09 November 2012

ॐ शंखनाद की औषधीय विशेषता ॐ



हिंदू मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख की उत्पत्ति छठे स्थान पर हुई। शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद हैं, जो अन्य तेरह रत्नों में हैं। दक्षिणावर्ती शंख के अद्भुत गुणों के कारण ही भगवान विष्णु ने उसे अपने हस्तकमल में धारण किया हुआ है।


शंख मुख्यतः दो प्रकार के होते ह्रैं : वामावर्ती और दक्षिणावर्ती। इन दोनों की पूजा का विशेष महत्व है। दैनिक पूजा-पाठ एवं कर्मकांड अनुष्ठानों के आरंभ में तथा अंत में वामावर्ती शंख का नाद किया जाता है। इसका मुख ऊपर से खुला होता है। इसका नाद प्रभु के आवाहन के लिए किया जाता है। इसकी ध्वनि से क्क शब्द निकलता है। यह ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। वैज्ञानिक भी इस बात पर एकमत हैं कि शंख की ध्वनि से होने वाले वायु-वेग से वायुमंडल में फैले वे अति सूक्ष्म किटाणु नष्ट हो जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए घातक होते हैं।

उक्त अवसरों के अतिरिक्त अन्य मांगलिक उत्सवों के अवसर पर भी शंख वादन किया जाता है। महाभारत के युद्ध के अवसर पर भगवान कृष्ण ने पांचजन्य निनाद किया था। कोई भी शुभ कार्य करते समय शंख ध्वनि से शुभता का अत्यधिक संचार होता है। शंख की आवाज को सुन कर लोगों को ईश्वर का स्मरण हो आता है।

शंख वादन के अन्य लाभ भी हैं। इसे बजाने से सांस की बीमारियों से छुटकारा मिलता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख बजाना विशेष लाभदायक है। शंख बजाने से पूरक, कुंभक और प्राणायाम एक ही साथ हो जाते हैं। पूरक सांस लेने, कुंभक सांस रोकने और रेचक सांस छोड़ने की प्रक्रिया है। आज की सबसे घातक बीमारी हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, सांस से संबंधित रोग, मंदाग्नि आदि शंख बजाने से ठीक हो जाते हैं।

घर में शंख वादन से घर के बाहर की आसुरी शक्तियां भीतर नहीं आ सकतीं। यही नहीं, घर में शंख रखने और बजाने से वास्तु दोष दूर हो जाते हैं।

दक्षिणावर्ती शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक है। इसका मुख ऊपर से बंद होता है। घर के मंदिर में इसकी स्थापना करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति और व्यवसाय में लाभ होता है। दक्षिणावर्ती शंख से भगवान सूर्य को जल का अर्य देने से मानसिक तथा शारीरिक कष्टों का निवारण होता है और नेत्र विकार से मुक्ति मिलती है।

अगर आपको खांसी, दमा, पीलिया, ब्लड प्रेशर या दिल से संबंधित मामूली से लेकर गंभीर बीमारी है तो इससे निजात पाने का एक सरल और आसान सा उपाय है- प्रतिदिन शंख बजाइए।


करते हैं कि शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है।

शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है।

प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं हो सकते।
शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है।

शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का भी व्यायाम हो जाता है।

शंख वादन से स्मरण शक्ति भी बढ़ती है।


ॐ पेट कि बीमारी का इलाज ॐ


राजीव भाई कहते है अगर आपकी पेट ख़राब है दस्त हो गया है , बार बार आपको टॉयलेट जाना पड़ रहा है तो इसकी सबसे अछि दावा है जीरा | अध चम्मच जीरा चबाके खा लो पीछे से गुनगुना पानी पी लो तो दस्त एकदम बंध हो जाते है एक ही खुराख में |

अगर बहुत जादा दस्त हो ... हर दो मिनिट में आपको टॉयलेट जाना पड़ रहा है तो आधा कप कच्चा दूध ले लो बिना गरम किया हुआ और उसमे निम्बू डालके जल्दी से पी लो | दूध फटने से पहले पीना है और बस एक ही खुराक लेना है बस इतने में ही खतरनाक दस्त ठीक हो जाते है |

और एक अछि दावा है ये जो बेल पत्र के पेड़ पर जो फल होते है उसका गुदा चबाके खा लो पीछे से थोडा पानी पी लो ये भी दस्त ठीक कर देता है | बेल का पाउडर मिलता है बाज़ार में उसका एक चम्मच गुनगुना पानी के साथ पी लो ये भी दस्त ठीक कर देता है |

पेट अगर आपका साफ़ नही रहता कब्जियत रहती है तो इसकी सबसे अछि दावा है अजवाईन | इसको गुड में मिलाके चबाके खाओ और पीछे से गरम पानी पी लो तो पेट तुरंत साफ़ होता है , रात को खा के सो जाओ सुबह उठते ही पेट साफ होगा |

और एक अछि दावा है पेट साफ करने की वो है त्रिफला चूर्ण , रात को सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण ले लो पानी के साथ पेट साफ हो जायेगा |

पेट जुडी दो तिन ख़राब बिमारिय है जैसे बवासीर, पाईल्स, हेमोरोइड्स, फिसचुला, फिसर .. ये सब बिमारिओ में अछि दावा है मुली का रस | एक कप मुली का रस पियो खाना खाने के बाद दोपहर को या सबेरे पर शाम को मत पीना तो हर तरेह का बवासीर ठीक हो जाता है , भगंदर ठीक होता है फिसचुला, फिसर ठीक होता है .. अनार का रस पियो तो भी ठीक हो जाता है

ॐ भगवान शिव के 108 नाम ॐ


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१- ॐ भोलेनाथ नमः
२-ॐ कैलाश पति नमः
३-ॐ भूतनाथ नमः
४-ॐ नंदराज नमः

