04 July 2013

!!! २ प्रकार के श्री शिव चालीसा !!!


अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। 
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥ 

आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार। 
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥ 

पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। 
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥ 

पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। 
ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥ 

जय शिव शङ्कर औढरदानी। 
जय गिरितनया मातु भवानी॥ 

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥ 
सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥ 
पराशक्ति -पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति॥ 

सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥ 
अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥ 

वृषवाहन नंदीगणनायक। अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥ 
व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥ 
कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥ 

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥ 

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर। गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥ 

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी॥ 

तुम हो नित्य दया के सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर॥ 

अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सबके मंगलकारी॥ 

सती-पार्वती के प्राणेश्वर। स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥ 

हरि-हर एक रूप गुणशीला। करत स्वामि-सेवक की लीला॥ 

रहते दोउ पूजत पुजवावत। पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥ 

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥ 

जग-जित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकंठ वर॥ 

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥ 

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥ 

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परमहित॥ 

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी। ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥ 

अर्जुन संग लडे किरात बन। दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥ 

भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥ 

शङ्खचूड जालन्धर मारे। दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥ 

अन्धकको गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥ 

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥ 

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥ 

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥ 

काशी मरत जंतु अवलोकी। देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥ 

भक्त भगीरथ की रुचि राखी। जटा बसी गंगा सुर साखी॥ 

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥ 

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥ 

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥ 

अति उदार करुणावरुणालय। हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥ 

तुम्हरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥ 

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥ 

भेदशून्य तुम सबके स्वामी। सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥ 

जो जन शरण तुम्हारी आवत। सकल दुरित तत्काल नशावत॥ 

|| दोहा ||

बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। 

गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार॥ 

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय। 

तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय॥ 

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। 

कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥ 

कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र। 

राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥ 



श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥


!!! गणेशज़ी के १०८ नाम !!!




ॐ गणपतये नमः॥ ॐ गणेश्वराय नमः॥ 
ॐ गणक्रीडाय नमः॥


ॐ गणनाथाय नमः॥ ॐ गणाधिपाय नमः॥ 
ॐ एकदंष्ट्राय नमः॥
ॐ वक्रतुण्डाय नमः॥ ॐ गजवक्त्राय नमः॥ 
ॐ मदोदराय नमः॥
ॐ लम्बोदराय नमः॥ ॐ धूम्रवर्णाय नमः॥ ॐ विकटाय नमः॥
ॐ विघ्ननायकाय नमः॥ ॐ सुमुखाय नमः॥ ॐ दुर्मुखाय नमः॥
ॐ बुद्धाय नमः॥ ॐ विघ्नराजाय नमः॥ ॐ गजाननाय नमः॥
ॐ भीमाय नमः॥ ॐ प्रमोदाय नमः ॥ ॐ आनन्दाय नमः॥
ॐ सुरानन्दाय नमः॥ ॐ मदोत्कटाय नमः॥ ॐ हेरम्बाय नमः॥
ॐ शम्बराय नमः॥ ॐ शम्भवे नमः ॥ॐ लम्बकर्णाय नमः ॥ॐ महाबलाय नमः ॥ ॐ नन्दनाय नमः ॥ॐ अलम्पटाय नमः ॥ॐ भीमाय नमः ॥ॐ मेघनादाय नमः ॥ ॐ गणञ्जयाय नमः ॥ॐ विनायकाय नमः ॥ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥ॐ धीराय नमः ॥
ॐ शूराय नमः ॥ॐ वरप्रदाय नमः ॥ॐ महागणपतये नमः ॥ॐ बुद्धिप्रियाय नमः ॥ ॐ क्षिप्रप्रसादनाय नमः ॥ॐ रुद्रप्रियाय नमः ॥ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॥ॐ उमापुत्राय नमः ॥ ॐ अघनाशनाय नमः ॥ॐ कुमारगुरवे नमः ॥ॐ ईशानपुत्राय नमः ॥ॐ मूषकवाहनाय नः ॥
ॐ सिद्धिप्रदाय नमः ॥ॐ सिद्धिपतये नमः ॥ॐ सिद्ध्यै नमः ॥ॐ सिद्धिविनायकाय नमः ॥ ॐ विघ्नाय नमः ॥ॐ तुङ्गभुजाय नमः ॥ॐ सिंहवाहनाय नमः ॥ॐ मोहिनीप्रियाय नमः ॥ ॐ कटिंकटाय नमः ॥ॐ राजपुत्राय नमः ॥ॐ शकलाय नमः ॥ॐ सम्मिताय नमः ॥
ॐ अमिताय नमः ॥ॐ कूश्माण्डगणसम्भूताय नमः ॥ॐ दुर्जयाय नमः ॥ॐ धूर्जयाय नमः ॥ ॐ अजयाय नमः ॥ॐ भूपतये नमः ॥ॐ भुवनेशाय नमः ॥ॐ भूतानां पतये नमः ॥ ॐ अव्ययाय नमः ॥ॐ विश्वकर्त्रे नमः ॥ॐ विश्वमुखाय नमः ॥ॐ विश्वरूपाय नमः ॥
ॐ निधये नमः ॥ॐ घृणये नमः ॥ॐ कवये नमः ॥ॐ कवीनामृषभाय नमः ॥ ॐ ब्रह्मण्याय नमः ॥ ॐ ब्रह्मणस्पतये नमः ॥ॐ ज्येष्ठराजाय नमः ॥ॐ निधिपतये नमः ॥ ॐ निधिप्रियपतिप्रियाय नमः ॥ॐ हिरण्मयपुरान्तस्थाय नमः ॥ॐ सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः ॥ ॐ कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलाय नमः ॥ॐ पूषदन्तभृते नमः ॥ॐ उमाङ्गकेळिकुतुकिने नमः ॥ ॐ मुक्तिदाय नमः ॥ॐ कुलपालकाय नमः ॥ॐ किरीटिने नमः ॥ॐ कुण्डलिने नमः ॥ ॐ हारिणे नमः ॥ॐ वनमालिने नमः ॥ॐ मनोमयाय नमः ॥ॐ वैमुख्यहतदृश्यश्रियै नमः ॥ ॐ पादाहत्याजितक्षितये नमः ॥ॐ सद्योजाताय नमः ॥ॐ स्वर्णभुजाय नमः ॥ ॐ मेखलिन नमः ॥ॐ दुर्निमित्तहृते नमः ॥ॐ दुस्स्वप्नहृते नमः ॥ॐ प्रहसनाय नमः ॥
ॐ गुणिने नमः ॥ॐ नादप्रतिष्ठिताय नमः ॥ॐ सुरूपाय नमः ॥ॐ सर्वनेत्राधिवासाय नमः ॥ ॐ वीरासनाश्रयाय नमः ॥ॐ पीताम्बराय नमः ॥ॐ खड्गधराय नमः ॥ ॐ खण्डेन्दुकृतशेखराय नमः ॥ॐ चित्राङ्कश्यामदशनाय नमः ॥ॐ फालचन्द्राय नमः ॥ ॐ चतुर्भुजाय नमः ॥ॐ योगाधिपाय नमः ॥ॐ तारकस्थाय नमः ॥ॐ पुरुषाय नमः ॥
ॐ गजकर्णकाय नमः ॥ॐ गणाधिराजाय नमः ॥ॐ विजयस्थिराय नमः ॥
ॐ गणपतये नमः ॥ॐ ध्वजिने नमः ॥ॐ देवदेवाय नमः ॥ॐ स्मरप्राणदीपकाय नमः ॥
ॐ वायुकीलकाय नमः ॥ॐ विपश्चिद्वरदाय नमः ॥ॐ नादाय नमः ॥
ॐ नादभिन्नवलाहकाय नमः ॥ॐ वराहवदनाय नमः ॥ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ॥
ॐ व्याघ्राजिनाम्बराय नमः ॥ॐ इच्छाशक्तिधराय नमः ॥ॐ देवत्रात्रे नमः ॥
ॐ दैत्यविमर्दनाय नमः ॥ॐ शम्भुवक्त्रोद्भवाय नमः ॥ॐ शम्भुकोपघ्ने नमः ॥
ॐ शम्भुहास्यभुवे नमः ॥ॐ शम्भुतेजसे नमः ॥ॐ शिवाशोकहारिणे नमः ॥
ॐ गौरीसुखावहाय नमः ॥ॐ उमाङ्गमलजाय नमः ॥ॐ गौरीतेजोभुवे नमः ॥
ॐ स्वर्धुनीभवाय नमः ॥ॐ यज्ञकायाय नमः ॥ॐ महानादाय नमः ॥ॐ गिरिवर्ष्मणे नमः ॥
ॐ शुभाननाय नमः ॥ॐ सर्वात्मने नमः ॥ॐ सर्वदेवात्मने नमः ॥ॐ ब्रह्ममूर्ध्ने नमः ॥
ॐ ककुप्छ्रुतये नमः ॥ॐ ब्रह्माण्डकुम्भाय नमः ॥ॐ चिद्व्योमफालाय नमः ॥
ॐ सत्यशिरोरुहाय नमः ॥ॐ जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषाय नमः ॥ॐ अग्न्यर्कसोमदृशे नमः ॥
ॐ गिरीन्द्रैकरदाय नमः ॥ॐ धर्माय नमः ॥ॐ धर्मिष्ठाय नमः ॥ॐ सामबृंहिताय नमः ॥
ॐ ग्रहर्क्षदशनाय नमः ॥ॐ वाणीजिह्वाय नमः ॥ॐ वासवनासिकाय नमः ॥
ॐ कुलाचलांसाय नमः ॥ॐ सोमार्कघण्टाय नमः ॥ॐ रुद्रशिरोधराय नमः ॥
ॐ नदीनदभुजाय नमः ॥ॐ सर्पाङ्गुळिकाय नमः ॥ॐ तारकानखाय नमः ॥
ॐ भ्रूमध्यसंस्थतकराय नमः ॥ॐ ब्रह्मविद्यामदोत्कटाय नमः ॥ ॐ व्योमनाभाय नमः ॥
ॐ श्रीहृदयाय नमः ॥ॐ मेरुपृष्ठाय नमः ॥ॐ अर्णवोदराय नमः ॥
ॐ कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षः किन्नरमानुषाय नमः ॥

!!! सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर कथा !!!



संम्पूर्ण भारत में 12 ज्योतिर्लिंग है. पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग सौराष्टृ में कठवाडा नामक स्थान में है. मल्लिकार्जुन श्री शैल ज्योतिर्लिंग, महाकाल ज्योतिर्लिंग, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग, विश्वनाथ विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग, त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग, वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग, रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग, घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग.

इस प्रकार कुल 12 ज्योतिर्लिंग है.किवदंतियों के अनुसार इस स्थान पर ही भगवान श्री कृ्ष्ण ने अपनी देह का त्याग किया था. इस वजह से यहां आज भी भगवान शिव के साथ साथ भगवान श्री कृ्ष्ण का भी सुन्दर मंदिर है.

