27 November 2012

जप तीन प्रकार का कहा गया है


जप तीन प्रकार का कहा गया है – 

(१) वाचिक, (२) उपांशु एवं (३) मानसिक | 

एक की अपेक्षा दुसरे को उतरोतर अधिक लाभदायक माना  गया है | 

अर्थात वाचिक की अपेक्षा उपाशु और उपांशु की अपेक्षा मानसिक जप अधिक लाभदायक है | जप जितना अधिक हो उतना ही विशेष लाभदायक होता है |

मानसिक जप : इस जप में किसी भी प्रकार के नियम की बाध्यता नहीं होती है। सोते समय, चलते समय, यात्रा में भी ‘मंत्र’ जप का अभ्यास किया जाता है। मानसिक जप सभी दिशाओं एवं दशाओं में करने का प्रावधान है। मंत्र जप के लिए शरीर की शुद्धि आवश्यक है। अत: स्नान करके ही आसन ग्रहण करना चाहिए। साधना करने के लिए सफेद कपड़ों का प्रयोग करना सर्वथा उचित रहता है भगवान् श्रीहरि के लिए तुलसी की माला का प्रयोग करना चाहिए। भगवान् शिव के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए। चन्दन की माला का प्रयोग कार्य सिद्ध की कामना के लिए करना चाहिए।


आयुर्वेदिक दोहे



1.जहाँ कहीं भी आपको,काँटा कोइ लग जाय। दूधी पीस लगाइये, काँटा बाहर आय।।

2.मिश्री कत्था तनिक सा,चूसें मुँह में डाल। मुँह में छाले हों अगर,दूर होंय
... तत्काल।।

3.पौदीना औ इलायची, लीजै दो-दो ग्राम। खायें उसे उबाल कर, उल्टी से आराम।।

4.छिलका लेंय इलायची,दो या तीन गिराम। सिर दर्द मुँह सूजना, लगा होय आराम।।

5.अण्डी पत्ता वृंत पर, चुना तनिक मिलाय। बार-बार तिल पर घिसे,तिल बाहर आ जाय।।

6.गाजर का रस पीजिये, आवश्कतानुसार। सभी जगह उपलब्ध यह,दूर करे अतिसार।।

7.खट्टा दामिड़ रस, दही,गाजर शाक पकाय। दूर करेगा अर्श को,जो भी इसको खाय।।

8.रस अनार की कली का,नाकबूँद दो डाल। खून बहे जो नाक से, बंद होय तत्काल।।

9.भून मुनक्का शुद्ध घी,सैंधा नमक मिलाय। चक्कर आना बंद हों,जो भी इसको खाय।।

10.मूली की शाखों का रस,ले निकाल सौ ग्राम। तीन बार दिन में पियें,पथरी से
आराम।।

11.दो चम्मच रस प्याज की,मिश्री सँग पी जाय। पथरी केवल बीस दिन,में गल बाहर
जाय।।

12.आधा कप अंगूर रस, केसर जरा मिलाय। पथरी से आराम हो, रोगी प्रतिदिन खाय।।

13.सदा करेला रस पिये,सुबहा हो औ शाम। दो चम्मच की मात्रा, पथरी से आराम।।

14.एक डेढ़ अनुपात कप, पालक रस चौलाइ। चीनी सँग लें बीस दिन,पथरी दे न दिखाइ।।

15.खीरे का रस लीजिये,कुछ दिन तीस ग्राम। लगातार सेवन करें, पथरी से आराम।।

16.बैगन भुर्ता बीज बिन,पन्द्रह दिन गर खाय। गल-गल करके आपकी,पथरी बाहर आय।।

17.लेकर कुलथी दाल को,पतली मगर बनाय। इसको नियमित खाय तो,पथरी बाहर आय।।

18.दामिड़(अनार) छिलका सुखाकर,पीसे चूर बनाय। सुबह-शाम जल डालकम, पी मुँह बदबू
जाय।।

19. चूना घी और शहद को, ले सम भाग मिलाय। बिच्छू को विष दूर हो, इसको यदि
लगाय।।

20. गरम नीर को कीजिये, उसमें शहद मिलाय। तीन बार दिन लीजिये, तो जुकाम मिट
जाय।।

21. अदरक रस मधु(शहद) भाग सम, करें अगर उपयोग। दूर आपसे होयगा, कफ औ खाँसी
रोग।।

22. ताजे तुलसी-पत्र का, पीजे रस दस ग्राम। पेट दर्द से पायँगे, कुछ पल का
आराम।।

23.बहुत सहज उपचार है, यदि आग जल जाय। मींगी पीस कपास की, फौरन जले लगाय।।

24.रुई जलाकर भस्म कर, वहाँ करें भुरकाव। जल्दी ही आराम हो, होय जहाँ पर घाव।।

25.नीम-पत्र के चूर्ण मैं, अजवायन इक ग्राम। गुण संग पीजै पेट के, कीड़ों से
आराम।।

26.दो-दो चम्मच शहद औ, रस ले नीम का पात। रोग पीलिया दूर हो, उठे पिये जो
प्रात।।

27.मिश्री के संग पीजिये, रस ये पत्ते नीम। पेंचिश के ये रोग में, काम न कोई
हकीम।।

28.हरड बहेडा आँवला चौथी नीम गिलोय, पंचम जीरा डालकर सुमिरन काया होय॥

29.सावन में गुड खावै, सो मौहर बराबर पावै॥


सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए


सुप्रभात



- सुबह उठ कर २ से ४ ग्लास पानी पीना चाहिए . इसके साथ अपनी प्रकृति के अनुसार कोई ना कोई आयुर्वेदिक औषधि लेनी चाहिए . 

वात या पित्त प्रवृत्ति के लोगों को आंवला , एलो वेरा , या बेल पत्र या नीम पत्र या वात प्रवृत्ति वालों को मेथी दाना (भिगोया हुआ ); 

थायरोइड के मरीजों को

भिगोया हुआ धनिया , कफ प्रवृत्ति के लोगों को तुलसी , कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वालों को गिलोय घनवटी . इस प्रकार से रूटीन बना ले .


- खाली पेट चाय पीने से एसिडिटी की समस्या बढ़ सकती है .

- चाय का पानी उबालते समय उसमे ऋतू अनुसार कोई ना कोई जड़ी बूटी अवश्य डाले .अदरक चाय के बुरे गुणों को कम करता है .
- सुबह घुमने जाते समय अपने आस पास के वृक्षों और पौधों पर नज़र डाले .इनका आयुर्वेदिक महत्त्व समझे और इसके बारे में जानकारी फैलाइए . ताकि लोग इन्हें संरक्षण दे और काटे नहीं .इसमें कोई ना कोई जड़ी बूटी अपनी चाय के लिए चुन ले .


- हार्ट के मरीजों को अर्जुन की छाल चाय में डालनी चाहिए

- शकर जितनी कम डालेंगे हमारी आदत सुधरती जायेगी और मोटापा कम होता जाएगा .

- सफ़ेद शकर की जगह मधुरम का प्रयोग करे .

- चाय में तुलसी , इलायची , लेमन ग्रास , अश्वगंधा या दालचीनी डाली जा सकती है .

- चाय के पानी में थोड़ी देर दिव्य पेय डाल कर उबाले .

- राजीव भाई ने बताया था के वाग्भट के अष्टांग हृदयम में बताये गएसूत्रों के अनुसार दूध सुबह नहीं लिया जाना चाहिए पर ये काढ़े के साथ
लिया जा सकता है . अगर हम चाय के पानी में दिव्य पेय या कोई भी जड़ी बूटी डाल कर ५-१० मी . उबाल ले तो ये एक काढा ही तैयार हो जाएगा . अब इसमें हम दूध डाल के ले सकते है .

- जो बच्चें मौसम बदलने पर बार बार बीमार पड़ते है उन्हें रोज़ थोड़ी चाय

(जड़ी बूटी वाली ) दी जानी चाहिए .पेट गड़बड़ होने पर भी बच्चों को चाय
देनी चाहिए .
- चाय के साथ कोई नमकीन पदार्थ ना ले क्योंकि इसमें दूध होता है जिसके साथ अगर नमक लिया जाए तो ये ज़हर पैदा करता है जिससे त्वचा रोग भी हो सकते
है .

- चाय कम स्ट्रोंग पीनी चाहिए .

- दिन में २ कप से अधिक चाय कभी ना ले .
- चाय हमेशा स्वदेशी ब्रांड की ही ले ताकि हम सुबह का पहला काम तो देश
के नाम कर सके .

- जो शाकाहारी है वे चाय बोन चायना के कप में ना ले क्योंकि ये कप

हड्डियों के चूरे से ही बनाए जाते है .
- आपका दिन शुभ हो ,मंगलमय हो .



26 November 2012

!!! एचआईवी से बचा सकता है सर्वदेवामयी गौ माता का दूध !!!