५-ॐ नन्दी की सवारी नमः
६-ॐ ज्योतिलिंग नमः
७-ॐ महाकाल नमः
८-ॐ रुद्रनाथ नमः
९-ॐ भीमशंकर नमः
१०-ॐ नटराज नमः
११-ॐ प्रलेयन्कार नमः
१२-ॐ चंद्रमोली नमः
१३-ॐ डमरूधारी नमः
१४-ॐ चंद्रधारी नमः
१५-ॐ मलिकार्जुन नमः
१६-ॐ भीमेश्वर नमः
१७-ॐ विषधारी नमः
१८-ॐ बम भोले नमः
१९-ॐ ओंकार स्वामी नमः
२०-ॐ ओंकारेश्वर नमः
२१-ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः
२२-ॐ विश्वनाथ नमः
२३-ॐ अनादिदेव नमः
२४-ॐ उमापति नमः
२५-ॐ गोरापति नमः
२६-ॐ गणपिता नमः
२७-ॐ भोले बाबा नमः
२८-ॐ शिवजी नमः
२९-ॐ शम्भु नमः
३०-ॐ नीलकंठ नमः
३१-ॐ महाकालेश्वर नमः
३२-ॐ त्रिपुरारी नमः
३३-ॐ त्रिलोकनाथ नमः
३४-ॐ त्रिनेत्रधारी नमः
३५-ॐ बर्फानी बाबा नमः
३६-ॐ जगतपिता नमः
३७-ॐ मृत्युन्जन नमः
३८-ॐ नागधारी नमः
३९- ॐ रामेश्वर नमः
४०-ॐ लंकेश्वर नमः
४१-ॐ अमरनाथ नमः
४२-ॐ केदारनाथ नमः
४३-ॐ मंगलेश्वर नमः
४४-ॐ अर्धनारीश्वर नमः
४५-ॐ नागार्जुन नमः
४६-ॐ जटाधारी नमः
४७-ॐ नीलेश्वर नमः
४८-ॐ गलसर्पमाला नमः
४९- ॐ दीनानाथ नमः
५०-ॐ सोमनाथ नमः
५१-ॐ जोगी नमः
५२-ॐ भंडारी बाबा नमः
५३-ॐ बमलेहरी नमः
५४-ॐ गोरीशंकर नमः
५५-ॐ शिवाकांत नमः
५६-ॐ महेश्वराए नमः
५७-ॐ महेश नमः
५८-ॐ ओलोकानाथ नमः
५४-ॐ आदिनाथ नमः
६०-ॐ देवदेवेश्वर नमः
६१-ॐ प्राणनाथ नमः
६२-ॐ शिवम् नमः
६३-ॐ महादानी नमः
६४-ॐ शिवदानी नमः
६५-ॐ संकटहारी नमः
६६-ॐ महेश्वर नमः
६७-ॐ रुंडमालाधारी नमः
६८-ॐ जगपालनकर्ता नमः
६९-ॐ पशुपति नमः
७०-ॐ संगमेश्वर नमः
७१-ॐ दक्षेश्वर नमः
७२-ॐ घ्रेनश्वर नमः
७३-ॐ मणिमहेश नमः
७४-ॐ अनादी नमः
७५-ॐ अमर नमः
७६-ॐ आशुतोष महाराज नमः
७७-ॐ विलवकेश्वर नमः
७८-ॐ अचलेश्वर नमः
७९-ॐ अभयंकर नमः
८०-ॐ पातालेश्वर नमः
८१-ॐ धूधेश्वर नमः
८२-ॐ सर्पधारी नमः
८३-ॐ त्रिलोकिनरेश नमः
८४-ॐ हठ योगी नमः
८५-ॐ विश्लेश्वर नमः
८६- ॐ नागाधिराज नमः
८७- ॐ सर्वेश्वर नमः
८८-ॐ उमाकांत नमः
८९-ॐ बाबा चंद्रेश्वर नमः
९०-ॐ त्रिकालदर्शी नमः
९१-ॐ त्रिलोकी स्वामी नमः
९२-ॐ महादेव नमः
९३-ॐ गढ़शंकर नमः
९४-ॐ मुक्तेश्वर नमः
९५-ॐ नटेषर नमः
९६-ॐ गिरजापति नमः
९७- ॐ भद्रेश्वर नमः
९८-ॐ त्रिपुनाशक नमः
९९-ॐ निर्जेश्वर नमः
१०० -ॐ किरातेश्वर नमः
१०१-ॐ जागेश्वर नमः
१०२-ॐ अबधूतपति नमः
१०३ -ॐ भीलपति नमः
१०४-ॐ जितनाथ नमः
१०५-ॐ वृषेश्वर नमः
१०६-ॐ भूतेश्वर नमः
१०७-ॐ बैजूनाथ नमः
१०८-ॐ नागेश्वर नमः


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!!! धनिया करदे धन्य !!!



हरा धनिया मसाले के रूप में व भोजन को सजाने या सुंदरता बढ़ाने के साथ ही चटनी के रूप में भी खाया जाता है। 

हमारे बड़े-बुजूर्ग इसके औषधिय गुणों को जानते थे इसीलिए प्राचीन समय से ही धनिए का उपयोग भारतीय भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जाता रहा है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं हरे धनिए के कुछ ऐसे ही औषधिय गुणों के बारे में...

- इसके एंटीसेप्टिक और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाया जाता है इसीलिए अगर चेहरे पर मुंहासे हो तो धनिए की हरी पत्तियों को पीसकर उसमें चुटकीभर हल्दी पाउडर मिलाकर लगाने से लाभ होता है। यह त्वचा की विभिन्न समस्याओं जैसे एक्जीमा, सुखापन और एलर्जी से राहत दिलवाता है।



- आयरन से भरपूर होने के कारण यह एनिमिया को दूर करने में मददगार होता है। एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन ए, सी और कई मिनरलों से भरपूर धनिया कैंसर से बचाव करता है।

- हरा धनिया की चटनी बनाकर खाई जाती है इसको खाने से नींद भी अच्छी आती है। डायबिटीज से पीडि़त व्यक्ति के लिए तो यह वरदान है। यह इंसुलिन बढ़ाता है और रक्त का ग्लूकोज स्तर कम करने में मदद करता है।

- धनिया की पत्तियों में एंटी टय़ुमेटिक और एंटी अर्थराइटिस के गुण होते हैं। यह सूजन कम करने में बहुत मददगार होता है, इसलिए जोड़ों के दर्द में राहत देता है।

- हरा धनिया वातनाशक होने के साथ-साथ पाचनशक्ति भी बढ़ाता है। धनिया की हरी पत्तियां पित्तनाशक होती हैं। पित्त या कफ की शिकायत होने पर दो चम्मच धनिया की हरी-पत्तियों का रस सेवन करना चाहिए।



07 November 2012

!!! शिवाष्टकम !!!


शिव के प्रशंसा में अनेकों अष्टकों की रचना हुई है जो शिवाष्टक, लिंगाष्टक, रूद्राष्टक,बिल्वाष्टक जैसे नामों से प्रसिद्ध हैं। शिवाष्टकों की संख्या भी कम नहीं है। प्रस्तुत शिवाष्टक आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित है। आठ पदों में विभक्त यह रचना परंब्रह्म शिव की पूजा का एक उत्तम साधन है ।

तस्मै नम: परमकारणकारणाय , दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय

नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय , ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ॥ 1 ॥
जो (शिव) कारणों के भी परम कारण हैं, ( अग्निशिखा के समान) अति दिप्यमान उज्ज्वल एवं पिङ्गल नेत्रोंवाले हैं, सर्पों के हार-कुण्डल आदि से भूषित हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि को भी वर देने वालें हैं – उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय ,शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय ।
कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय , लोकत्रयार्तिहरणाय नम: शिवाय ॥ 2 ॥
जो निर्मल चन्द्र कला तथा सर्पों द्वारा ही भुषित एवं शोभायमान हैं, गिरिराजग्गुमारी अपने मुख से जिनके लोचनों का चुम्बन करती हैं, कैलास एवं महेन्द्रगिरि जिनके निवासस्थान हैं तथा जो त्रिलोकी के दु:ख को दूर करनेवालेहैं, उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय , कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय ।
भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय ,नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय ॥ 3 ॥
जो स्वच्छ पद्मरागमणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले हैं, अगरू तथा चन्दन से चर्चित तथा भस्म, प्रफुल्लित कमल और जूही से सुशोभित हैं ऐसे नीलकमलसदृश कण्ठवाले शिव को नमस्कार है ।