सोमनाथ मंदिर

सोमनाथ मंदिर में प्राचीन समय में अन्य अनेक देवों के मंदिर भी थे़ इसमें शिवजी के 137 मंदिर थे. भगवान श्री विष्णु के 7, देवी के 27, सूर्यदेव के 16, श्री गणेश के 5 मंदिर थे़ समय के साथ इन मंदिरों की संख्या कुछ कम हो गई है. सोमनाथ मंदिर से 200 किलोमीटर दूर श्रीकृ्ष्ण की द्वारिका नगरी मानी जाती है. यहां भी भारत के ही नहीं वरण देश विदेश से अनेक भक्त दर्शनों के लिए आते है.

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर कथा |

ज्योतिर्लिंग के प्राद्रुभाव की एक पौराणिक कथा प्रचलित है. कथा के अनुसार राजा दक्ष ने अपनी सताईस कन्याओं का विवाह चन्द देव से किया था. सत्ताईस कन्याओं का पति बन कर देव बेहद खुश थे. सभी कन्याएं भी इस विवाह से प्रसन्न थी. इन सभी कन्याओं में चन्द्र देव सबसे अधिक रोहिंणी नामक कन्या पर मोहित थे़. जब यह बात दक्ष को मालूम हुई तो उन्होनें चन्द्र देव को समझाया. लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. उनके समझाने का प्रभाव यह हुआ कि उनकी आसक्ति रोहिणी के प्रति और अधिक हो गई.

यह जानने के बाद राजा दक्ष ने देव चन्द्र को शाप दे दिया कि, जाओं आज से तुम क्षयरोग के मरीज हो जाओ. श्रापवश देव चन्द्र् क्षय रोग से पीडित हो गए. उनके सम्मान और प्रभाव में भी कमी हो गई. इस शाप से मुक्त होने के लिए वे भगवान ब्रह्मा की शरण में गए.

इस शाप से मुक्ति का ब्रह्मा देव ने यह उपाय बताया कि जिस जगह पर आप सोमनाथ मंदिर है, उस स्थान पर आकर चन्द देव को भगवान शिव का तप करने के लिए कहा. भगवान ब्रह्मा जी के कहे अनुसार भगवान शिव की उपासना करने के बाद चन्द्र देव श्राप से मुक्त हो गए.

उसी समय से यह मान्यता है, कि भगवान चन्द इस स्थान पर शिव तपस्या करने के लिए आये थे. तपस्या पूरी होने के बाद भगवान शिव ने चन्द्र देव से वर मांगने के लिए कहा. इस पर चन्द्र देव ने वर मांगा कि हे भगवान आप मुझे इस श्राप से मुक्त कर दीजिए. और मेरे सारे अपराध क्षमा कर दीजिए.

इस श्राप को पूरी से समाप्त करना भगवान शिव के लिए भी सम्भव नहीं था. मध्य का मार्ग निकाला गया, कि एक माह में जो पक्ष होते है. एक शुक्ल पक्ष और कृ्ष्ण पक्ष एक पक्ष में उनका यह श्राप नहीं रहेगा. परन्तु इस पक्ष में इस श्राप से ग्रस्त रहेगें. शुक्ल पक्ष और कृ्ष्ण पक्ष में वे एक पक्ष में बढते है, और दूसरे में वो घटते जाते है. चन्द्र देव ने भगवान शिव की यह कृ्पा प्राप्त करने के लिए उन्हें धन्यवाद किया. ओर उनकी स्तुति की.

उसी समय से इस स्थान पर भगवान शिव की इस स्थान पर उपासना करना का प्रचलन प्रारम्भ हुआ. तथा भगवान शिव सोमनाथ मंदिर में आकर पूरे विश्व में विख्यात हो गए. देवता भी इस स्थान को नमन करते है. इस स्थान पर चन्द्र देव भी भगवान शिव के साथ स्थित है.


सोमनाथ कुण्ड स्थापाना |

यहां से संबन्धित एक अन्य कथा के अनुसार यहां पर स्थित सोमनाथ नामक कुंड की स्थापना देवों के द्वारा की गई है. यह माना जाता है, कि इस स्थन पर भगवान शिव और ब्रहा देव आज भी निवास करते है. वर्तमान में जो भी श्रद्वालु इस कुंड में स्नान करता है. वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है. यहां तक की असाध्य से असाध्य रोग भी इस स्थान पर आकर ठिक हो जाते है. अगर कोई व्यक्ति क्षय रोग से युक्त है, तो उसे पूरे छ: माह तक इस कुंड् में स्नान करना चाहिए. इससे वह व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है.

सोमनाथ मंदिर महिमा |

इसके अतिरिक्त किसी कारण वश अगर कोई व्यक्ति यहां दर्शनों के लिए नहीं आ सकता है. तो उसे केवल यहां की उत्पत्ति की कथा सुन लेनी चाहिए. यह कथा सुनने मात्र से व्यक्ति पुन्य का भागी बनता है. सोमनाथ मंदिर स्थल पर दर्शन करने मात्र से व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती है. 12 ज्योतिर्लिंगों में इस स्थान को सबसे ऊपर स्थान दिया गया है.

यहां पर कोई भक्त अगर दो सोमवार भी यहां की पूजा में शामिल जो जाता है, तो उसके सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. सावन मास में भगवान शिव के पूजन का विशेष महत्व है. उस समय में यहां दर्शन करने से विशेष पुन्य की प्राप्ति होती है. यहां आकर शिव भक्ति का अपना ही एक अलग महत्व है. यह श्विव महिमा है, कि शिवरात्रि की रात्रि में यहां एक माला शिव के महामृ्त्युंजय मंत्र का जाप चमत्कारिक फल देता है.


!!! सच्ची शिव भक्ति, उपासना, साधना !!!


शास्त्रो में भगवान शिव को वेद या ज्ञान स्वरूप माना गया है। इसलिए शिव भक्ति मन की चंचलता को रोक व्यक्ति को दुःख व दुर्गति से बचाने वाली मानी जाती है। भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए ही धर्म व लोक परंपराओं में अभिषेक, पूजा व मंत्र जप आदि किए जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि तन, मन और वचन के स्तर पर सच्ची शिव भक्ति, उपासना, साधना और सेवा के सही तरीके या विधान क्या हैं? इसका जवाब शिवपुराण में मिलता है, जिसमें शिव सेवा को 'शिव धर्म' भी बताया गया है। जानिए, शिव भक्ति और सेवा के ये खास तरीके -


शिवपुराण के मुताबिक भक्ति के तीन रूप हैं। यह है मानसिक या मन से, वाचिक या बोल से और शारीरिक यानी शरीर से। सरल शब्दों में कहें तो तन, मन और वचन से देव भक्ति।

इनमें भगवान शिव के स्वरूप का चिन्तन मन से, मंत्र और जप वचन से और पूजा परंपरा शरीर से सेवा मानी गई है। इन तीनों तरीकों से की जाने वाली सेवा ही शिव धर्म कहलाती है। इस शिव धर्म या शिव की सेवा के भी पांच रूप हैं, जो शिव भक्ति के 5 सबसे अच्छे उपाय भी माने जाते हैं।
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  • ध्यान - शिव के रूप में लीन होना या चिन्तन करना ध्यान कहलाता है।
  • कर्म - लिंगपूजा सहित अन्य शिव पूजन परंपरा कर्म कहलाते हैं।
  • तप - चान्द्रायण व्रत सहित अन्य शिव व्रत विधान तप कहलाते हैं।
  • जप - शब्द, मन आदि द्वारा शिव मंत्र का अभ्यास या दोहराव जप कहलाता है।
  • ज्ञान - भगवान शिव की स्तुति, महिमा और शक्ति बताने वाले शास्त्रों की शिक्षा ज्ञान कही जाती है।
  • इस तरह शिव धर्म का पालन या शिव की सेवा हर शिव भक्त को बुरे कर्मों, विचारों व इच्छाओं से दूर कर शांति और सुख की ओर ले जाती है।


03 July 2013

!!! दुर्गा-पूजा विधान !!!



एकान्त स्थान पर जगह को साफ़ करने के बाद उसे नमक मिले पानी से साफ़ करें,और दुर्गा पूजा के लिये कलश स्थापना कर लें,फ़िर प्राण्गमुख होकर आसन पर बैठ जावें,जल से शिखा का प्रेक्षण करे,और शिखा को बांध लें। तिलक लगाकर आचमन एवं प्राणायाम करें। हाथ में फ़ूल लेकर अंजलि बांध कर दुर्गाजी का ध्यान करे। 

ध्यान का मंत्र इस प्रकार है:-


सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिभुजै:,शंखं चक्रधनु:शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभि: शोभिता।
आमुक्तांगदहारकंकणरणत्कांचीरणन्नूपुरा,दुर्गा दुर्गति हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥

(ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ऊँ दुर्गायै नम:)


अर्थ:- जो सिंह की पीठ पर विराजमान है,जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है,जो मरकतमणि के समान कान्तिवाली अपनी चार भुआओं में शंख चक्र धनुष और बाण धारण करती हैं,तीन नेत्रों से सुशोभित होती है,जिनके भिन्न भिन्न अंग बांधे हुये बाजूबंद हार कंकण खनखनाती हुई करधनी और रुनझुन करते हुये नूपुरों से विभूषित है,तथा जिनके कानों में रत्न जटित कुण्डल झिलमिलाते रहते है,वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों। यदि प्रतिष्टित मूर्ति हो तो आवाहन की जगह पुष्पांजलि दें,नहीं तो दुर्गाजी का आवाहन करें।


आवाहन


आगच्छ त्वं महादेवि ! स्थाने चात्र स्थिरा भव। यावत पूजां करिष्यामि तावत त्वं संनिधौ भव॥
श्री जगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहयामि। आवाहनार्थे पुष्पांजलि समर्पयामि ॥ 

(दोनो हाथों में फ़ूल लेकर प्रतिमा या आवाहन करने वाले नारियल के ऊपर हाथ का पृष्ठ भाग नीचे रखकर चढायें।

आसन


अनेक रत्न संयुक्तम नाना मणि गणान्वितम। इदम हेममयम दिव्यासनम प्रति गृह्यताम॥
श्री जगदाम्बायै दुर्गा देव्यै नम:। आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। 

(सजा हुआ आसन या प्रतिमा पर फूल चढाकर आसन पर स्थापित होने की प्रार्थना करें)

पाद्य


गंगादि सर्व तीर्थेभ्य आनीतम तोय मुत्तमम। पाद्यार्थम ते प्रदास्यामि ग्रहाण परमेश्वरि॥

(साफ़ बिना टोंटी के लोटे से प्रतिमा या नारियल में देवी के पैरों में जल चढायें).


