18 October 2012

यज्ञ का रहस्य।


वेदानुसार यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं-(1) ब्रह्मयज्ञ (2) देवयज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।

यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म। सकारात्मक भाव से ईश्वर-प्रकृति तत्वों से किए गए आह्‍वान से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ : जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्‍य। मनुष्‍य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य। पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पाँच शक्तियाँ और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण। ईश्‍वर अर्थात ब्रह्म। यह ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से। इसके करने से ऋषियों का ऋण अर्थात 'ऋषि ऋण' ‍चुकता होता है। इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्‍ट होता है।

(2) देवयज्ञ : देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है।
हवन करने को 'देवयज्ञ' कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएँ (लकड़ियाँ) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है।

(3) पितृयज्ञ : सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है।

(4) वैश्वदेवयज्ञ : इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद-पुराण कहते हैं।

(5) अतिथि यज्ञ : अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है।


भूख से कम खाने पर लाभ :



गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च।
अनाबिलं चास्य भवत्यपत्यं न चैनमाद्यूत इति क्षिपन्ति।।


भूख से थोड़ा सा कम खाने से पहला फायदा है कि व्यक्ति रोगी नहीं होता। क्योंकि ज्यादा खाना पाचन में गड़बड़ी से कई बीमारियों की वजह बनता है। कम खाने से इनसे बचाव होता है।

जब व्यक्ति खान-पान नियंत्रित रख निरोगी रहता है तो जाहिर है कि उसकी उम्र बढ़ती है यानी लंबे वक्त तक जीवित रहता है।

कम भोजन से सेहतमंद और बलवान शरीर मन, वचन व व्यवहार को भी साधकर जीवन के सारे सुख बटोरना आसान बना देता हैं।

कम खाने से जुड़ी व्यावहारिक तौर पर सबसे रोचक बात व फायदा यही है कि ऐसे व्यक्ति को कोई 'ज्यादा खाने वाला' यानी 'पेटू'बोलकर ताना नहीं मारता, टोकता नहीं या फिर कोई उससे कतराता नहीं है।


ॐ ॐ

17 October 2012

भोजन करने से पहले और बाद में पलने योग्य आवश्यक नियम------


जब हम भोजन करते हैं तो हमें भोजन से पूर्व और भोजन के बाद बहुत-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। इससे हम अपने स्वास्थ्य को ठीक रख सकते हैं। भोजन करने से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बातें निम्नानुसार हैं-

* प्रातः बिना स्नान किए भोजन नहीं करना चाहिए।

* भोजन करने से पहले हाथ, मुँह और पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए। ऐसा करने से अनेक लाभ होते हैं।

* भोजन करने से पूर्व ईश्वर का स्मरण करना चाहिए और यह प्रार्थना करना चाहिए कि हम जो भोजन करने जा रहे हैं, वह हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकर हो।

* भोजन को धीरे-धीरे चबाकर खाना चाहिए।

* भोजन को कभी भी ठूँस-ठूँसकर नहीं खाना चाहिए। इससे कई रोग हो सकते हैं। भोजन भरपेट से तीन चौथाई ही करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ्य रहने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि भूख से कम भोजन किया जाए।

* भूख लगने पर पानी पीना और प्यास लगने पर भोजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है।

* भोजन के बीच में प्यास लगने पर थोड़ा-थोड़ा पानी पीना चाहिए। भोजन के अंत में तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए। भोजन के एक घंटे बाद खूब पानी पीना चाहिए।

* बासी, ठंडा, कच्चा अथवा जला हुआ और दोबारा गर्म किया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

* भोजन पच जाने पर ही दूसरी बार भोजन करना चाहिए। प्रातः भोजन के बाद यदि शाम को अजीर्ण मालूम हो, तो उस समय कुछ नर्म भोजन लिया जा सकता है। परंतु रात्रि के भोजन के बाद प्रातः अजीर्ण हो तो बिल्कुल भी भोजन नहीं करना चाहिए।

* दोपहर को भोजन करने के बाद थोड़ा विश्राम करना लाभदायक होता है और रात्रि के भोजन के बाद थोड़ा टहलना हितकर होता है।

* भोजन करने के तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए। चाहे वह दोपहर का भोजन हो या रात्रि का। भोजन व रात्रि के सोने में कम से कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए।

* सर्दी के दिनों में भोजन से पूर्व थोड़ा-सा अदरक व सेंधा नमक खाना चाहिए। इससे पाचन शक्ति बढ़ जाती है।

* भोजन सामग्री में कड़े पदार्थ सबसे पहले, नर्म पदार्थ बीच में और पतले पदार्थ अंत में खाने चाहिए।

* भोजन में दूध, दही एवं छाछ का प्रयोग लाभप्रद होता है। इस सबका सेवन दीर्घजीवी एवं स्वस्थ बनाता है।

* इस बात को हमेशा याद रखें कि भोजन करने के बाद क्रोध नहीं करना चाहिए और न ही भोजन के तुरंत बाद व्यायाम करना चाहिए, इससे स्वास्थ्य को नुकसान होता है।

* रात्रि के भोजन के बाद दूध पीना हितकर है। रात्रि में दूध का सेवन अमृततुल्य माना गया



नवरात्र व्रत के लाभ


हिंदू धर्म में नवरात्र में आस्था और साधना का विशेष महत्व होता है। हिंदू संस्कृति में नवरात्र पूजा का पर्व एक वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में और दूसरा आश्विन माह में। कई लोग नौं दिनों तक व्रत रखते हैं और कुछ लोग पहले और आठवें दिन। इस समय आदमी हर रोज धूप-बत्तियां जलाता है जिसके सुगंध से पूरा वातावरण शानदार हो जाता है। व्रत किसी भी बीमारी को दूर करने का बहुत ही अच्छा प्रा‍कृतिक उपचार है। भारत में केवल नवरात्र में ही लोग व्रत नहीं रहते बल्कि कई त्‍यौहारों पर व्रत रखने की परंपरा है। व्रत रहने से आदमी को कई प्रकार के फायदे होते हैं।


नवरात्र व्रत के लाभ –

तनाव पर नियंत्रण -

नवरात्र के दौरान प्रत्येक इन्सान एक नए उत्साह और उमंग से भरा दिखाई देता है। व्रत रखने से शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर आते हैं जिसकी वजह से लसिका प्रणाली सही होती है और रक्त संचार बना रहता है जिससे मानसिक स्तर सुधरता है दिमाग से तनाव समाप्त होता है। इसके अलावा दिनचर्या के नियमित करने की वजह से आदमी के चेहरे पर रौनक आ जाती है।

रोगियों को फायदा –
नवरात्र में व्रत रखने से विभिन्ने रोगों – मधुमेह, कैंसर, अर्थराइटिस आदि से ग्रस्ति लोगों को बहुत फायदा होता है। नवरात्र के नौं दिनों तक लोगों की नियमित दिनचर्या हो जाती है जिसकी वजह से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। आदमी समय पर उठकर पूजा-अर्चना करने के बाद फलों का सेवन करता है जिससे कई रोग दूर होते हैं।

मोटापे पर नियंत्रण –
नवरात्र के दौरान व्रत रखने से कई प्रकार की खाने की बंदिशें हो जाती है जिसकी वजह से मोटे लोगों का वजन कम होता है। नवरात्र में व्रत के दौरान लोग तली हुई और ज्यादा कैलोरी वाले खाने से परहेज करते हैं और ज्यादातर फल का सेवन करते हैं जिसकी वजह से मोटापे पर नियंत्रण होता है। व्रत के समय हमारी डाइट में सामान्य खाने की जगह व्रत का खाना रहता है जिसमें तले हुए आलू साबूदाने का पापड़, व्रत के चिप्स, मिठाई और फल आदि प्रमुख हैं।