लम्बत्स पिङ्गल जटा मुकुटोत्कटाय , दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय ।
व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय , त्रिलोकनाथनमिताय नम: शिवाय ॥4॥
जो लटकती हुई पिङ्गवर्ण जटाओंके सहित मुकुट धारण करने से जो उत्कटजान पड़ते हैं तीक्ष्ण दाढ़ों के कारण जो अति विकट और भयानक प्रतीतहोते हैं, साथ ही व्याघ्रचर्म धारण किए हुए हैं तथा अति मनोहर हैं, तथा तीनों लोकों के अधिश्वर भी जिनके चरणों में झुकते हैं, उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

दक्षप्रजापतिमहाखनाशनाय , क्षिप्रं महात्रिपुरदानवघातनाय ।
ब्रह्मोर्जितोर्ध्वगक्रोटिनिकृंतनाय , योगाय योगनमिताय नम: शिवाय॥5॥
जो दक्षप्रजापति के महायज्ञ को ध्वंस करने वाले हैं, जिन्होने परंविकट त्रिपुरासुर का तत्कल अन्त कर दिया था तथा जिन्होंने दर्पयुक्त ब्रह्मा के ऊर्ध्वमुख (पञ्च्म शिर) को काट दिया था, उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय , रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय ।
सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय, शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय ॥ 6 ॥
जो संसार मे घटित होने वाले सम्सतघटनाओं में परिवर्तन करने में सक्षम हैं, जो राक्षस, पिशाच से ले कर सिद्धगणों द्वरा घिरे रहते हैं (जिनके बुरे एवं अच्छे सभि अनुयायी हैं); सिद्ध, सर्प, ग्रह-गण एवं इन्द्रादिसे सेवित हैं तथा जो बाघम्बर धारण किये हुएहैं, उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय , सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय ।
गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय , गोक्षीरधारधवलाय नम: शिवाय ॥ 7 ॥
जिन्होंने भस्म लेप द्वरा सृंगारकिया हुआ है, जो अति शांत एवं सुन्दर वन का आश्रय करने वालों (ऋषि, भक्तगण) के आश्रित (वश में) हैं, जिनका श्री पार्वतीजी कटाक्ष नेत्रों द्वरा निरिक्षण करती हैं, तथा जिनका गोदुग्ध की धारा के समान श्वेत वर्ण है, उन शिव जी को नमस्कार करता हूँ।

आदित्य सोम वरुणानिलसेविताय , यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय ।
ऋक्सामवेदमुनिभि: स्तुतिसंयुताय, गोपाय गोपनमिताय नम: शिवाय ॥ 8 ॥
जो सूर्य, चन्द्र, वरूण और पवन द्वार सेवित हैं, यज्ञ एवं अग्निहोत्र धूममें जिनका निवास है, ऋक-सामादि, वेद तथा मुनिजन जिनकी स्तुति करते हैं, उन नन्दीश्वरपूजित गौओं का पालन करने वाले शिव जी को नमस्कार करताहूँ।


बस चुटकी भर हल्दी ऐसे लगाएंगे तो चेहरा दमकने लगेगा


पुराने ग्रंथों में मिले वर्णन के अनुसार आचार्य चरक ने हल्दी को कुष्ठ मिटाने वाली, खुजली दूर करने वाली, गुणों से भरपूर माना है। हल्दी मसाले के साथ ही एक आयुर्वेदिक औषधी भी है। इसके अंदर अनेक अनमोल औषधिय गुण छिपे हैं। हल्दी के इन्हीं गुणों के कारण इसका प्रयोग अनेक बीमारियों के इलाज में भी किया जाता है।

यही कारण है कि पुराने समय से ही दुल्हन या दूल्हे का रूप-सौन्दर्य निखारने के लिए हल्दी का उबटन लगाने की प्रथा बनाई गई है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं हल्दी का एक ऐसा ही प्राचीन प्रयोग जिससे आपका रूप निखर आएगा....


प्रयोग ---- 

हल्दी को थोड़ी मात्रा में लेकर उसमें मक्खन अच्छी तरह मिला लें। इस तैयार मिश्रण को त्वचा पर अच्छी तरह लगाएं। आधा घंटे के बाद स्नान कर लें। कुछ ही दिनों के प्रयोग से त्वचा चमकने लगती है और रूप निखर आता है।

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?


चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?
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गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर
के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार
होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य

महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं।
इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और
संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत
माना जाता है। यह विपाक में मधुर,
शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार
नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है।
गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय
गुणों से भरपूर है। गाय के दही से
बना छाछ पचने में आसान और पित्त
का नाश करने वाला होता है।
गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए
उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है।
इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।
गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम
उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने
पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम,
यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड,
क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य
पाये जाते हैं।

गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला, उदर रोग,
नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास,
श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में
राम-बाण का काम करता है।
चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं
वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग
किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं
असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।
गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक
पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में
किया जाता रहा है।

यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक
गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां,
जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित
गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है।
अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के
कारण पंचगव्य चिकित्सा में
उपयोगी साबित हो रहा है।
चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?

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गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर
के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार
होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य
महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं। इनमें गाय के
दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार
कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है।
यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त
शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु
सर्वथा उपयुक्त है। 

गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से
भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने
में आसान और पित्त का नाश करने
वाला होता है। गाय का घी विशेष रूप से
नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल
दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक
माना जाता है। गोमूत्र प्लीहा रोगों के
निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक
दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम,
मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया,
क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट
आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गोमूत्र कफ
नाशक, शूल गुला, उदर रोग, नेत्र रोग,
मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग
नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण
का काम करता है। चिकित्सा में
इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के
रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक
पुराने एवं असाध्य रोगों में परम
उपयोगी है। गोबर का उपयोग वैदिक
काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय
संस्कृति में किया जाता रहा है। यह
दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक
गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां,
जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित
गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है।
अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के
कारण पंचगव्य चिकित्सा में
उपयोगी साबित हो रहा है


मुलेठी का चमत्कारिक प्रभाव


पहचान-

मुलेठी का वैज्ञानिक नाम ग्‍लीसीर्रहीजा ग्लाब्र (Glycyrrhiza glabra ) कहते है। संस्‍कृत में मधुयष्‍टी:, बंगला में जष्टिमधु, मलयालम में इरत्तिमधुरम, तथा तमिल में अतिमधुरम कहते है। एक झाड़ीनुमा पौधा होता है। इसमें गुलाबी और जामुनी रंग के फूल होते है। इसके फल लम्‍बे चपटे तथा कांटे होते है। इसकी पत्तियॉं सयुक्‍त होती है। मूलजड़ों से छोटी-छोटी जडे निकलती है। इसकी खेती पूरे भारतवर्ष में होती है।
अनेक रोगों की दवा मुलेठी