एचआईवी से बचा सकता है सर्वदेवामयी गौ माता का दूध',,,जयशम्‍भौ

मेलबर्न।। गाय का दूध अब एचआईवी को दूर भगाएगा। जी, हां यह सच है। ऑस्ट्रेलिया में हुए एक रिसर्च से इस बात का खुलासा हुआ है। इसमें दावा किया गया है कि गाय के दूध को आसानी से एक ऐसी क्रीम में बदला जा सकता है जो इंसान को एचआईवी से बचा सकता है।

मेलबर्न यूनिवर्सिटी के चीफ साइंटिस्ट मेरिट क्रेमस्की ने रिसर्च के दौरान पाया कि जब प्रेगनेंट गाय को एचआईवी प्रोटीन का इंजेक्शन दिया गया, तो उसने हाई लेवल की रोग प्रतिरोधक क्षमता

वाला दूध दिया जो नवजात बछड़े को बीमारी से बचाता है। गाय द्वारा बछड़े को जन्म दिए जाने के बाद पहली बार दिए गए दूध को 'कॉलोस्ट्रम' कहा गया।

हेराल्ड सन की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों की योजना इस दूध को क्रीम में बदलने से पहले उसके प्रभाव और सुरक्षा का टेस्ट करना है। यह क्रीम पुरुषों से यौन संबंध बनाने के दौरान वायरस से बचा सकती है। प्रभावित सेल्स को दूध के साथ मिलाने के बाद वैज्ञानिक इस वायरस को फैलने से रोकने में सफल रहे थे।

क्रेमस्की ने बताया कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का यह सबसे सस्ता और आसान रास्ता है। उन्होंने कहा कि कॉन्डम सस्ते और आसान उपाय हैं लेकिन जहां हर साल लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हो रहे हैं, वहां ये विकल्प नहीं हो सकते। खासकर, साउथ अमेरिका और अफ्रीका में, जहां औरतों को सेक्स के दौरान यह कहने की आजादी नहीं है कि हमें कॉन्डम का यूज करना चाहिए।

क्रेमस्की ने कहा, 'ऐसे में यह दूध एचआईवी को रोकने का सबसे सस्ता और आसान उपाय हो सकता है। अगर आप दवाईयों का यूज करते हैं तो यह सच में महंगी होती हैं।'


****श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ****



श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है।ये संख्या में १२ है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर।हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।

01- श्री सोमनाथ सौराष्ट्र, (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है। इस प्रसिद्ध मंदिर को अतीत में छह बार ध्वस्त एवं निर्मित किया गया है।


02- श्रीमल्लिकार्जुन आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं।

03- श्री महाकालेश्वर (मध्यप्रदेश) के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैननगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।

04- श्रीॐकारेश्वर मालवा क्षेत्र में श्रीॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर है। उज्जैन सेखण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और मामलेश्वर दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं। श्रीॐकारेश्वर लिंग को स्वयंभू समझा जाता है।

05- श्री केदारनाथ हिमालय के केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओरअलकनन्दा के तट पर श्री बदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिम में मन्दाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150 मील और ऋषिकेश से 132 मील दूरउत्तरांचल राज्य में है।

06- श्री भीमशङ्कर का स्थान मुंबई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर है। यह स्थान नासिक से लगभग 120 मील दूर है। सह्याद्रि पर्वत के एक शिखर का नाम डाकिनी है। शिवपुराण की एक कथा के आधार पर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग कोअसम के कामरूप जिले में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बतलाया जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि नैनीताल जिले के काशीपुर नामक स्थान में स्थित विशाल शिवमंदिर भीमशंकर का स्थान है।

07- श्री विश्वनाथजी वाराणसी (उत्तर प्रदेश) स्थित काशी के श्री विश्वनाथजी सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। गंगा तट स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग दर्शन हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र है।

08- श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे है। इस स्थान पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है।

09- शिवपुराण में 'वैद्यनाथं चिताभूमौ' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार (झारखंड) राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में जसीडीह स्टेशन के पास देवघर (वैद्यनाथधाम) नामक स्थान पर श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। महाराष्ट्र में पासे परभनीनामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ को भी ज्योतिर्लिङ्ग माना जाता है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से देवघर स्थित श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग को ही प्रमाणिक मान्यता है।

10- श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग बड़ौदा क्षेत्रांतर्गत गोमती द्वारका से ईशानकोण में बारह-तेरह मील की दूरी पर है। निजाम हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिङ्ग को ही कोई-कोई नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग मानते हैं। कुछ लोगों के मत से अल्मोड़ा से 17 मील उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) शिवलिङ्ग ही नागेश ज्योतिर्लिङ्ग है।

11- श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। यहाँ लंका विजय के पश्चात भगवान श्रीराम ने अपने अराध्यदेव शंकर की पूजा की थी। ज्योतिर्लिंग को श्रीरामेश्वरया श्रीरामलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।

12- श्री घुश्मेश्वर (गिरीश्नेश्वर) ज्योतिर्लिंग को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान महाराष्ट्र प्रांत में दौलताबाद स्टेशन से बारह मील दूर बेरूल गांव के पास है।

श्री द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्


सौराष्ट्रदेशे विशदे‌உतिरम्ये ज्योतिर्मयं चंद्रकलावतंसम् ।

भक्तप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥
श्रीशैलशृंगे विविधप्रसंगे शेषाद्रिशृंगे‌உपि सदा वसंतम् ।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेनं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥ २ ॥
अवंतिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् ।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वंदे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३ ॥
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय ।
सदैव मांधातृपुरे वसंतम् ॐकारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ४ ॥
पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसं तं गिरिजासमेतम् ।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥ ५ ॥
यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च ।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि ॥ ६ ॥
श्रीताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः ।
श्रीरामचंद्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥ ७ ॥
याम्ये सदंगे नगरे‌உतिरम्ये विभूषितांगं विविधैश्च भोगैः ।
सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ८ ॥
सानंदमानंदवने वसंतम् आनंदकंदं हतपापबृंदम् ।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ९ ॥
सह्याद्रिशीर्षे विमले वसंतं गोदावरितीरपवित्रदेशे ।
यद्दर्शनात् पातकं पाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यंबकमीशमीडे ॥ १० ॥
महाद्रिपार्श्वे च तटे रमंतं संपूज्यमानं सततं मुनींद्रैः ।
सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ११ ॥
इलापुरे रम्यविशालके‌உस्मिन् समुल्लसंतं च जगद्वरेण्यम् ।
वंदे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥ १२ ॥

ज्योतिर्मयद्वादशलिंगकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण ।
स्तोत्रं पठित्वा मनुजो‌உतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥


जय महाकाल !!
जय जय श्री राम !!

25 November 2012

!!! पान के औषधीय गुण !!!



भारतीय संस्कृति में पान को हर तरह से शुभ माना जाता है। धर्म, संस्कार, आध्यात्मिक एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी पान का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है।

*****************इसके अलावा पान का रोगों को दूर भगाने में भी बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। खाना खाने के बाद और मुंह का जायका बनाए रखने के लिए पान बहुत ही कारगर है। कई बीमारियों के उपचार में पान का इस्तेमाल लाभप्रद माना जाता है
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* पान में दस ग्राम कपूर को लेकर दिन में तीन-चार बार चबाने से पायरिया की शिकायत दूर हो जाती है। इसके इस्तेमाल में एक सावधानी रखना जरूरी होती है कि पान की पीक पेट में न जाने पाए।

* चोट लगने पर पान को गर्म करके परत-परत करके चोट वाली जगह पर बांध लेना चाहिए। इससे कुछ ही घंटों में दर्द दूर हो जाता है। खांसी आती हो तो गर्म हल्दी को पान में लपेटकर चबाएं।

* यदि खांसी रात में बढ़ जाती हो तो हल्दी की जगह इसमें अजवाइन डालकर चबाना चाहिए। यदि किडनी खराब हो तो पान का इस्तेमाल बगैर कुछ मिलाए करना चाहिए। इस दौरान मसाले, मिर्च एवं शराब (मांस एवं अंडा भी) से पूरा परहेज रखना जरूरी है।

* जलने या छाले पड़ने पर पान के रस को गर्म करके लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं। पीलिया ज्वर और कब्ज में भी पान का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद होता है। जुकाम होने पर पान में लौंग डालकर खाने से जुकाम जल्दी पक जाता है। श्वास नली की बीमारियों में भी पान का इस्तेमाल अत्यंत कारगर है। इसमें पान का तेल गर्म करके सीने पर लगातार एक हफ्ते तक लगाना चाहिए।

* पान में मुलेठी डालकर खाने से मन पर अच्छा असर पड़ता है। यूं तो हमारे देश में कई तरह के पान मिलते हैं। इनमें मगही, बनारसी, गंगातीरी और देशी पान दवाइयों के रूप में ज्यादा कारगर सिद्ध होते हैं। भूख बढ़ाने, प्यास बुझाने और मसूड़ों की समस्या से निजात पाने में बनारसी एवं देशी पान फायदेमंद साबित होता है।


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चेतावनी :कत्थे का प्रयोग मुंह के कैंसर का कारण भी हो सकता है। यहां सिर्फ पान के औषधीय महत्व की जानकारी दी गई है।
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सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ


अभिशापों से भरी धरा को मैं कैसे वरदान लिखूँ
सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ


सोनचिरैया भी जब केवल विस्फ़ोटों की धुन गाती हो
बुलबुल के पंखों से भी जब बारूदों की बू आती हो
जब हत्यारे जमा हुए हों, घर-खेतों से बाज़ारों तक
जब विषधर फुफकार रहे हों झोंपड़ियों से मीनारों तक
जब अधनंगे लाखों बच्चे रोटी को भी तरस रहे हों
मुस्कानों की जगह आँख से खारे आँसू बरस रहे हों
जब निर्धनता गली-गली और चौराहों पर नाच रही हो
जब कंगाली फुटपाथों पर रोटी-रोटी बाँच रही हो
आहों और कराहों को मैं कैसे मंगलगान लिखूँ
सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ

जब शिक्षा के बाद हाथ में आती हो केवल बेकारी
जब आँसू में घुली हुई हो भूखे पेटों की लाचारी
जहाँ रूप के बाज़ारों में टके-टके काया बिकती हो
जहाँ आसमां के चंदा में भी केवल रोटी दिखती हो
जब खादी के पहन मुखौटे झूठ पड़ा हो सिंहासन पर
जब बेबस-लाचार नयन ले साँच खड़ा हो निर्वासन पर
पतझर का ही शासन हो तो फागुन कैसे भा सकता है
सारे जग की पीड़ा लेकर कैसे कोई गा सकता है
कैसे चिथड़ों से कपड़ों को मोती का परिधान लिखूँ
सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ

जब संसद में जमा हुए हों, सारे भारत के अपराधी
जब सुरसा के मुँह के जैसी बढ़ती जाती हो आबादी
जब जनता की चुनी मूरतें पड़ी हुई हों मदिरालय में
जब खादी और खाकी दोनों टंगी हुई हों वेश्यालय में
जब सारे जग की संपत्ति नेताजी के घर संचित हो
और देश की आधी जनता दो रोटी से भी वंचित हो
आँसू ही लिखते-लिखते जब आँखें भी हों खारी-खारी
कैसे क़लम निभा सकती है तब ख़ुशियों की ज़िम्मेदारी
रोते और सिसकते अधरों को कैसे मुस्कान लिखूँ
सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ

पाँच दिनों से भूखे बचपन की अंतड़ियाँ जब खाली हों
और बाढ़ की चर्चा में छप्पन भोगों की थाली हों
जब खाली पेटों वाले शव जला दिए हों गुमनामों में
और नाज के लाखों बोरे जमा हुए हों गोदामों में
जब माँओं ने बच्चों के शव गंदले पानी में ढोए हों
और देश के सत्ताधारी एसी कमरों में सोए हों
जिस भारत का स्वर्ण बुढ़ापा सर तक पानी में ज़िन्दा है
उस भारत की आज़ादी पर भारत माँ भी शर्मिंदा है
आँसू से कड़वे हाथों से कैसे मीठा गान लिखूँ
सोने की चिड़िया है कैसे मेरा हिन्दुस्तान लिखूँ


मैं पाप बेचती हूँ



एक बार घूमते-घूमते कालिदास बाजार गये|

वहाँ एक महिला बैठी मिली | उसके पास एक मटका था और कुछ प्यालियाँ पड़ी थी |


कालिदास ने उस महिला से पूछा :

” क्या बेच रही हो ? “

महिला ने जवाब दिया :

” महाराज ! मैं पाप बेचती हूँ | “

कालिदास ने
आश्चर्यचकित होकर पूछा :

” पाप और मटके में ?