डीहाइड्रेशन नहीं होता –
व्रत के दौरान प्यास ज्यादा लगती है और खाने की बजाय लोग पानी और अन्य तरल पदार्थों का ज्यादा मात्रा में सेवन करते हैं जिसकी वजह से डीहाइड्रेशन नहीं होता है। ज्यादा पानी पीने के प्रयोग से भी कई बीमारियों से छुटकारा मिलता है।


व्रत के अन्या फायदे –

व्रत रखने से निकोटीन, ड्रग, शराब और धूम्रपान छूट जाता है।
व्रत रखने से शरीर के अंदर से कोलेस्ट्राल की मात्रा कम होती है।
व्रत से गैस व कब्ज जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
व्रत रखने से पाचन तंत्र ठीक होता है जिसकी वजह से खाना आसानी से पचता है।
व्रत अध्यात्म से जुडा होता है जिससे शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा का एहसास होता है।


नवरात्र में पूरे दिन भूखा रहने और रात में हैवी खाना खाने से बेहोशी आना, चक्कर आना, सिरदर्द होना, कमजोरी महसूस करना आदि समस्याएं शुरू हो जाती हैं। इसलिए व्रत के दौरान हर दो-तीन घंटे में फल और सलाद, जूस आदि लेते रहें। व्रत में खीरा, खरबूज जैसे फलों को खाते रहने से डिहाइड्रेशन की समस्या नहीं होगी और वजन बढ़ने का खतरा भी नहीं रहेगा।


उपवास का महत्व


तरक्की और स्वास्थ्य के अचूक उपाय हैं व्रत-उपवास

हिन्दू धर्म धार्मिक रस्मों में जीवन को संयमित और अनुशासित रखने की दृष्टि से व्रत-उपवास का महत्व है। किसी न किसी वार, उत्सव या पर्व पर व्रत- उपवास रखा जाता है

। किंतु आज रोजमर्रा की तेज जिंदगी और रेलमपेल में युवा और कामकाजी पीढ़ी का धार्मिक व्रत-उपवास में रुझान कम देखा जाता है या फिर वह समयाभाव के कारण व्रत से जुड़ी धार्मिक परंपराओं को पूरा करने में कठिनाई महसूस करने से उपवास आदि नहीं रखते।
व्यावहारिक दृष्टि से व्रत-उपवास धार्मिक नजरिए से दूर अच्छे स्वास्थ्य के लिए करना भी फायदेमंद साबित होता है। क्योंकि व्रत-उपवास का विज्ञान है कि इनके पालन से आपकी जीवनशैली और दिनचर्या में बदलाव दिखाई देता है, जो आधुनिक युग के तनाव और दबाव से पैदा हुए अनेक रोगों से बचाव और राहत भी दे सकते हैं।

यहां जानते हैं व्रत-उपवास का धार्मिक परंपराओं से हटकर व्यावहारिक तौर पर कैसे पालन किया जा सकता है और उसका लाभ कितना मिलता है -

- सबेरे जल्दी उठें। नित्यकर्म और स्नान करें।
- व्रत-उपवास यथा संभव अन्न न खाएं। चाय न पीएं। यानि गेंहू, चावल, दाल के स्थान पर फल, दूध, सूखे मेवे या कोई हल्का भोजन जैसे साबूदाना, मूंगफली और कम मात्रा में आलू का सेवन करें।
- स्वभाव के स्तर पर अपने गुस्से, आवेश, कटु बोल से बचें। वासना, उत्तेजना पैदा करने वाली सोच से दूर रहें।
- सिनेमा, टीवी जैसे बैठक के मनोरंजन के साधनों से दूर रहें। क्योंकि लंबी बैठक से शरीर में चर्बी और वजन बढऩे से शरीर में आलस्य बढ़ता है। - शांत स्थान पर कुछ देर बैठकर ध्यान करें।
- आप जिस भी देवता में आस्था और श्रद्धा रखते हों, जहां भी समय मिले उनका नाम स्मरण करें।
इस तरह व्रत-उपवास का पालन भी आपके लिए इस तरह फायदेमंद साबित हो सकता है -
- व्रत- उपवास से शरीर में स्फूर्ति और चपलता के साथ-साथ आत्मबल की बढता है।
- स्वस्थ शरीर होने पर आपका आत्मविश्वास हमेशा ऊंचा रखता है।
- इसके प्रभाव से आपकी कार्यक्षमता बढ़ेगी। जाहिर है आपकी कार्य कुशलता और मेहनत आपको तरक्की और धन लाभ देगी।
- दबाव, चिंता और परेशानियों से पैदा हुए रोगों के इलाज में होने वाले गैर-जरुरी खर्च बचेगा।
- इस तरह के व्रत-उपवास के पालन से मन और इच्छाओं पर काबू भी रखने का अभ्यास होगा। धर्म शास्त्रों में भी मन के संयम को ही सुख का सूत्र बताया गया है।
- व्रत-उपवास तन, मन को स्वस्थ रखने का अचूक उपाय है, जो आपको सामाजिक और व्यावहारिक जीवन में भी दूसरों से मेल-मिलाप में सहज बना देगा। यही आपकी तरक्की और स्वास्थ्य की राह आसान बना देगा।


व्रत में खाएं स्‍वादिष्‍ट लौकी की बर्फी


व्रत के लिए हम अक्‍सर वही पुराने तरीके से बना हुआ पकवान ही खाते हैं। पर आज हम आपको कुछ मीठा बनाना सिखाएगें जिसको आप व्रत में आराम से खा सकते हैं। लौकी की बर्फी, बना कर आप व्रत में तो खा ही सकते हैं साथ ही इसको फ्रिज में जमा कर रख देने पर यह काफी दिनो तक चल भी सकती है। आइये जानते हैं इसको बनाने की विधी-


सामग्री-

लौकी - 1 किग्रा, घी - 4 छोटी चम्मच, चीनी - 250 ग्राम, मावा - 250 ग्राम, काजू - 15 टुकड़े करते हए, कुटी हुई इलाइची - 6, पिस्ता- एक छोटी चम्मच।

विधि-

लौकी छील कर उसे लंबा काट जीजिए और उसमें से बीज एवं वाला गूदा हटा दीजिये। टुकड़ों को धोइये और कद्दूकस कर लीजिये, कढ़ाई में बिना पानी डाले लौकी डालिये, 2 छोटी चम्मच घी डाल दीजिये, ढककर धीमी आग पर पकाने के लिए रख दीजिये, थोड़ी देर में चमचे से चलाइये और फिर से ढक दीजिये। जब तक लौकी नरम न हो जाए उसे पकाइये। अब जब लौकी नरम हो जाए तब उसमें चीनी डालकर पकाइये, चीनी के साथ मिलकर लौकी से काफी मात्रा में पानी निकल आता है, थोड़ी थोड़ी देर में चमचे से चलाते रहिये ताकि लौकी तले में न लगे, इस तरह लौकी से पानी बिलकुल खतम होने तक लौकी को पका लीजिये।

पकी हुई लौकी में बचा हुआ घी डालिये और लौकी को अच्छी तरह भून लीजिये और चीनी में मावा और मेवे मिलाइये। चमचे से चलाते हुये तब तक पकाइये जब तक कि वह जमने वाली अवस्था में न आ जाय, इसके लिये उंगलियों से चाशनी को चिपका कर देखिये कि वह उंगलियों से चिपकते हुये जमने सा लगता है। आग बन्द कर दीजिये और इलाइची पीस कर मिला दीजिये।

थाली में जरा सा घी लगाकर चिकना कीजिये और ये मिश्रण थाली में डालकर एकसार करके जमने रख दीजिये। बर्फी के ऊपर कतरे हुये बारीक पिस्ते डाल कर चिपका दीजिये। लगभग 1 घंटे में लौकी की बर्फी जमकर तैयार हो जाती है। लौकी की बर्फी को आप अपने मन पसन्द आकार में काटिये और परोसिये।


