24 September 2012

भरत चरित्र

श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध के सप्तम अध्याय में भरत चरित्र का वर्णन है। कई करोड़ वर्ष धर्मपूर्वक शासन करने के बाद उन्होंने राजपाट पुत्रों को सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया तथा
भगवान की भक्ति में जीवन बिताने लगे। एक बार नदी में बहते मृग को बचाकर वे उसका उपचार करने लगे। धीरे-धीरे उस मृग से उनका मोह हो गया। मृग के मोह में पड़ने के कारण अगले जन्म में उन्होंने मृगयोनि में जन्म लिया।मृगयोनि में जन्म लेने पर भी उन्हें पुराने पुण्यों के कारण अपने पूर्वजन्म का भान था अतः मृगयोनि में रहते हुये भी वे भगवान का ध्यान करते 
रहे। 



अगले जन्म में उन्होंने एक ब्राह्मण कुल में जन्म लिया। पुराने जन्मों की याद होने से इस बार वे संसार से पूरी तरह विरक्त रहे। उनकी विरक्ति के कारण लोग उन्हें पागल समझने लगे तथा उनका नाम जड़भरत पड़ गया। जड़भरत के रुप में वे जीवनपर्यन्त भगवान की आराधना करते हुये अन्तः में मोक्ष को प्राप्त हुये।


ॐ ॐ

सतयुग कलियुग का काल

सतयुग: सतयुग का काल १७२८००० (सत्रह लाख अठाईस हजार) वर्षों का होता है. इस युग में चार अमानवीय अवतार हुए. मत्स्यावतार, कुर्मावतार, वराहावतार एवं नरिसिंघवातर. सतयुग में पाप ० भाग तथा पुण्य २० भाग था. मनुष्यों की आयु १००००० वर्ष, उचाई २१ हाथ, पात्र स्वर्णमय, द्रव्य रत्नमय तथा ब्रम्हांडगत प्राण था. पुष्कर तीर्थ, स्त्रियाँ पद्मिनी तथा पतिव्रता थी. सूर्यग्रहण ३२००० तथा चंद्रग्रहण ५००० बार होते थे. सारे वर्ण अपने धर्म में लीन रहते थे. ब्राम्हण ४ वेद पढने वाले थे.

त्रेतायुग: 
त्रेतायुग  का काल १२९६००० (बारह लाख छियान्व्वे हजार) वर्षों का होता है. इस युग में तीन मानवीय अवतार हुए. वामन, परशुराम एवं राम. त्रेता में पाप ५ भाग एवं पुण्य १५ भाग होता था. मनुष्यों की आयु १०००० वर्ष, उचाई १४ हाथ, पात्र चांदी के, द्रव्य स्वर्ण तथा अस्थिगत प्राण था. नैमिषारण्य तीर्थ, स्त्रियाँ पतिव्रता होती थी. सूर्यग्रहण ३२०० तथा चंद्रग्रहण ५०० बार होते थे. सारे वर्ण अपने अपने कार्य में रत थे. ब्राम्हण ३ वेद पढने वाले थे.

द्वापर युग: द्वापर युग का काल ८६४००० (आठ लाख चौसठ हजार) वर्षो
 का होता है. इस युग में २ मानवीय अवतार हुए. कृष्ण एवं बुद्ध. इस युग में पाप १० भाग एवं पुण्य १० भाग का होता था. मनुष्यों की आयु १००० वर्ष, उचाई ७ हाथ, पात्र ताम्र, द्रव्य चांदी तथा त्वचागत प्राण था. स्त्रियाँ शंखिनी होती थी. सूर्यग्रहण ३२० तथा चंद्रग्रहण ५० हुए. वर्ण व्यवस्था दूषित थी तथा ब्राम्हण २ वेद पढने वाले थे.