मुलेठी के प्रयोग से न सिर्फ आमाशय के विकार बल्कि गैस्ट्रिक अल्सर और छोटी आंत के प्रारम्भिक भाग ड्यूओडनल अल्सर में भी लाभ होता है। मुलेठी एक वनौषधि है जिसका एक से छह फुट का पौधा होता है। इसका काण्ड और मूल मधुर होने से इसे यष्टिमधु भी कहा जाता है। असली मुलेठी अंदर से पीली, रेशेदार एवं हल्की गंधवाली होती है। ताजी जड़ मधुर होती है। यह सूखने पर कुछ तिक्त एवं अम्ल जैसे स्वाद की हो जाती है। जड़ को उखाड़ने के बाद दो वर्ष तक उसमें औषधीय गुण बना रहता है। इसका औषधि के रूप में अति प्राचीन काल से ही उपयोग किया जाता रहा है। सुश्रुत, अष्टांगह्वदय, चरक संहिता जैसे ग्रन्थों में इसके प्रयोग द्वारा चेतना लाने (मूच्र्छा दूर करने), उदर रोग, श्वास रोग, स्तन रोग, योनिगत रोगों को दूर करने की अनेक विधियां दी गई हैं। ईरानी चिकित्सक तो आज भी çस्त्रयों की सेक्स संबंधी बीमारियों में इसका प्रयोग कर रहे हैं। ताजा मुलेठी में पचास प्रतिशत जल होता है, जो सुखाने पर मात्र दस प्रतिशत ही शेष रह जाता है। ग्लिसराइजिक एसिड के होने के कारण इसका स्वाद साधारण शक्कर से पचास गुना अधिक मीठा होता है।


पेट के घाव

वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोगों द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया है कि मुलेठी की जड़ का चूर्ण पेट के घावों पर लाभकारी प्रभाव डालता है और घाव जल्दी भरने लगता है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पूनम दिनकर का कहना है कि मुलेठी का एक ग्राम चूर्ण नियमित रूप से सेवन करके स्त्रियाँ अपने स्तन, योनि, सेक्स की भावना, सुन्दरता आदि को लंबे समय तक बनाए रख सकती हैं । डॉ. डी.आर. लॉरेन्स की क्लीनिकल फार्मोकॉलॉजी के अनुसार मुलेठी में ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त ट्राइटर्पी नामक अम्ल भी होता है, जिसे कार्बेनोक्लोजीन के नाम से एलोपैथी में प्रयोग किया जाता है। यह पदार्थ आमाशय में श्लेष्मा की मात्रा बढ़ा देता है। यह प्रभाव अन्य अम्ल निरोधक एण्टासिड्स से कहीं अधिक होता है।

अल्सर मिटाए

मुलेठी न केवल गैस्ट्रिक अल्सर वरन् छोटी आंत के प्रारम्भिक भाग ड्यूओडनल अल्सर में भी पूरी तरह से प्रभावशाली है। इण्डियन मेडिकल गजट के अनुसार ड्यूओडनल अल्सर के रोगियों पर जब मुलेठी का चूर्ण दिया जाता है, तो यह चूर्ण ड्यूओडनल अल्सर के अपच, हाइपर एसिडिटी आदि पर लाभदायक प्रभाव डालता है। साथ ही अल्सर के घावों को भी इतनी तेज गति से भरता है, जितना अन्य औषधि नहीं भर पाते।

आंतों की टीबी

डॉ. बी.डी. अग्रवाल के अनुसार आज लोग आंतों की टीबी के शिकार होते जा रहे हैं। आंतों की टीबी में लगातार उल्टियां होती हैं, तीव्र पेट दर्द की शिकायत रहती है, पखाने के रास्ते खून बहता रहता है, ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। इस स्थिति में मुलेठी का प्रयोग लाभदायक देखा गया है। आमाशय के रोगों में मुलेठी चूर्ण, क्वाथ या स्वरस रूप में पांच मिलीलीटर से दस मिली. तक दिन में तीन बार तक दिया जाता है। तृष्णा एवं उदरशूल में भी यह शीघ्र लाभ देता है। आमाशयिक व्रणों में विशेष लाभकारी होता है। अम्लाधिक्य एवं अम्लपित्त को भी शांत
रखता है।


खून की उल्टी

खून की उल्टियां होने पर दूध के साथ मुलेठी का चूर्ण एक से चार माशे की मात्रा में अथवा मधु के साथ देने पर लाभ होता है। हिचकी होने पर मुलेठी के चूर्ण को शहद में मिलाकर नाक में टपकाने तथा पांच ग्राम चूर्ण को पानी के साथ खिला देने से लाभ होता है।


!!! जानिए शरीर में छिपे सप्त चक्र !!!



मनुष्य शरीर स्थित कुंडलिनी शक्ति में जो चक्र स्थित होते हैं उनकी संख्या सात बताई गई है। इन चक्रों के विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं गोपनीय जानकारी यहां दी गई है। यह जानकारी शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं तथ्यात्मक है-

(1) मूलाधार चक्र - गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। वहाँ वीरता और आनन्द भाव का निवास है ।

(2) स्वाधिष्ठान चक्र - इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छ: पंखुरियाँ हैं । इसके जाग्रत होने पर क्रूरता,गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है ।

(3) मणिपूर चक्र - नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईष्र्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि कषाय-कल्मष मन में लड़ जमाये पड़े रहते हैं ।

(4) अनाहत चक्र - हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । यह सोता रहे तो लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा । जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे ।

(5) विशुद्धख्य चक्र - कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभूतियाँ विद्यमान है

(6) आज्ञाचक्र - भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ '?' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियाँ जाग पड़ती हैं ।

(7) सहस्रार चक्र - सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है ।


कुण्डलिनी जागरण: विधि और विज्ञान::