अर्घ्य



गन्ध पुष्प अक्षतैर्युक्तम अर्घ्यम सम्पादितम मया। ग्रहाण त्वम महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा॥

(पानी में लाल चन्दन घिसकर मिलालें,फ़ूल डाल लें,और चावल मिलाकर देवी के हाथों में लगायें)

आचमन


कर्पूरेण सुगन्धेन वासितम स्वादु शीतलम। तोयम आचमनीयार्थम ग्रहाण परमेश्वरि॥

(कोरे घडे से निकाला हुआ ठंडा जल,कपूर मिलाकर देवी को प्रार्थना करके उनको आचमन के लिये चढायें)

स्नान


मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरम शुभम। तदिदम कल्पितम देवि! स्नार्थम प्रतिगृह्यताम॥

(गंगाजल या पवित्र नदी का जल लेकर प्रतिमा अथवा नारियल को स्नान करवाने का क्रम करें)


स्नानांग-आचमन


स्नानान्ते पुनराचमनीयम जलम समर्पयामि।

(स्नान के बाद आचमन के लिये शुद्ध कपूर मिला जल दें)

दुग्ध स्नान


कामधेनु सम उत्पन्नम सर्व ईशाम जीवनम परम। पावनम यज्ञ हेतुश्च पय: स्नानार्थम अर्पितम॥

(गाय के दूध से स्नान करवायें)

दधि स्नान

पयस अस्तु समुद भूतम मधुर अम्लम शशि प्रभम। दध्यानीतम मया देवि! स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(गाय के दही से स्नान करवायें)

घृतस्नान

नवनीत सम उत्पन्नम सर्व संतोष कारकम। घृतम तुभ्यम प्रदस्य अमि स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(गाय के घी से स्नान करवायें)

मधु स्नान


पुष्प रेणु सम उत्पन्नम सु स्वादु मधुरम मधु। तेज: पुष्टि सम आयुक्तम स्नार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शहद से स्नान करवायें)

शर्करा स्नान

इक्षु सार सम अद्भुताम शर्कराम पुष्टिदाम शुभाम।मल अपहारिकाम दिव्याम स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शक्कर से स्नान करवायें)

पंचामृत स्नान

पयो दधि घृत चैव मधु च शर्करान्वितम। पंचामृतम मय आनीतम स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(किसी दूसरे बर्तन में दूध,दही,घी,शहद,शक्कर मिलाकर पंचामृत का निर्माण करें और किसी कांसे या चांदी के पात्र में इसी पंचामृत से स्नान करवायें)

गन्धोदक स्नान

मलयाचल सम्भूतम चन्दन अगरु मिश्रितम। सलिलम देव देवेशि शुद्ध स्नानाय गृह्यताम॥

(सफ़ेद चंदन लकडी वाला घिसकर और अगर को पानी में घिस कर एक बर्तन में मिलाकर स्नान करवायें)


शुद्धोदक स्नान


शुद्धम यत सलिलम दिव्यम गंगाजल समम स्मृतम। समर्पितम मया भक्त्या स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शुद्ध जल से स्नान करवायें,और स्नान करवाने के बाद आचमन के लिये वही कपूर मिला शीतल जल दें)


वस्त्र पहिनाना


पट्ट युगमम मया दत्तम कंचुकेन समन्वितम। परिधेहि कृपाम कृत्वा माता दुर्गति नाशिनि॥

(लाल रंग की कंचुकी पहिनायें,फ़िर लाल रंग की साडी या वेष पहिनायें और ऊपर से चुनरी ओढायें,हाथों में लाल रंग की मौली बांधे,फ़िर आचमन के लिये वही कपूर से युक्त शीतल जल आचमन के लिये दें)

सौभाग्यसूत्र


सौभाग्य सूत्रम वरदे सुवर्ण मणि संयुतम। कण्ठे बघ्नामि देवेशि सौभाग्यम देहि मे सदा॥

(मंगल सूत्र लाल धागे का पीले रंग के मोतियों से युक्त या स्वर्ण से बने मोतियों से युक्त देवी के गले में पहिनायें,माता पुत्र का मानसिक ध्यान करे)

चन्दन

श्रीखण्डम चन्दनम दिव्यम गन्ध आढ्यम सुमनोहरम। विलेपनम सुर श्रेष्ठे चन्दनम प्रति गृह्यताम॥

(लकडी वाला लाल चन्दन शिला पर पानी के साथ घिस कर माता के माथे पर तिलक स्थान पर,दोनो कानों की लौरियों पर दोनो हाथों के बाजुओं पर और दोनो हाथों की हथेलियों पर लगायें)


हरिद्राचूर्ण


हरिद्रा रंचिते देवि ! सुख सौभाग्य दायिनी। तस्मात त्वाम पूज्याम यत्र सुखम शान्तिम प्रयच्छ में॥

(हल्दी को पहले से घिसकर लेप बनाकर सुखा लें,फ़िर उसका चूर्ण पूजा के लिये सावधानी से रख ले,और माता के सभी अंगों पर लगायें,हल्दी को पीस कर या बाजार की हल्दी को पिसी हुयी लाकर कदापि नहीं चढायें)


कुंकुम


कुंकुमम कामदम दिव्यम कामिनी काम सम्भवम। कुंकुमेन अर्चितम देवी कुंकुमम प्रति गृह्यताम॥

(माता के पैरों में कुंकुम लगायें,दोनो हाथों में लगायें)


सिन्दूर


सिन्दूरमरुणाभासम जपा कुसुम संनिभम। अर्पितम ते मया भक्त्या प्रसीद परमेश्वरि॥

(माता के माथे पर सिन्दूर की बिन्दी लगायें,नाक की सीध में बालों के अन्दर सिन्दूर भरें)

काजल


चक्षुर्भ्याम कज्जलम रम्यम सुभगे शान्ति कारकम। कर्पूर्ज्योति समुत्पन्नम गृहाण परमेश्वरि॥

(कपूर को जलाकर उसकी लौ के ऊपर कांसे का बर्तन रखें थोडी सी देर में काले रंग का काजल बर्तन पर आजायेगा,उस काजल को माता की आंखों में नीचे की तरफ़ सावधानी से दाहिने हाथ की अनामिका उंगली से लगायें)

दूर्वांकुर


तृणकान्त मणि प्रख्य हरित अभि: सुजातिभि:। दूर्वाभिराभिर्भवतीम पूजयामि महेश्वरि॥

(किसी नदी या साफ़ स्थान से हरी और सफ़ेद दूब जिसके अन्दर ऊपर के भाग की तीन पत्तियों के अंकुर हों साफ़ करने के बाद अपने पास रखलें,रोजाना लाना सम्भव नही हो तो पहले लाकर किसी साफ़ सफ़ेद कपडे को गीला करने के बाद उसके अन्दर लपेट कर रख दें,पीली दूब या सूखी दूब कभी नही चढायें,१०८ या कम से कम १८ अंकुर रोजाना जरूर चढायें)

बिल्वपत्र

त्रिदलम त्रिगुणाकारम त्रिनेत्रम च त्रिधायुतम। त्रिजन्म पाप संहारम बिल्वपत्रम शिवार्पणम॥

(अर्धनारीश्वर की आभा में देवी का रूप है,शैवमत के अनुसार शिव के बिना शक्ति नही है और शक्ति के बिना शिव नही है,बिल्व पत्र की तीन पत्तियों वाली हरी कोमल शाखायें माता के तीन नेत्रों का प्रति रूप है,ध्यान रखना चाहिये कि यह नौ से अधिक कभी न चढायें,पहली तीन पत्ती की शाखा माता के आंखों के ऊपर लगायें बाद में कान नाक मुंह हाथ नाभि कटि गुहा पैरों लगाना चाहिये)


आभूषण


हार कंकण केयूर मेखला कुण्डलादिभि:। रत्नाढ्यम हीरकोपेतम भूषणम प्रति गृह्यताम॥

(दुर्गापूजा से पहले ही माता के लिये स्वर्ण या रजत से निर्मित हार कंगन बाजूबंद कनकती कुन्डल पाजेब बिछिया जिनके अन्दर विभिन्न रत्न लगे हों बनवाकर रख लेना चाहिये,और पूजा में पहिनाने चाहिये,तथा मूर्ति विसर्जित होने पर उनको किसी कन्या को दान कर देना चाहिये,या मूर्ति के साथ जाने देना चाहिये,भूलकर भी लोभ वश उन्हे अन्य काम के लिये नहीं रखना चाहिये)

पुष्पमाला


माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तित:। मय आर्ह्यतानि पुष्पाणि पूजार्थम प्रति गृह्यताम॥

(अपने हाथ से लाल फ़ूलों की माला लाल रंग के धागे में अपने हाथों से पिरोना चाहिये,फ़ूल सौ से अधिक या कम नही हों,एक बार या प्रतिमा के अनुसार दो बार तीन बार माला को घुमाकर दाहिने से पहिनानी चाहिये)

परिमल द्रव्य


अबीरम गुलालम च हरिद्रा आदि समन्वितम। नाना परिमल द्रव्यम गृहाण परमेश्वरि॥

(सफ़ेद रंग की खडिया मिट्टी को पीसकर लाल रंग और सुगन्धित केवडा आदि मिलाकर अबीर तैयार करना चाहिये,हल्दी,चन्दन,छोटी इलायची और तेज पत्ता को पीसकर गुलाल तैयार करना चाहिये,हल्दी का पहले तैयार किया चूर्ण कपूर पीस कर मिलाकर तैयार करना चाहिये,और माता के चारों तरफ़ दाहिने से बायें चढाना चाहिये)

सौभाग्य पेटिका


हरिद्राम कुंकुमम चैव सिन्दूरादि समन्वितम। सौभाग्यपेटिकामेताम गृहाण परमेश्वरि॥

(हल्दी का चूर्ण कुंकुम सिन्दूर हरी चूडियां श्रंगार का अन्य सामान सहित सौभाग्य पेटी (श्रंगारदान) माता को अर्पित करें)

धूप


वनस्पतिरसोदभूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तम:। आघ्रेय: सर्वदेवानाम धूपोअयम प्रति गृह्यताम॥

(धूप जो बनी हुई अगर तगर कपूर चन्दन के बुरादे से युक्त माता के सामने धूपें)

दीप

साज्यं च वर्ति संयुक्तम वाहिन्ना योजितम मया। दीपम गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहम॥

(शुद्ध रुई की दोहरी बत्ती बनायें,और आरती वाले पात्र में जिसमे कमसे कम दो अंगुल ऊंचा शुद्ध गाय का घी भरा हो,उसके अन्दर बत्तियों को डुबोकर अगरबत्ती से दीपक को प्रज्वलित करें,दीपक के अन्दर एक चांदी का या सोने का सिक्का डालें और माता को दिखायें,दीपक दिखाकर दीपक को अपने दाहिने रखें और हाथ साफ़ पानी से धो लें)

नैवेद्य

शर्कराखण्ड खाद्यानि दधि क्षीर घृतानि च। आहारार्थम भक्ष्य भोज्यम नैवेद्यम प्रति गृह्यताम॥

(शक्कर और दही तथा खीर में घी मिलाकर नैवेद्य माता को आहार के रूप में अर्पित करें,नैवेद्य अर्पित करने के बाद आचमन के लिये कपूर मिला शीतल जल अर्पित करें,उसके बाद सादा पानी हाथ और मुंह धोने के लिये अर्पित करें)


ऋतुफ़ल


इदम फ़लम मया देवि स्थापितम पुरतस्तव। तेन मे सफ़ल अवाप्तिर भवेज जन्मनि जन्मनि॥

(जो भी फ़ल बाजार में आ रहे हों,उन्ही को बिना दाग धब्बे के लेकर आवें,और माता को प्रकार प्रकार के चढावें)

ताम्बूल

पूगीफ़लम महाद्दिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम। एलालवंगसंयुक्तम ताम्बूलम प्रतिगृह्यताम॥

(इलायची लौंग सुपाडी और पान माता को अर्पित करें)