16 October 2012

नवरात्री दुर्गा के नव रूप – नवरात्र-दुर्गापूजा विधि





नवरात्रि का त्योहार नौ दिनों तक चलता है। इन नौ दिनों में तीन देवियों पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरुपों की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन पार्वती के तीन स्वरुपों (कुमार, पार्वती और काली), अगले तीन दिन लक्ष्मी माता के स्वरुपों और आखिरी के तीन दिन सरस्वती माता के स्वरुपों की पूजा करते हैं।

वासन्तिक नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि के इन्हीं नौ दिनों पर मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है वे हैं – पहला शैलपुत्री, दूसरा ब्रह्माचारिणी, तीसरा चन्द्रघन्टा, चौथा कूष्माण्डा, पाँचवा स्कन्द माता, छठा कात्यायिनी, सातवाँ कालरात्रि, आठवाँ महागौरी, नौवां सिद्धिदात्री।

प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री



नवरात्री प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा विधि



वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥

श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।


द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी



नवरात्री दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि


“दधना कर पद्याभ्यांक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदमयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥“

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।


तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा



नवरात्री तीसरा दिन माता चंद्रघंटा की पूजा विधि


“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैयुता।
प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥“

श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

इनकी आराधना से मनुष्य के हृदय से अहंकार का नाश होता है तथा वह असीम शांति की प्राप्ति कर प्रसन्न होता है। माँ चन्द्रघण्टा मंगलदायनी है तथा भक्तों को निरोग रखकर उन्हें वैभव तथा ऐश्वर्य प्रदान करती है। उनके घंटो मे अपूर्व शीतलता का वास है।

चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा





नवरात्री चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा विधि

”सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥“

श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं।

इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं।

पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता


नवरात्री पंचमी दिन स्कंदमाता की पूजा विधि

“सिंहासनगता नित्यं पद्याञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥“

श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।

इनकी आराधना से मनुष्य सुख-शांति की प्राप्ति करता है। सिह के आसन पर विराजमान तथा कमल के पुष्प से सुशोभित दो हाथो वाली यशस्विनी देवी स्कन्दमाता शुभदायिनी है।

षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी


नवरात्री पूजा - छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा विधि

“चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलावरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानव घातिनी॥“

श्री दुर्गा का षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है।

इनकी आराधना से भक्त का हर काम सरल एवं सुगम होता है। चन्द्रहास नामक तलवार के प्रभाव से जिनका हाथ चमक रहा है, श्रेष्ठ सिंह जिसका वाहन है, ऐसी असुर संहारकारिणी देवी कात्यायनी कल्यान करें।

सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि



नवरात्री पूजा - सप्तमी दिन माता कालरात्रि की पूजा विधि

मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि कहा जाता है, दुर्गा-पूजा के सातवें दिन माँ काल रात्रि की उपासना का विधान है. मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, इनका वर्ण अंधकार की भाँति काला है, केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है, माँ कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से बिजली की भाँति किरणें निकलती रहती हैं, इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं. माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए.

माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली होती हैं इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है. दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है.

कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्र्च दारूणा. त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा..

मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से जीवन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी मंत्र से मां की स्तुति की थी. यह देवी काल रात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं. इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है.

देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है. मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं. देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं.

बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है. देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं. देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं. मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है. देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है.
सप्तमी दिन – कालरात्रि की पूजा विधि :

देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है. दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है (Seventh day of Durga Puja is most important day for Tantrik.). सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं. इस दिन मां की आंखें खुलती हैं. षष्ठी पूजा के दिन जिस विल्व को आमंत्रित किया जाता है उसे आज तोड़कर लाया जाता है और उससे मां की आँखें बनती हैं. दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है. इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं.

सप्तमी की पूजा सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है. इस दिन अनेक प्रकार के मिष्टान एवं कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है. सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है. कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं.

पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहले कलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए. देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए

” देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां, भक्त नता: स्म विदाधातु शुभानि सा न:..
देवी कालरात्रि के मंत्र :

1- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

2- एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।

वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।
देवी कालरात्रि के ध्यान :

करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।

कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥

दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।

अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥

महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।

घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥

सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।

एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥
देवी कालरात्रि के स्तोत्र पाठ :

हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।

कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।

कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।

कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥
देवी कालरात्रि के कवच :

ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि।

ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।

कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।

तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए.
नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं -

इस प्रकार दुर्गा की आरती होती है.
आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती गीत भक्त जन गाते हैं ||

देवी कालरात्रि की महत्व :

दुर्गा सप्तशती के प्रधानिक रहस्य में बताया गया है कि जब देवी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का प्रकटीकरण हुआ उसस पहले देवी ने अपने स्वरूप से तीन महादेवीयों को उत्पन्न किया. सर्वेश्वरी महालक्ष्मी ने ब्रह्माण्ड को अंधकारमय और तामसी गुणों से भरा हुआ देखकर सबसे पहले तमसी रूप में जिस देवी को उत्पन्न किया वह देवी ही कालरात्रि हैं. देवी कालरात्रि ही अपने गुण और कर्मों द्वारा महामाया, महामारी, महाकाली, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, एवं दुरत्यया कहलाती हैं.



“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥“

श्रीदुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।

संसार में कालो का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं।

अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी


नवरात्री की अष्टमी दिन माता महागौरी की पूजा विधि


देवी दुर्गा के नौ रूपों में महागौरी आठवीं शक्ति स्वरूपा हैं. दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाश-मान होता है इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी हैम माँ महागौरी की अराधना से भक्तों को सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है.

दुर्गा सप्तशती (Durga Saptsati) में शुभ निशुम्भ से पराजित होकर गंगा के तट पर जिस देवी की प्रार्थना देवतागण कर रहे थे वह महागौरी हैं. देवी गौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया. यह देवी गौरी शिव की पत्नी हैं यही शिवा और शाम्भवी के नाम से भी पूजित होती हैं.
महागौरी स्वरूप :

महागौरी की चार भुजाएं हैं उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता है. बायीं भुजा में डमरू डम डम बज रही है और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान देती हैं. जो स्त्री इस देवी की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वयं करती हैं. कुंवारी लड़की मां की पूजा करती हैं तो उसे योग्य पति प्राप्त होता है. पुरूष जो देवी गौरी की पूजा करते हैं उनका जीवन सुखमय रहता है देवी उनके पापों को जला देती हैं और शुद्ध अंत:करण देती हैं. मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं.
दुर्गा पूजा अष्टमी महागौरी की पूजा विधि :

नवरात्रे के दसों दिन कुवारी कन्या भोजन कराने का विधान है परंतु अष्टमी के दिन का विशेष महत्व है. इस दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं. देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी देवी की पंचोपचार सहित पूजा करें. देवी का ध्यान करने के लिए दोनों हाथ जोड़कर इस मंत्र का उच्चारण करें “सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यामाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥”.

महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं.देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”
महागौरी के मंत्र :

1- श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

2- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
माता महागौरी की धयान :

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।

वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।

कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥
महागौरी की स्तोत्र पाठ :

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।

ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।

डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।

वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
माता महागौरी की कवच :

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।

क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥

ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।

कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥

देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए.
नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं - दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

इस प्रकार दुर्गा की आरती होती है.
आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती गीत भक्त जन गाते हैं ||

महागौरी कथा :

देवी पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं.

इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं.

एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा.

महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है, और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं.

“श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥“

श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

माँ महागौरी की आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देवे वाली शुद्धता मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हों।

नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री


नवरात्री पूजा की नवमी दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा विधि

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं, नवरात्र-पूजन के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है. नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है. दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुई और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का. देवी प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं. देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है, मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है.

मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं, मां की सवारी सिंह हैं. देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है. देवतागण, ऋषि-मुनि, असुर, नाग, मनुष्य सभी मां के भक्त हैं. देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है मां उसी पर अपना स्नेह लुटाती हैं. मां का ध्यान करने के लिए आप“सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी..” इस मंत्र से स्तवन कर सकते हैं.
सिद्धि के प्रकार :

पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिध्दियों को प्राप्त किया था तथा इन्हें के द्वारा भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप प्राप्त हुआ. अणिमा, महिमा,गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं जिनका मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख किया गया है .

