाद और मुंह का जायका बनाए रखने के लिए पान खाया जाता है। हमारे भारत में सिर्फ खाने में ही नहीं बल्कि पूजा-पाठ व औषधि के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। कई बीमारियों के उपचार में पान का इस्तेमाल लाभप्रद माना जाता है। पान में क्लोरोफिल पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसलिए इसके रस को कई प्रकार की दवाईयां बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। पान एक पत्ता भर नहीं है।

हिंदू मान्यता के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय ही इसकी उत्पत्ति हुई थी। शास्त्रों में इसका वर्णन है। अमृत मंथन के समय आयुर्वेदज्ञ धन्वंतरि के कलश में जीवन देने वाली औषधियों के साथ पान का भी आगमन हुआ। 


यह भोजन को पाचन शक्ति प्रदान करता है। यह कैल्शियम की मात्रा से भरपूर है। इसमें डाली जाने वाली सामग्री कत्था, चूना, सौंफ, लौंग, गुलकन्द (गुलाब की पत्ती से बनने वाला), मुलहट्ठी, सुपारी, नारियल का चूरा, इलायची, धनिए के बीज- ये सभी हाजमा दुरुस्त रखने में रामबाण का काम करते हैं।हमारे देश में भोजन के बाद पान खिलाने की प्रथा सदियों पहले शुरू हुई और आज भी प्रचलित है।

- जलने या छाले पडऩे पर पान के रस को गर्म करके लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं।

- पान में दस ग्राम कपूर को लेकर दिन में तीन-चार बार चबाने से पायरिया की शिकायत दूर हो जाती है। (इसके इस्तेमाल में एक सावधानी रखना जरूरी होती है कि पान की पीक पेट में न जाने पाए।)

- पान के रस को शहद के साथ चटाने के सूखी खांसी ठीक हो जाती है।

- पान के पत्तों का रस आंखों में डालने से रतौंधी की बीमारी में लाभ होता है।

- अजीर्ण होने पर पान के रस में थोड़ा-सा शहद मिलाकर चटाएं।

- कुकुर खांसी में पान के रस से लाभ होता है। खांसी हेतु होने पर पान के रस को निकालकर थोड़ा गर्म करके दिन में तीन-चार बार तक पिलाते रहना चाहिए।

- भूख बढ़ाने, प्यास बुझाने और मसूड़ों की समस्या से निजात पाने में बनारसी एवं देशी पान फायदेमंद साबित होता है।

-शोधकर्ताओं के अनुसार पान में एचसीएच पाया जाता है जो न सिर्फ कैंसरयुक्त सीएमएल कोशिकाओं को मारता है, बल्कि दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर चुकी कैंसर कोशिकाओं को भी नष्ट करता है। यह तत्व इंसान की प्रतिरोधी क्षमता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले पेरिफेरल ब्लड मोनोक्यूक्लियर सेल्स (पीबीएमसी) को कम से कम नुकसान पहुंचाते हुए कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है।

-चोट लगने पर पान बहुत फायदेमंद है। अगर कहीं चोट लग जाए तो पान को गर्म करके परत-परत करके चोट वाली जगह पर बांध लेना चाहिए। इससे दर्द में आराम मिलता है।


18 October 2012

यज्ञ का रहस्य।


वेदानुसार यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं-(1) ब्रह्मयज्ञ (2) देवयज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।

यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म। सकारात्मक भाव से ईश्वर-प्रकृति तत्वों से किए गए आह्‍वान से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ : जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्‍य। मनुष्‍य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य। पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पाँच शक्तियाँ और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण। ईश्‍वर अर्थात ब्रह्म। यह ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से। इसके करने से ऋषियों का ऋण अर्थात 'ऋषि ऋण' ‍चुकता होता है। इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्‍ट होता है।

(2) देवयज्ञ : देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है।
हवन करने को 'देवयज्ञ' कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएँ (लकड़ियाँ) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है।

(3) पितृयज्ञ : सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है।

(4) वैश्वदेवयज्ञ : इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद-पुराण कहते हैं।

(5) अतिथि यज्ञ : अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है।


भूख से कम खाने पर लाभ :



गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च।
अनाबिलं चास्य भवत्यपत्यं न चैनमाद्यूत इति क्षिपन्ति।।


भूख से थोड़ा सा कम खाने से पहला फायदा है कि व्यक्ति रोगी नहीं होता। क्योंकि ज्यादा खाना पाचन में गड़बड़ी से कई बीमारियों की वजह बनता है। कम खाने से इनसे बचाव होता है।

जब व्यक्ति खान-पान नियंत्रित रख निरोगी रहता है तो जाहिर है कि उसकी उम्र बढ़ती है यानी लंबे वक्त तक जीवित रहता है।