“ महिला बोली :

” हाँ, महाराज ! मटके में पाप है | “

कालिदास :
” कौन-सा पाप है ? “
महिला :
” आठ पाप इस मटके में है |

मैं चिल्लाकर कहती हूँ की मैं पाप बेचती हूँ पाप …
और लोग पैसे देकर पाप ले जाते है |”

अब महाकवि कालिदास को और आश्चर्य हुआ :

” पैसे देकर लोग पाप ले जातेहै ? “

महिला :
” हाँ, महाराज ! पैसे से खरीदकर लोग पाप ले जाते है | “

कालिदास :
” इस मटके में आठ पाप कौन-कौन से है ? “

महिला :
” क्रोध ,
बुद्धिनाश ,
यश का नाश ,
स्त्री एवं बच्चों के साथ अत्याचार
और अन्याय ,
चोरी ,
असत्य आदि दुराचार ,
पुण्य का नाश ,
और स्वास्थ्य का नाश …
ऐसे आठ प्रकार के
पाप इस घड़े में है | “

कालिदास को कौतुहल हुआ की यह तो बड़ी विचित्र बात है | किसी भी शास्त्र में नहीं आया है की मटके
में आठ प्रकार के
पाप होते है |

वे बोले : ”
आखिरकार इसमें क्या है ? ”

महिला : ” महाराज ! इसमें शराब है

शराब !
“ कालिदास महिला की कुशलता पर प्रसन्न होकर बोले:
” तुझे धन्यवाद है !

शराब में आठ प्रकार के पाप है यह तू जानती है और
‘ मैं पाप बेचती हूँ ‘
ऐसा कहकर बेचती है फिर भी लोग ले
जाते है |

धिक्कार है ऐसे लोगों को !


!!! जरूर पढ़ें... !!!


कुछ समय पहले ऑस्ट्रेलिया में आये भूकंप में एक दिल को छु लेने वाली घटना हुई..

भूकंप के बाद बचाव कार्य का एक दल एक महिला के पूर्ण रूप से ध्वस्त हुए घर की जांच कर रहा था,बारीक दरारों में से महिला का मृत शारीर दिखा लेकिन वो एक अजीब अवस्था में था,महिला अपने घुटनों के बल बैठी थी ठीक वैसे ही जैसे मंदिर में लोग भगवान् के सामने नमन करते है,उसके दोनों हाथ किसी चीज़ को पकडे हुए थे,भूकंप से उस महिला की पीठ व् सर को काफी क्षति पहुंची थी,

काफी मेंहनत के बाद दल के सदस्य ने बारीक दरारों में से जगह बना कर अपना हाथ महिला की तरफ बढाया इस उम्मीद में की शायद वो जिंदा हो,लेकिन महिला का शारीर ठंडा प़ड‍ चूका था,जिसे बचाव दल समझ गया की महिला मर चुकी है,

बचाव दल ने उस घर को छोड़ दिया और दुसरे मकानों की तरफ चलने लगे,बचाव दल के प्रमुख का कहना था की "पता नहीं क्यूँ मुझे उस महिला का घर अपनी तरफ खींच रहा था,कुछ था जो मुझसे कह रहा था के मैं इस घर को ऐसे छोड़ कर न जाऊं और मैंने अपने दिल की बात मानने का फैसला किया"
उसके बाद बचाव दल एक बार फिर उस महिला के घर की तरफ पहुंचे,दल प्रमुख ने मलबे को सावधानी से हटा कर बारीक दरारों में से अपना हाथ महिला की तरफ बढ़ाया और उसके शारीर के निचे स्थित जगह को हाथों से टटोलने लगे,तभी उनके मुह से निकला "बच्चा... यहाँ एक बच्चा है"पूरा दल काम में जुट गया,सावधानी से मलबा हटाया जाने लगा,तब उन्हें महिला के मृत शारीर के निचे एक टोकरी में रेशमी कम्बल में लिपटा हुआ ३ माह का एक बच्चा मिला,दल को अब समझ में आ चूका था की महिला ने अपने बच्चे को बचाने के लिए अपने जीवन का त्याग किया है,भूकंप के दौरान जब घर गिरने वाला था तब उस महिला ने अपने शारीर से सुरक्षा देकर अपने बच्चे की रक्षा की थी.डोक्टर भी जल्द ही वहां आ पहुंचे.
दल ने जब बच्चे को उठाया तब बच्चा बेहोश था,जब बचाव दल ने बच्चे का कम्बल हटाया तब उन्हें वहां एक मोबाइल मिला जिसके स्क्रीन पर सन्देश लिखा था,"मेरे बच्चे अगर तुम बच गए तो बस इतना याद रखना की तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्यार करती है" मोबाइल बचाव दल में एक हाथ से दुसरे हाथ जाने लगा, सभीने वो सन्देश पढ़ा,सबकी आँखें नम हो गयी...
माँ के प्रेम से बढ़ कर दुनिया में और कोई प्रेम नहीं हो सकता

!!! धन्य है " मातृत्व-प्रेम " !!!



बात दुर्ग के रेलवे स्टेशन की है.., कल रात .,मैं ट्रेन के इंतज़ार में रेल्वे - प्लेटफार्म पर टहल रहा था .,

एक वृद्ध महिला , जिनकी उम्र लगभग 60 - 65 वर्ष के लगभग रही होगी ., वो मेरे पास आयी और मुझसे खाने के लिए पैसे माँगने लगी ....
उनके कपडे फटे ., पूरे तार - तार थे., उनकी दयनीय हालत देख कर ऐसा लग रहा था की पिछले कई दिनों से भोजन भी ना किया हो ..
मुझे उनकी दशा पर बहुत तरस आया तो मैंने अपना पर्स टटोला ., कुछ तीस रुपये के आसपास छुट्टे पैसे और एकहरा " गांधी " मेरे पर्स में था .,
मैंने वो पूरे छुट्टे उन्हें दे दिए...

मैंने पैसे उन्हें दिए ही थे ., कि इतने में एक महिला ., एक छोटे से रोते - बिलखते., दूधमुहे बच्चे के साथ टपक पड़ी ., और छोटे दूधमुहे बच्चे का वास्ता देकर वो भी मुझसेपैसे माँगने लगी ... मैं उस दूसरी महिला को कोई ज़वाब दे पाता की उन वृद्ध माताजी ने वो सारे पैसे उस दूसरी महिला को दे दिए ., जो मैंने उन्हें दिए थे .... पैसे लेकर वो महिला तो चलती बनी... लेकिन मैं सोचमें पड़ गया ... मैंने उनसे पूछा की-" आपने वो पैसे उस महिला को दे दिए ..??? "


उनका ज़वाब आया -" उस महिला के साथउसका छोटा सा दूधमुहा बच्चा भी तोथा ., मैं भूखे रह लूंगी लेकिन वो छोटा बच्चा बगैर दूध के कैसे रह पायेगा ... ??? भूख के मारे रो भी रहा था ..."

उनका ज़वाब सुनकर मैं स्तब्ध रह गया .... सच ... भूखे पेट भी कितनी बड़ी मानवता की बात उनके ज़ेहन में बसी थी ....

उनकी सोच से मैं प्रभावित हुआ ., तो उनसे यूं ही पूछ लिया की यूं दर -बदर की ठोकरे खाने के पीछे आखिर कारण क्या है ...???

उनका ज़वाब आया की उनके दोनों बेटो ने शादी के बाद उन्हें साथ रखने से इनकार कर दिया ., पति भी चल बसे .., आखिर में कोई चारा न बसा ...
बेटो ने तो दुत्कार दिया ., लेकिन वो भी हर बच्चे में अपने दोनों बेटो को ही देखती है ., इतना कहकर उनकी आँखों में आंसू आ गए ...

मैं भी भावुक हो गया .,मैंने पास की एक कैंटीन से उन्हें खाने का सामान ला दिया ... मैं भी वहा से फिर साईड हट गया ...

लेकिन बार-बार ज़ेहन में यही बात आ रही थी ., की आज की पीढी कैसी निर्लज्ज है ., जो अपनी जन्म देने वाली माँ तक को सहारा नहीं दे सकती ...??? लानत है ऐसी संतान पर .... और दूसरी तरफ वो " माँ " ., जिसे हर 
बच्चे में अपने " बेटे " दिखाई देते है ....


20 November 2012

♥ लकड़ी का कटोरा ♥


एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु – बेटे के यहाँ शहर रहने गया . उम्र के इस पड़ाव पर वह अत्यंत कमजोर हो चुका था , उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम देता था . वो एक छोटे से घर में रहते थे , पूरा परिवार और उसका चार वर्षीया पोता एक साथ डिनर टेबल पर खाना खाते थे . लेकिन वृद्ध होने के कारण उस व्यक्ति को खाने में बड़ी दिक्कत होती थी . कभी मटर के दाने उसकी चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाँथ से दूध छलक कर मेजपोश पर गिर जाता .