दक्षिणा

दक्षिणाम हेमसहिताम यथा शक्ति समर्पिताम। अनन्तफ़लदामेनाम गृहाण परमेश्वरि॥

(मुद्रा में जो वर्तमान में चल रही हो,सिक्कों के रूप में माता को चढायें,भूलकर भी कागज की मुद्रा नही चढायें,अगर नही मिले तो केवल चावल बिना टूटे चढावें)

आरती


कदली गर्भ सम्भूतम कर्पूरम तु प्रदीपितम। आरार्तिकमहम कुर्वे पश्य माम वरदा भव॥

(चलते हुये दीपक से पीतल के बर्तन में कपूर को जला लें और माता की दाहिने बायें सात बार आरती उतारें,और आरती के बाद पानी को तांबे के लोटे में भरकर सात बार पानी से आरती उतारें)

दुर्गा सप्तशती का मन्त्र पाठ

एक सौ आठ बार दुर्गा सप्तशती का मंत्र जाप करें, मंत्र के शुरु में जो "ऊँ" प्रत्यय लगा है उसे कदापि नही बोलें,मन्त्र को शुरु करने के लिये उच्चारण को साफ़ तरीके से करें, मन्त्र है:-

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चै,ऊँ ग्लों हूँ क्लीं जूँ स:, ज्वालय ज्वालय,ज्वल जवल,प्रज्वल प्रज्वल,ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चै,ज्वल हँ सँ लँ क्षँ फ़ट स्वाहा।

तदुपरान्त दुर्गा सप्तशती के पाठ जो तीन चरित्रों में है उनको क्रम बार करें,चाहें तो तुरत परिणाम के लिये पाठ के पहले रात्रि सूक्त और इक्कीस बार कुंजिका-स्तोत्र फ़िर एक बार रात्रि सूक्त का पाठ करें।



!!! ऊँ और स्वास्तिक का महत्व !!!



स्वास्तिक भारतीयों में चाहे वे वैदिक मतालम्बी हों या सनातनी हो या जैन मतालम्बी,ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी मांगलिक कार्यों जैसे विवह आदि संस्कार घर के अन्दर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर "ऊँ" और स्वातिक का दोनो का अथवा एक एक का प्रयोग किया जाता है। इन दोनो का प्रयोग करने का तरीका यह जरूरी नही है कि वह पढे लिखे या विद्वान संगति में ही देखने को मिलता हो,यह किसी भी ग्रामीण या शहरी संस्कृति में देखने को मिल जाता है। किसी के घर में मांगलिक कार्य होते है तो दरवाजे पर लिखा जाता है,किसी मंदिर में जाते है तो उसके दरवाजे पर यह लिखा मिलता है,किसी प्रकार की नई लिखा पढी की जाती है तो शुरु में इन दोनो को या एक को ही प्रयोग में लाया जाता है। "ऊँ" के अन्दर तीन अक्षरों का प्रयोग किया जाता है,"अ उ म" इन तीनो अक्षरों में अ से अज यानी ब्रह्मा जो ब्रह्माण्ड के निर्माता है,सृष्टि का बनाने का काम जिनके पास है,उ से उनन्द यानी विष्णुजी जो ब्रह्माण्ड के पालक है और सृष्टि को पालने का कार्य करते है, म से महेश यानी भगवान शिवजी,जो ब्रह्माण्ड में बदलाव के लिये पुराने को नया बनाने के लिये विघटन का कार्य करते है। वेदों में ऊँ को प्रणव की संज्ञा दी गयी है,जब भी किसी वेद मंत्र का उच्चारण होता है तो ऊँकार से ही शुरु किया जाता है,स्वास्तिक को चित्र के रूप में भी बनाया जाता है और लिखा भी जाता है जैसे "स्वास्ति न इन्द्र:" आदि.

हिन्दू समाज में किसी भी शुभ संस्कार में स्वास्तिक का अलग अलग तरीके से प्रयोग किया जाता है,बच्चे का पहली बार जब मुंडन संस्कार किया जाता है तो स्वास्तिक को बुआ के द्वारा बच्चे के सिर पर हल्दी रोली मक्खन को मिलाकर बनाया जाता है,स्वास्तिक को सिर के ऊपर बनाने का अर्थ माना जाता है कि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों का योगात्मक रूप सिर पर हमेशा प्रभावी रहे,स्वास्तिक के अन्दर चारों भागों के अन्दर बिन्दु लगाने का मतलब होता है कि व्यक्ति का दिमाग केन्द्रित रहे,चारों तरफ़ भटके नही,वृहद रूप में स्वास्तिक की भुजा का फ़ैलाव सम्बन्धित दिशा से सम्पूर्ण इनर्जी को एकत्रित करने के बाद बिन्दु की तरफ़ इकट्ठा करने से भी माना जाता है,स्वास्तिक का केन्द्र जहाँ चारों भुजायें एक साथ काटती है,उसे सिर के बिलकुल बीच में चुना जाता है,बीच का स्थान बच्चे के सिर में परखने के लिये जहाँ हड्डी विहीन हिस्सा होता है और एक तरह से ब्रह्मरंध के रूप में उम्र की प्राथमिक अवस्था में उपस्थित होता है और वयस्क होने पर वह हड्डी से ढक जाता है,के स्थान पर बनाया जाता है। स्वास्तिक संस्कृत भाषा का अव्यय पद है,पाणिनीय व्याकरण के अनुसार इसे वैयाकरण कौमुदी में ५४ वें क्रम पर अव्यय पदों में गिनाया गया है। यह स्वास्तिक पद ’सु’ उपसर्ग तथा ’अस्ति’ अव्यय (क्रम ६१) के संयोग से बना है,इसलिये ’सु+अस्ति=स्वास्ति’ इसमें ’इकोयणचि’सूत्र से उकार के स्थान में वकार हुआ है। ’स्वास्ति’ में भी ’अस्ति’ को अव्यय माना गया है और ’स्वास्ति’ अव्यय पद का अर्थ ’कल्याण’ ’मंगल’ ’शुभ’ आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है। जब स्वास्ति में ’क’ प्रत्यय का समावेश हो जाता है तो वह कारक का रूप धारण कर लेता है और उसे ’स्वास्तिक’ का नाम दे दिया जाता है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व में अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है,जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है,अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वास्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है,हिटलर का यह फ़ौज का निशान था,कहा जाता है कि वह इसे अपनी वर्दी पर दोनो तरफ़ बैज के रूप में प्रयोग करता था,लेकिन उसके अंत के समय भूल से बर्दी के बेज में उसे टेलर ने उल्टा लगा दिया था,जितना शुभ अर्थ सीधे स्वास्तिक का लगाया जाता है,उससे भी अधिक उल्टे स्वास्तिक का अनर्थ भी माना जाता है। स्वास्तिक की भुजाओं का प्रयोग अन्दर की तरफ़ गोलाई में लाने पर वह सौम्य माना जाता है,बाहर की तरफ़ नुकीले हथियार के रूप में करने पर वह रक्षक के रूप में माना जाता है। काला स्वास्तिक शमशानी शक्तियों को बस में करने के लिये किया जाता है,लाल स्वास्तिक का प्रयोग शरीर की सुरक्षा के साथ भौतिक सुरक्षा के प्रति भी माना जाता है,डाक्टरों ने भी स्वास्तिक का प्रयोग आदि काल से किया है,लेकिन वहां सौम्यता और दिशा निर्देश नही होता है। केवल धन (+) का निशान ही मिलता है। पीले रंग का स्वास्तिक धर्म के मामलों में और संस्कार के मामलों में किया जाता है,विभिन्न रंगों का प्रयोग विभिन्न कारणों के लिये किया जाता है।


ऊँ परमात्मा वाची कहा गया है,ऊँ को मंगल रूप में जाना गया है,जैन धर्म के अनुसार ऊँ पंच परमेष्ठीवाचक की उपाधि से विभूषित है। णमोकार मंत्र के पहले इसे प्रयोग किया गया है। ऊँ एक बीजाक्षर की भांति है,इसके मात्र उच्चारण करने से ही भक्ति महिमा का निष्पादन हो जाता है। इसका रूप दोनो आंखों के बीच में आंखों को बन्द करने के बाद सुनहले रूप में कल्पित करते रहने से यह सहज योग का रूप सामने लाना शुरु कर देता है,और उन अनुभूतियों की तरफ़ मनुष्य जाना शुरु कर देता है जिन्हे वह कभी सोच भी नही सकता है।

ऊँ कार बिन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिना:।
कामदं मोक्षदं चैव ऊँकाराय नमो नम:॥




!!! हनुमान पूजा और वैज्ञानिक तथ्य !!!


हनुमान पूजा और वैज्ञानिक तथ्यहमारे भारत वर्ष में अक्षर पूजा की मान्यता रही है,अक्षरों को मूर्तियों में उकेर कर और उनके रूप को सजाकर विभिन्न नाम दिये गये है। समय की धारा में मूर्ति को ही भगवान मान लिया गया और उन्ही की श्रद्धा से पूजा की जाने लगी,हनुमान जी की पूजा का अर्थ भी यही लिया गया। अक्षर "ह" को सजाकर और ब्रह्मविद्या से जोड कर देखा जाये तो "हं" की उत्पत्ति होती है। मुँह को खोलने के बाद ही अक्षर "ह" का उच्चारण किया जा सकता है। अक्षर "हं" को उच्चारित करते समय नाक और मुंह के अलावा नाभि से लेकर सिर के सर्वोपरि भाग में उपस्थित ब्रह्मरन्ध तक हवा का संचार हो जाता है। "हं हनुमतये नम:" का जाप करते करते गला जीभ और व्यान अपान सभी वायु निकल कर शरीर से बाहर हो जाती हैं। इसी प्रकार मारक अक्षर "क" का सम्बोधन करने पर और बीजाक्षर "क्रीं" को सजाने पर मारक शक्ति काली का रूप सामने आता है,लेकिन बीज "क्रां" को सजाने पर पर्वत को धारण किये हुये हनुमान जी का रूप सामने आजाता है,ग्रहों के बीजाक्षरों को उच्चारण करने पर उन्ही अक्षरों के प्रयोग को सकारात्मक,नकारात्मक और द्विशक्ति बीजों का उच्चारण किया जाता है। जैसे मंगल जिनके देवता स्वयं हनुमान जी है,के बीजात्मक मंत्र के लिये "ऊँ क्रां क्रीं क्रौं स: भोमाय नम:" का उच्चारण किया जाता है,इस बीज मंत्र में "क्र" आक्रामक रूप में सामने होता है,बडे आ की मात्रा लगाने पर समर्थ होता है और बिन्दु का प्रयोग करने पर ब्रह्माण्डीय शक्तियों का प्रवेश होता है।
इसी प्रकार से अगर शिव जी के मंत्र को जपा जाता है तो "ऊँ नम: शिवाय" का जाप किया जाता है,अक्षर "श" को ध्यानपूर्वक देखने पर बैठे हुये भगवान शिव का रूप सामने आता है,लेकिन जबतक "इ" की मात्रा नही लगती है,तब तक शब्द "शव" ही रहता है,इ की मात्रा लगते ही "शिव" शक्ति से पूर्ण हो जाता है,शनि देव का रंग काला है और ग्रहों के लिये इनका प्रयोग शक्ति वाले श का प्रयोग किया गया है,अगर शनि के बीज मंत्र को ध्यान से देखें तो "शं" बीज का प्रयोग किया गया है,"ऊँ शं शनिश्चराय नम:" का जाप करने पर भगवान शनि के द्वारा दिये गये कठिन समय को आराम से निकाला जा सकता है।
लेकिन अक्षर "शं" को साकार रूप में सजाने पर मुरली बजाते हुये भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति भी मिलती है,और उस मूर्ति का रंग भी काला है,वृंदावन में कोकिलावन की उपस्थिति इसी बात का द्योतक मानी जा सकती है। शब्द हरि को अगर सजा दिया जाये तो लिटाकर रखने पर सागर के अन्दर लेटी हुयी भगवान विष्णु की प्रतिमा को माना जा सकता है। "श्रीं" शब्द को सजाकर देखा जाये तो लक्ष्मी जी का रूप साक्षात देखा जा सकता है।
ह्रीं को सजाकर देखने पर माता सरस्वती को देखा जा सकता है,इसी प्रकार से विभिन्न अक्षरों को सजाकर देखने पर उन भगवान के दर्शन होते है।


!!! मंत्रात्मक श्री दुर्गा-सप्तशती !!!