इसके अलावा ब्रह्ववैवर्त पुराण (Brahmvaivart Puran) में अनेक सिद्धियों का वर्णन है जैसे 


1. सर्वकामावसायिता 2. सर्वज्ञत्व 3. दूरश्रवण 4. परकायप्रवेशन 5. वाक्‌सिद्धि 6. कल्पवृक्षत्व 7. सृष्टि 8. संहारकरणसामर्थ्य 9. अमरत्व 10 सर्वन्यायकत्व. कुल मिलाकर 18 प्रकार की सिद्धियों का हमारे शास्त्रों में वर्णन मिलता है. यह देवी इन सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं. इनकी पूजा से भक्तों को ये सिद्धियां प्राप्त होती हैं.

नवमी देवी सिद्धिदात्री की पूजा विधि :

सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं उन्हें नवमी के दिन निर्वाण चक्र (Nirvana Chakra) का भेदन करना चाहिए. दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है. हवन से पूर्व सभी देवी दवाताओं एवं माता की पूजा कर लेनी चाहिए. हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए. बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए.

दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति दी जा सकती है. देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार हवि दें.


माँ सिद्धिदात्री के मंत्र :

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

देवी सिद्धिदात्री की ध्यान :

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।

शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।

कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ : 

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥
परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

देवी सिद्धिदात्री की कवच :

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥


भगवान शंकर और ब्रह्मा जी की पूजा पश्चात अंत में इनके नाम से हवि देकर आरती और क्षमा प्रार्थना करें.

हवन में जो भी प्रसाद चढ़ाया है उसे बाटें और हवन की अग्नि ठंडी को पवित्र जल में विसर्जित कर दें अथवा भक्तों के में बाँट दें. यह भस्म- रोग, संताप एवं ग्रह बाधा से आपकी रक्षा करती है एवं मन से भय को दूर रखती है.

नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं -


इस प्रकार दुर्गा की आरती होती है. 

आरती में “जय अम्बे गौरी”- दुर्गा आरती गीत भक्त जन गाते हैं ||


“सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि।
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥“

श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

सिद्धिदात्री की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्वये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी है। भगवती सिद्धिदात्री उपरोक्त संपूर्ण सिद्धियाँ अपने उपासको को प्रदान करती है। माँ दुर्गा के इस अंतिम स्वरूप की आराधना के साथ ही नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता है।

इस दिन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन अर्थात दसवें दिन को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशम् तिथि को बुराई पर अच्छाकई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार विजया दशमी यानि दशहरा मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।

नवरात्री दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी












माँ ब्रह्माचारिणी


नवरात्री दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि

“दधना कर पद्याभ्यांक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदमयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा"॥

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।



मां दुर्गा की द्वितीय शक्ति का नाम ब्रह्माचारिणी है। ब्रह्मा में लीन होकर तप करने के कारण इन महाशक्ति को ब्रह्माचारिणी की संज्ञा मिली है। इसीलिए मां के इस स्वरूप का ध्यान हमारी शक्तियों को जाग्रत करके स्वयं पर नियंत्रण करने की साम‌र्थ्य प्रदान करता है।


माता शैलपुत्री: पूजन विधि, ध्यान मंत्र, महत्व व शुभ मुहूर्त




दुर्गा पूजा के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा -वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है . माँ दुर्गा की पहली स्वरूप और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है . नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और आराधना की जाती है . माता शैलपुत्री का वहां वृषभ है , उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है . नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार ’ चक्र में स्थित करते हैं और यही से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है . पौराणिक कथानुसार माँ शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुयी थी . उस समय माता का नाम सटी था और इनका विवाह भगवन शंकर से हुआ था . एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवन शिव को आमंत्रण नहीं दिया . अपने माँ aur बहनों से मिलने को आतुर माँ सटी बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वह अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला . माँ सटी इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वही योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया . शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारन माँ दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैलपुत्री कहा जाता है .

नवरात्रि के पहले दिन (16 अक्टूबर, मंगलवार) मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं। इनकी पूजन विधि इस प्रकार है-

सबसे पहले चौकी (बाजोट) पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका(सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें। इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।


महत्व

हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: नवरात्रि के पहले दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।


पूजन के शुभ मुहूर्त


सुबह 10:45 से दोपहर 12:12 तक (लाभ का चौघडिय़ा)

दोपहर 11.49 से 12:35 (अभिजीत मुहूर्त)

दोपहर 12:12 से 01:38 तक (अमृत का चौघडिय़ा)

शाम 07:38 से रात 09:36 तक (स्थिर लग्न वृषभ)




शैलपुत्री की ध्यान :

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।

वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥



अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥





शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥


शैलपुत्री की कवच :

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥


थाइराइड ग्रंथि की समस्या - समाधान



थाइराइड ग्रंथि की समस्या आज आमतौर पर ज्यादातर लोगों में देखी जा सकती है। थाइराइड की समस्या आदमी की तुलना में महिलाओं में ज्यादा होती है। थाइराइड एक साइलेंट किलर है जो सामान्य स्वास्‍थ्‍य समस्यायओं के रूप में शरीर में शुरू होती है और बाद में घातक हो जाती है। थाइराइड से बचने के लिए विटामिन, प्रोटीनयुक्त और फाइबरयुक्त आहार का ज्यादा मात्रा में सेवन करना चाहिए। थाइराइड में ज्यादा आयोडीन वाले खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। मछली और समुद्री मछली थाइराइड के मरीज के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है। थाइराइड के मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर ही अपना डाइट प्लान बनाना चाहिए। हम आपको कुछ आहार के बारे में जानकारी दे रहे हैं जो कि थाइराइड के मरीज के लिए फायदेमंद हो सकता है।


स्व्स्थ खान-पान 

अपना कर थाइराइड के खतरे को कम किया जा सकता है। इसलिए अपने डाइट प्लान में थाइराइड के लिए उपयोगी आहार को शामिल कीजिए।


थाइराइड में फायदेमंद आहार - 

मछली – 


थाइराइड के मरीज को आयोडीनयुक्त भोजन करना चाहिए। मछली में ज्यादा मात्रा में आयोडीन होता है। आम मछलियों की तुलना में समुद्री मछलियों में आयोडीन होता है। इसलिए समुद्री मछली जैसे, सेलफिश और झींगा खाना चाहिए जिसमें ज्यादा मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। अल्बकोर ट्यूना, सामन, मैकेरल, सार्डिन, हलिबेट, हेरिंग और फ़्लाउंडर, ओमेगा -3 फैटी एसिड की शीर्ष आहार स्रोत हैं।

साबुत अनाज - 

आटा या पिसे हुए अनाज की तुलना में अनाज में ज्यादा मात्रा में विटामिन, मिनरल, प्रोटीन और फाइबर होता है। अनाज में विटामिन-बी और अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिसे खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है। पुराना भूरा चावल, जंगली चावल, जई, जौ, ब्रेड, पास्ता और पापकॉर्न खाना चाहिए।


दूध और दही - 

थाइराइड के मरीज को दूध और उससे बने खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। दूध और दही में पर्याप्त मात्रा में विटामिन, मिनरल्स, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। दही में पाऐ जाने वाले स्वस्थ बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) शरीर के इम्‍यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। प्रोबायोटिक्स थाइराइड रोगियों में गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल को स्‍वस्‍थ बनाए रखने में मदद करता है।