बहु -बेटे एक -दो दिन ये सब सहन करते रहे पर अब उन्हें अपने पिता की इस काम से चिढ होने लगी . “ हमें इनका कुछ करना पड़ेगा ”, लड़के ने कहा . बहु ने भी हाँ में हाँ मिलाई और बोली ,” आखिर कब तक हम इनकी वजह से अपने खाने का मजा किरकिरा रहेंगे , और हम इस तरह चीजों का नुक्सान होते हुए भी नहीं देख सकते .”

अगले दिन जब खाने का वक़्त हुआ तो बेटे ने एक पुरानी मेज को कमरे के कोने में लगा दिया , अब बूढ़े पिता को वहीँ अकेले बैठ कर अपना भोजन करना था . यहाँ तक कि उनके खाने के बर्तनों की जगह एक लकड़ी का कटोरा दे दिया गया , ताकि अब और बर्तन ना टूट -फूट सकें . बाकी लोग पहले की तरह ही आराम से बैठ कर खाते और जब कभी -कभार उस बुजुर्ग की तरफ देखते तो उनकी आँखों में आंसू दिखाई देते . यह देखकर भी बहु-बेटे का मन नहीं पिघलता , वो उनकी छोटी से छोटी गलती पर ढेरों बातें सुना देते . वहां बैठा बालक भी यह सब बड़े ध्यान से देखता रहता , और अपने में मस्त रहता .

एक रात खाने से पहले , उस छोटे बालक को उसके माता -पिता ने ज़मीन पर बैठ कर कुछ करते हुए देखा , ”तुम क्या बना रहे हो ?” पिता ने पूछा .

बच्चे ने मासूमियत के साथ उत्तर दिया , “ अरे मैं तो आप लोगों के लिए एक लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ , ताकि जब मैं बड़ा हो जाऊं तो आप लोग इसमें खाना खा सकें .” ,और वह पुनः अपने काम में लग गया . पर इस बात का उसके माता -पिता पर बहुत गहरा असर हुआ . उनके मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला और आँखों से आंसू बहने लगे . वो दोनों बिना बोले ही समझ चुके थे कि अब उन्हें क्या करना है . उस रात वो अपने बूढ़े पिता को वापस डिनर टेबल पर ले आये , और फिर कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया .


17 November 2012

फेफडे से सम्बंधित इलाज



सुबह-सुबह थोडा सा व्यायाम या योगासान करने से हमारा पूरा दिन स्फर्र्ति और ताजगी भरा बना रहता है । यदि आपको दिनभर अत्यधिक मानसिक तनाव झेलना पडता है तो यह क्रिया करें, दिनभर चुस्त रहेंगे । इस क्रिया को करने वाले व्यक्ति से फेफडे और साँस से सम्बंधित बीमारियाँ सदैव दूर रहेंगी ।


क्रिया की विधिः समतल और हवादार स्थान पर किसी भी आसन जैसे पद्मासन या सुखासन में बैठकर इस क्रिया को किया जाता है । दोनों हाथ को दोनों घुटनों पर रखें । अब नाक के दोनों छ्रि्र से तेजी से गहरी सांस लें । फिर सांस को बिना रोके, बाहर छोड दें । इस तरह कई बार तेज गति से सांस लें और फिर उसी तेज गति से सांस छोडते हुए इस क्रिया को करें । इस क्रिया में पहले कम और बाद में धीरे-धीरे संख्या को बढाएँ ।



इस क्रिया से लाभः इस क्रिया के अभ्यास से फेफडे में स्वच्छ वायु भरने से फेफडे स्वास्थ्य और रोग दूर होते हैं । यह आमाशय तथा पाचक अंग को स्वास्थ्य रखता है । इससे पाचन शक्ति और वायु में वृद्धि होती है तथा शरीर में शक्ति और स्फर्र्ति आती है । इस क्रिया से सांस संबंधी कई बीमारियाँ दूर ही रहती हैं ।


सावधानी किसी व्यक्ति को दमा या सांस सम्बंधी कोई बीमारी हो तो वह अपने डाँक्टर से परामर्श कर ही इस क्रिया को करें ।



रंग-रुप भी निखरता है प्राणायाम से प्राणायाम ऐसी क्रिया है जिसके नियमित अभ्यास से बडी-बडी बीमारियाँ साधक से दूर रहती है । साथ ही व्यक्ति का रंग-रुप भी निखर जाता है । शीतली प्राणायाम के संबंध में ऐसा माना जाता है कि इसका नियमिति अभ्यास करने वाले व्यक्ति को कभी जहर नहीं चढता ।


शीतली प्राणायाम की विधिः शीतली प्राणायाम और सीत्कारी प्राणायाम लगभग एक जैसे ही हैं । अंतर केवल इतना है कि सीत्कारी प्राणायाम में जीभ गोलकर तालु से लगा ली जाती है और शीतली में जीभ को गोलकार बना लेते है और सीत्कार करते हुए मुँह द्वारा वायु को पेट में भर लेते हैं । इस प्रणायाम को खडे होकर, चलते हुए अथवा बैठकर भी कर सकते हैं । इसमें मूँह को गोल करके जीभ को भी गोल कर लिया जाता है और होंठ को बाहर निकालकर सांस लेते हैं । जितना संभव हो उतना समय सांस रोककर फिर सांस को बाहर निकाल दिया जाता है ।



शीतली प्राणायाम के लाभ;


इस प्रणायाम से पित्त, कफ, अपच जैसी बीमारियाँ बहुत जल्द समाप्त हो जाती है । योग शास्त्र के अनुसार लंबे समय तक इस प्रणायाम के नियमित अभ्यास से व्यक्ति पर जहर का भी असर नहीं होता ।

According to health care professionals, living with unhealthy lungs can cause an array of problems. Harmful particles in the air are often leading causes of sickness, while other activities such as smoking can make the problems even worse.
To help avoid respiratory problems, cleansing the lungs usingnatural remedies is simple. Following a three- to five-day cleansing program is often effective in keeping the lungs working properly.
Diet

Step 1


Remove all dairy products from your diet. Dairy products can impede the digestion process making detoxification slow and difficult.


Step 2
Drink one cup of herbal laxative tea before you go to bed the evening before you begin your lung cleanse. This will help remove toxins in your intestines and rid your system of. There are many brands of herbal laxative teas. "Get Regular" by Yogi is among the top choices.


Step 3


Squeeze two lemons into and eight- to 10- ounce glass of water and drink it before your first meal. Lemons help digest alkalizing foods, which help repair damaged lung tissue.


Step 4


Drink a 10-ounce glass of grapefruit juice with breakfast. Grapefruit juice contains natural antioxidants that promote a healthy respiratory system.


Step 5


Drink a 10-ounce glass of carrot juice between breakfast and your second meal. Carrot juice helps alkalize your blood and is high in beta-carotene. Beta-carotene produces Vitamin A.

Step 6


Discover the power of Noni juice. Noni juice is extracted from the Noni tree, which grows in Southeast Asia. It is is extremely high in potassium and aids in repairing damaged tissue. Mix 2 oz. of Noni juice with an eight-ounce glass of spring water. Noni juice can be purchased from most health-food stores. There are several brands out there, however, it is important to use pure Noni.

Step 7


Drink one cup of mucus-cleansing tea before dinner. Mucus-cleansing tea is rich in rose hips, ginger and peppermint, which are all strong fighters against congestion and mucus buildup. Cleansing tea is readily available in supermarkets and health-food stores.

Step 8


Drink a 12-ounce glass of of pure cranberry juice before bed. Cranberry juice is a powerful antioxidant and will aid in fighting bacteria in the lungs. Cranberries also aid in cleansing the blood.





Physical Care

Step 1


Enjoy a 20-minute sauna at least once a day during your lung cleanse. A sauna will help open your pores, allowing toxins to leave the body through perspiration. If you don't have access to a sauna, sit in a hot bath.


Step 2

Take a brisk walk at least once day. Maintain a rhythm, inhaling deeply an exhaling slowly without becoming dizzy.

Step 3


Do a mucus cleanse at least once a day or as-needed. Place five to 10 drops of eucalyptus oil into two quarts of simmering water. Drape a dry hand towel over the back of your head and slowly inhale the steam until the water cools. The oil's properties in the steam will help loosen mucus. Using a Netty pot will cleanse the sinuses and rid your lungs of unwanted mucus.





16 November 2012

तुलसी के गुणकारी उपयोग




१. तुलसी रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा नियंत्रित करने की क्षमता रखती है !!

२. शरीर के वजन को नियंत्रित रखने हेतु भी तुलसी अत्यंत गुणकारी है !! इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का वजन घटता है एवं पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है यानी तुलसी शरीर का वजन आनुपातिक रूप से नियंत्रित करती है !!

३. तुलसी के रस की कुछ बूँदों में थोड़ा-सा नमक मिलाकर बेहोश व्यक्ति की नाक में डालने से उसे शीघ्र होश आ जाता है !!

४. चाय बनाते समय तुलसी के कुछ पत्ते साथ में उबाल लिए जाएँ तो सर्दी, बुखार एवं मांसपेशियों के दर्द में राहत मिलती है !!

५. १० ग्राम तुलसी के रस को ५ ग्राम शहद के साथ सेवन करने से हिचकी एवं अस्थमा के रोगी को ठीक किया जा सकता है !!

६. तुलसी के काढ़े में थोड़ा-सा सेंधा नमक एवं पीसी सौंठ मिलाकर सेवन करने से कब्ज दूर होती है !!

७. दोपहर भोजन के पश्चात तुलसी की पत्तियाँ चबाने से पाचन शक्ति मजबूत होती है !!

८. १० ग्राम तुलसी के रस के साथ ५ ग्राम शहद एवं ५ ग्राम पिसी कालीमिर्च का सेवन करने से पाचन शक्ति की कमजोरी समाप्त हो जाती है !!

९. दूषित पानी में तुलसी की कुछ ताजी पत्तियाँ डालने से पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है !!

१०. रोजाना सुबह पानी के साथ तुलसी की ५ पत्तियाँ निगलने से कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों एवं दिमाग की कमजोरी से बचा जा सकता है !! इससे स्मरण शक्ति को भी मजबूत किया जा सकता है !!

११. ४-५ भुने हुए लौंग के साथ तुलसी की पत्ती चूसने से सभी प्रकार की खाँसी से मुक्ति पाई जा सकती है !!