कलियुग: कलियुग का काल ४३२००० (चार लाख ३२ हजार) वर्षों का होता है. इस युग में एक अवतार संभल देश, गोड़ ब्राम्हण विष्णु यश के घर कल्कि नाम से होगा. इस युग में पाप १५ भाग एवं पुण्य ५ भाग होगा. मनुष्यों की आयु १०० वर्ष, उचाई ३.५ हाथ, पात्र मिटटी, द्रव्य ताम्र, मुद्रा लौह, गंगा तीर्थ तथा अन्नमय प्राण होगा. कलियुग के अंत में गंगा पृथ्वी से लीन हो जाएगी तथा भगवान विष्णु धरती का त्याग कर देंगे. सभी वर्ण अपने कर्म से रहित होंगे तथा ब्राम्हण केवल एक वेद पढने वाले होंगे अर्थात ज्ञान का लोप हो जाएगा.


One day of Brahma is called a kalp.

In one kalp there are 14 divisions of time called manvantar. Each maha yug has four cycles that are called satyug, tretayug dwaparyug kaliyug.

This is the how time was or is measured..

Krati Krati = 34,000th of a second
1 Truti = 300th of a second
2 Truti = 1 Luv
2 Luv = 1 Kshana
30 Kshana = 1 Vipal
60 Vipal = 1 Pal
60 Pal = 1 Ghadi (24 minutes)
2.5 Gadhi = 1 Hora (1 hour)
24 Hora = 1 Divas (1 day)
7 Divas = 1 saptaah (1 week)
4 Saptaah = 1 Maas (1 month)
2 Maas = 1 Rutu (1 season)
6 Rutu = 1 Varsh (1 year)
100 Varsh = 1 Shataabda (1 century)
10 Shataabda = 1 sahasraabda
432 Sahasraabda = 1 Yug DIVISION OF TIME-PERIOD (ERS) KAAL

SATYUG 4,32,000 YEARS X 4 = 17,28,000 YEARS
TRETA 4,32,000 YEARS X 3 = 12,96,000 YEARS
DWAPAR 4,32,000 YEARS X 2 = 8,64,000 YEARS
KALIYUG 4,32,000 YEARS X 1 = 4,32,000 YEARS
1 MAHAYUG (GRAND TOTAL OF ALL THE YUGAS) = 43,20,000 YEARS
71 MAHAYUG = 43,20,000X71 = 1 MANVANTAR
1 MANVANTAR = 30,6720,000 YEARS
14 MANVANTAR = 4,29,40,80,000 YEARS 
(There are 14 Manvantars)

According to the Indian calendar, the universe is going through Kali Yug at this time. The kaliyug started approx after 3500-5000 yrs from the time Lord Krishna left the earth.

The time left for the first Pralay (annihilation) is about two point three five billion years. This number is close to the number that corresponds to the expansion of Sun and the loss of solar light to a significant level based on modern theories of activity of Sun. It will cause major extinction of Earth and therefore life on Earth.

Indians say Kalki will mark the end to the yug and it will be the time for the divine great to begin the cosmic dance, wherein everything will be destroyed and all the energies which will be absorbed.

सती शिव की कथा

दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं। पर दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो शक्ति-संपन्न हो। सर्व-विजयिनी हो। दक्ष एक ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। मैं स्वय पुत्री रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी।' फलतः भगवती
आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहाँ जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में अलौकिक थीं। उन्होंने बाल्यकाल में ही कई ऐसे अलौकिक कृत्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय की लहरों में डूब जाना पड़ा।

 

जब सती विवाह योग्य हुई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता हुई। उन्होंने ब्रह्मा जी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, 'सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदिशक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं।' दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। यद्यपि भगवान शिव के दक्ष के जामाता थे, किंतु एक ऐसी घटना घटी जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध पैदा हो गया। *घटना इस प्रकार थी


— एक बार ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र थे। भगवान शिव भी एक ओर बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान शिव को किसी के मान और किसी के अपमान से क्या मतलब? वे तो समदर्शी हैं। उन्हें तो चारों ओर अमृत दिखाई पड़ता है। जहां अमृत होता है, वहां कडुवाहट और कसैलेपन का क्या काम?