फल और सब्जियां -

फल और सब्जिया एंटीऑक्सीडेंट्स का प्राथमिक स्रोत होती हैं जो कि शरीर को रोगों से लडने में सहायता प्रदान करते हैं। सब्जियों में पाया जाने वाला फाइबर पाचन क्रिया को मजबूत करता है जिससे खाना अच्छे से पचता है। हरी और पत्तेदार सब्जियां थाइराइड ग्रंथि की क्रियाओं के लिए अच्छी होती हैं। हाइपरथाइराइजिड्म हड्डियों को पतला और कमजोर बनाता है इसलिए हरी और पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए जिसमें विटामिन-डी और कैल्शियम होता है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है। लाल और हरी मिर्च, टमाटर और ब्लूबेरी खाने में शरीर के अंदर ज्यादा मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट जाता है। इसलिए थाइराइड के रोगी को फल और हरी सब्जियों का सेवन करना चाहिए।


आयोडीन - 

थाइराइड के मरीज को आयोडीनयुक्त भोजन करना चाहिए। आयो‍डीन थाइराइड ग्रंथि के दुष्प्रभाव को कम करता है। थाइराइड के मरीज को ज्या‍दा आयोडीनयुक्त नमक नहीं खाना चाहिए क्योंकि उसमें सूगर की मात्रा भी मौजूद होती है जिससे थाइराइड बढता है।
थाइराइड को साइलेंट किलर भी कहा जाता है। थाइराइड के मरीज को सामान्य स्वास्‍थ्‍य समस्याएं होती हैं जिसे भागदौड की जिंदगी में आदमी असानी से उपेक्षा कर देता है जो कि घातक हो सकता है। लेकिन स्वस्थ खान-पान अपनाकर थाइराइड के खतरे को कम किया जा सकता है।


आयोडीन क्या है?


आयोडीन आपके बढ़ते शिशु के दिमाग के विकास और थायराइड प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है। यह एक माइक्रोपोशक तत्व है जिसकी हमारे शरीर को विकास एवं जीने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है। थायराइड ग्रंथि गर्दन के सामने है और यह उन हार्मोन का उत्पादन करता है जो शरीर की चयापचय का नियंत्रण करते हैं

आयोडीन हमारे शरीर के तापमान को भी विनियमित करता है, विकास में सहायक है और भ्रूण के पोशक तत्वों का एक अनिवार्य घटक है।


आपके शरीर को कितने आयोडीन की जरूरत है?

एक व्यक्ति को जीवनभर में एक छोटे चम्मच से भी कम आयोडीन की आवश्यकता पड़ती है। चूंकि आयोडीन शरीर में जमा नहीं रह सकता इसे दैनिक आधार पर लेना पड़ता है। रिसर्च से पता चला है कि महिलाओं को गर्भावस्था एवं स्तनपान के दौरान अपने आहार में पर्याप्त आयोडीन नहीं मिलता।

डब्ल्यूएचओ(WHO)की हिदायतों के अनुसार ली जाने वाली आयोडीन की मात्रा निम्न है:

गर्भवती महिलाओं के लिए 200-220 माइक्रोग्राम प्रतिदिन
स्तनपान कराती महिलाओं के लिए 250-290 माइक्रोग्राम
1 वर्ष से छोटे शिशुओं के लिए 50-90 माइक्रोग्राम प्रतिदिन
1-11 वर्ष के बच्चों के लिए 90-120 माइक्रोग्राम प्रतिदिन, और
वयस्कों तथा किशोरों के लिए 150 माइक्रोग्राम प्रतिदिन


आयोडीन की कमी से क्या कुप्रभाव हो सकते हैं?


आयोडीन की कमी से आप मानसिक तथा शारीरिक तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। इसके आम लक्षण हैं त्वचा का सूखापन, नाखूनों और बालों का टूटना, कब्ज़ और भारी और कर्कश आवाज़ । इनमें से कुछ लक्षण गर्भावस्था में आम पाए जाते हैं इसलिए इस बारे में डाक्टर से सलाह लेना सुरक्षित है।

आयोडीन की कमी से वज़न बढ़ना, रक्त में कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ना और ठंड बर्दाश्त न होना आदि लक्षण होते हैं। वस्तुत: आयोडीन की कमी से मस्तिश्क का धीमा होना और दिमाग को क्षति आदि हो सकते हैं जिन्हें समय से रोका जा सकता है।

आयोडीन की लगातार कमी से चेहरा फूला हुआ, गले में सूजन (गले के अगले हिस्से में थाइराइड ग्रंथि में सूजन) थाइराइड की कमी (जब थाइराइड हार्मोन का बनना सामान्य से कम हो जाए) और मस्तिश्क की कार्यप्रणाली में बाधा आती है।

गर्भवती महिलाओं में आयोडीन की कमी से गर्भपात, नवज़ात शिशुओं का वज़न कम होना,शिशु का मृत पैदा होना और जन्म लेने के बाद शिशु की मृत्यु होना आदि लक्षण होते हैं। एक शिशु में आयोडीन की कमी से उसमें बौद्धिक और विकास समस्यायें जैसे कि मस्तिश्क का धीमा चलना, शरीर का विकास कम होना, बौनापन, देर से यौवन आना, सुनने और बोलने की समस्यायें तथा समझ में कमी आदि होती हैं।


आयोडीन के अच्छे प्राकृतिक स्रोत क्या हैं?

आयोडीन मुख्यत: मिट्टी और पानी में पाया जाता है। बहरहाल, पेड़ काटने, बाढ़ आने, विक्षालन तथा भारी वर्षा के कारण मिट्टी में मौजूद आयोडीन घुल कर बह जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में आयोडीन की मात्रा सबसे कम होती है जबकि तटीय क्षेत्रों में इसकी मात्रा बेहतर होती है।

आयोडीन के सर्वोत्तम प्राकृतिक स्रोत हैं अनाज, दालें एवं ताजे खाद्य पदार्थ। दूध, मछली और खाने योग्य समुद्री जीव, मॉस तथा अंडों में भी कुछ मात्रा में आयोडीन होता है।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि लोगों के विष्वास के विपरीत समुद्री नमक में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा नहीं होती। अत: विकल्प के तौर पर समुद्री नमक का इस्तेमाल न करें क्योंकि इसके प्रत्येक ग्राम में केवल 2 माइक्रोग्राम आयोडीन होता है।


क्या आयोडीन युक्त नमक इसका सर्वोत्तम उपाय है?


आयोडीन युक्त नमक अपने आहार में आयोडीन शामिल करने का सबसे बेहतर तरीका है। एक औसत भारतीय प्रतिदिन लगभग 10-15 ग्रा. नमक का सेवन करता है। अपने दैनिक भोजन में आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करने से आपकी आयोडीन की दैनिक मात्रा पूरी हो जाती है।

नमक में आयोडीन नष्ट नहीं होता यदि इसे उचित ढंग से रखा जाए। बहरहाल, लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी तथा नमी पड़ने से नमक में मौजूद आयोडीन नष्ट हो सकता है। आपको आयोडीन युक्त नमक शीशे या प्लास्टिक के बंद कंटेनरों में रखना चाहिए और उस पर लिखी निर्माण की तारीख हमेशा देखें। आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल पैकिंग की तारीख से 12 महीने के अंदर कर लेना चाहिए।

बहरहाल, यदि आपको उच्च रक्तचाप तथा कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है जिसके कारण आप अपने आहार में नमक का इस्तेमाल कर पाने में असमर्थ हैं तो इसके विकल्प के लिए अपनी डाक्टर से सलाह करें।


आयोडीन की कमी का पता कैसा चलता है?


चूंकि सेवित आयोडीन की 90 प्रतिशत मात्रा मूत्र के जरिए निकल जाती है, अत: आयोडीन की कमी का पता लगाने का सर्वोत्तम तरीका 24 घंटे मूत्र कलेक्षन टेस्ट या अचानक किया जाने वाला आयोडीन-से -क्रियेटिनाइन मूत्र परीक्षण है। आपके शरीर में टी एस एच(TSH) स्तर की जांच के लिए एक थाइराइड प्रक्रिया परीक्षण भी किया जाता है।


आयोडीन की कमी का उपचार कैसा किया जाता है?