कुंडलिनी जागरण का अर्थ है मनुष्य को प्राप्त महानशक्ति को जाग्रत करना। यह शक्ति सभी मनुष्यों में सुप्त पड़ी रहती है। कुण्डली शक्ति उस ऊर्जा का नाम है जो हर मनुष्य में जन्मजात पायी जाती है। यह शक्ति बिना किसी भेदभाव के हर मनुष्य को प्राप्त है। इसे जगाने के लिए प्रयास या साधना करनी पड़ती है। जिस प्रकार एक नन्हें से बीज में वृक्ष बनने की शक्ति या क्षमता होती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य में महान बनने की, सर्वसमर्थ बनने की एवं शक्तिशाली बनने की क्षमता होती है। कुंडली जागरण के लिए साधक को शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर पर साधना या प्रयास पुरुषार्थ करना पड़ता है। जप, तप, व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, योग आदि के माध्यम से साधक अपनी शारीरिक एवं मानसिक, अशुद्धियों, कमियों और बुराइयों को दूर कर सोई पड़ी शक्तियों को जगाता है। अत: हम कह सकते हैं कि विभिन्न उपायों से अपनी अज्ञात, गुप्त एवं सोई पड़ी शक्तियों का जागरण ही कुंडली जागरण है। योग और अध्यात्म की भाषा में इस कुंडलीनी शक्ति का निवास रीढ़ की हड्डी के समानांतर स्थित छ: चक्रों में माना गया है। कुण्डलिनी की शक्ति के मूल तक पहुंचने के मार्ग में छ: फाटक है अथवा कह सकते हैं कि छ: ताले लगे हुए है। यह फाटक या ताले खोलकर ही कोई जीव उन शक्ति केंद्रों तक पहुंच सकता है। इन छ: अवरोधों को आध्यात्मिक भाषा में षट्-चक्र कहते हैं। ये चक्र क्रमश: इस प्रकार है: मूलधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र, आज्ञाचक्र। साधक क्रमश: एक-एक चक्र को जाग्रत करते हुए। अंतिम आज्ञाचक्र तक पहुंचता है। मूलाधार चक्र से प्रारंभ होकर आज्ञाचक्र तक की सफलतम यात्रा ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है।



06 November 2012

गुणकारी है तीखी मिर्च-



1 छोटी-छोटी फुन्सियां उठने पर हरी मिर्च का लेप लगाने से फुन्सियां बैठ जाती है।

2 खाज-खुजली के लिए मिर्च को तेल में जलाकर मालिश करने से आराम मिलता है।

3 जोड़ों का दर्द होने पर भी यह तेल फायदेमंद होता है।

4 कुत्ते के काट लेने पर या ततैया के के डंक मारने पर मिर्च को पीस कर लगाने से विषैले असर से छुटकारा मिलता है।

5 मकड़ी त्वचा पर चल जाती है, तब छोटे-छोटे दाने उभर आते हैं। उन पर भी मिर्च पीसकर लगाने से फायदा होता है।

6 हरी मिर्च अधिक मात्रा में नहीं ली जानी चाहिए, अन्यथा अम्ल-पित्त की शिकायत हो सकती है।

7 और शायद आपको पढ़कर आश्चर्य हो कि कई बुजुर्ग तीनों प्रकार की मिर्च काली, लाल और हरी को मिलाकर बनाए घोल से लंबे समय से चले आ रहे छालों का इलाज करते हैं। लेकिन बिना विशेषज्ञ की सलाह के आप ऐसा ना करें क्योंकि इसके लिए तीनों मिर्च की सुनिश्चित मात्रा लेकर कटोरी में घोल बनाया जाता है और जी कड़ा करके उसे एक साथ पी लिया जाता है। यह हर किसी पर कारगर हो आवश्यक नहीं।



अगर आप क्रीम वाले बिस्किट खाने के शौकीन हैं तो सतर्क हो जाइए


अगर आप क्रीम वाले बिस्किट खाने के शौकीन हैं तो सतर्क हो जाइए। हो सकता है इन बिस्किट में क्रीम की जगह वनस्पति घी और शक्कर का पेस्ट लगा हो। ये खुलासा हुआ है राज्य खाद्य पदार्थ परीक्षण प्रयोगशाला में नामी कंपनियों के क्रीम बिस्किटों की जांच रिपोर्ट में। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों (एफएसओ) द्वारा पिछले एक साल में नामी कंपनियों के क्रीमयुक्त बिस्किटों के 150 नमूने लिए गए थे। इनमें से 78 में वनस्पति घी, शक्कर और पानी के घोल का पेस्ट बिस्किटों के बीच लगा मिला है। मानक स्तर पर फेल हुए नमूनों में ब्रिटानिया, पारले, सनफीस्ट और कैडबरी जैसी नामी कंपनियों के नमूने शामिल हैं

एफएसओ डीके वर्मा के मुताबिक़ सभी मामलों में बिस्किट निर्माता कंपनी और सप्लायरों के विरुद्ध खाद्य सुरक्षा एवं मानक निर्धारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर कोर्ट में चालान दाखिल किए गए हैं। वर्मा के मुताबिक बिस्किट में अमानक क्रीम पाए जाने के बाद सभी एफएसओ को हर माह दुकानों को निरीक्षण कर बिस्किट के नमूने लेने को कहा गया है।

राज्य खाद्य पदार्थ परीक्षण प्रयोगशाला के फूड एनालिस्ट चतुर्भुज मीणा ने बताया बिस्किट निर्माता कंपनियां क्रीम के नाम पर बिस्किटों के बीच वनस्पति घी, शक्कर और पानी के पेस्ट का उपयोग कर रही हैं। पेस्ट का रंग क्रीम जैसा होने के कारण उपभोक्ता असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते। बिस्किटों के बीच भरे जाने वाले इस पेस्ट में बिस्किट कंपनियों के अधिकारी विभिन्न प्रकार के फ्लेवर व एसेंस की मिलावट करते हैं।

एफएसओ वर्मा ने बताया कि इस साल सबसे ज्यादा 50 नमूने पारले मेनिफिस्टो के फेल हुए हैं। इसके अलावा सनफीस्ट क्रीम के 15 और ब्रिटानिया क्रीम बिस्किट (ऑरेंज फ्लेवर) के 12 नमूनों में मिलावट मिली है। दो माह पहले लिए गए कैडबरी कंपनी के ओरियो बिस्किट का भी एक नमूना फेल हुआ है। एफएसओ वर्मा ने बताया कि कैडबरी कंपनी ने लैब रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस पर ओरियो बिस्किट का नमूना जांच के लिए रेफरल लैब, मैसूर भेजा भेजा गया था, जहां से भेजी गई जांच रिपोर्ट में बिस्किट की क्रीम को अमानक स्तर का बताया गया।

बिस्किट का नाम : नमूने फेल


पारले मेनिफिस्टो : 50
सनफीस्ट क्रीम बिस्किट : 15
ब्रिटानिया क्रीम बिस्किट (ऑरेंज फ्लेवर) : 12
कैडबरी ओरियो बिस्किट : 1


(राज्य खाद्य पदार्थ परीक्षण प्रयोगशाला के फूड एनालिस्ट चतुर्भुज मीणा के मुताबिक।)


आयुर्वेद .....वात, पित्त कफ ::