भगवान शिव कैलाश में दिन-रात राम-राम कहा करते थे। सती के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो उठी। उन्होंने अवसर पाकर भगवान शिव से प्रश्न किया, 'आप राम-राम क्यों कहते हैं? राम कौन हैं?' भगवान शिव ने उत्तर दिया, 'राम आदि पुरुष हैं, स्वयंभू हैं, मेरे आराध्य हैं। सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं।' किंतु सती के कंठ के नीचे बात उतरी नहीं। वे सोचने लगीं, अयोध्या के नृपति दशरथ के पुत्र राम आदि पुरुष के अवतार कैसे हो सकते हैं? वे तो आजकल अपनी पत्नी सीता के वियोग में दंडक वन में उन्मत्तों की भांति विचरण कर रहे हैं। वृक्ष और लताओं से उनका पता पूछते फिर रहे हैं। यदि वे आदि पुरुष के अवतार होते, तो क्या इस प्रकार आचरण करते? सती के मन में राम की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। सीता का रूप धारण करके दंडक वन में जा पहुंची और राम के सामने प्रकट हुईं। भगवान राम ने सती को सीता के रूप में देखकर कहा, 'माता, आप एकाकी यहाँ वन में कहां घूम रही हैं? बाबा विश्वनाथ कहां हैं?' राम का प्रश्न सुनकर सती से कुछ उत्तर देते न बना। वे अदृश्य हो गई और मन ही मन पश्चाताप करने लगीं कि उन्होंने व्यर्थ ही राम पर संदेह किया। राम सचमुच आदि पुरुष के अवतार हैं। सती जब लौटकर कैलाश गईं, तो भगवान शिव ने उन्हें आते देख कहा, 'सती, तुमने सीता के रूप में राम की परीक्षा लेकर अच्छा नहीं किया। सीता मेरी आराध्या हैं। अब तुम मेरी अर्धांगिनी कैसे रह सकती हो! इस जन्म में हम और तुम पति और पत्नी के रूप में नहीं मिल सकते।' शिव जी का कथन सुनकर सती अत्यधिक दुखी हुईं, पर अब क्या हो सकता था। शिव जी के मुख से निकली हुई बात असत्य कैसे हो सकती थी? शिव जी समाधिस्थ हो गए। सती दुख और पश्चाताप की लहरों में डूबने उतारने लगीं।


उन्हीं दिनों सती के पिता कनखल में बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने यज्ञ में सभी देवताओं और मुनियों को आमन्त्रित किया था, किंतु शिव जी को आमन्त्रित नहीं किया था, क्योंकि उनके मन में शिव जी के प्रति ईर्ष्या थी। सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता ने बहुत बड़े यज्ञ की रचना की है, तो उनका मन यज्ञ के समारोह में सम्मिलित होने के लिए बैचैन हो उठा। शिव जी समाधिस्थ थे। अतः वे शिव जी से अनुमति लिए बिना ही वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर चली गईं।
कहीं-कहीं सती के पितृगृह जाने की घटना का वर्णन एक दूसरे रूप में इस प्रकार मिलता है— एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं?'
भगवान शकंर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता ने यज्ञ की रचना की है। देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।'


सती ने दूसरा प्रश्न किया, 'क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?'
भगवान शंकर ने उत्तर दिया, 'आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?'
सती मन ही मन सोचने लगीं, फिर बोलीं, 'यज्ञ के अवसर पर अवश्य मेरी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं,हो सकता है वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता'
भगवान शिव ने उत्तर दिया,'हां, विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती है। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता है।' किंतु सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी कर दिया, उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं, किंतु उनसे किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा,'तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो, वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर है। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है।' दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं, ‘उन्होंने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता है? अब तो आ ही गई हूं।'
पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, 'पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है। आपने उनका भाग क्यों नहीं दिया?' दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया, 'मै तुम्हारे पति कैलाश को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा।


सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा,'ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं, मुझे धिक्कार है। देवताओ, तुम्हें भी धिक्कार है! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता है। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नरक में जाना पड़ता है। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।' सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक देया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा। वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए।
भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हिए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम! पाहिमाम! भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।
धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती है। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है, वंदनीय बना दिया है। —

****विश्व विजेता सम्राट विक्रमादित्य****

ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्
रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति महेंद्राद्वित्तीय "की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था |
 

शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया।

गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।

विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।

अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय। वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त
आदि प्रमुख थे।

अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी |

कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।
इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया गया |भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया।

मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा।

लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के आक्रमणों से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्र्माद्वित्तीय के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादि
त्य के नाम की उपाधि धारण की |

भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट विकारामाद्वित्य को शत-शत प्रणाम।

कालचक्र

 

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु के नाभि कमल से उत्पन ब्रम्हा की आयु १०० दिव्य वर्ष मानी गयी है. पितामह ब्रम्हा के प्रथम ५० वर्षों को पूर्वार्ध एवं अगले ५० वर्षों को उत्तरार्ध कहते हैं.

सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग को मिलकर एक महायुग कहते हैं. ऐसे १००० महायुगों का ब्रम्हा का एक दिन होता है. इसी प्रकार १००० महायुगों का ब्रम्हा की एक रात्रि होती है. अर्थात परमपिता ब्रम्हा का एक पूरा दिन २००० महायुगों का होता है.


ब्रम्हा के १००० दिनों का भगवान विष्णु की एक घटी होती
है. भगवान विष्णु की १२००००० (बारह लाख) घाटियों की भगवान शिव की आधी कला होती है. महादेव की १००००००००० (एक अरब) अर्ध्कला व्यतीत होने पर १ ब्रम्हाक्ष होता है.

अभी ब्रम्हा के उत्तरार्ध का पहला वर्ष चल रहा है (ब्रम्हा का ५१ वा वर्ष).

ब्रम्हा के एक दिन में १४ मनु शाषण करते हैं:

स्वयंभू
स्वरोचिष
उत्तम
तामस
रैवत
चाक्षुष
वैवस्वत
सावर्णि
दक्ष सावर्णि
ब्रम्हा सावर्णि
धर्म सावर्णि
रूद्र सावर्णि
देव सावर्णि
इन्द्र सावर्णि

इस प्रकार ब्रम्हा के द्वितीय परार्ध (५१ वे) वर्ष के प्रथम दिन के छः मनु व्यतीत हो गए है और सातवे वैवस्वत मनु का अठाईसवा (२८) युग चल रहा है. इकहत्तर (७१) महायुगों का एक मनु होता है. १४ मनुओं का १ कल्प कहा जाता है जो की ब्रम्हा का एक दिन होता है. आदि में ब्रम्हा कल्प और अंत में पद्मा कल्प होता है. इस प्रकार कुल ३२ कल्प होते हैं. ब्रम्हा के परार्ध में रथन्तर तथा उत्तरार्ध में श्वेतवराह कल्प होता है. इस समय श्वेतवराह कल्प चल रहा है. इस प्रकार ब्रम्हा के १ दिन (कल्प) ४०००३२००००००० (चार लाख बतीस "करोड़") मानव वर्ष के बराबर है जिसमे १४ मवंतर होते है. चार युगों का एक महायुग होता है:

चाणक्यनीति / Chanakya Quotes



जब भीष्म पितामह ने पूछा - "मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूँ?''

बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इ

स युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सर
सैया पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?'' इस पर पितामह ने कहा, 'हाँ''। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया? इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गये क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।'' तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का 'श्राप' आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।

गोस्वामी तुलसीदास



श्री रामचरित मानस के रचयित गोस्वामी तुलसीदास का परिचय



श्री रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सन् १५६८ में राजापुर में श्रावण शुक्ल ७ को हुआ था। पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी देवी था। तुलसी की पूजा के फलस्वरुप उत्पन्न पुत्र का नाम तुलसीदास रखा गया। गोस्वामी तुलसीदास जी को महर्षि वाल्मीकि का अवतार माना जाता है। उनका जन्म बांदा जिले के राजापुर गाँव में एक सरयू पारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका विवाह सं. १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को बुद्धिमती (या रत्नावली) से हुआ। वे अपनी पत्नी के प्रति पूर्ण रुप से आसक्त थे। पत्नी रत्नावली के प्रति अति अनुराग की परिणति वैराग्य में हुई।एक बार जब उनकी पत्नी मैके गयी हुई थी उस समय वे छिप कर उसके पास पहुँचे। पत्नी को अत्यंत संकोच हुआ उसने कहा -

हाड़ माँस को देह मम, तापर जितनी प्रीति।
तिसु आधो जो राम प्रति, अवसि मिटिहि भवभीति।।