श्री दुर्गा सप्तशती का प्रस्तुत संस्करण गुप्तावतार पूज्य बाबा श्री द्वारा अपने प्रिय स्वदेश भारतवर्ष के प्रति दिया गया एक अनूठा और अद्वितीय उपहार है। इसकी पाण्डु लिपि आपने अपने कर कमलो से उस विलक्षण अनुष्ठान के लिये तैयार की थी,जिसके सम्पन्न होने के फ़लस्वरूप ही संवत १९९९ वि. सन १९४२ में भारत छोडो आन्दोलन हुआ और भारत स्वतंत्र हुआ। पूज्य चरण बाबा मोतीलाल जी महाराज ने श्रीदुर्गा सप्तशती के इस संस्करण के सम्बन्ध मे अपने कर कमलों से लिखित रजिस्टर के प्रारम्भ में लिखा है कि -

हिमालय के प्रवास में नेपाल की तिब्बती सीमा पर एक ब्राह्मण नेवार शिष्य साधक ने मन्त्रात्मक सप्तशती की यह प्रति मुझे दी जो अपने ढंग की अनूठी है,यह पाण्डुलिपि संवत ११२१ वि. यानी सन १०६४ ई. की थी।

मन्त्रात्मक सप्तशती के प्रस्तुत संस्करण को बाबा श्री ने संवत १९८१ वि सन १९२४ ई में काशी में पुन: लिपि बद्ध किया था। इसमें उन्होने विस्तार पूर्वक श्रीद्र्गा सप्तशती के ७०० मन्त्रों का सम्पूर्ण पूजा विधान व आहुति प्रकार लिखा। दैव योग से बाबा श्री द्वारा लिखित रजिस्टर श्री चण्डी धाम में आज भी सुरक्षित है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि प्रस्तुत मन्त्रात्मक सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के अनुष्ठान की जो विधि दी गयी है,वह देखने से ही बडी वैज्ञानिक प्रतीत होती है। साधकों को सुविधा के लिये प्रत्येक मन्त्र का विधान और अधिक स्पष्ट रूप में अलग अलग प्रकाशित किया जा रहा है,इससे कोई भी श्रद्धालु व्यक्तिसहज ही अपने अभीष्ट मन्त्र का अनुष्ठान कर लाभ उठा सकता है।

अन्त मे यह लिखना आवश्यक है कि लोगों को अपने गुरु देव की अनुमति प्राप्त कर ही मन्त्रात्मक सप्तशती के अनुसार किसी अनुष्ठान में प्रवृत्त होना चाहिये।

परिचय

हम सबको उपहार स्वरूप मन्त्रात्मक सप्तशती देने वाले पूज्य बाबा श्री का जन्म सं १९४१ विक्रमी को श्रावण शुक्ला त्रयोदशी को हुआ था। आज उनकी १२७ वीं जयन्ती के पावन अवसर पर मन्त्रात्मक सप्तशती के इन्टरनेट संस्करण को लिखने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है। यह किताब श्री श्याम सुन्दर भुवालका जी कलकत्ता वालों की तरफ़ से बहुत पहले मुझे दी गयी थी। इसके बारे में अधिक विस्तार से बताने वाले लाल बाबा रतनगढ वाले आज हमारे बीच नही है जिन्होने मुझे दस विद्या की जानकारी भुवालका जी के कलकत्ता निवास पर दी थी।

पूज्य बाबा श्री मन्त्र शास्त्र के गहन ज्ञाता होने के साथ ही परम देश भक्त भी थे। बाबा श्री चरितामृत नामक आपके परिचय ग्रन्थ में आपके सम्बन्ध में सन १९२७ से सम्पर्क में रहने वाले श्री यशवन्त केशव प्रधान लिखते है कि -

"……..सन १९३० में जिन दिनो सारे देश में महात्मा गांधी का आन्दोलन प्रारम्भ होकर उच्च स्थिति को प्राप्त कर रहा था,उन दिनो श्री बाबा जी महाराज सदा चिन्ता ग्रस्त मालुम होते थे। भारत वर्ष की भावी स्थिति के सम्बन्ध में वे सदैव चिन्त्तित रहते थे। मेरे देखने में जो श्रेष्ठ उपासक पुरुष साधु सन्त इत्यादि अब तक आये है,उनमे से अधिकांश अपनी स्वयं की उन्नति किस प्रकार हो सकती इसी विचार में मग्न रहने वाले रहे है। भारत का पुनुरुत्थान कैसे होगा और कैसे किया जाये ? इस प्रकर का विचार करने वाले केवल बाबाजी महाराज मिले। उनके जैसा अपने शिष्य की उन्नतावस्था के लिये सदा दूक्ष द्रिष्टि से विचार करने वाला और साथ ही शाथ अपने राष्ट्र के सम्बन्ध मे विचार करने वाला सन्त मेरे देखने में तथा अध्ययन करने में अन्य कोई नही हुआ।

पूज्य श्री बाबाजी ने भारत के उत्थान के लिये शत चण्डी यज्ञ भी किया था,इस्के लिये उनके निर्देशानुसार निम्न संकल्प के अनुसार चैत्र पूर्णिमा के दिन अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ यथा -

"मम देशस्य क्षेम स्थैर्यायुरारोग्यामिवृद्धयर्थ श्री जगदम्बा योग माया-भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थ च नमो युत प्रणव वाग बीज स्व बीज लोम विलोम पुटितोक्त शरणागत सम्पुटित श्रीसप्तशत्यन्तर्गत अमुक (श्लोक संख्या) मन्त्र जपे विनियोग:।"

पूज्य श्री बाबाश्री ने हमे उक्त संकल्प के साथ्ही सप्तशती के श्लोक पाठ भी दिखलाये। श्लोकों का अर्थ बताने के साथ साथ किन किन कार्यों में इन श्लोकों का अनुष्ठान किया जाता है व किसने किसने ऐसे अनुष्ठान किये है,इस सबका उन्होने वर्णन किया। प्रत्येक श्लोक का कौन कौन सा गुण है कौन सी इन्द्रिय है कौन सा रस है,कौन सी कर्मेन्द्रिय है कौन सा स्वर है कौन से तत्व है कौन सी कला है कौन सी मुद्रा है और क्या ध्यान है ? इत्यादि समस्त बातें जब बाबा श्री ने हमे बता दीं तब हम सब लोगों ने मन्त्र के द्वारा आहुति दी।

इस प्रकार दस आदमी दस बार मन्त्र पढकर आहुति देते थे। नित्य दश श्लोक होते थे और अन्त में आरती आदि होने के पश्चात प्रसाद बांटा जाता था। फ़िर राज के एक बजे के बाद सारा समूह बाबाजी के साथ सागर के किनारे शमशान भूमि के पास बैठता था और प्राय: प्रात: चार बजे हमें बांदरा स्टेशन पहुंचना दिया जाता था।

उक्त अनुष्ठान के पूर्ण होने में लगभग तीन महिने लग गये। अनुष्ठान के पूर्ण होने पर पूज्य बाबाजी के निर्देशों से ऐसा आभास हुआ कि कि इसी प्रकार के और भी महत्य के अनुष्ठाओं का योग आयेगा।

दूसरा अनुष्ठान श्रावण मास में आरम्भ हुआ था। इस बार किसी यन्त्र की प्रतिष्ठा नही की गयी। चांदी का एक विशाल कुम्भ जो पहले के कुम्भ से अधिक बडा था एक यन्त्र पर स्थापित किया गया था। इस दूसरे अनुष्ठान का संकल्प तीव्र था। भगवती योग माया दुर्गा देवी के प्रसाद से स्वदेश के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर देश की स्वतन्त्रता के लिये पूर्ववत बीज सहित प्रत्येक श्लोक की = इत्यं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति। तदा तदावतीर्याऽहं करिष्याम्यारि संक्षयम।" इस मन्त्र से सम्पुटित कर अनुष्ठान किया गया।

बाबाजी ने कुछ श्लोकों के लिये -

"कु-नीतिन: ब्रिटेनस्य,गृहीत्वा त्वमुपागता। लोकेषु विनाशाय ख्याता देवि! भविष्यसि॥"

उक्त पाठ को लेकर हवन किया था। कुछ समय के बाद मैने महाराज श्री से पूछा था कि - इस यज्ञ की फ़लद्रूपता कब होगी ? उन्होने बताया था कि "अभी और तम बाकी है, तीसरा अनुष्ठान हो जाये,तो जल्दी ही सिद्धि प्राप्ति होगी। नही तो तम निरसन होने में नौ या ग्यारह वर्ष लगेंगे",ऐसा ही हुआ। ग्यारह वर्षों के बाद आठ अगस्त १९४२ को भारत छोडो आन्दोलन की शुरुआत हुयी और आगे नौ वर्षों की अवधि के भीतर ही स्वराज मिल गया और छब्बिस जनवरी १९५० भारतीय गणराज्य की स्थापना भी हो गयी।…"

स्पष्ट है कि बाबाश्री द्वारा प्राप्त प्रस्तुत मन्त्रात्मक सप्तशती नामक विधान अत्यन्त विलक्षण है। इसके द्वारा पूज्य बाबा श्री ने भारत की स्वतन्त्रता हेतु अनुष्ठान कर हमें प्रेरणा दी है,वह अपने आप में अपूर्व एवं पूर्णतया फ़लप्रद है। मन्त्रात्मक सप्तशती जैसे सांगोपांग अनुष्ठान के द्वारा हम अपना एवं अपने देश का अभीष्ट कल्याण करें,यही बाबा श्री की इच्छा थी। हमे बाबा श्री की इस इच्छा को सदैव ध्यान में रखना चाहिये।

साधना की कुछ विशेष बातें

मन्त्रात्मक सप्तशती में श्रीदुर्गा सप्तशती के प्रत्येक मन्त्र का सर्वश्रेष्ठ विधान है,इसमें मन्त्र के १४ अंगों का वर्णन है, यथा -१. ऋषि,२. देवता,३. बीज,