१२. तुलसी के रस में खड़ी शक्‍कर मिलाकर पीने से सीने के दर्द एवं खाँसी से मुक्ति पाई जा सकती है !!

१३. तुलसी के रस को शरीर के चर्मरोग प्रभावित अंगों पर मालिश करने से दाग, एक्जिमा एवं अन्य चर्मरोगों से मुक्ति पाई जा सकती है !!

१४. तुलसी की पत्तियों को नींबू के रस के साथ पीस कर पेस्ट बनाकर लगाने से एक्जिमा एवं खुजली के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है !!



*** रूद्राक्ष को कैसे पहचाने ***



1) प्रायः पानी में डूबने वाला रूद्राक्ष असली और जो पानी पर तैर जाए उसे नकली माना जाता है। लेकिन यह सच नहीं है। पका हुआ रूद्राक्ष पानी में डूब जाता है जबकी कच्चा रूद्राक्ष पानी पर तैर जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया से रूद्राक्ष के पके या कच्चे होने का पता तो लग सकता है, असली या नकली होने का नहीं।

2) प्रायः गहरे रंग के रूद्राक्ष को अच्छा माना जाता है और हल्के रंग वाले
को नहीं। असलियत में रूद्राक्ष का छिलका उतारने के बाद उसपर रंग चढ़ाया जाता है। बाजार में मिलने वाली रूद्राक्ष की मालाओं को पिरोने के बाद पीले रंग से रंगा जाता है। रंग कम होने से कभी-कभी हल्का रह जाता है। काले और गहरे भूरे रंग के दिखने वाले रूद्राक्ष प्रायः इस्तेमाल किए हुए होते हैं, ऐसा रूद्राक्ष के तेल या पसीने के संपर्क में आने से होता है।

3) कुछ रूद्राक्षों में प्राकृतिक रूप से छेद होता है ऐसे रूद्राक्ष बहुत शुभ माने जाते हैं। जबकि ज्यादातर रूद्राक्षों में छेद करना पड़ता है।

4) दो अंगूठों या दो तांबे के सिक्कों के बीच घूमने वाला रूद्राक्ष असली है यह भी एक भ्रांति ही है। इस तरह रखी गई वस्तु किसी दिशा में तो घूमेगी ही। यह उस पर दिए जाने दबाव पर निर्भर करता है।

5) रूद्राक्ष की पहचान के लिए उसे सुई से कुरेदें। अगर रेशा निकले तो असली और न निकले तो नकली होगा।

6) नकली रूद्राक्ष के उपर उभरे पठार एकरूप हों तो वह नकली रूद्राक्ष है। असली रूद्राक्ष की उपरी सतह कभी भी एकरूप नहीं होगी। जिस तरह दो मनुष्यों के फिंगरप्रिंट एक जैसे नहीं होते उसी तरह दो रूद्राक्षों के उपरी पठार समान नहीं होते। हां नकली रूद्राक्षों में कितनों के ही उपरी पठार समान हो सकते हैं।


7) कुछ रूद्राक्षों पर शिवलिंग, त्रिशूल या सांप आदी बने होते हैं। यह प्राकृतिक रूप से नहीं बने होते बल्कि कुशल कारीगरी का नमूना होते हैं। रूद्राक्ष को पीसकर उसके बुरादे से यह आकृतियां बनाई जाती हैं। इनकी पहचान का तरीका आगे लिखूंगा।

8) कभी-कभी दो या तीन रूद्राक्ष प्राकृतिक रूप से जुड़े होते हैं। इन्हें गौरी शंकर या गौरी पाठ रूद्राक्ष कहते हैं। इनका मूल्य काफी अधिक होता है इस कारण इनके नकली होने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है। कुशल कारीगर दो या अधिक रूद्राक्षों को मसाले से चिपकाकर इन्हें बना देते हैं।

9) प्रायः पांच मुखी रूद्राक्ष के चार मुंहों को मसाला से बंद कर एक मुखी कह कर बेचा जाता है जिससे इनकी कीमत बहुत बढ़ जाती है। ध्यान से देखने पर मसाला भरा हुआ दिखायी दे जाता है।

10) कभी-कभी पांच मुखी रूद्राक्ष को कुशल कारीगर और धारियां बना अधिक मुख का बना देते हैं। जिससे इनका मूल्य बढ़ जाता है। प्राकृतिक तौर पर बनी धारियों या मुख के पास के पठार उभरे हुए होते हैं जबकी मानव निर्मित पठार सपाट होते हैं। ध्यान से देखने पर इस बात का पता चल जाता है।

इसी के साथ मानव निर्मित मुख एकदम सीधे होते हैं जबकि प्राकृतिक रूप से बने मुख पूरी तरह से सीधे नहीं होते।

11) प्रायः बेर की गुठली पर रंग चढ़ाकर उन्हें असली रूद्राक्ष कहकर बेच दिया जाता है। रूद्राक्ष की मालाओं में बेर की गुठली का ही उपयोग किया जाता है।

12) रूद्राक्ष की पहचान का तरीका- एक कटोरे में पानी उबालें। इस उबलते पानी में एक-दो मिनट के लिए रूद्राक्ष डाल दें। कटोरे को चूल्हे से उतारकर ढक दें। दो चार मिनट बाद ढक्कन हटा कर रूद्राक्ष निकालकर ध्यान से देखें। यदि रूद्राक्ष में जोड़ लगाया होगा तो वह फट जाएगा। दो रूद्राक्षों को चिपकाकर गौरीशंकर रूद्राक्ष बनाया होगा या शिवलिंग, सांप आदी चिपकाए होंगे तो वह अलग हो जाएंगे।

जिन रूद्राक्षों में सोल्यूशन भरकर उनके मुख बंद करे होंगे तो उनके मुंह खुल जाएंगे। यदि रूद्राक्ष प्राकृतिक तौर पर फटा होगा तो थोड़ा और फट जाएगा। बेर की गुठली होगी तो नर्म पड़ जाएगी, जबकि असली रूद्राक्ष में अधिक अंतर नहीं पड़ेगा।

यदि रूद्राक्ष पर से रंग उतारना हो तो उसे नमक मिले पानी में डालकर गर्म करें उसका रंग हल्का पड़ जाएगा। वैसे रंग करने से रूद्राक्ष को नुकसान नहीं होता है।


गला और छाती की बीमारी का इलाज



गले में किनती भी ख़राब से ख़राब बीमारी हो, कोई भी इन्फेक्शन हो, इसकी सबसे अच्छी दवा है हल्दी । जैसे गले में दर्द है, खरास है , गले में खासी है, गले में कफ जमा है, गले में टोनसीलाईटिस हो गया ; ये सब बिमारिओं में आधा चम्मच कच्ची हल्दी का रस लेना और मुह खोल कर गले में डाल देना , और फिर थोड़ी देर चुप होके बैठ जाना तो ये हल्दी गले में निचे उतर जाएगी लार के साथ ; और एक खुराक में ही सब बीमारी ठीक होगी दुबारा डालने की जरुरत नही । ये छोटे बच्चो को तो जरुर करना ; बच्चो के टोन्सिल जब बहुत तकलीफ देते है न तो हम ऑपरेशन करवाके उनको कटवाते है ; वो करने की जरुरत नही है हल्दी से सब ठीक होता है ।


गले और छाती से जुडी हुई कुछ बीमारिया है जैसे खासी ; इसका एक इलाज तो कच्ची हल्दी का रस है जो गले में डालने से तुरन्त  ठीक हो जाती है चाहे कितनी भी जोर की खासी हो । 

दूसरी दवा है अदरक , ये जो अदरक है इसका छोटा सा टुकड़ा मुह में रख लो और ट़ाफी की तरह चुसो खासी तुरन्त  बंद  हो जाएगी । अगर किसी को खासते खासते चेहरा लाल पड़ गया हो तो अदरक का रस ले लो और उसमे थोड़ा पान का रस मिला लो दोनों एक एक चम्मच और उसमे मिलाना थोड़ा सा गुड या सेहद । अब इसको थोडा गरम करके पी लेना तो जिसको खासते खासते चेहरा लाल पड़ा है उसकी खासी एक मिनट में बंध हो जाएगी । 

और एक अच्छी दवा है , अनार का रस गरम करके पियो तो खासी तुरन्त ठीक होती है । काली मिर्च है गोल मिर्च इसको मुह में रख के चबालो , पीछे से गरम पानी पी लो तो खासी बंध हो जाएगी, काली मिर्च को चुसो तो भी खासी बंध हो जाती है ।

छाती की कुछ बिमारिया जैसे दमा, अस्थमा, ब्रोंकिओल अस्थमा, इन तीनो बीमारी का सबसे अच्छा दवा है गाय मूत्र ; आधा कप गोमूत्र पियो सबेरे का ताजा ताजा तो दमा ठीक होता है, अस्थमा ठीक होता है, ब्रोंकिओल अस्थमा ठीक होता है । और गोमूत्र पिने से टीबी भी ठीक हो जाता है , लगातार पांच छे महीने पीना पड़ता है । दमा अस्थमा का 

और एक अछि दावा है दालचीनी, इसका पाउडर रोज सुबह आधे चम्मच खाली पेट गुड या सेहद मिलाके गरम पानी के साथ लेने से दमा अस्थमा ठीक कर देती है ।


15 November 2012

श्री बालाजी महाराज




राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है । भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बनी दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं ।

सम्पूर्ण भारत से आने वाले लगभग एक हजार रोगी और उनके स्वजन यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।