आयुर्वेद मुख्यतः पारंपरिक और महर्षि होते हैं । जो महर्षि आयुर्वेद है वो पारंपरिक आयुर्वेद पर हीं आधारित है जिसे योगी महेश ने शास्त्रीय ग्रंथों का अनुवाद करके लिखा है। दोनों प्रकार के आयुर्वेदिक उपचार में शरीर के दोष को दूर किया जाता है और लगभग एक हीं तरह का उपचार किया जाता है । आयुर्वेद के अलावा महर्षि महेश ने अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में परम चेतना की भूमिका पर जोर दिया है, जिसके लिए उन्होनें ट्रान्सेंडटेल  ध्यान (टीएम) को प्रोत्साहित किया है । इसके अलावा महर्षि महेश के विचार सकारात्मक भावनाओं पर जोर देती है जो शरीर की लय को प्राकृतिक जीवन के साथ समायोजित करती है ।


दोष और उपचार

आयुर्वेद मानता है कि जिस तरह प्रत्येक व्यक्ति के उँगलियों के निशान अलग अलग होते हैं उसी तरह हर किसी की मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा अलग अलग पैटर्न की होती है । आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति में तीन बुनियादी ऊर्जा मौजूद होती हैं जिन्हें दोष कहा जाता है , जो निम्न प्रकार के होते हैं :

• वात: यह शारीरिक ऊर्जा से संबंधित कार्यों की गति को नियंत्रण में रखता है, साथ ही रक्त परिसंचरण, श्वशन क्रिया , पलकों का झपकाना , और दिल की धड़कन में उचित संतुलन ऊर्जा भेजकर उससे सही काम करवाता है । वात आपके सोचने समझने की शक्ति को बढ़ावा देता है, रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है लेकिन अगर यह असंतुलित हो गया तो घबराहट एवं डर पैदा करता है।

• पित्त: यह शरीर की चयापचय क्रिया पर नियंत्रण रखता है, साथ ही पाचन, अवशोषण, पोषण, और शरीर के तापमान को भी संतुलित रखता है। अगर पित्त की मात्रा संतुलन में हो तो यह मन में संतोष पैदा करता है तथा बौधिक क्षमता को बढाता है लेकिन यह अगर असंतुलित हो गया तो अल्सर एवं क्रोध पैदा करता है।

• कफ: यह ऊर्जा शरीर के विकास पर नियंत्रण रखता है । यह शरीर के सभी भागों को पानी पहुंचाता है, त्वचा को नम रखता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है । उचित संतुलन में कफ की ऊर्जा मनुष्य के भीतर प्यार और क्षमा की भावना भर देती है लेकिन इसके असंतुलन पर मनुष्य ईर्ष्यालू हो जाता है और वह खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है ।

आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति में ये तीन दोष पाए जाते हैं , लेकिन किसी किसी व्यक्ति में केवल 1 या 2 दोष ही पूरी तरह से सक्रिय रहतें हैं । इन दोषों का संतुलन कई कारणों से असंतुलित हो जाता है मसलन तनाव में रहने से या अस्वास्थ्यकर आहार खाने से या प्रतिकूल मौसम की वजह से या पारिवारिक रिश्तों में दरार के कारण । तत्पश्चात दोषों की गड़बड़ी शरीर की बीमारी के रूप में उभर कर सामने आती!!


इन पत्तियों की खास बातें जानेंगे तो आप भी मानेंगे ये हैं चमत्कारी पत्तियां-



शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर कई प्रकार की सामग्री फूल-पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। इन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण है बिल्वपत्र। बिल्वपत्र से जुड़ी खास बातें जानने के बाद आप भी मानेंगे कि बिल्व का पेड बहुत चमत्कारी है-


पुराणों के अनुसार रविवार के दिन और द्वादशी तिथि पर बिल्ववृक्ष का विशेष पूजन करना चाहिए। इस पूजन से व्यक्ति से ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है।

क्या आप जानते हैं कि बिल्वपत्र छ: मास तक बासी नहीं माना जाता। इसका मतलब यह है कि लंबे समय शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार बिल्ववृक्ष के सात पत्ते प्रतिदिन खाकर थोड़ा पानी पीने से स्वप्न दोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में काम आता है।

शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भक्त को जीवन में कभी भी पैसों की कोई समस्या नहीं रहती है।

शास्त्रों में बताया गया है जिन स्थानों पर बिल्ववृक्ष हैं वह स्थान काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र है। ऐसी जगह जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

बिल्वपत्र उत्तम वायुनाशक, कफ-निस्सारक व जठराग्निवर्धक है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। इनमें निहित उड़नशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि औषधीय गुणों से भरपूर हैं। चतुर्मास में उत्पन्न होने वाले रोगों का प्रतिकार करने की क्षमता बिल्वपत्र में है।

ध्यान रखें इन कुछ तिथियों पर बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ये तिथियां हैं चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति और सोमवार तथा प्रतिदिन दोपहर के बाद बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ऐसा करने पर पत्तियां तोडऩे वाला व्यक्ति पाप का भागी बनता है।

शास्त्रों के अनुसार बिल्व का वृक्ष उत्तर-पश्चिम में हो तो यश बढ़ता है, उत्तर-दक्षिण में हो तो सुख शांति बढ़ती है और बीच में हो तो मधुर जीवन बनता है।

घर में बिल्ववृक्ष लगाने से परिवार के सभी सदस्य कई प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। इस वृक्ष के प्रभाव से सभी सदस्य यशस्वी होते हैं, समाज में मान-सम्मान मिलता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।



SPROUTED FOOD नहीं खाते हैं ...तो जान लें क्यों हैं ये SUPERB



हेल्थ बनाने के लिए अधिकतर लोग भोजन में सलाद भी शामिल करते हैं क्योंकि माना जाता है कि खीरा, ककड़ी, टमाटर, मूली, चुकन्दर, गोभी आदि खाना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। लेकिन अगर पत्तेदार सब्जी व सलाद के साथ ही भोजन में अंकुरित अनाज को शामिल किया जाए तो न सिर्फ यह बहुत फायदेमंद होता है क्योंकि बीजों के अंकुरित होने के बाद इनमें पाया जाने वाला स्टार्च- ग्लूकोज, फ्रक्टोज एवं माल्टोज में बदल जाता है जिससे न सिर्फ इनके स्वाद में वृद्धि होती है बल्कि इनके पाचक एवं पोषक गुणों में भी वृद्धि हो जाती है। वैसे तो अंकुरित दाल व अनाज खाना लाभदायक होता है ये तो सभी जानते हैं लेकिन आज हम बताते हैं इन्हें खाने के कुछ खास फायदे जिन्हें आप शायद ही जानते होंगे.....