४. शक्ति,५. महाविद्या,६. गुण, ७. ज्ञानेन्द्रिय, ८. रस, ९. कर्मेन्द्रिय १०. स्वर, ११. तत्व, १२. कला, १३. उत्कीलन, १४. मुद्रा, मन्त्र के इन १४ अंगों से तादात्म्य स्थापित होने पर श्रीजगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।

मन्त्र का पहला अंग ऋषि होता है । ऋषि शब्द गत्यर्थक ऋ धातु और षिंड. प्रापणे प्रत्यय से बना है,जिससे उस परम साधक का बोध होता है,जो मन्त्र की वास्तविक गति से परमात्मा के स्वरूप को स्वयं प्राप्त करता है एवं कराता है। इस प्रकार किसी मन्त्र को सिद्ध करने के लिये मन्त्र के ऋषि से तादाम्त्य स्थापित करना परम आवश्यक है।

देवता मन्त्र का दूसरा अंग है इसके द्वारा साधक को देव भाव की प्राप्ति होती है।

बीज मन्त्र के स्फ़ुरण एवं विकास का केन्द्र है,इसकी अपने में स्थापना होने से ही अभीष्ट फ़ल की प्राप्ति होती है।

शक्ति मन्त्र की क्रिया शक्ति का बोधक है इससे तादात्म्य होने पर साधक की क्रिया शक्ति मन्त्र मय हो जाती है।

महाविद्या मन्त्र की मूल प्रकृति की सूचक है इससे तादात्म्य होने पर साधक की प्रकृति भी मन्त्र मय हो जाती है।

गुण ज्ञानेन्द्रिय रस कर्मेन्द्रिय स्वर तत्व कला मन्त्र के अन्य विशिष्ट अंग है,इनसे तादात्म्य होने पर साधक का मन्त्र से सीधा सम्बन्ध हो जाता है।

मन्त्र का ऊर्जा स्वरूप उत्कीलन द्वारा हस्तगत होता है,इससे तादात्म्य स्थापित होने पर मन्त्र की ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है।

मन्त्र की ऊर्जा सतत प्रवाहित होने के लिये मन्त्र की प्रसन्नता कारक शक्ति मुद्रा का ज्ञान होन आवश्यक है,अत: सम्पूर्ण शरीर में इसकी प्रतिष्ठा की जाती है।

अभीष्ट फ़ल की प्राप्ति साधक के प्रार्थना भाव की गहराई पर न्रिभर होती है,अत: अंजलो यानी प्रार्थना मुद्रा में जुडे दोनो हाथों मे इसका न्यास किया जाता है।

मन्त्र के अक्षरों को छ: भागों मे विभाजित करके छ कर अंगों १. अंगूठा २. तर्जनियों ३. मध्यमाओं ४. अनामिकाओं ५. कनिष्ठाओं ६. करतल पृष्ठों में तथा छ: प्रधान अंगों १. ह्रदय २. शिर ३. शिखा ४. कवच ५. नेत्र ६. अस्त्र में प्रतिष्ठित किया जाता है।

अंगुष्ठाभ्याम नम: ह्रदयाय नम: का तात्पर्य है कि भावना मय देवता के समक्ष साधक सब प्रकार से अपनी विनम्रता प्रकट करता है।

तर्जनीभ्याम नम: और शिरसे स्वाहा का तात्पर्य है कि साधक क्षुद्र अहन्ता के स्थान पर दिव्य अहन्ता का अनुभव करता है।

मध्यमा वषट शिखायै वषट के द्वारा साधक आत्मा के दिव्य तेजोमय स्वरूप का अनुभव करता है,वषट का अर्थ समर्पण है।

अनामिकाभ्याम हुम और कवचाय हुम के द्वारा साधक अपने तेजोमय स्वरूप के सुरक्षित होने की भावना करता है,इससे साधक में दूसरों के लिये भय प्रद और अपनेलिये रक्षा कारक तेज का प्रादुर्भाव होता है।

कनिष्ठकाभ्याम वौषट और नेत्र त्राय वौषट के द्वारा साधक मन्त्र रूपी आत्मशक्ति का साक्षात्कार करता है।

करतल कर पृष्ठाभ्याम फ़ट और अस्त्राय फ़ट के द्वारा साधक अपने तीनो प्रकार के तापों को दूर फ़ेंक कर मन्त्र शक्ति की ज्ञानाग्नि में जलाकर भस्म करने की भावना करता है।

इस प्रकार से साधना करने से अभीष्ट फ़ल की प्राप्ति निश्चित होती है। पूज्य बाबाश्री ने श्रीदुर्गा सप्तशती के प्रत्येक मन्त्र हेतु हमें पूर्ण विधान उपहार स्वरूप दिया है। हम सबको इस दिव्य विधान द्वारा अपना एवं देश का अभीष्ट कल्याण सिद्ध करना चाहिये। श्रीदुर्गा सप्तशती के श्लोकों मे कल्याणकारी भाव छिपे है,किसी अभीष्ट कल्याण कारी श्लोक को मन्त्रात्मक सप्तशती के विधान के अनुसार प्रत्येक श्लोक के साथ सम्पुटित कर विशिष्ट अभीष्ट फ़ल प्राप्त कर सकते है।

किसी विशिष्ट अभीष्ट फ़ल की कामना नही होने पर केवल माँ दुर्गा की कृपा एवं अपने कल्याण की कामना हो तो प्रस्तुत विधान के द्वारा प्रतिदिन निश्चित संख्या में एक एक मन्त्र का अनुष्ठान करने से विशेष अनुभूतियों की प्राप्ति होती है। यदि हवन करना सम्भव नही हो तो उसके स्थान पर दशांस जाप अधिक करना चाहिये। इस प्रकार क्रमश: एक एक मन्त्र का अनुष्ठान कर सभी ७०० मन्त्रों का अनुष्ठान अकेले पूरा किया जा सकता है। जो बन्धु समर्थ हो वे यज्ञ की भांति इससे अनुष्ठान कर या करवा सकते है। दस या दस से अधिक योग्य व्यक्तियों का सहयोग लेकर सभी मन्त्रों का अनुष्ठान कुछ ही दिनो में सम्पन्न किया जा सकता है।

अन्त में यह उल्लेखनीय है कि बाबाश्री के अनुसार प्रस्तुत मन्त्रात्मक सप्तशती का विधान मुख्यत: ऊर्ध्वाम्नायोक्त है। अत: इसका प्रयोग क्षुद्र कामनाओं के लिये नही करना चाहिये,व्यक्ति समाज राष्ट्र के वास्तविक कल्याण हेतु ही इसका अनुष्ठान करना चाहिये।

महाकाली





प्रथम चरित विधानं

विनियोग

ऊँ प्रथम चरितस्य श्रीब्रह्मा ऋषि: महाकाली देवता गायत्री छन्द: नन्दा शक्ति: रक्त दन्तिका बीजं अग्नितत्वं ऋग्वेद: स्वरूपं श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थं जपे विनियोग: ।

ऋष्यादि न्यास

श्री ब्रह्मा ऋषये नम: शिरसि,श्रीमहाकाली देवतायै नमं ह्रदि,गायत्री छन्दसे नम: मुखे,नन्दा शक्तयै नम: नाभौ,रक्त दन्तिका बीजाय नम: लिंगे,अग्नि तत्वाय नम: गुह्ये,ऋग्वेद स्वरूपाय नम: पादौ,श्रीमहाकाली प्रीत्यर्थं जपे विनियोगाय नम: सर्वांगे।


षडंग न्यास:कर न्यास:अंग न्यास:
खंगिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा,शंखिनी चापिनी बाण भुशुण्डी परिघायुधाअंगुष्ठाभ्याम नम:ह्रदयाय नम:
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खडगेन चाम्बिके,घण्टा स्वनेन न: पाहि चाप ज्या नि: स्वनेन चतर्जनीभ्याम स्वाहाशिरसे स्वाहा
प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे,भ्रामणेनात्म शूलस्य उत्तरस्यां तथेस्वरिमध्यमाम वषटशिखायै वषट
सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते,यानि चात्यर्थ घोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवंअनामिकाभ्यां हुमकवचाय हुम
खडग शूल गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके,कर पल्लव संगीनि तैरस्मान रक्ष सर्वत:कनिष्ठकाभ्याम वौषटनेत्रत्राय वौषट
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते,भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु तेकरतल कर पृष्ठाभ्याम फ़टअस्त्राय फ़ट

ध्यानम
षडंग न्यास: कर न्यास: अंग न्यास:
खंगिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा,शंखिनी चापिनी बाण भुशुण्डी परिघायुधा अंगुष्ठाभ्याम नम: ह्रदयाय नम:

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खडगेन चाम्बिके,घण्टा स्वनेन न: पाहि चाप ज्या नि: स्वनेन च तर्जनीभ्याम स्वाहा शिरसे स्वाहा

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे,भ्रामणेनात्म शूलस्य उत्तरस्यां तथेस्वरि मध्यमाम वषट शिखायै वषट

सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते,यानि चात्यर्थ घोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवं अनामिकाभ्यां हुम कवचाय हुम

खडग शूल गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके,कर पल्लव संगीनि तैरस्मान रक्ष सर्वत: कनिष्ठकाभ्याम वौषट नेत्रत्राय वौषट

सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते,भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते करतल कर पृष्ठाभ्याम फ़ट अस्त्राय फ़ट

ध्यानम

खडगं चक्र गदेषु चाप परिघांछूलं भुशुण्डीं शिर:,

शंखं सन्दधतीं करैस्त्रि नयनां सर्वांग भूषावृताम।

नीलाश्म द्युतिमास्य पाद दशकां सेवे महाकालिकाम,

यामस्तीत स्वपिते हरो कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम॥

दक्षिणाम्नाय मते आयुधानि

दक्षिण करे - खडक चक्र गदा इषु चाप

वाम करे - परिघ शूल भुशुण्डी शिर: शंख।

ऊर्ध्वाम्नाय मते आयुधानि

दक्षिण करे- खडग गदा चाप शूल शिर:,

वाम करे - चक्र इषु परिघ भुशुण्डी शंख।


!!! शिव की उपासना !!!