बालाजी का मन्दिर मेंहदीपुर नामक स्थान पर दो पहाड़ियों के बीच स्थित है , इसलिए इन्हें घाटे वाले बाबा जी भी कहा जाता है । इस मन्दिर में स्थित बजरंग बली की बालरूप मूर्ति किसी कलाकार ने नहीं बनाई, बल्कि यह स्वयंभू है । यह मूर्ति पहाड़ के अखण्ड भाग के रूप में मन्दिर की पिछली दीवार का कार्य भी करती है । इस मूर्ति को प्रधान मानते हुए बाकी मन्दिर का निर्माण कराया गया है । इस मूर्ति के सीने के बाईं तरफ़ एक अत्यन्त सूक्ष्म छिद्र है, जिससे पवित्र जल की धारा निरंतर बह रही है । यह जल बालाजी के चरणों तले स्थित एक कुण्ड में एकत्रित होता रहता है, जिसे भक्त्जन चरणामृत के रूप में अपने साथ ले जाते हैं । यह मूर्ति लगभग 1000 वर्ष प्राचीन है किन्तु मन्दिर का निर्माण इसी सदी में कराया गया है । मुस्लिम शासनकाल में कुछ बादशाहों ने इस मूर्ति को नष्ट करने की कुचेष्टा की, लेकिन वे असफ़ल रहे । वे इसे जितना खुदवाते गए मूर्ति की जड़ उतनी ही गहरी होती चली गई । थक हार कर उन्हें अपना यह कुप्रयास छोड़ना पड़ा । ब्रिटिश शासन के दौरान सन 1910 में बालाजी ने अपना सैकड़ों वर्ष पुराना चोला स्वतः ही त्याग दिया । भक्तजन इस चोले को लेकर समीपवर्ती मंडावर रेलवेस्टेशन पहुंचे, जहां से उन्हें चोले को गंगा में प्रवाहित करने जाना था । ब्रिटिश स्टेशन मास्टर ने चोले को निःशुल्क ले जाने से रोका और उसका लगेज करने लगा, लेकिन चमत्कारी चोला कभी मन भर ज्यादा हो जाता और कभी दो मन कम हो जाता । असमंजस में पड़े स्टेशन मास्टर को अंततः चोले को बिना लगेज ही जाने देना पड़ा और उसने भी बालाजी के चमत्कार को नमस्कार किया । इसके बाद बालाजी को नया चोला चढाया गया । यज्ञ हवन और ब्राह्मण भोज एवं धर्म ग्रन्थों का पाठ किया गया । एक बार फ़िर से नए चोले से एक नई ज्योति दीप्यमान हुई । यह ज्योति सारे विश्व का अंधकार दूर करने में सक्षम है । बालाजी महाराज के अलावा यहां श्री प्रेतराज सरकार और श्री कोतवाल कप्तान ( भैरव ) की मूर्तियां भी हैं । प्रेतराज सरकार जहां द्ण्डाधिकारी के पद पर आसीन हैं वहीं भैरव जी कोतवाल के पद पर । यहां आने पर ही सामान्यजन को ज्ञात होता है कि भूत प्रेतादि किस प्रकार मनुष्य को कष्ट पहुंचाते हैं और किस तरह सहज ही उन्हें कष्ट बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है । दुखी कष्टग्रस्त व्यक्ति को मंदिर पहुंचकर तीनों देवगणों को प्रसाद चढाना पड़ता है । बालाजी को लड्डू प्रेतराज सरकार को चावल और कोतवाल कप्तान (भैरव) को उड़द का प्रसाद चढाया जाता है । इस प्रसाद में से दो लड्डू रोगी को खिलाए जाते हैं और शेष प्रसाद पशु पक्षियों को डाल दिया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि पशु पक्षियों के रूप में देवताओं के दूत ही प्रसाद ग्रहण कर रहे होते हैं । प्रसाद हमेशा थाली या दोने में रखकर दिया जाता है । लड्डू खाते ही रोगी व्यक्ति झूमने लगता है और भूत प्रेतादि स्वयं ही उसके शरीर में आकर बड़बड़ाने लगते है । स्वतः ही वह हथकडी और बेड़ियों में जकड़ जाता है । कभी वह अपना सिर धुनता है कभी जमीन पर लोट पोट कर हाहाकार करता है । कभी बालाजी के इशारे पर पेड़ पर उल्टा लटक जाता है । कभी आग जलाकर उसमें कूद जाता है । कभी फ़ांसी या सूली पर लटक जाता है । मार से तंग आकर भूत प्रेतादि स्वतः ही बालाजी के चरणों में आत्मसमर्पण कर देते हैं अन्यथा समाप्त कर दिये जाते हैं । बालाजी उन्हें अपना दूत बना लेते हैं । संकट टल जाने पर बालाजी की ओर से एक दूत मिलता है जोकि रोग मुक्त व्यक्ति को भावी घटनाओं के प्रति सचेत करता रहता है । बालाजी महाराज के मन्दिर में प्रातः और सायं लगभग चार चार घंटे पूजा होती है । पूजा में भजन आरतियों और चालीसों का गायन होता है । इस समय भक्तगण जहां पंक्तिबद्ध हो देवताओं को प्रसाद अर्पित करते हैं वहीं भूत प्रेत से ग्रस्त रोगी चीखते चिल्लाते उलट पलट होते अपना दण्ड भुगतते हैं ।

हजारों वर्षों से जीवित है सात महामानव


श्लोक : 'अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥'

अर्थात् : अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम ये सभी चिरंजीवी हैं।

यह दुनिया का एक आश्चर्य है। विज्ञान इसे नहीं मानेगा, योग और आयुर्वेद कुछ हद तक इससे सहमत हो सकता है, लेकिन जहाँ हजारों वर्षों की बात हो तो फिर योगाचार्यों के लिए भी शोध का विषय होगा। इसका दावा नहीं किया जा सकता और इसके किसी भी प्रकार के सबूत नहीं है। यह आलौकिक है। किसी भी प्रकार के चमत्कार से इन्कार ‍नहीं किया जा सकता। सिर्फ शरीर बदल-बदलकर ही हजारों वर्षों तक जीवित रहा जा सकता है। यह संसार के सात आश्चर्यों की तरह है।

हिंदू इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे सात व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह परामनोविज्ञान जैसा है, जो परामनोविज्ञान और टेलीपैथी विद्या जैसी आज के आधुनिक साइंस की विद्या को जानते हैं वही इस पर विश्वास कर सकते हैं। आओ जानते हैं कि हिंदू धर्म अनुसार कौन से हैं यह सात जीवित महामानव।

1. बलि : राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। देवताओं पर चढ़ाई करने राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। बलि सतयुग में भगवान वामन अवतार के समय हुए थे। राजा बलि के घमंड को चूर करने के लिए भगवान ने ब्राह्मण का भेष धारण कर राजा बलि से तीन पग धरती दान में माँगी थी। राजा बलि ने कहा कि जहाँ आपकी इच्छा हो तीन पैर रख दो। तब भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप दिए और तीसरा पग बलि के सर पर रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया।

2. परशुराम : परशुराम राम के काल के पूर्व महान ऋषि रहे हैं। उनके पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका है। पति परायणा माता रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। राम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें फरसा दिया था इसीलिए उनका नाम परशुराम हो गया।
भगवान पराशुराम राम के पूर्व हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के काल में भी थे। भगवान परशुराम विष्णु के छठवें अवतार हैं। इनका प्रादुर्भाव वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ, इसलिए उक्त तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है।

3. हनुमान : अंजनी पुत्र हनुमान को भी अजर अमर रहने का वरदान मिला हुआ है। यह राम के काल में राम भगवान के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद वे महाभारत काल में भी नजर आते हैं। महाभारत में प्रसंग हैं कि भीम उनकी पूँछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूँछ नहीं हटा पाता है।

4. विभिषण : रावण के छोटे भाई विभिषण। जिन्होंने राम की नाम की महिमा जपकर अपने भाई के विरु‍द्ध लड़ाई में उनका साथ दिया और जीवन भर राम नाम जपते रहें।

5. ऋषि व्यास : महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये साँवले रंग के कारण 'कृष्ण' तथा जन्मस्थान के कारण 'द्वैपायन' कहलाए। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया।

कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किए जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाए, इनमें तीसरे विदुर भी थे। व्यासस्मृति के नाम से इनके द्वारा प्रणीत एक स्मृतिग्रन्थ भी है। भारतीय वांड्मय एवं हिन्दू-संस्कृति व्यासजी की ऋणी है।

6. अश्वत्थामा : अश्वथामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। अश्वस्थामा के माथे पर अमरमणि है और इसीलिए वह अमर हैं, लेकिन अर्जुन ने वह अमरमणि निकाल ली थी। ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि कल्पांत तक तुम इस धरती पर जीवित रहोगे, इसीलिए अश्वत्थामा सात चिरन्जीवियों में गिने जाते हैं। माना जाता है कि वे आज भी जीवित हैं तथा अपने कर्म के कारण भटक रहे हैं। हरियाणा के कुरुक्षेत्र एवं अन्य तीर्थों में यदा-कदा उनके दिखाई देने के दावे किए जाते रहे हैं। मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के किले में उनके दिखाई दिए जाने की घटना भी प्रचलित है।

7. कृपाचार्य : शरद्वान् गौतम के एक प्रसिद्ध पुत्र हुए हैं कृपाचार्य। कृपाचार्य अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु प्राप्त हुए। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उनका लालन-पालन किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे।


परमात्मा का स्वरुप


संसार में जितने ईश्वर में विश्वास करने वाले लोंग हैं परमात्मा के भिन्न भिन्न स्वरूपों को मानते हैं | कुछ अपने ही ईश्वर को लेकर झगडा भी करते हैं कुछ सब सही हैं यह कहे कर ईश्वर अर्थात परमात्मा के स्वरुप पर चिंतन व चर्चा नहीं करते | पर सत्य तो एक ही होता हैं, परमात्मा भी एक स्वरुप हैं और उस सत्य स्वरुप का पता चल जाए तो दुनिया के झगडे ही खत्म हो जाए | एक स्वरुप इस लिए हैं क्यों की सृष्टि भी एक हैं यदि ईश्वर भिन्न होता तो सृष्टि भी बट जाती | पर अब प्रश्न ये उठता हैं के उस ईश्वर को जाने कैसे ? पर वेद की भी क्यों माने यदि बुद्धि से स्वीकार ईश्वर का स्वरुप हमें समझ नहीं आता | तो परमात्मा को जानने के लिए हम एक स्तरीय परिभाषा को लेकर चलते हैं फिर उस परिभाषा को ज्ञान से मापते हैं तर्क कर के देखते हैं के दोष तो नहीं हैं | परिभाषा ऐसी हो जो सबको स्वीकार हो यानी वह परमात्मा के गुण, स्वाभाव इत्यादि के बारे में हमें बताती हो | यदि हर संभावित तर्क से अपनी ही मान्य परिभाषा में की समीक्षा करते हैं | सारे रहस्य खुल जाएंगे यदि हम परमात्मा के वास्तविक स्वरुप को समझ सके |