गोस्वामी तुलसीदास के लिखे दोहावली, कवित्तरामायण, गीतावली, रामचरित मानस, रामलला नहछू, पार्वतीमंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, रामाज्ञा, विन पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, कृष्ण गीतावली। इसके अतिरिक्त रामसतसई, संकट मोचन, हनुमान बाहुक, रामनाम मणि, कोष मञ्जूषा, रामशलाका, हनुमान चालीसा आदि आपके ग्रंथ भी प्रसिद्ध हैं।

१२६ वर्ष की अवस्था में संवत् १६८० श्रावण शुक्ल सप्तमी, शनिवार को आपने अस्सी घाट पर अपना शहरी त्याग दिया।

संवत सोलह सै असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।

22 September 2012

शिवलिंग का मतलब



हमारे धार्मिक ग्रन्थ में एक मंत्र आता है .... 
निरंजनो निराकारो... एको देवो महेश्वरः ...
अर्थात .. निरंजन निराकार महादेव ही एकमात्र ईश्वर हैं.......! और.... देवों के देव... महादेव..... शिवलिंग के रूप में पूजे जाते हैं....! परन्तु दुखद है की... बहुत से लोगों का शिवलिंग का मतलब तक नहीं मालूम है..... ! 

अतः... आज जानिये शिवलिंग का मतलब.... और शिवलिंग की महिमा .... शिवलिंग की अर्चना अनादिकाल से जगद्व्यापक है। संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में लिंगोपासना की चर्चा मिलती है। शुक्लयजुर्वेदकी रुद्राष्टाध्यायी के द्वारा शिवार्चन एवं रुद्राभिषेक करने से समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा अन्त में सद्गति भी प्राप्त होती है। रुद्रहृदयोपनिषद्का स्पष्ट कथन है- सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:। अर्थात् शिव और रुद्र सर्वदेवमयहोने से ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। 

प्राय: सभी पुराणों में शिवलिंगके पूजन का उल्लेख और माहात्म्य मिलता है। हिन्दू साहित्य में जहाँ कहीं भी शिवोपासनाका वर्णन है,
वहाँ शिवलिंगकी महिमा का गुण-गान अवश्य हुआ है। लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिह्न अथवा लक्षण है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को,
प्रकृति से विकृति को भी लिंग कहते हैं। देव-चिह्न के अर्थ में लिंग शब्द
भगवान सदाशिवके निर्गुण- निराकार रूप शिवलिंग के संदर्भ में ही प्रयुक्त
होता है। 

स्कन्दपुराणमें लिंग की ब्रह्मपरकव्याख्या इस प्रकार की गई है- आकाशं लिङ्गमित्याहु:पृथ्वी तस्यपीठिका। आलय: सर्वदेवानांलयनाल्लिङ्गमुच्यते॥ आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। इस लिंग में समस्त देवताओं
का वास है। सम्पूर्ण सृष्टि का इसमें लय होता है, इसीलिए इसे लिंग कहते हैं। शिवपुराणमें लिंग शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है- लिङ्गमर्थ हि पुरुषंशिवंगमयतीत्यद:। शिव-शक्त्योश्च चिह्नस्यमेलनंलिङ्गमुच्यते॥ अर्थात् शिव-शक्ति के चिह्नोंका सम्मिलित स्वरूप ही शिवलिंगहै। इस प्रकार लिंग में सृष्टि के जनक की अर्चना होती है। 

लिंग परमपुरुष सदाशिवका बोधक है। इस प्रकार यह विदित होता है कि लिंग का प्रथम अर्थ ज्ञापकअर्थात् प्रकट करने वाला हुआ, क्योंकि इसी के व्यक्त होने से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। दूसरा अर्थ आलय है अर्थात् यह प्राणियों का परम कारण है और निवास-स्थान है। तीसरा अर्थ यह है कि प्रलय के समय सब कुछ जिसमें लय हो जाए वह लिंग है। समस्त देवताओं का वास होने से यह लिंग सर्वदेवमयहै। लिंग
के आधार रूप में जो तीन मेखलायुक्तवेदिका है, वह भग रूप में कही जाने
वाली जगद्धात्री महाशक्ति है। अत: आधार सहित लिंग जगत् का कारण है, 