कम भोजन से सेहतमंद और बलवान शरीर मन, वचन व व्यवहार को भी साधकर जीवन के सारे सुख बटोरना आसान बना देता हैं।

कम खाने से जुड़ी व्यावहारिक तौर पर सबसे रोचक बात व फायदा यही है कि ऐसे व्यक्ति को कोई 'ज्यादा खाने वाला' यानी 'पेटू'बोलकर ताना नहीं मारता, टोकता नहीं या फिर कोई उससे कतराता नहीं है।


ॐ ॐ

17 October 2012

भोजन करने से पहले और बाद में पलने योग्य आवश्यक नियम------


जब हम भोजन करते हैं तो हमें भोजन से पूर्व और भोजन के बाद बहुत-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। इससे हम अपने स्वास्थ्य को ठीक रख सकते हैं। भोजन करने से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नानुसार हैं-

* प्रातः बिना स्नान किए भोजन नहीं करना चाहिए।

* भोजन करने से पहले हाथ, मुँह और पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए। ऐसा करने से अनेक लाभ होते हैं।

* भोजन करने से पूर्व ईश्वर का स्मरण करना चाहिए और यह प्रार्थना करना चाहिए कि हम जो भोजन करने जा रहे हैं, वह हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकर हो।

* भोजन को धीरे-धीरे चबाकर खाना चाहिए।

* भोजन को कभी भी ठूँस-ठूँसकर नहीं खाना चाहिए। इससे कई रोग हो सकते हैं। भोजन भरपेट से तीन चौथाई ही करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ्य रहने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि भूख से कम भोजन किया जाए।

* भूख लगने पर पानी पीना और प्यास लगने पर भोजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है।

* भोजन के बीच में प्यास लगने पर थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए। भोजन के अंत में तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन के एक घंटे बाद खूब पानी पीना चाहिए।

* बासी, ठंडा, कच्चा अथवा जला हुआ और दोबारा गर्म किया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

* भोजन पच जाने पर ही दूसरी बार भोजन करना चाहिए। प्रातः भोजन के बाद यदि शाम को अजीर्ण मालूम हो, तो उस समय कुछ नर्म भोजन लिया जा सकता है। परंतु रात्रि के भोजन के बाद प्रातः अजीर्ण हो तो बिल्कुल भी भोजन नहीं करना चाहिए।

* दोपहर को भोजन करने के बाद थोड़ा विश्राम करना लाभदायक होता है और रात्रि के भोजन के बाद थोड़ा टहलना हितकर होता है।

* भोजन करने के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए। चाहे वह दोपहर का भोजन हो या रात्रि का। भोजन व रात्रि के सोने में कम से कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए।

* सर्दी के दिनों में भोजन से पूर्व थोड़ा-सा अदरक व सेंधा नमक खाना चाहिए। इससे पाचन शक्ति बढ़ जाती है।

* भोजन सामग्री में कड़े पदार्थ सबसे पहले, नर्म पदार्थ बीच में और पतले पदार्थ अंत में खाने चाहिए।

* भोजन में दूध, दही एवं छाछ का प्रयोग लाभप्रद होता है। इस सबका सेवन दीर्घजीवी एवं स्वस्थ बनाता है।

* इस बात को हमेशा याद रखें कि भोजन करने के बाद क्रोध नहीं करना चाहिए और न ही भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करना चाहिए, इससे स्वास्थ्य को नुकसान होता है।

* रात्रि के भोजन के बाद दूध पीना हितकर है। रात्रि में दूध का सेवन अमृततुल्य माना गया



नवरात्र व्रत के लाभ


हिंदू धर्म में नवरात्र में आस्था और साधना का विशेष महत्व होता है। हिंदू संस्कृति में नवरात्र पूजा का पर्व एक वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में और दूसरा आश्विन माह में। कई लोग नौं दिनों तक व्रत रखते हैं और कुछ लोग पहले और आठवें दिन। इस समय आदमी हर रोज धूप-बत्तियां जलाता है जिसके सुगंध से पूरा वातावरण शानदार हो जाता है। व्रत किसी भी बीमारी को दूर करने का बहुत ही अच्छा प्रा‍कृतिक उपचार है। भारत में केवल नवरात्र में ही लोग व्रत नहीं रहते बल्कि कई त्‍यौहारों पर व्रत रखने की परंपरा है। व्रत रहने से आदमी को कई प्रकार के फायदे होते हैं।