माता पार्वती को समझाते हुए भगवान् शिव कहते हैं, ‘प्रियतमे ! पुण्य कर्मों से ही वंश की वृद्धि होती है। पुण्य कर्म करने से ही जीव कीर्तिवान होता है और इसी पुण्य कर्म में लगे रहने से शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।’

शास्त्र कहते हैं कि अवश्यमेव भोक्तव्यम कृते कर्म शुभाशुभं अर्थात मनुष्य को अपने द्वारा किए हुए पाप-पुण्य जनित कर्मों का फल भोगना पड़ता है। जीव पाप करके भी तभी तक सुखी रह पाता है, जब तक कि उसके द्वारा संचित पुण्य कर्मों का कोष खाली नहीं हो जाता। कोष खाली होते पाप कर्मों का फल मिलने लगता है। फिर जीवात्मा इतनी परेशान हो जाती है कि उसे बचने का कोई भी मार्ग दिखाई नहीं देता। श्रावण मे स्वयं भगवान शिव माता पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी और अपने शिवगणों सहित पूरे माह पृथ्वी पर विराजते हैं। यही शिव जब जीव का संहार करते हैं, तो महाकाल बन जाते हैं। यही शिव महामृत्युंजय बनकर उसी जीव कि रक्षा भी करते हैं और शंकर बनकर जीव का भरण-पोषण भी करते हैं, तो रुद्र बनकर महाविनाशलीला भी करते हैं। अर्थात स्वयं शिव ही ब्रह्मा और विष्णु के रूप में एकाकार देवो के देव महादेव बन जाते हैं। इन्हीं महादेव को प्रसन्न करने के लिए अच्छे अवसर के रूप में मासिक शिवरात्रि का पावन पर्व आता है। आप शिव की आराधना पंचामृत से करें, तो अति उत्तम रहेगा। शिव की पूजा ही ऐसी पूजा है, जिसमें केवल पत्रं-पुष्पं-फलं-तोयं अर्थात पत्र, पुष्प, फल और जल से करके पूर्ण फल प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए जो भी आप के पास सामग्री हो, उसी को लेकर श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान शिव की पूजा करें।


"ॐ नम: शिवाय करालं महाकाल कालं कृपालं ॐ नम: शिवाय।"


इस मंत्र का जप करते रहें। साथ ही "ॐ नमो भगवते रुद्राय" का जप भी कर सकते हैं। ऐसा जपते हुए बेलपत्र पर चंदन या अष्टगंध से राम-राम लिखकर शिव पर चढ़ाएं। पुत्र की इच्छा रखने वाले शिव भक्त मंदार पुष्प से, घर में सुख-शांति चाहने वाले धतूरे के पुष्प अथवा फल से शत्रुओं पर विजय पाने वाले अथवा मुकदमों में सफलता की इच्छा रखने वाले लोग भांग से शिव की पूजा करें, तो सभी तरह की पराजय की संभावनाएं समाप्त हो जाएंगी। संपूर्ण कष्टों और पुनर्जन्मों से मुक्ति चाहने वाले मनुष्य गंगा जल और पंचामृत चढ़ाते हुए


ॐ नमो भगवते रुद्राय, ॐ तत्पुरुषाय विध्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।


यह मंत्र पढ़ते हुए सभी सामग्री जो भी यथासंभव हो समर्पण भाव से शिव को अर्पित करें। आज आप श्रद्धा भाव और विश्वास के साथ जो भी करेंगे महादेव आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।



आप अपना ट्रांसफर चाहते हैं यह उपाय करे


छोटे-छोटे उपायों से व्यक्ति को जीवन में कई लाभ हो सकते हैं। लाल किताब में ऐसे कई उपाय बताए गए हैं, जिनपर अमल करने से हम कठिनतम परेशानियों से भी उबर सकते हैं। असल में कुछ परेशानियां ऐसी होती हैं, जिनका सरोकार हमारे दैनिक जीवन से होता है। जैसे अगर आप कोर्ट केस के चक्कर में फंसे हुए हैं और मामला जल्दी निपट नहीं रहा है, तो आपको दक्षिण में शयन करना लाभप्रद रहेगा। इसके अलावा मंगलवार के दिन व्रत रखने एवं प्रतिदिन सात बार बजरंग बाण का पाठ करने से भी आपको विजयश्री हासिल होगी। अगर आप चांदी के एक चौकोर टुकड़े को पीले कपड़े में बांधकर गले में धारण करें, तो लाभ होगा।


अगर आप अपना ट्रांसफर चाहते हैं, तो सूर्योदय से पहले स्नान कर लें और कपड़े बदल लें। सूर्योदय के पश्चात सूर्य नमस्कार करें और लाल मिर्च के 21 बीज लेकर सूर्य देवता को अर्पित कर दें। यह प्रक्रिया तीन दिनों तक करें। आपका ट्रांसफर हो जाएगा।


शिव जी की पूजा का जो महात्म्य है। लेकिन इससे भी अधिक महत्व शिवलिंग की पूजा का बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार मृत्युलोक में भगवान शिव मानव कल्याण के लिए विभिन्न रूप धारण कर प्रत्येक रूप में मानव कल्याण का कार्य करते हैं। इनकी पूजा सरल व सुगम होने की वजह से सभी स्त्री-पुरुष तन-मन-धन से इस माह में इनकी पूजा करते हैं। पर अगर आपको अपनी पूजा का फल तुरंत चाहिए और आप भगवान की कृपा पाना चाहते हैं, तो विभिन्न अभिलाषाओं के लिए अलग पदार्थों से बने शिवलिंग की पूजा करना श्रेयस्कर माना गया है।


अगर साधक को प्रॉपर्टी की कामना हो, तो उसे फूलों से बने शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए।


अगर साधक चाहता है कि उसका व उसके परिवार का स्वास्थ्य अच्छा रहे, तो उसे जौ, गेहूं, चावल का समान भागों में मिला आटे से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए।

इसी प्रकार अगर साधक की यह कामना है कि वह जहां जाए, वहां लोगों से उसके संबंध मधुर रहें और उसकी बात भी सब माने, तो उसे सोंठ, मिर्च, पीपल का चूर्ण, नमक समभाग में लेकर शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने से लाभ होगा।


अगर साधक अपनी सारी अभिलाषाओं की पूर्ति करना चाहता है, तो तिल के शिवलिंग बनाकर पूजा करना ठीक रहेगा।


प्रेम संबंधों में सफलता के लिए गुड़ की डली के शिवलिंग बनाकर पूजा करें, तो लाभ होगा।


वंश वृद्धि के लिए बांस के अंकुर को शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करने से लाभ होगा।


रजत पत्र के शिवलिंग भी धन-धान्य बढ़ाते हैं


!!! धन प्रदायक अचूक उपाय !!!




भगवान श्री गणेश प्रखर बुद्धि के स्वामी हैं। यह विघ्रहर्ता है। भुत प्रेत आदि इनकी सेवा करते हैं। श्री गणेश जी की पुजा के करण शिव गण भी प्रसन्न होते हैं। जब हम श्री गणेश जी का पुजन नहीं करते तब शिव गण भुत प्रेत आदि पुजा पाठ मे विघ्र उत्तपन करते हैं। इसी करण श्री गणेश जी की सबसे पहले पुजा की जाती हैं। इनकी कृपा से बुद्धि निखर जाती हैं और पुजा पाठ मे भी बुद्धि शुद्ध होना जरुरी हैं। बुद्धि ही सही और गलत का निर्णय लेती है। सही दिशा मे कदम बढने से सफलता निश्चित होती है। ऐसी सफलता आदमी को यश और सम्मान देती है।

इसलिये भगवान गणेश की उपासना सुखदायक, दु:खनाशक और धनदायक भी है। क्योंकि बुद्धि को सही दिशा देने पर कम प्रयास मे भी अचुक सफलता मिलती हैं और बुद्धि बल से कोई भी अदमी अपनी काबिलियत को साबित कर सकता है। जो सभी चाहते हैं। जबकि विपरित समय मे भी बुद्धि कठिन दौर से बाहर आना मे मदद करती है। इसलिए भगवान गणेश की उपासना शुभ फलदायी मानी गई है। श्री गणेश जी संकटनाशक है। अतः गणेश जी का ध्यान जरुरी करें। 


बुधवार को की गई भगवान गणेश की उपासना का अच्छा प्रभाव होता है। इस संसार मे पैसे का कितना महत्व हैं यह तो आप सब जांनते ही हैं। या यूं कहे कि इस दुनिया मे पेसा और उस दुनिया मे राम नाम ही काम आता है। इन दोनो साधना मे श्री गणेश जी कल्याणकारी है। इनकी पुजा से यह दोनो प्राप्त होने लगते हैं। पैसा कमाने के लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है। और मन मे एक प्रशन होता हैं कि और पैसा कैसे कमाया जाए? यहाँ पर मैं श्री गणेश जी की इच्छा से कुछ सरल से उपाय आप के सामने रख रहा हूं। आप इन उपाय को एक बार करके देखे शेष मुझे कहने की जरुरत नहीं हैं।

धन प्रदायक उपाय (श्री लक्ष्मी जी और श्री गणपति जी) 


उनी या कम्बल का साफ आसन बिछाये अब पूर्व दिशा की ओर मुंह करके आसन पर बैठ जाओ। एक लकडी के बाजोट पर कोई नया पीला रुमाल सा बिछाये। इसके ऊपर मसूर की दाल की ढेरी बनाए। इस ढेरी पर सात कौडिय़ां व एक लघु शंख को स्थापित करें। फिर मूंगे की माला से “ॐ गं गणपतये नम:” मंत्र का पांच माला जप करें। जप पुरा होने पर इस रुमाल की सामग्री सहित गाठ मार कर किसी निर्जन स्थान (जहां कोई आता-जाता न हो) पर जाकर गाढ़ दें। चुपचाप घर चले आये, रास्ते मे किसी से बात ना करें, घर पर आकर मुंह हाथ धो ले। किसी बुजर्ग महिला या माँ या गाय आदि को कुछ मिठा खिला आशीर्वाद लो बस हो गया जीवन परिवर्तन। अब पैसे की कमी नहीं रहेगी।


पैसो की कमी का एक कारण श्री शनि देव हैं और श्री शनि देव जी भी क्या करें जब किसी व्यकिती के कर्म ही खराब थे। इसलिये श्री शनि देव का पुजन भी करते रहना चाहिये और प्रार्थना करे कि मेरे गुनाओ को क्षमा करे। क्योंकि जब श्री शनि देव जी प्रसन्न होने वाले होते है तो श्री लक्ष्मी जी उनसे पहले ही प्रसन्न हो जाती हैं। और बिना मांगे ही आ जाती हैं। (खराब शनि की निशानी फटी एडियाँ हैं अपने तलवे देखे)


या फिर एक बात यह कि श्री लक्ष्मी जी को कमल गट्टे विशेष प्रिय हैं इसलिये कमल गट्टे की माला को श्री लक्ष्मी जी के मन्दिर मे श्री लक्ष्मी जी को चढाना चाहिये या फिर घर-दुकान में कमल गट्टे की माला (का आसन दे) को बिछा कर उसके ऊपर श्री लक्ष्मी जी का चित्र स्थापित कर पुजा की जाए तो व्यापार बहुत अच्छा चलता हैं।



या फिर एक दिन शुभ समय मे हवन करें। हवन मे घी लगाकर कमल गटटे के बीजो से 108 आहुतियां दे। और अंत मे श्री लक्ष्मी जी से बने रहने की प्रार्थना करे। एक विशेष बात यह है कि यदि आपने ऐसा 21 दिन तक लगातार किया तो आने वाली कई पीढिय़ां का भी उद्धार हो जायेगा।


या फिर अगर कोई व्यक्ति श्री लक्ष्मी जी की पूजा-पाठ के दौरान-उपरांत अपने गले में कमल गटटे की माला धारण करें तो श्री लक्ष्मी जी की कृपा उस पर सदा बनी रहती है।

या फिर श्री लक्ष्मी जी की मुर्ति, चित्र या यंत्र पर कमल गट्टे की माला पहनाकर किसी तालाब, नदी में श्री लक्ष्मी जी को विसर्जित करें तो उसके घर में निरंतर लक्ष्मी का आगमन बना रहता है।




या फिर ऐसा करें कि श्री लक्ष्मी जी को सफेद गुंजा बहुत पसन्द हैं इस गुंजा को श्री लक्ष्मी जी स्त्रोत्र से 2-5 बार अभिमंत्रित करें। गुंजा फिर पैसे के स्थान पर रखे। (गुंजा उडद की साबुत दाल के बराबर से थोडा सा बडा होता है लोग इसे लडाई की जड के नाम से जानते है। यह सामान्यतः आधी लाल- आधी काले रंग की होती है। इसके लाल काले दाने यदि किसी के घर मै डाल दिये जाये तो जब तक यह दाने उसके घर से ना निकले तब तक लडाई होती रहती ही है। सफेद रंग के दाने हल्का किनारे से काले होते है यह ही लक्ष्मी पुजन मे काम आते है। यह किसी पंसारी के यहाँ से मिल सकते है। वेसे तो बरसात के मोसम मे ही होते है। कोई भी 10 रु मे दे देता है। पुजा मे 7, 11, 21 दाने ही प्रयोग होते है।)


यह सब अचूक प्रयोग हैं आप अपनी इच्छा अनुसार इसमे से कितने भी कर ले परंतु विस्वास रखना चाहिये।





!!! जायजाद, बीमारी और शांति के लिए टोटके !!!