उमा-महेश स्वरूप लिंग और वेदी के समायोग में भगवान शंकर के अर्धनारीश्वररूप के ही दर्शन होते हैं। सृष्टि के समय परमपुरुष सदाशिवअपने ही अर्धागसे प्रकृति (शक्ति) को पृथक कर उसके माध्यम
से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार शिव- शक्ति का लिंग-
योनिभाव और अर्द्धनारीश्वर भाव मूलत:एक ही है। सृष्टि के बीज को देने वाले परमलिंगरूपश्रीशिवजब अपनी प्रकृतिरूपाशक्ति (योनि) से आधार-आधेय की भाँति संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं। श्रीमद्भगवद्गीताके 14वें अध्याय के तीसरे श्लोक से इस तथ्य की पुष्टि होती है- मम योनिर्महद्ब्रह्मतस्मिन्गर्भदधाम्यहम्। 

भवत:सर्वभूतानांततोभवतिभारत॥ भगवान कहते हैं- महद्ब्रह्म(महान प्रकृति) मेरी योनि है, जिसमें मैं बीज देकर गर्भ
का संचार करता हूँ और इसी से सम्पूर्ण सृष्टि (सब भूतों) की उत्पत्ति होती है।


वस्तुत:अनादि सदाशिव-लिंगऔर अनादि प्रकृति-योनि के संयोग से
ही सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। इस दोनों के बिना सृष्टि की संरचना संभव
नहीं है। शिवलिंग (परमपुरुष) जगदम्बारूपीजलहरीसे वेष्टित होने से
प्रकृतिसंस्पृष्टपुरुषोत्तम है- पीठमम्बामयं सर्वशिवलिङ्गंचचिन्मयम्। अत: इसे जड समझना उचित न होगा। लिंगपुराणमें लिंगोद्भवकी कथा है।
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य एक बार यह विवाद हो गया कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ है? इतने में उन्हें एक वृहत् ज्योतिर्लिगदिखाई दिया। उसके मूल और परिमाण का पता लगाने के लिए ब्रह्मा ऊपर गए और विष्णु नीचे, किंतु दोनों को उस लिंग के आदि-अन्त का पता न चला। तभी वेद ने प्रकट होकर उन्हें समझाया कि प्रणव (ॐ) में अ कार ब्रह्मा है, उ कार विष्णु है और म कार महेश है। 


म कार ही बीज है और वही बीज लिंगरूपसे सबका परम कारण है। लिंगपुराणशिवलिंगको त्रिदेवमयऔर शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप घोषित करता है- मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:। रुद्रोपरिमहादेव: प्रणवाख्य:सदाशिव:॥ लिङ्गवेदीमहादेवी लिङ्गसाक्षान्महेश्वर:। तयो:सम्पूजनान्नित्यंदेवी देवश्चपूजितो॥ शिवलिंगके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष में शंकर हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से सदाशिव महादेव कहलाते हैं। शिवलिंग प्रणव का रूप होने से साक्षात् ब्रह्म ही है। लिंग महेश्वर और उसकी वेदी महादेवी होने से लिगांचर्नकेद्वारा शिव-शिक्त दोनों की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। भगवान सदाशिवस्वयं लिंगार्चन की प्रशंसा करते हैं- 

लोकं लिङ्गात्मकंज्ञात्वालिङ्गेयोऽर्चयतेहि माम्। न मेतस्मात्प्रियतर:प्रियोवाविद्यतेक्वचित्॥ जो भक्त संसार के मूल कारण महाचैतन्यलिंग की अर्चना करता है तथा लोक
को लिंगात्मकजानकर लिंग-पूजा में तत्पर रहता है, मुझे उससे अधिक 
प्रिय अन्य कोई नर नहीं है। 


इस तरह....... वस्तुत: शिवलिंग साक्षात् ब्रह्म का ही प्रतिरूप है। इस तथ्य
को जान लेने पर साधक को शिवलिंग में ब्रह्म का साक्षात्कार अवश्य होता है। जय महाकाल...!!