नवरात्र व्रत के लाभ –

तनाव पर नियंत्रण -

नवरात्र के दौरान प्रत्येक इन्सान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई देता है। व्रत रखने से शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर आते हैं जिसकी वजह से लसिका प्रणाली सही होती है और रक्त संचार बना रहता है जिससे मानसिक स्तर सुधरता है दिमाग से तनाव समाप्त होता है। इसके अलावा दिनचर्या के नियमित करने की वजह से आदमी के चेहरे पर रौनक आ जाती है।

रोगियों को फायदा –
नवरात्र में व्रत रखने से विभिन्ने रोगों – मधुमेह, कैंसर, अर्थराइटिस आदि से ग्रस्ति लोगों को बहुत फायदा होता है। नवरात्र के नौं दिनों तक लोगों की नियमित दिनचर्या हो जाती है जिसकी वजह से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। आदमी समय पर उठकर पूजा-अर्चना करने के बाद फलों का सेवन करता है जिससे कई रोग दूर होते हैं।

मोटापे पर नियंत्रण –
नवरात्र के दौरान व्रत रखने से कई प्रकार की खाने की बंदिशें हो जाती है जिसकी वजह से मोटे लोगों का वजन कम होता है। नवरात्र में व्रत के दौरान लोग तली हुई और ज्यादा कैलोरी वाले खाने से परहेज करते हैं और ज्यादातर फल का सेवन करते हैं जिसकी वजह से मोटापे पर नियंत्रण होता है। व्रत के समय हमारी डाइट में सामान्य खाने की जगह व्रत का खाना रहता है जिसमें तले हुए आलू साबूदाने का पापड़, व्रत के चिप्स, मिठाई और फल आदि प्रमुख हैं।

डीहाइड्रेशन नहीं होता –
व्रत के दौरान प्यास ज्यादा लगती है और खाने की बजाय लोग पानी और अन्य तरल पदार्थों का ज्यादा मात्रा में सेवन करते हैं जिसकी वजह से डीहाइड्रेशन नहीं होता है। ज्यादा पानी पीने के प्रयोग से भी कई बीमारियों से छुटकारा मिलता है।


व्रत के अन्या फायदे –

व्रत रखने से निकोटीन, ड्रग, शराब और धूम्रपान छूट जाता है।
व्रत रखने से शरीर के अंदर से कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होती है।
व्रत से गैस व कब्ज जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
व्रत रखने से पाचन तंत्र ठीक होता है जिसकी वजह से खाना आसानी से पचता है।
व्रत अध्यात्म से जुडा होता है जिससे शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का एहसास होता है।


नवरात्र में पूरे दिन भूखा रहने और रात में हैवी खाना खाने से बेहोशी आना, चक्कर आना, सिरदर्द होना, कमजोरी महसूस करना आदि समस्याएं शुरू हो जाती हैं। इसलिए व्रत के दौरान हर दो-तीन घंटे में फल और सलाद, जूस आदि लेते रहें। व्रत में खीरा, खरबूज जैसे फलों को खाते रहने से डिहाइड्रेशन की समस्या नहीं होगी और वजन बढ़ने का खतरा भी नहीं रहेगा।


उपवास का महत्व


तरक्की और स्वास्थ्य के अचूक उपाय हैं व्रत-उपवास

हिन्दू धर्म धार्मिक रस्मों में जीवन को संयमित और अनुशासित रखने की दृष्टि से व्रत-उपवास का महत्व है। किसी न किसी वार, उत्सव या पर्व पर व्रत- उपवास रखा जाता है

। किंतु आज रोजमर्रा की तेज जिंदगी और रेलमपेल में युवा और कामकाजी पीढ़ी का धार्मिक व्रत-उपवास में रुझान कम देखा जाता है या फिर वह समयाभाव के कारण व्रत से जुड़ी धार्मिक परंपराओं को पूरा करने में कठिनाई महसूस करने से उपवास आदि नहीं रखते।
व्यावहारिक दृष्टि से व्रत-उपवास धार्मिक नजरिए से दूर अच्छे स्वास्थ्य के लिए करना भी फायदेमंद साबित होता है। क्योंकि व्रत-उपवास का विज्ञान है कि इनके पालन से आपकी जीवनशैली और दिनचर्या में बदलाव दिखाई देता है, जो आधुनिक युग के तनाव और दबाव से पैदा हुए अनेक रोगों से बचाव और राहत भी दे सकते हैं।

यहां जानते हैं व्रत-उपवास का धार्मिक परंपराओं से हटकर व्यावहारिक तौर पर कैसे पालन किया जा सकता है और उसका लाभ कितना मिलता है -