यदि आयोडीन की कमी का पता चल जाए, आपकी डाक्टर इसके संबंध में की जाने वाली कार्रवाई की हिदायत देंगी और इस संबंध में आपके स्वास्थ्य पर नज़र रखी जाएगी। गर्भवती तथा स्तनपान कराती महिलाओं को इसके सप्लीमेंट लेने चाहिएं ताकि मां तथा शिशु दोनों को आयोडीन की पर्याप्त मात्रा मिले। अपनी डाक्टर के निर्देश का अनुपालन करना आवश्यक है क्योंकि इसकी दवा की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के अनुसार भिन्न हो सकती है।
बहरहाल, आयोडीन के सप्लीमेंट लेने की सलाह सभी को नहीं दी जाती, विशेषकर उन लोगों को जिन्हें थाइराइड की समस्या हो। अत: आयोडीन के सप्लीमेंट लेने से पहले अपनी डाक्टर से सलाह जरूर करें।

थाइराइड उपचार के तरीके -


रेडियोएक्टिव आयोडीन ट्रीटमेंट -



थाइराइड के मरीज को रेडियोएक्टिव आयोडीन दवाई गोली या लिक्विड के द्वारा दिया जाता है। इस उपचार के द्वारा थाइराइड की ज्यादा सक्रिय ग्रंथि को काटकर अलग किया जाता है। इसमें जो आयोडीन दिया जाता है वह आयोडीन स्कैन से अलग होता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन को लगातार आयोडनी स्कैन चेकअप के बाद दिया जाता है और आयोडीन हाइपरथाइराइजिड्म के पहचान की पुष्टि करता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन थाइराइड की कोशिकाओं को समाप्त करते हैं। इस थेरेपी से शरीर को कोई भी साइड-इफेक्ट नहीं होता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में भी सुरक्षित तरीके से प्रयोग किया जा सकता है। प्रेग्नेंसी में रेडियोएक्टिव आयोडीन ट्रीटमेंट का इलाज नहीं किया जाता है इससे मां और बच्चे को नुकसान हो सकता है। दिल के मरीजों के लिए यह उपचार बहुत ही सुरक्षित होता है। इस थेरेपी से 8-12 महीने में थाइराइड की समस्या समाप्त हो जाती है। सामान्यतया 80 प्रतिशत तक थाइराइड के मरीजों को रेडियोएक्टिव आयोडीन के एक ही खुराक से उपचार हो जाता है। लेकिन थाइराइड की समस्या गंभीर होने पर इसके इलाज में कम से कम 6 महीने तक लग सकते हैं।



सर्जरी -

सर्जरी के द्वारा आंशिक रूप से थाइराइड ग्रंथि को निकाल दिया जाता है, जो कि बहुत सामान्य तरीका है। थाइराइड के मरीजों में सर्जरी के द्वारा उसके शरीर से थाइराइड के ऊतकों को निकाला जाता है जो कि ज्यादा मात्रा में थाइराइड के हार्मोन पैदा करते हैं। लेकिन सर्जरी से आसपास के ऊतकों पर भी प्रभाव पडता है। इसके अलावा मुंह की नसें और चार अन्य। ग्रंथियां (जिनको पैराथाइराइड ग्रंथि कहते हैं) भी प्रभावित होती हैं जो कि शरीर में कैल्शियम स्तर को नियमित करती हैं। थाइराइड की सर्जरी उन मरीजों को करानी चाहिए जिनको खाना निगलने में दिक्कत हो रही हो और सांस लेने में दिक्कत हो। प्रग्नेंट महिला और बच्चे जो कि थाइराइड की दवाइयों को बर्दास्त नहीं कर सकते हैं उनके लिए सर्जरी उपयोगी है।



एंटीथाइराइड गोलियां -

थाइराइड में सामान्य समस्याएं जैसे बुखार, गले में ख्रास जैसी समस्याएं होती हैं। यह छोटी समस्याएं थाइराड की वजह से हो सकती हैं इसलिए दवाईयां लेने से पहले जांच करानी चाहिए। थाइराइड के मरीज को चिकित्सक से सलाह लेकर एंटीथाइराइड की गोलियां खानी चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीथाइराइड की गोलियां आपके लिए हानिकारक हो सकती हैं।


शारदीय नवरात्र की आज से शुरूआत हो गई है



शारदीय नवरात्र: 
प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना

शारदीय नवरात्र की आज से शुरूआत हो गई है. नवरात्र का आज पहला दिन है.नवरात्र के नौ दिनों में आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है.

मां के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्र के नौ दिनों मे मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है 

वह हैं : -

  • पहला शैलपुत्री,
  • दूसरा ब्रह्माचारिणी,
  • तीसरा चन्द्रघन्टा,
  • चौथा कूष्माण्डा,
  • पांचवा स्कन्द माता,
  • छठा कात्यायिनी,
  • सातवां कालरात्रि,
  • आठवां महागौरी,
  • नौवां सिद्धिदात्री।

देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप : शैलपुत्री 

नवदु्र्गाओं में सर्वप्रथम गिरिराज हिमवान की पुत्री शैलपुत्री का नाम आता है. श्वेत एवं दिव्यस्वरूपा वृषभ पर आरूढ़ हिमवान की पुत्री आदि महाशक्तिरूपा सती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं. जब दक्ष ने एक यज्ञ के आयोजन में सभी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन आदि देव शंकर जी को नहीं बुलाया तो सती शंकर जी से आज्ञा लेकर अपने पिता के घर गईं

सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के ऊपर अपने पति शंकर जी को न बुलाए जाने पर अत्यंत क्रोधित हुईं. पिता दक्ष प्रजापति ने सती के सामने ही शंकर जी को कुछ अपमानजनक शब्द बोले जिसे सती अपने पति शंकर जी का अपमान सहन न कर सकीं.

अपमानित सती ने अपने पिता दक्ष की भर्त्सना की एवं दहकते यज्ञ कुंड में अग्नि की ज्वाला में अपनी योगमाया की शक्ति का आवाहन कर के अपने प्राण त्याग दिए.

वहीं सती कालांतर में पार्वती के रूप में पुन: हिमालय की पुत्री बनकर शंकर जी की अरधागिनी बनीं. यही पार्वती देवी ने इन्द्रादि देवताओं के अंहकार को नष्ट करने के लिए उनको शक्तिहीन कर दिया. तब ब्रहमा, विष्णु एवं महेश त्रिदेवों को लेकर सभी देवता पार्वती देवी की शरण में गए एवं दीन भाव से उनकी स्तुति की.

देवताओं द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न होकर पार्वती जी ने पुन: उन्हें अस्त्र-शस्त्र के साथ उनकी शक्ति को वापस किया. इन्हीं देवी पार्वती को देवी शैलपुत्री के नाम से पुकारा गया.


ध्यान मंत्र

वंदे वांछित लाभायचन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारुढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ।।

अर्थात् मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृष पर आरूढ़ होने वाली, शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा जी की मैं वंदना करता हूं. इस प्रकार ध्यान करते हुए शैलपुत्री देवी के मंत्र 


‘ऊं’ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊं शैलपुत्री देव्यै नम:

का नित्य एक माला जाप करने से हर प्रकार की शुभता प्राप्त होती है.

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या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

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15 October 2012

क्यों 'ॐ' से शुरू होते हैं मंत्र ?