फ्रीज में रखा आटा आमंत्रित करता है भूतों को


महत्वपूर्ण जानकारी ---

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है। ऋषि-मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है।

ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है।

शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है। गूंथे हुए आटे को उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं।

किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं।
जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं।

आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती। पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही।

आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकती है।

RAJESH AGRAWAL

21 September 2012

जीवन की सच्चाई:


जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसको जलाने के बाद वो मात्र '20 ग्राम मिट्टी' में बदल जाता है और उस मिट्टी में 8 रुपये का कैल्सियम, 2-2.5 रुपये का फास्फोरस और 10-11 रुपये के अन्य माइक्रो न्यूटरिएण्ट्स होते हैं, मतलब मरने के बाद आदमी की 'कीमत 20 रुपये' से ज्यादा नहीं है। 


इसलिए विलासिता को छोडकर अपना राष्ट्रधर्म निभाएँ जिससे जिस मिट्टी में पैदा हुए हैं, शायद उसका थोड़ा सा भी कर्ज़ चुका सकें।

॥ वन्दे मातरम् ॥

मंत्र का शाब्दिक मतलब होता है मनन करना।


मंत्र का शाब्दिक मतलब होता है मनन करना। मगर फल की दृष्टि से मंत्र का मतलब होता है मन की पीड़ा का त्राण यानी अंत करने वाला। मंत्र शक्ति से जब दु:खों से छुटकारे के धार्मिक उपाय पर विचार किया जाता है, तब एक ही मंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। वह
है - महामृत्युंजय मंत्र।


धर्म परंपराओं में यह शिव के महामृत्युंजय रूप की आराधना से रोग, काल भय और दु:खों के शमन का मंत्र है। किंतु शास्त्रों में इस मंत्र से कामनापूर्ति का भी महत्व बताया गया है। साथ ही यह शिव ही नहीं बल्कि अनेक देवताओं की उपासना का भी अद्भुत मंत्र है।

शास्त्रों के मुताबिक यह मंत्र 32 अक्षरों से बना है। किंतु ऊँ के जुडऩे पर मंत्र 33 अक्षरों का हो जाता है। इसलिए इसे तैंतीस अक्षरी मंत्र भी कहा जाता है। चूंकि मंत्रों में आने वाले अक्षर, शब्द, स्वर, व्यंजन, ध्वनि और बिंदु देवीय शक्तियों के ही रूप और बल के संकेत होते हैं। इसी तरह महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षरों में 33 देवीय शक्तियां मानी गई है,जिससे यह मंत्र बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली माना जाता है।

ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।
त्र - ध्रुव वसु। यम - अध्वर वसु। ब - सोम वसु। कम् - वरुण। य- वायु। ज - अग्नि। म - शक्ति। हे - प्रभास। सु - वीरभद्र। ग - शम्भु। न्धिम - गिरीश। पु - अजैक। ष्टि - अहिर्बुध्न्य। व - पिनाक। र्ध - भवानी पति। नम् - कापाली। उ - दिकपति। र्वा - स्थाणु। रु -भर्ग। क - धाता। मि - अर्यमा। व- मित्रादित्य। ब - वरुणादित्य। न्ध - अंशु। नात - भगादित्य। मृ - विवस्वान। त्यो - इंद्रादित्य। मु - पूषादिव्य। क्षी - पर्जन्यादिव्य। य - त्वष्टा। मा - विष्णुऽदिव्य। मृ - प्रजापति। तात -वषट। इस तरह मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1-1 प्रजापति और वषट यानी त्रिदेव की शक्तियां समाई है, इससे इसे स्मरण करने वाला काल, संकट, रोग व तमाम दःखों से सुरक्षित रहता है।

सनातन संस्कृति की सप्त-पुरियाँ...


शास्त्रों में मुक्ति के पांच प्रकार बताये गये हैं...

१) ब्रह्म-ज्ञान
२) भक्ति द्वारा भगवत-कृपा प्राप्ति...
३) पुत्र-पौत्रादि, गोत्रज, कुटुम्बियो आदि द्वारा गया आदि तीर्थो में संपादित श्राद्ध कर्म...
४) धर्म-युद्ध और गौ-रक्षा आदि में मृत्यु...
५) कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि प्रधान तीर्थो में और सप्त प्रधान मोक्ष-दायिनी पुरियो में निवास-पूर्वक शरीर- त्याग सभी तीर्थ फल देने वाले और पुण्य प्रदान करने वाले होते हैं... अपनी अद्भुत विशेषताओं के कारण यह सप्त-पुरिया अत्यंत प्रसिद्द हैं...