- अंकुरित मूंग, चना, मसूर, मूंगफली के दानें आदि शरीर की शक्ति बढ़ाते हैं।

- अंकुरित दालें थकान, प्रदूषण व बाहर के खाने से उत्पन्न होने वाले ऐसिड्स को बेअसर कर देतीं हैं और साथ ही ये ऊर्जा के स्तर को भी बढ़ा देती हैं।


- अंकुरित भोजन क्लोरोफिल, विटामिन ,कैल्शियम, फास्फोरस, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयरन, जैसे खनिजों का अच्छा स्रोत होता है।

- अंकुरित भोजन से काया कल्प करने वाला अमृत आहार कहा गया है यह शरीर को सुंदर व स्वस्थ बनाता है।

- अंकुर उगे हुए गेहूं में विटामिन-ई भरपूर मात्रा में होता है। शरीर की उर्वरक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन-ई एक आवश्यक पोषक तत्व है। यही नहीं, इस तरह के गेहूं के सेवन से त्वचा और बाल भी चमकदार बने रहते हैं। किडनी, ग्रंथियों, तंत्रिका तंत्र की मजबूत तथा नई रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी इससे मदद मिलती है। अंकुरित गेहुं में मौजूद तत्व शरीर से अतिरिक्त वसा का भी शोषण कर लेते हैं।

- अंकुरित भोजन शरीर का मेटाबॉलिज्म रेट बढ़ता है। यह शरीर में बनने वाले विषैले तत्वों को बेअसर कर, रक्त को शुद्घ करता है। अंकुरित गेहूं के दानों को चबाकर खाने से शरीर की कोशिकाएं शुद्घ होती हैं और इससे नई कोशिकाओं के निर्माण में भी मदद मिलती है। अंकुरित गेहूं में उपस्थित फाइबर के कारण इसके नियमित सेवन से पाचन क्रिया भी सुचारु रहती है। अत: जिन लोगों को पाचन संबंधी समस्याएं हो उनके लिए भी अंकुरित गेहूं का सेवन फायदेमंद है।

- अंकुरित खाने में एंटीआक्सीडेंट, विटामिन ए, बी, सी, ई पाया जाता है। इससे कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, आयरन और जिंक मिलता है। रेशे से भरपूर अंकुरित अनाज पाचन तंत्र को सुदृढ बनाते हैं।
- अंकुरित भोज्य पदार्थ में मौजूद विटामिन और प्रोटीन होते हैं तो शरीर को फिट रखते हैं और कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है।


05 November 2012

श्री शिव चालीसा




ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 



श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥


जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥ 

 ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 

भारत 99 साल के लिए पट्टे पर है india is on lease for 99 years


भारत को अंग्रेजो ने अपनी शर्तो पर आजाद किया था उन्होंने भारत को 99 साल के लिए पटे पर रखा हुआ है यही कारण है की भारत अब तक अंग्रेजो द्वारा बनाये हुए 35 हज़ार कानून को नहीं ख़तम करवा पाया है . भारतीय जनमानस और यहाँ की प्रकति के अनुसार भारत में एकभी कानून नहीं चल रहा है .सभी कानून पर अग्रेजो की छाप है.
यहाँ तक की आज भी भारत के कोर्ट कही मामलो में ब्रिटिश कोर्ट के नियमो का और फेसलो का रेफरेंस देकर फैसला करते हैं .

ऐसी आज़ादी का समझोता करके नेहरु ने शहीदों का अपमान किया था जो आज भी जारी है .ये 125 करोड़ के देश के लिए बहुत ही शर्म की बात है ये उधार की आज़ादी नहीं है तो फिर और क्या है .उधार ले ले कर तो एक आदमी भी सम्मान और स्वाभिमान से नहीं जी सकता तो फिर रास्ट्र कैसे उन्नति कर सकता है सोचिये जरा

आप इस फोटो को Desktop Wallpaper के रूप में लगा सकते हैं जिससे आपके पास हर आने वाले को पता चले की हमारा साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है



कारण: जानकर आपको भी लगेगा, ठंड में जरूर खाना चाहिए आंवला



आंवले को बहुत ही गुणकारी माना जाता है लेकिन आंवले का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसे पकाने के बाद भी इसमें मौजूद विटामिन सी खत्म नहीं होता। वैसे तो आंवला हर मौसम में ही फायदा पहुंचाता है। लेकिन ठंड के मौसम आंवले खाने के कुछ विशेष फायदे होते हैं। आंवले में क्रोमियम काफी मात्रा में होता है, आंवला हरा, ताजा हो या सुखाया हुआ पुराना हो, इसके गुण नष्ट नहीं होते। इसकी अम्लता इसके गुणों की रक्षा करती है। आयुर्वेद में आंवले को रसायन माना जाता है। च्यवनप्राश आयुर्वेद का प्रसिद्ध रसायन है, जो टॉनिक के रूप में आम आदमी भी प्रयोग करता है। यह शरीर में आरोग्य शक्ति बढ़ाता है। त्वचा, नेत्र रोग और बालों के लिए विटामिन बहुत उपयोगी है।


- एसीडिटी की समस्या है, तो एक ग्राम आंवला पाउडर और थोड़ी-सी चीनी को एक गिलास पानी या दूध में मिलाकर लें।


- आंवला अर्थराइटिस के दर्द को कम करने में भी सहायक होता है।

- आंवला खाने से सर्दी, खांसी, जुकाम जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।

- आंवले के जूस में शहद मिलाकर पीएं। यह मोतियाबिंद की परेशानी में भी फायदेमंद रहता है।

- आंवला हमारे पाचन तन्त्र और हमारी किडनी को स्वस्थ रखता है।

- आंवला बालों को मजबूत बनाता है, इनकी जड़ों को मजबूत करता है और बालों का झडऩा भी काफी हद तक रोकता है।

- आंवला खाने से कब्ज दूर होती है। यह डायरिया जैसी परेशानियों को दूर करने में बहुत फायदेमंद है।खाना खाने से पहले आंवले का पाउडर, शहद और मक्खन मिलाकर खाने से भूख अच्छी लगती है।

- दिल को सेहतमंद रखने के लिए ठंड में रोजआंवला खाने की आदत डालें। इससे आपके दिल की मांसपेशियां मजबूत होंगी, जिससे दिल शरीर को ज्यादा व साफ खून सप्लाई कर पाएगा। बेशक इससे आप सेहतमंद रहेंगे।

- आंवला हमारे शरीर की त्वचा और हमारे बालों के लिए बहुत लाभकारी होता है।

- डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद है। दरअसल, क्रोमियम इंसुलिन बनाने वाले सेल्स को ऐक्टिवेट करता है और इस हॉर्मोन का काम शरीर में ब्लड शुगर को कंट्रोल करना होता है।

- ठंड में सुबह नाश्ते में आंवले का मुरब्बा खाने से आप सालभर स्वस्थ बने रहेंगे।


उरद की दाल से बना दही वड़ा


मित्रो आयूर्वेद के अनुसार कभी भी दो विरुद्ध वस्तूये एक साथ नहीं खानी चाहिए ।

विरुद्ध वस्तुओ से अभिप्राय ऐसी वस्तूए जिनका गुण - धर्म अलग हो ।

ऐसी कुछ 103 चीज़े आयूर्वेद में बाताई गई है । जो एक साथ कभी नहीं खानी चाहिए ।

उदाहरण के लिये प्याज और दूध कभी एक साथ न खाये ।

एक दुसरे के जानी दुशमन हैं । इसको खाने से सबसे ज्यादा चमड़ी के रोग आपको
होगें दाद,खाज ,खुजली,एगसिमा ,सोराईसिस, आदि ।