देव उपासना में तरह-तरह के मंत्र बोलें जाते हैं। लेकिन सभी मंत्रों में एक शुभ अक्षर समान रूप से बोला जाता है। वह है ॐ यानी प्रणव। वैदिक, पौराणिक या बीज मंत्रों की शुरुआत ऊँकार से होती है। असल में मंत्रों के आगे ॐ लगाने के पीछे का रहस्य धर्मशास्त्रों में मिलता है। 

डालते हैं इस पर एक नजर-

शास्त्रों के मुताबिक पूरी प्रकृति तीन गुणों से बनी है। ये तीन गुण है - रज, सत और तम। वहीं ॐ को एकाक्षर ब्रह्म माना गया है, जो पूरी प्रकृति की रचना, स्थिति और संहार का कारण है। इस तरह इन तीनों गुणों का ईश्वर ॐ है। चूंकि भगवान गणेश भी परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। उनके नाम का एक अर्थ गणों के ईश ही नहीं गुणों का ईश भी है।

इस कारण ॐ को प्रणवाकार गणेश की मूर्ति भी माना गया है। श्री गणेश मंगलमूर्ति होकर प्रथम पूजनीय देवता भी हैं। इसलिए ॐ यानी प्रणव को श्री गणेश का प्रत्यक्ष रूप मानकर वेदमंत्रों के आगे विशेष रूप से लगाकर उच्चारण किया जाता है। जिसमें मंत्रों के आगे श्री गणेश की प्रतिष्ठा, ध्यान और नाम जप का भाव होता है, जो पूरे संसार के लिये बहुत ही मंगलकारी, शुभ और शांति देने वाला होता है।

क्या स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं है... ?



इस विषय पर मैं पाठकों का ध्यान कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर दिलाना चाहता हूँ :

०१. जब ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा ऋषि स्त्रियां हो सकतीं हैं तो उनको अध्ययन के अधिकार का निषेध करना मेरी दृष्टि से कभी समयविशेष की आवश्यकता रही होगी, आज इस बात की आवश्यकता नहीं।

०२. ऋग्वेद के मन्त्रों का दर्शन करने वाले ४०२ ऋषियों में से ३७७ पुरुष तथा २५ महिलायें हैं, जब देवता हिरण्यगर्भ प्राण इन २५ ऋषिकाओं के पवित्र हृदय में वेदमन्त्रों का प्राकट्य कर सकते हैं, तो फिर माताओं को वेदाध्ययन का अधिकार न देने का कोई औचित्य नहीं।

०३. बृहदारण्यकोपनिषद् में गार्गी एवं मैत्रेयी के याज्ञवल्क्यमुनि के साथ संवाद को देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि वे अपने वैदिक ज्ञान में यजुर्वेद के इस श्रेष्ठतम मुनि से कहीं भी कम होंगी।

०४. इसके अतिरिक्त स्मृतिवाक्यों ने स्वीकार किया कि प्राचीन काल में स्त्रियों को गायत्री मन्त्र भी दिया जाता था ओर मौञ्जी बन्धन भी किया जाता था। पुरा कल्पे तु नारीणां मौज्ञ्जी बन्धनमिष्यते इत्यादि।

०५. पत्नी शब्द का संस्कृत में अर्थ ही होता है पति के साथ यज्ञ में संयुक्त होने वाली... हम जानते हैं कि वैदिक काल में कोई भी यज्ञ यजमानी के बिना नहीं हो सकता था... अब अगर उसको वेद का ज्ञान नहीं होगा, तो वह वैदिक यज्ञ कैसे सम्पन्न करेगी ?

०६. हां, कुछ अपेक्षाकृत आधुनिक धर्मशास्त्रों में और पुराणों में स्पष्ट निषेध है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब विदेशियों के आक्रमण के परिणाम स्वरूप स्त्रियों का जीवन भारत में असुरक्षित होता चला गया है, तभी घूंघट से ले कर सारे सीमित करने वाले नियम उनकी सुरक्षा के लिये वैसे ही बनाये गये हैं। जैसे आज से कुछ वर्ष पहले तक फिलिस्तीन की मुसलमान लड़कियां कभी अपने बाल और सिर नहीं ढकती थी, पर अब इतने अधिक अत्याचार के उपरान्त अधिकतर अपनी सुरक्षा के लिये उन्हें ढकने लगी हैं।

०७. ऋग्वेद १०:८५ के सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिकाएँ " सूर्या सावित्री" हैं।

०८. ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के २४ अध्याय में इस प्रकार है -

घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित ।
ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्तस्य स्वसादिती !!८४!!
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी ।
लोपामुद्रा च नद्यस्य यमी नारी च शाश्वती !!८५!!
श्री लक्ष्मिः सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधाच दक्षिण ।
रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः !!८६!!


०९. ऋग्वेद के १०:१३४, १०:३९, १९:४०, ८:९१, १०:५, १०:१०७, १०:१०९, १०:१५४, १०:१५९, १०:१८९, ५:२८, ८:९१ अदि सूक्तों की मंत्रद्रष्टा यह ऋषिकाएँ हैं।

१०. आचार्य श्री मध्वाचार्य जी ने महाभारत निर्णय में द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए लिखा है :

वेदाश्चप्युत्तम स्त्रीभिः कृष्णात्ताभिरिहाखिलाः !

इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में भी स्त्रियाँ वेदाध्ययन करती थीं।

११. तैत्तिरीय ब्रह्मण में सोम द्वारा 'सीता सावित्री' ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है। (तैत्तिरीय ब्राह्मण १:३:१० )

१२. वभूव श्रीमती राजन शांडिलस्य महात्मनः !
सुता धृतव्रता साध्वी, नियता ब्रह्मचारिणी !!
साधू तप्त्वा तपो घोरे दुश्चरम स्त्री जनेन ह !
गता स्वर्ग महाभागा देव ब्रह्मण पूजिता!! 
महाभारत , शल्य पर्व ५४:९ !!

अर्थात:- महात्मा शांडिल्य की पुत्री 'श्रीमती' थी, जिसने व्रतों को धारण किया। वेदाध्ययन में निरंतर प्रवृत्त थी! अत्यंत कठिन तप करके वह देवी ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारीं।

१३. अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेद पारगा!
अधीत्य सकलान वेदान लेभेSसंदेहमक्षयम !! महाभारत, उद्योग पर्व १९०:१८ !!

अर्थात:- शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थीं, उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष प्राप्त किया !

१४. विष्णु पुराण १:१० और १८:१९ में तथा मार्कंडेय पुराण अध्याय २२ में भी इस प्रकार ब्रह्मवादिनी (वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है।

१५. आचार्य शंकर को भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करना पड़ा था। उसने ऐसा अद्भुत शास्त्रार्थ किया था कि बड़े-बड़े विद्वान भी अचंभित रह गए थे।

शंकर-दिग्विजय में भारती देवी के सम्बन्ध लिखा है-


सर्वाणि शास्त्राणि षडंग वेदान,
कव्यादिकान वेत्ति, परंच सर्वम !
तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र वाला,
तस्मादभुच्चित्र पदम् जनानाम !! 
शंकर दिग्विजय ३:१६ !!

अर्थात:- भारती देवी सर्वशास्त्र तथा अंगों सहित सब वेदों और काव्यों को जानती थीं। उससे बढ़कर श्रेष्ठ और विद्वान् स्त्री और न थी।

आज जिस प्रकार स्त्रियों के शास्त्राध्ययन पर रोक लगी जाती है, यदि उस समय ऐसे प्रतिबन्ध होते तो याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाली स्त्रिया किस प्रकार हो सकती थीं?

ऐसे अनेकों प्रमाण मिलते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं! वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या आदि में पारंगत थीं। वेद, उपनिषद् आदि धर्मशास्त्रों पर स्त्रियों का सामान अधिकार सर्वदा रहा है।



सोमवार व्रत कथा


एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी मृत्युलोक में विवाह की इच्छा करके माता पार्वती के साथ पधारे। विदर्भ देश की अमरावती नगरी जो कि सभी सुखों से परिपूर्ण थी वहां पधारे. वहां के राजा द्वारा एक अत्यंत सुन्दर शिव मंदिर था, जहां वे रहने लगे. एक बार पार्वती जी ने चौसर खलने की इच्छा की. तभी मंदिर में पुजारी के प्रवेश करन्बे पर माताजी ने पूछा कि इस बाज़ी में किसकी जीत होगी? तो ब्राह्मण ने कहा कि महादेव जी की. लेकिन पार्वती जी जीत गयीं. तब ब्राह्मण को उन्होंने झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी होने का श्राप दिया. कई दिनों के पश्चात देवलोक की अपसराएं, उस मंदिर में पधारीं, और उसे देखकर कारण पूछा. पुजारी ने निःसंकोच सब बताया. तब अप्सराओं ने ढाढस बंधाया, और सोलह सोमवार के व्रत्र रखने को बताया. विधि पूछने पर उन्होंने विधि भी उपरोक्तानुसार बतायी. इससे शिवजी की कृपा से सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं.फ़िर अप्सराएं स्वर्ग को चलीं गयीं. ब्राह्मण ने सोमवारों का व्रत कर के रोगमुक्त होकर जीवन व्यतीत किया. 