अब ईश्वर विषय में ऐसे विद्वान की बात लेकर चले जो अद्वतीय आस्तिक हो | हम महर्षि दयानंद को लेकर चलते हैं | उन्होंने आर्यो को निर्देशित नियमो में दूसरे नियम में ही ईश्वर के स्वरुप के बारे में बताया हैं | जो इस प्रकार हैं “ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।“

अब शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसे आपत्ति हो परमात्मा के इन गुणों पर | पर फिर भी हम एक एक करके ऋषि द्वारा बताये इन सारे गुणों पर चर्चा करेंगे | यह सारे गुण उसके स्वरुप से जुड़े हुए हैं और आपस में भी सम्बंधित हैं | यह सारे गुण उस परमात्मा के पूर्ण होने की भी बात हमें बताते हैं | आइये हम उसके स्वरुप को पूर्ण करने वाले गुणों पर चर्चा प्रारंभ करे |

सच्चिदानंदस्वरूप : यह शब्द सत् + चित् + आनंद से बना हैं | सत् कहते हैं जो हमेशा रहे समय के बंधन में ना बंधने वाला | चित् कहते हैं चिताने वाला यानी प्रकृति और जीवो का मिलन कराने वाला वही हैं यह ये भी बताता हैं के वह सत्य जानता हैं लोगो के किये हुए कर्मो को जानता हैं और न्याय रखते हुए उपयुक्त कर्माशय युक्त जीवात्मा को उपयुक्त शरीर दिलाता हैं | वह आनंद स्वरुप भी हैं यानी वह परमात्मा राग द्वेष इर्ष्या भाव इत्यादि से मुक्त हैं | जो उसकी उपासना नहीं कर्ता उस से भी वह आनंद स्वरुप परमात्मा प्रेम कर्ता हैं उसकी अमृतवर्षा सबके लिए समान हैं | हमारा मन जितना शुद्ध होगा, जितना ही हम उस चेतना के आनंद स्वरुप को पाने का प्रयास करेंगे उतना ही हम लाभ उठा सकेंगे | अब कोई मनुष्य शरीर में रहते काल से परे नहीं हो सकताए अतः सत् गुण मनुष्य पर लागू नहीं होता, जीवात्मा जरुर अनादी हैं काल के अंत के बाद भी रहेगी पर वह कुछ कर नहीं सकती प्रकृति के बिना इसलिए परमात्मा जैसा सामर्थ्य उसमे नहीं | जीव विज्ञान(क्लोनिंग) या गर्भाधान संस्कार के माध्यम से रासायनिक प्रक्रियाये जरुर कर सकता हैं मनुष्य, पर उसके बाद उसे परमात्मा से उत्तम जीवात्मा के लिए प्रार्थना करनी ही पड़ेगी सो चित् गुण भी परमात्मा जैसा नहीं प्राप्त कर सकता | हां आनंद स्वरुप तो मनुष्य समाधी अवस्था में हो सकता हैं और उसके बाद जब मोक्ष को प्राप्त होता हैं तो निश्चित समय के लिए उसी आनंद में रहता हैं |

निराकार : जिसका कोई आकार ना हो उसे निराकार कहते हैं | अब यह गुण समझने के लिए हम विपरीत बात मान कर समझते हैं | हम परमात्मा का आकार मान लेते हैं और देखते हैं ऐसा मानने से क्या दोष आते हैं | एक निश्चित आकार की चेतना का प्रभाव भी निश्चित सीमा में रहेगा | उसका ज्ञान भी सिमित रहेगा या जितना भी रहेगा वहा सिर्फ अपनी सत्ता में लगा सकता हैं जहा तक वह हैं | उसकी न्याय सत्ता भी प्रभावित होगी, उसके निकट अधिक न्याय होगा और जैसे-२ दुरी बढती जाएगी उसका न्याय कम होगा क्यों की वह वहा पर हैं ही नहीं | सम्पूर्ण सृष्टि के निर्माण का सामर्थ्य भी उसमे नहीं होगा वह सिर्फ सिमित आकार के साथ सिमित निर्माण ही कर सकेगा | यानी सारे गुण विपरीत सिद्ध होते हैं यदि हम परमात्मा को निराकार नहीं मानते | वह अन्यायकारी, सिमित सामर्थ्य वाला सिमित ज्ञान वाला इत्यादि सिद्ध होता हैं | इसलिए परमात्मा निराकार ही हैं तभी वह पूर्ण हैं | अब निराकार कैसा होता हैं यह समझना जरुरी हैं | वह ब्रह्म हैं अर्थात सबसे बड़ा हैं सूर्य चंद्र ही नहीं सारा या सारे ब्रह्माण्ड उसमे आते हैं | हम सब उस असीम चेतना के भीतर हैं और वह हमारे भीतर हैं यानी जिसे हम शुन्य कहते हैं वह भी परमात्मा की चेतना से भरा हुआ हैं यही उसका निराकार स्वरुप हैं |

सर्वशक्तिमान : यानी सबसे ताकतवर, उसकी शक्ति के समान किसी का सामर्थ्य नहीं | कोई मनुष्यधारी उसकी सर्वशक्तिमत्ता के पास पहुच सकता | जो वह सबसे अधिक शक्ति सामर्थ्यावाला ना हो तो वह सूर्य आदि ग्रहों का चंद्र आदि पिंडो का निर्माण भी ना कर सके | वह ग्रहों से लेकर समस्त परमाणुओ तक को अपनी शक्ति से संतुलित रखता हैं | कोई मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता |

न्यायकारी : जो जिस योग्य हैं उसे वह कल्याण हेतु प्रदान करने वाला, न्याय करने वाला परमात्मा ही हैं | सभी मनुष्यों को चाहिए के परमात्मा के न्याय के गुण को धारण करे और समस्त जगत में न्याय के साथ, न्याय के लिए ही जीवन व्यतीत करे | ना अन्याय करे ना होने दे यही धर्म को धारण कराता हैं | आप को संशय ये हो सकता हैं के दुनिया में जो गलत कार्य होते हैं क्या वह परमात्मा की इच्छा से होते हैं ? नहीं कदापि नहीं, वह सदैव लोगो को अपने गुणों का आनंद देता रहता हैं हमारा अन्तःकरण मलिन होने से हम उसके आदेशो का पालन नहीं कर पाते | और जीव कर्म करने को पूर्णतः स्वतंत्र हैं पर कर्मफल पाने को परतंत्र हैं | जो अन्याय होता दीखता हैं उसका कारण पशुतुल्य मनुष्य हैं और न्यायव्यवस्था में उन्हें दंड देने वाला परमात्मा हैं |

दयालु : देखिये न्यायकारी के बाद दयालु कहा गया हैं | वह अभयदान कर्ता हैं, दोषी को दंड देने वाला और न्याय करने वाले पर दया करने वाला हैं | उसका यह गुण सभी मनुष्यों को अपने अंदर लेना चाहिए

अजन्मा : प्रकृति से युक्त होने को जन्म कहते हैं | जो जन्म लेता हैं उसकी मृत्यु भी निश्चित हैं और जो मृत्यु को प्राप्त हो जाए वह परमात्मा नहीं हो सकता | वह परमात्मा तो सदैव से प्रकृति का त्याग करे हुए हैं और क्यों की वहा त्याग करे हुए हैं इसीलिए उसने जीवात्माओ के जन्ममरण व्यवस्था हेतु सृष्टि का निर्माण किया | अतः वह परमात्मा अजन्मा हैं |

अनंत : जो अजन्मा हैं उसका कोई अंत भी नहीं इसलिए वह अनंत हैं | उसका कोई परिमाण करना संभव नहीं इसलिए भी वहा अनंत हैं यानी हर दिशा में बस फैला हुआ हैं बिना किसी अंत के |

निर्विकार : उसमे कोई विकार नहीं | जो भी मनुष्य शरीर धारण कर्ता हैं वह विकारों से नहीं बच सकता | रोग से शोक तक भिन्न विकार उसमे रहते ही हैं | जब योगी समाधी में जाता हैं तब जीवात्मा उस निर्विकार परमात्मा के आनंद का अनुभव करती हैं | जो वह निर्विकार ना हो तो आनंद में ना रह सके | आनंद सुख और दुःख से भिन्न हैं | आनंद युक्त प्रेम मनुष्य के काम (इच्छा) युक्त प्रेम से भिन्न होता हैं |

अनादि : वह सदैव से था सदैव रहेगा इसलिए वह परमात्मा अनादी हैं | परमात्मा के अतिरिक्त जीवात्मा और प्रकृति भी अनादी हैं | पर जब जीवात्मा शरीर धारण करती हैं तो उसके शरीर की मृत्यु निश्चित होती हैं और प्रकृति का जब परमात्मा स्वरुप बदलता हैं तो प्रकृति का वापस अपने मूल स्वरुप में आना भी निश्चित हैं |

अनुपम : उसके सामान कोई नहीं हो सकता | यह गुण बताता हैं की वह एक ही हैं और उसके जैसा दूसरा कोई नहीं |

सर्वाधार : सबको धारण करने वाला सर्वाधार परमात्मा हैं | उसका धारण किया हुआ शरीर यही हैं के प्रकृति और जगत सब उसके अंदर हैं और वहा ब्रह्म स्वरुप सबसे बड़ा हैं | यह उसके निराकार गुण की भी पुष्टि करता हैं जो वहा निराकार ना होता तो सर्वाधार ना होता |

सर्वेश्वर : अर्थात सबका ईश्वर परमात्मा हैं यानी के ईश्वर एक हैं | जो वह सर्वेश्वर ना हो तो पुरे जगत में अव्यवस्था फ़ैल जाए | सृष्टि कभी क्रम में आ ही ना पाए क्यों के २ सृष्टिकर्ता माने तो जगत में भिन्न-२ नियमों को पावेंगे पर विज्ञान अर्थात प्रकृति से निर्मित सरचनाओ के नियम समस्त ब्रह्माण्ड में एक ही हैं इसलिए सबका ईश्वर एक परमात्मा हैं |