ऐसी ही कटहल (jack fruit )और दूध कभी न खाये । ये भी जानी दुश्मन हैं ।

ऐसे ही खट्टे फ़ल जिनमे सिट्रिक ऐसिड होता है कभी न खायें । एक सिट्रिक
ऐसिड तो इनसान का बनाया है एक भगवान का बनाया है । जैसे संतरा । कभी दूध
के साथ न खाये ।

आयुर्वेद के अनुसार अगर कोई खट्‌टा फ़ल दूध के साथ खाने वाला है वो एक
ही है आवला । आवला दूध के साथ जरुर खाये ।

इसी तरह शहद और घी कभी भी एक साथ न खायें ।

आम की दोस्ती दूध से जबरद्स्त हैं लेकिन खट्टे आम की नहीं |इसलिये मैग़ो शेक पी रहे है तो ध्यान रखे आम खट्‌टा ना हो । ।

ऐसी ही उरद की दाल और दही एक दुसरे के जानी दुशमन हैं ।
उरद की दाल पर भारत में जितनी रिसर्च हो चुकी हैं तो ये पता लगा ये दालो का राजा है । हमेशा अकेले ही खाये दही के साथ तो भूल कर भी ना खाये ।


आप इसका अपने शरीर पर परिकक्षण करे । एक खाने से पहले अपना b.P चैक करें

फ़िर उरद की दाल और दही खाये । आप पायेगें 22 से 25 % आपका B.P बढ़ा हुआ होगा । अर्थात ये अगर रोज रोज आप उरद की दाल , दही खा रहें है तो  5, 6 महीने में हार्ट अटैक आ ही जायेगा ।

इसका मतलब (दही वाड़ा ) कभी नहीं ।
क्योंके दही वाड़ा मे अगर वाड़ा उरद की दाल का बना हैं । और आप उसे दही के साथ खा रहें है तो बहुत तकलीफ़ करने वाला है ।

हां अगर आपको खाना है तो जरुर खायें लेकिन दही के साथ नहीं चटनी के साथ खायें ।
इस लिये अगर घर में विवाह है तो मीनो बनाते समय जरुर ध्यान रखें । उरद की दाल का वड़ा दही के साथ परोस कर दोहरे पाप के भागी न बने ।
क्योंके आतिथि देवो भव । मेहमान भगवान का रुप हैं । उसके हनिकारक
वास्तुये न खिलाये ।

या वो वड़ा मूंग की दाल का बनवाये । उरद की दाल का है तो दही के साथ नहीं चटनी के साथ खाये ।


करेले का कमाल ...न खाने वाले भी खाने लगेंगे जब जानेंगे इसके ये गुण



करेला एक ऐसी सब्जी है जो स्वाद में बेहद कड़वी होती है। इसीलिए ये कम ही लोगों को करेला पसंद होता है। लेकिन इसके स्वाद के ठीक विपरीत है इसका स्वभाव है। यह जितना कड़वा स्वाद में होता है उससे कहीं ज्यादा मीठे गुणों से भरपूर होता है। यह एक गुणों से भरी सब्जी है।
करेले में 6 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 15 ग्राम प्रोटीन,20 मिलीग्राम कैल्शियम, 70 मिलीग्राम फास्फोरस,18 मिलीग्राम लोह तत्व, विटामिन ए, विटामिन-सी के अलावा इसमें गंधयुक्त वाष्पशील तेल, केरोटीन, ग्लूकोसाइड, सेपोनिन, एल्केलाइड पाए जाते हैं। इन सभी पौषक तत्वों के कारण करेला केवल सब्जी न होकर औषधि का काम भी करता है। इसके औषधीय गुण इस प्रकार हैं। 

- करेला मधुमेह में रामबाण औषधि का कार्य करता है, छाया में सुखाए हुए करेला का एक चम्मच पावडर प्रतिदिन सेवन करने से डायबिटीज में चमत्कारिक लाभ मिलता है क्योंकि करेला पेंक्रियाज को उत्तेजित कर इंसुलिन के स्रावण को बढ़ाता है।


- विटामिन ए की उपस्थिति के कारण इसकी सब्जी खाने से रतौंधी रोग नहीं होता है।

- जोड़ों के दर्द में करेले की सब्जी का सेवन व जोड़ों पर करेले के पत्तों का रस लगाने से आराम मिलता है।

- करेले के तीन बीज और तीन कालीमिर्च को पत्थर पर पानी के साथ घिसकर बच्चों को पिलाने से उल्टी-दस्त बंद होते हैं।करेले के पत्तों को सेंककर सेंधा नमक मिलाकर खाने से अम्लपित्त के रोगियों को भोजन से पहले होने वाली उल्टी बंद होती है।

- करेले का रस और 1 नींबू का रस मिलाकर सुबह सेवन करने से शरीर की चर्बी कम होती है और मोटापा कम होता है।

- पथरी रोगी को 2 करेले का रस प्रतिदिन पीना चाहिए और इसकी सब्जी खाना चाहिए। इससे पथरी गलकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है।


02 November 2012

!!! सर्दी खांसी जुकाम का ईलाज !!!



• एक अच्छी दवाई खांसी जुखाम एलर्जी सर्दी आदि के लिए जिसे आप घर पर बना सकते है इसके लिए आपको चाहिए तुलसी के पत्ते, तना और बीज तीनो का कुल वजन 50 ग्राम इसके लिए आप तुलसी के ऊपर से तोड ले इसमें बीज तना और तुलसी के पत्ते तीनो आ जाएंगे इनको एक बरतन में डाल कर 500 मिलि पानी डाल ले और इसमें 100 ग्राम अदरक और 20 ग्राम काली मिर्च दोनो को पीस कर डाले और अच्छे से उबाल कर काढे और जब पानी 100 ग्राम रह जाए तो इसे छान कर किसी कांच की बोतल में डाल कर रखे इसमे थोडा सा शहद मिला कर आप इसके दो चम्मच ले सकते है दिन में 3 बार


• जुखाम के लिए 2 चम्मच अजवायन को तवे पर हल्का भूने और फ़िर उसे एक रूमाल या कपडे में बांध ले और पोटली बना ले......उस पोटली को नाक से सूंघे और सो जाए

• खांसी के लिए रोज दिन में 3 बार हल्के गर्म पानी में आधा चम्मच सैंधा नमक डाल कर गरारे(gargles) करे सुबह उठ कर दोपहर को और फ़िर रात को सोने से पहले..............एक चम्मच शहद में थोडी सी पीसी हुई काली मिर्च का पाऊडर डाल कर मिलाए और उसे चाटे...........अगर खासी ज्यादा आ रही हो तो 2 साबुत कालीमिर्च के दाने और थोडी सी मिश्री मुंह में रख कर चूसे आराम मिलेगा

• अगर दही खाते है तो उसे बंद करदे और रात को सोते समय दूध न पिए

• तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे बढि़या रहती हैं।

• हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।

• पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।