- सबेरे जल्दी उठें। नित्यकर्म और स्नान करें।
- व्रत-उपवास यथा संभव अन्न न खाएं। चाय न पीएं। यानि गेंहू, चावल, दाल के स्थान पर फल, दूध, सूखे मेवे या कोई हल्का भोजन जैसे साबूदाना, मूंगफली और कम मात्रा में आलू का सेवन करें।
- स्वभाव के स्तर पर अपने गुस्से, आवेश, कटु बोल से बचें। वासना, उत्तेजना पैदा करने वाली सोच से दूर रहें।
- सिनेमा, टीवी जैसे बैठक के मनोरंजन के साधनों से दूर रहें। क्योंकि लंबी बैठक से शरीर में चर्बी और वजन बढऩे से शरीर में आलस्य बढ़ता है। - शांत स्थान पर कुछ देर बैठकर ध्यान करें।
- आप जिस भी देवता में आस्था और श्रद्धा रखते हों, जहां भी समय मिले उनका नाम स्मरण करें।
इस तरह व्रत-उपवास का पालन भी आपके लिए इस तरह फायदेमंद साबित हो सकता है -
- व्रत- उपवास से शरीर में स्फूर्ति और चपलता के साथ-साथ आत्मबल की बढता है।
- स्वस्थ शरीर होने पर आपका आत्मविश्वास हमेशा ऊंचा रखता है।
- इसके प्रभाव से आपकी कार्यक्षमता बढ़ेगी। जाहिर है आपकी कार्य कुशलता और मेहनत आपको तरक्की और धन लाभ देगी।
- दबाव, चिंता और परेशानियों से पैदा हुए रोगों के इलाज में होने वाले गैर-जरुरी खर्च बचेगा।
- इस तरह के व्रत-उपवास के पालन से मन और इच्छाओं पर काबू भी रखने का अभ्यास होगा। धर्म शास्त्रों में भी मन के संयम को ही सुख का सूत्र बताया गया है।
- व्रत-उपवास तन, मन को स्वस्थ रखने का अचूक उपाय है, जो आपको सामाजिक और व्यावहारिक जीवन में भी दूसरों से मेल-मिलाप में सहज बना देगा। यही आपकी तरक्की और स्वास्थ्य की राह आसान बना देगा।


व्रत में खाएं स्‍वादिष्‍ट लौकी की बर्फी


व्रत के लिए हम अक्‍सर वही पुराने तरीके से बना हुआ पकवान ही खाते हैं। पर आज हम आपको कुछ मीठा बनाना सिखाएगें जिसको आप व्रत में आराम से खा सकते हैं। लौकी की बर्फी, बना कर आप व्रत में तो खा ही सकते हैं साथ ही इसको फ्रिज में जमा कर रख देने पर यह काफी दिनो तक चल भी सकती है। आइये जानते हैं इसको बनाने की विधी-


सामग्री-

लौकी - 1 किग्रा, घी - 4 छोटी चम्मच, चीनी - 250 ग्राम, मावा - 250 ग्राम, काजू - 15 टुकड़े करते हए, कुटी हुई इलाइची - 6, पिस्ता- एक छोटी चम्मच।

विधि-

लौकी छील कर उसे लंबा काट जीजिए और उसमें से बीज एवं वाला गूदा हटा दीजिये। टुकड़ों को धोइये और कद्दूकस कर लीजिये, कढ़ाई में बिना पानी डाले लौकी डालिये, 2 छोटी चम्मच घी डाल दीजिये, ढककर धीमी आग पर पकाने के लिए रख दीजिये, थोड़ी देर में चमचे से चलाइये और फिर से ढक दीजिये। जब तक लौकी नरम न हो जाए उसे पकाइये। अब जब लौकी नरम हो जाए तब उसमें चीनी डालकर पकाइये, चीनी के साथ मिलकर लौकी से काफी मात्रा में पानी निकल आता है, थोड़ी थोड़ी देर में चमचे से चलाते रहिये ताकि लौकी तले में न लगे, इस तरह लौकी से पानी बिलकुल खतम होने तक लौकी को पका लीजिये।

पकी हुई लौकी में बचा हुआ घी डालिये और लौकी को अच्छी तरह भून लीजिये और चीनी में मावा और मेवे मिलाइये। चमचे से चलाते हुये तब तक पकाइये जब तक कि वह जमने वाली अवस्था में न आ जाय, इसके लिये उंगलियों से चाशनी को चिपका कर देखिये कि वह उंगलियों से चिपकते हुये जमने सा लगता है। आग बन्द कर दीजिये और इलाइची पीस कर मिला दीजिये।

थाली में जरा सा घी लगाकर चिकना कीजिये और ये मिश्रण थाली में डालकर एकसार करके जमने रख दीजिये। बर्फी के ऊपर कतरे हुये बारीक पिस्ते डाल कर चिपका दीजिये। लगभग 1 घंटे में लौकी की बर्फी जमकर तैयार हो जाती है। लौकी की बर्फी को आप अपने मन पसन्द आकार में काटिये और परोसिये।