घर में किसी तरह के क्लेश रहते हों या किसी बीमारी से परेशान हैं, तो इसके लिए तंत्र शास्त्र में कई छोटे-छोटे उपाय बताए गए हैं। ये सरल होने के साथ-साथ कारगर भी हैं। इनके बारे में आप भी जानें:

हृदय संबंधी कोई विकार हो, तो एकमुखी या सोलहमुखी रुद्राक्ष धारण करें। इनके न मिलने पर ग्यारहमुखी, सातमुखी अथवा पांचमुखी रुद्राक्ष का उपयोग भी कर सकते हैं। धारण करने से पहले रुद्राक्ष को सावन मास में किसी प्रदोष व्रत के दिन अथवा सोमवार के दिन, गंगाजल से स्नान कराकर शिवजी पर चढ़ाएं। संभव हो, तो रुद्राभिषेक करें या शिवजी पर ‘ॐ नम: शिवाय’ बोलते हुए दूध से अभिषेक करें। इस प्रकार अभिमंत्रित रुद्राक्ष को काले डोरे में पिरोकर गले में पहन लें। इससे हृदय संबंधी बीमारी में राहत मिलती है।

घर में नित्य घी का दीपक जलाएं। दीपक की लौ पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रखें। इसके अलावा रात्रि के समय शयनकक्ष में कपूर जलाएं।इससे घर में बीमारियां नहीं आती। पितृदोष का नाश होता है और घर में शांति बनी रहती है।

पूर्णिमा के दिन चांद की रोशनी में खीर बनाएं। ठंडी होने पर चंद्रमा और अपने पितरों को भोग लगाएं। इसमें से कुछ खीर काले कुत्तों को भी दे दें। इस उपाय को पूरे वर्ष करें। ऐसा करते रहने से गृह क्लेश, बीमारी तथा व्यापार-हानि से मुक्ति मिलती है।
पुत्र बीमार हो, तो कन्याओं को हलवा खिलाएं। पीपल के पेड़ की लकड़ी सिरहाने रखकर सोएं। यदि पत्नी बीमार रहती हो, तो गौ-दान करें। 

सोते हुए अपना सिर हमेशा पूर्व या दक्षिण दिशा की तरफ रखना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर सिर कर के सोने वाले व्यक्ति में चुम्बकीय बल रेखाएं पैर से सिर की ओर जाती हैं, जो अधिक से अधिक रक्त खींच कर सिर की ओर लाएंगी, जिससे व्यक्ति विभिन्न रोगों से मुक्त रहता है। उसे नींद भी अच्छी आती है।

जिस घर की स्त्री हमेशा बीमार रहती हो, उस घर में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी श्रद्धापूर्वक देखभाल करें। रोग आदि पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा मंदिर में गुप्त दान भी कर सकते हैं। रविवार के दिन बूंदी के सवा किलो लड्डू मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटें।

किसी भी रविवार से आरंभ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का पेड़ा और एक लोटा पानी बीमार व्यक्ति के ऊपर से उतार लें। जल को पौधे में डालें और पेड़ा गाय को खिला दें।

!!! काली हल्दी का चमत्कार !!!


मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए तंत्र शास्त्र में हरिद्रा तंत्र की चर्चा है। कहते हैं, इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन-धान्य की वर्षा करती हैं। हरिद्रा यानी काली हल्दी खाने के काम में नहीं आती, पर चोट लगने और दूसरे औषधीय गुणों में इसे महत्व दिया जाता है। यदि किसी को इस काली हल्दी की गांठ प्राप्त हो, तो उसे पूजा घर में रख दें। मान्यता है कि यह जहां भी होती है, सहज ही वहां श्री-समृद्धि का आगमन होने लगता है। हरिद्रा तंत्र को नए कपड़े में अक्षत और चांदी के टुकड़े अथवा किसी सिक्के के साथ रखकर गांठ बांध दें और धूप-दीप से पूजा करके गल्ले या बक्से में रख दें, तो आश्चर्यजनक आर्थिक लाभ होने लगता है। लेकिन इसको घर में रखने से पहले अभिमंत्रित भी कर लें, तभी इसका विशेष प्रभाव दिखता है।



हरिद्रा तंत्र के लिए साधना विधि महीने की किसी भी अष्टमी से इस पूजा को शुरू कर सकते हैं। इस दिन प्रात: उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठ जाएं। तत्पश्चात् काली हल्दी की गांठ को धूप-दीप देकर नमस्कार करें। फिर उगते हुए सूर्यको नमस्कार करें और 108 बार निम्न मंत्र का जाप करें।

‘‘ॐ ह्रीं सूर्याय नम:।’




इसके बाद स्थापित काली हल्दी की पूजा करें। पूरे दिन व्रत रखें और फलाहार करें। यथाशक्ति दान-पुण्य भी करें। हरिद्रा तंत्र की साधना में यह तथ्य स्मरण रखना चाहिए कि इसके साधक के लिए मूली, गाजर और जिमींकंद का प्रयोग वर्जित है। इस प्रयोग को विधिपूर्वक करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। घर में बरकत होती है।

!!! अग्नि देव की पत्नी !!!



यज्ञ आदि अनुष्ठान में हवन करते समय देवताओं के नाम की आहुति देने का विधान है। कहते हैं कि देवताओं की पुष्टि यज्ञों में अर्पित आहुतियों से ही होती है। इसलिए जब भी असुरों ने देवताओं को पराजित किया, उन्होंने यज्ञों का भी विध्वंस किया ताकि देवताओं की शक्ति क्षीण हों। पुराणों के अनुसार, यज्ञ की अग्नि के माध्यम से भेजी गई आहुतियां देवताओं तक अवश्य पहुंचती हैं और इसका माध्यम बनती है स्वाहा। यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि में मंत्रोच्चारण के साथ ‘स्वाहा’ बोलते हुए यज्ञ सामग्री और घी की आहुतियां दी जाती हैं। क्या आपको मालूम है कि स्वाहा का उच्चारण बार-बार क्यों किया जाता है?

स्वाहा शब्द का अर्थ है सु+आ+हा यानी अच्छे लोगों को दिया गया। श्रीमद्भागवत एवं शिवपुराण के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री स्वाहा का विवाह अग्नि देवता के साथ हुआ था। अग्नि अपनी पत्नी स्वाहा द्वारा ही भोजन ग्रहण करते हैं। इसीलिए स्वाहा बोलकर उनके माध्यम से अग्नि को हविष्य भेंट करने का विधान है। विभिन्न देवी-देवताओं के नाम के बाद स्वाहा का उच्चारण किया जाता है, ताकि अग्निदेव तक आहुतियां पहुंचें और फिर अग्निदेव उसे विभिन्न देवताओं तक पहुंचाएं।




!!! बीज मंत्र की महिमा !!!


मंत्र शास्त्र में बीज मंत्रों का विशेष स्थान है। मंत्रों में भी इन्हें शिरोमणि माना जाता है क्योंकि जिस प्रकार बीज से पौधों और वृक्षों की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार बीज मंत्रों के जप से भक्तों को दैवीय ऊर्जा मिलती है। ऐसा नहीं है कि हर देवी-देवता के लिए एक ही बीज मंत्र का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है। बल्कि अलग-अलग देवी-देवता के लिए अलग बीज मंत्र हैं।



“ऐं” सरस्वती बीज । यह मां सरस्वती का बीज मंत्र है, इसे वाग् बीज भी कहते हैं। जब बौद्धिक कार्यों में सफलता की कामना हो, तो यह मंत्र उपयोगी होता है। जब विद्या, ज्ञान व वाक् सिद्धि की कामना हो, तो श्वेत आसान पर पूर्वाभिमुख बैठकर स्फटिक की माला से नित्य इस बीज मंत्र का एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


“ह्रीं” भुवनेश्वरी बीज । यह मां भुवनेश्वरी का बीज मंत्र है। इसे माया बीज कहते हैं। जब शक्ति, सुरक्षा, पराक्रम, लक्ष्मी व देवी कृपा की प्राप्ति हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


“क्लीं” काम बीज । यह कामदेव, कृष्ण व काली इन तीनों का बीज मंत्र है। जब सर्व कार्य सिद्धि व सौंदर्य प्राप्ति की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


“श्रीं” लक्ष्मी बीज । यह मां लक्ष्मी का बीज मंत्र है। जब धन, संपत्ति, सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य की कामना हो, तो लाल रंग के आसन पर पश्चिम मुख होकर कमलगट्टे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


"ह्रौं" शिव बीज । यह भगवान शिव का बीज मंत्र है। अकाल मृत्यु से रक्षा, रोग नाश, चहुमुखी विकास व मोक्ष की कामना के लिए श्वेत आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


"गं" गणेश बीज । यह गणपति का बीज मंत्र है। विघ्नों को दूर करने तथा धन-संपदा की प्राप्ति के लिए पीले रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


"श्रौं" नृसिंह बीज । यह भगवान नृसिंह का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, सर्व रक्षा बल, पराक्रम व आत्मविश्वास की वृद्धि के लिए लाल रंग के आसन पर दक्षिणाभिमुख बैठकर रक्त चंदन या मूंगे की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


“क्रीं” काली बीज । यह काली का बीज मंत्र है। शत्रु शमन, पराक्रम, सुरक्षा, स्वास्थ्य लाभ आदि कामनाओं की पूर्ति के लिए लाल रंग के आसन पर उत्तराभिमुख बैठकर रुद्राक्ष की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।


“दं” विष्णु बीज । यह भगवान विष्णु का बीज मंत्र है। धन, संपत्ति, सुरक्षा, दांपत्य सुख, मोक्ष व विजय की कामना हेतु पीले रंग के आसन पर पूर्वाभिमुख बैठकर तुलसी की माला से नित्य एक हजार बार जप करने से लाभ मिलता है।