सर्वव्यापक : इसका पर्याय संस्कृत में विष्णु होता हैं | जो वह हर जगह ना हो तो हर जगह निर्माण या प्रलय भी ना करा सके | वह सातवे आसमान पर नहीं अपितु सारे आसमान उसके अंदर समाहित हैं | उसका सर्वव्यापक होने का गुण भी उसे सर्वज्ञानी होना सार्थक कर्ता हैं |

सर्वांतर्यामी : यानी सब कुछ जानने वाला | सर्वज्ञानी सिर्फ परमात्मा हैं | वह इतना सूक्ष्म हैं के अंदर भी हैं और बाहर भी तो आप कुछ सोचते हैं उसे तुरंत ही ज्ञात हो जाता हैं उसकी उपस्तिथि के कारण | अतः हमें सदैव सर्व कल्याणकारी चिंतन (यानी यज्ञ का) चिंतन करना चाहिए | और जो वह सर्वान्तर्यामी ना होता तो सृष्टि का निरमंड भी ना कर पाता | इसीलिए वह सबका गुरु कहा गया हैं उसे सभी पदार्थो की विद्या आती हैं इसीलिए आर्यो के प्रथम नियम में सत्य विद्या का मूल परमेश्वर बताया गया हैं | जो चेतना होती हैं वह सदैव ज्ञान से युक्त होती हैं और वो चेतना जो हर जगह हैं वह सर्वज्ञानी ही हैं |

अजर : वह आयु को प्राप्त नहीं होता | उसे बुढ़ापा नहीं आता वह सदा एक सा रहता हैं यह उसके सर्वव्यापक गुण की पुष्टि कर्ता हैं | उसको काल से भिन्न कर्ता हैं उसका अजरता का गुण और परमात्मा अपना गुण कभी नहीं छोड़ता |

अमर : जो वह अजर हैं सो वह अमर हैं | कभी मर नहीं सकता, सदा से हैं सदा रहेगा |

अभय : जो वहा अजर हैं और अमर हैं तो वहा अभय भी हैं क्यों की उसके पास भय का कोई कारण नहीं | और जो वहा अभय ना होता तो निर्विकार भी ना होता |

नित्य : वह निश्छल अविनाशी हैं इसलिए नित्य कहा गया हैं | कोई उसका विनाश नहीं कर सकता विनाश और निर्माण का कारण वहा परमात्मा हैं |

पवित्र : उस से अधिक पवित्र कोई नहीं | उसका स्वाभाव साधू हैं, वह दयालु हैं, वहा न्यायकारी हैं पवित्रता को पूर्ण करने के सारे गुण उसमे हैं और इस प्रकार जैसे वह परमात्मा हैं कोई पवित्र नहीं |

सृष्टिकर्ता : उपरोक्त गुण उसे सृष्टिकर्ता सिद्ध करते हैं जो उसमे इतना सामर्थ्य हैं और जो वह पवित्र हैं तो वह आलसियो की तरह अपने सामर्थ्य का प्रयोग ना करने का अधर्म नहीं कर सकता और इसीलिए उसने अपने सामर्थ्य और जीवात्मा के सामर्थ्य को प्रकृति की उपस्तिथि की उपयोगिता को सार्थक करते हुए सृष्टि का निर्माण किया |

समस्त वेदादि शास्त्र इन्ही गुणों से युक्त परमात्मा की बात करते हैं | ये जो परमात्मा जो तर्क से भी सिद्ध हैं और वेद के प्रमाण से भी सिद्ध हैं उसी की उपासना से मनुष्य का कल्याण हैं | सो तो उसके असंख्य गुण हमें वेद बाटते हैं पर इतने ही गुण में हम उसके स्वरुप को समझ सकेंगे | आप को यदि अभी भी कोई संशय रह गया हो तो आप परमात्मा के यह गुण उसमे लगा के देखिये जिसे आप साक्षात परमात्मा मान रहे हैं | यदि वह इन गुणों को पूर्ण करे तो वह परमात्मा हैं परन्तु कोई मनुष्य इन सभी गुणों को पूर्ण नहीं कर सकता | जो शरीर धारी हैं वह जीवात्मा हैं और जीवात्मा ही माता के गर्भ में नौ मास उल्टा लटकती हैं ताकि उस परमात्मा के योग के माध्यम से साक्षात्कार कर सके और मोक्ष को प्राप्त कर सके | जितने भी आप्त हुए हैं उन सभी ने उसकी उपासना उसके श्रेष्ठ नाम “ओ३म्” से की हैं | सभी महर्षि अग्नि, वायु, अंगिरा आदित्य, ब्रह्मा, कणाद, मनु, जैमिनी, दयानंद इत्यादि एवं सभी धर्मं संस्थापक राजाओ ने राम, कृष्ण, शंकर इत्यादि एवं सभी आचार्यो ने एवं आचार्य चाणक्य, आचार्य शंकर इत्यादि ने “ओ३म्” नाम की एक मात्र निराकार ईश्वर की उपासना की हैं | हम सभी को उसी की उपासना करते हुए अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना चाहिए |

जब अचानक आने लगें चक्कर तो क्या करें और क्या न करें....


थोड़ी देर तक बैठे रहने के बाद आप जैसे ही उठते हैं, आपके आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है, आपको चक्कर आने लगते हैं। ऐसा लगता होगा कि आपके चारो ओर की चीजें तेजी से घूम रही हैं। आज हम चक्कर आने की बीमारी के निदान के बारे में आपको बताएंगे। चक्कर आना या सिर घूमना एक सामान्य समस्या है। यह स्वयं में एक बीमारी भी है और अनेक बीमारियों का एक लक्षण भी।

कारण

चक्कर आने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन दिमाग से जुड़ी या कान से जुड़ी समस्याएं अधिकांश इसका मुख्य कारण होती है। इसके अलावा ब्लडप्रेशर में परिवर्तन, स्पॉन्डिलोसिस, शरीर में खून की कमी, खून में ग्लूकोज की मात्रा बहुत बढऩे या कम होने और अत्यधिक शारीरिक व मानसिक तनाव से भी मरीज को चक्कर का अनुभव हो सकता है।


चक्कर आने पर तुरंत करें ये घरेलू उपाय

-नारियल का पानी रोज पीने से भी चक्कर आने बंद हो जाते है।

- 20 ग्राम मुनक्का घी में सेंककर सेंधा नमक डालकर खाने से चक्कर आने बंद हो जाते है।

- सिर चकराने पर आधा गिलास पानी में दो लौंग डालकर उसे उबाल लें और फिर उस पानी को पी लें। इस पानी को पीने से लाभ मिलता है।

-10 ग्राम आंवला, 3 ग्राम काली मिर्च और 10 ग्राम बताशे को पीस लें। 15 दिनों तक रोजाना इसका सेवन करें चक्कर आना बंद हो जाएगा।

- रोजाना जूस पीने से चक्कर आने बंद हो जाएंगे। लेकिन ध्यान रखें कि जूस में किसी प्रकार का मीठा या मसाला नहीं डालें। जूस की जगह चाहें तो ताजे फल भी खा सकते हैं।


चक्कर आते हैं तो क्या खाएं.....

- हरी सब्जियों का अधिक मात्रा में सेवन करें।

- अंगूर, अनार, आम, सेब, संतरा, मौसमी आदि फलों का सेवन करें या रस पिएं।

- आंवले, फालसे, शहतूत का शरबत पीने से उष्णता नष्ट होने से चक्कर आने की विकृति नष्ट होती है।

-रात को 4-5 बादाम जल में डालकर रखें। प्रात: उनके छिलके उतार करके, बादाम पीसकर, दूध में मिलाकर सेवन करें।

-प्रतिदिन सुबह-शाम दूध का सेवन करें। दूध में घी डालकर पिएं।

- सेब या गाजर का मुरब्बा प्रतिदिन खाएं और दूध पिएं।

- दूध में बादाम का तेल डालकर पिएं।

- जिन लोगों को चक्कर आते हैं उन्हें दोपहर के भोजन के 2 घंटे पहले और शाम के नाश्ते में फलों का जूस पीना चाहिए।

क्या न खाएं

- जंक फूड, चाय व कॉफी से परहेज करें।

- अधिक मसालेदार न खाएं।

- नॉनवेज और ज्यादा ऑइली खाने से भी बचें।



इस रविवार ऐसे लगाएं एक दीपक, नहीं सताएगा अकाल मृत्यु का डर


स्कंद पुराण के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी यानी धनरतेरस (इस बार 11 नवंबर, रविवार) के प्रदोषकाल में यमराज के निमित्त दीप और नैवेद्य समर्पित करने पर अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। यमदीप दान प्रदोषकाल यानी शाम के समय करना चाहिए। इसकी विधि इस प्रकार है-

विधि

मिट्टी का एक बड़ा दीपक लें और उसे स्वच्छ जल से धो लें। इसके बाद साफ रुई लेकर दो लंबी बत्तियां बना लें। उन्हें दीपक में एक-दूसरे पर आड़ी इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुहं दिखाई दें। अब उसे तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें कुछ काले तिल भी डाल दें।

इस प्रकार तैयार किए गए दीपक का रोली, चावल एवं फूल से पूजन करें। उसके बाद घर के मुख्य दरवाजे के बाहर थोड़ी सी खील अथवा गेहूं की एक ढेरी बनाएं और नीचे लिखे मंत्र को बोलते हुए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यह दीपक उस पर रख दें-


मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदनात् सूर्यज: प्रीयतामिति।।

इसके बाद हाथ में फूल लेकर नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए यमदेव को दक्षिण दिशा में नमस्कार करें-
ऊँ यमदेवाय नम:। नमस्कारं समर्पयामि।।

अब यह फूल दीपक के समीप छोड़ दें और हाथ में एक बताशा लें तथा नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए उसे भी दीपक के पास रख दें-

ऊँ यमदेवाय नम:। नैवेद्यं निवेदयामि।।

अब हाथ में थोड़ा सा जल लेकर आचमन के निमित्त नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए दीपक के समीप छोड़ दें-
ऊँ यमदेवाय नम:। आचमनार्थे जलं समर्पयामि।

अब पुन: यमदेव को ऊँ यमदेवाय नम: कहते हुए दक्षिण दिशा में नमस्कार करें।
इस तरह दीपदान करने से यमराज प्रसन्न होते हैं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।