कुछ दिन उपरांत शिव पार्वती जी के पधारने पर, पार्वती जी ने उसके रोगमुक्त होने का करण पूछा. तब ब्राह्मण ने सारी कथा बतायी. तब पार्वती जी ने भी यही व्रत किया, और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. उनके रूठे पुत्र कार्तिकेय जी माता के आज्ञाकारी हुए. परन्तु कार्तिकेय जी ने अपने विचार परिवर्तन का कारण पूछा. तब पार्वती जी ने वही कथा उन्हें भी बतायी. तब स्वामी कार्तिकेय जी ने भी यही व्रत किया. उनकी भी इच्छा पूर्ण हुई. उनसे उनके मित्र ब्राह्मण ने पूछ कर यही व्रत किया. फ़िर वह ब्राह्मण विदेश गया और एक राज के यहां स्वयंवर में गया. वहां राजा ने प्रण किया था, कि एक हथिनी एक माला, जिस के गले में डालेगी , वह अपनी पुत्री उसी से विवाह करेगा. वहां शिव कृपा से हथिनी ने माला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी. राजा ने उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. उस कन्या के पूछने पर ब्राह्मण ने उसे कथा बतायी. तब उस कन्या ने भी वही व्रत कर एक सुंदर पुत्र पाया. 

बाद में उस पुत्र ने भी यही व्रत किया और एक वृद्ध राजा का राज्य पाया. जब वह नया राजा सोमवार की पूजा करने गया, तो उसकी पत्नी अश्रद्धा होने से नहीं गयी. पूजा पूर्ण होने पर आकाश वाणी हुई, कि राजन इस कन्या को छोड़ दे, अन्यथा तेरा सर्वनाश हो जाये गा.अंत में उसने रानी को राज्य से निकाल दिया. वह रानी भूखी प्यासी रोती हुई दूसरे नगर में पहुंची. वहां एक बुढ़िया उसे मिली, जिसके साथ वह कथा का बाकि अंश उसे एक बुढि औरत मिलि जो धागे बनाती थी। उसिके साथ काम करने लगि पर दुसरे दिन जब वो धागा बेचने निकली तो अचानक तेज हवा चलि और सारे धागे उडगए तो मालिकिन ने गुस्से मे आकर उसे कामसे निकाल दिया। फिर रोते फिरते वह एक तेलिके घर पहुँची तेलिने उसे रखलिया पर भन्डार घरमे जाते हि तेलके बर्तन गिरगए और तेल बहगया तो उस तेलीने उसे घरसे नीकाल दिया। इसप्रकार सभि जगहसे निकाले जानेके बाद वह एक सुन्दर वनमे पहुँची वहाँके तलावसे पानी पिने के लिए जब बढि तो तालाब सुखगया थोडा पानी बचा जो कि किटोसे युक्त था। उसि पानीको पिकर वो एक ब्रक्षके निचे बैठ गई पर तुरंत उस ब्रक्षके पत्ते झड गए। इसतरह वो जिस ब्रक्षके निचेसे गुजरति वह ब्र्क्ष पत्तोसे बिहिन होजाता ऐसे ही सारा वन हि सुखनेको आया। यह देखकर कुछ चरवाहोने उस रानीको लेकर एक शिवमंदिरके पुजारीके पास लेगए। वहा रानीने पुजारीके आग्रहसे सारी बात बतायी और सुनकर पुजारीने कहाकी तुम्हे शिवका श्राप लगा है। रानीने बिन्ती करके पुछातो पुजारीने इसके निदानका उपाय बताया और सोमवार ब्रतकि बिधि बताई। रानीने तनमन से ब्रत पुरा किया और शिवकी क्रिपासे सत्रहवे सोमवारको राजाका मन परिवर्तन हुवा। 

राजाने रानी को ढुढने दूत भेजे। पता लगने के बाद राजाने बुलावा भेजा पर पुजारीने कहा राजाको स्वयं भेजो। इसपर राजाने विचार कीया और स्वयं पहुचे। रानीको लेकर दरवार पहुचे और उनका स्थान दिया। सम्पुर्ण सहरमे खुसिया मनायी गयि राजाने गरिबोको काफि दानतक्षिणा किया और शिवके परमभक्त होकर नियम पुर्वक 16 सोमवार का ब्रत करने लगे और संसारके सारे सुखको भोगकर अंतमे सिवधाम गए। इसप्रकार जो भि मनुश्य श्रद्धा पुर्वक नियमसे 16 सोमवार का ब्रत करेगा वह इस लोकमे परम सुखोको प्राप्तकर अंतमे परलोकमे मुक्ती प्राप्त होगा

शहद गुणों की खान





शहद को आयुर्वेद में औषधीय गुणों का खजाना माना गया है। शहद का अलग-अलग तरह से उपयोग कर हम हमारे शरीर की कई सारी समस्याओं को दूर भगा सकते हैं। शहद में यह गुण होता भी है कि इसका अलग-अलग वस्तुओं के साथ उ
पयोग करने पर इसके गुण भी भिन्न हो जाते हैं ।

१. शहद को मसूड़ों पर मलने से पायरिया नहीं होता।

२. छोटे बच्चों को दूध पिलाने से पहले शहद चटा दें। फिर दूध पिलाएं ये रोग निरोधक क्षमता बढ़ाता है।

३. बेसन, मलाई में शहद मिलाकर त्वचा पर लगाएं। थोड़ी देर बाद धो लें, चेहरा चमक उठेगा ।

४. प्रतिदिन 25 ग्राम शहद दूध के साथ जरूर लें । इससे शरीर को ताकत मिलती है।

५. त्वचा सम्बन्धी रोग हो या कहीं जल-कट गया हो तो शहद लगाएं। जादू सा असर दिखाई देगा।

६. रात को सोने से पहले दूध के साथ शहद लेने पर बहुत अच्छी नींद आती है।

७. दूध में शक्कर की जगह शहद लेने से गैस नहीं बनती और पेट के कीड़े भी निकल जाते हैं।

८. जुकाम होने पर शहद की भाप लें व उसी पानी से कुल्ला करें।

९. शहद, गाजर के जूस के साथ लेने से आंखों की रोशनी को बढ़ाने में मदद करता है। इसे खाना खाने से एक घंटा पहले लेना चाहिये।

१०. खांसी में यह एक अचूक औषधि का काम करती है। बराबर की मात्र में अदरक के रस के साथ लेने से, सर्दी, गले की खराश, जुकाम तथा छाती में कन्जैशन से आराम मिलता है।

११. अदरक जूस, काली मिर्च के पाउडर के साथ शहर मिला कर (बराबर मात्र) में लेने से अस्थमा के रोगियों को दिन में तीन बार लेने से आराम मिलता है।

१२. प्रात: काल शौच जाने से पहले गर्म पानी के गिलास में 1-2 चम्मच शहद तथा एक चम्मच ‘निंबू जूस’ मिलाकर पीने से रक्त शुद्धि का कार्य करता है तथा मोटापे को बढ़ने से भी रोकता है।

१३. ह्रदय के लिए भी शहद गुणकारी है, मीठी सौंफ के साथ 1-2 चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से दिल को मजबूत तो करता ही है। हृदय को सुचारू रूप से कार्य करने में भी मदद करता है।