" अयोध्या मथुरा माया कशी कांची अवंतिका | पुरि द्वारावती श्रेया: सप्तैता मोक्षयका: ||"

१) अयोध्या... यह सात मोक्षदायिनी पुरियो में प्रथम है... यह भगवा श्री हरि के सुदर्शन चक्र पर बसी है... भगवान् राम की जन्म-भूमि होने के कारण इसका महत्व बहुत है... इसका आकार मछली के समान है...स्कन्द-पुराण के वैष्णव खंड के अयोध्या महातम्य के अनुसार... अयोध्या का मान सहस्त्र-धारा तीर्थ से एक योजन पूर्व तक, ब्रह्म-कुण्ड से एक योजन पश्चिमतक... दक्षिण में तमसा नदी तक... और उत्तर में सरयू नदी तक है...
अयोध्या में ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित ब्रह्म-कुण्ड है... और सीता जी द्वारा निर्मित सीता-कुण्ड भी है, जिसे भगवान् राम ने समस्त मनोकामनाओ को पूर्ण करने वाला बना दिया है... यहाँ सहस्त्र-धारा से पूर्व स्वर्ग-द्वार है... इस स्थान पर हवन , यज्ञ, दान पुण्य आदि अक्षय हो जाता है...

२) मथुरा-वृन्दावन. .. यह यमुना जी के दोनों तरफ बसा है... यमुना जी के दक्षिण भाग में इसका विस्तार ज्यादा है... यमुना जी का भी महत्व है... क्यूंकि यमुना जी सूर्य-पुत्री हैं और यमराज की बहन हैं... श्रीकृष्ण की प्रेमिका हैं... और भगवान् श्रीकृष्ण की जन्म-भूमि होने से इसका महत्व बहुत ज्यादा है...

३) हरिद्वार [ मायापुरी ]... यह तीसरी पवित्र पुरी है... यह एक शक्तिपीठ भी है... कनखल से ऋषिकेश तक का क्षेत्र मायापुरी कहलाता है... गंगा माता पर्वतो से उतरकर सर्वप्रथम यहीं समतल भूमि पर प्रवेश करती हैं... और मनुष्यों के पापो की निवृत्ति करती हैं...

४) काशी जी [ वाराणसी ]... यह नगरी भगवान् शिव के त्रिशूल पर बसी है... इस नगरी के लिए कहा जाता है की यह प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होगी... 'वरुण' और 'असी' के मध्य होने से इसे वाराणसी कहा गया है... यहाँ पर सैंकड़ो घाट हैं... और विश्वेश्वर लिंग स्वरुप विश्वनाथ मंदिर... अन्नपूर्णा मंदिर... संकट-मोचन मंदिर... गीता मंदिर... और सहस्त्रों अन्य मंदिर और पवित्रतीर्थ स्थान हैं... जो काशी जी की शोभा और महातम्य को बढाते हैं...

५) कांची... पेलार नदी के तट पर स्थित शिव-कांची और विष्णु-कांची नामो से विभक्त हरी-हरात्मक पुरी है... शिव-कांची विष्णु-कांची से बड़ी है... यह मद्रास से ७५ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित है... यहाँ वामन मंदिर... कामाख्या मंदिर... सुब्रह्मण्यम मंदिर आदितीर्थ स्थल हैं...और सर्वतीर्थ सरोवर भी है...

६) उजैन... उज्जैन को पृथ्वी की नाभि कहा जाता है... यहाँ महाकाल ज्योतिर्लिंग और हरसिद्धि देवी शक्तिपीठ प्रसिद्द है... सम्राट विक्रमादित्य के समय में यह सम्पूर्ण भारत की राजधानी रही है... यह मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से ११५ किलोमीटर पश्चिम में है... यहाँ क्षिप्रा नदी शहर के बीचों-बीच से बहती है... यहाँ असंख्यो मंदिर हैं... प्रातन काल में ऐसा कहा जाता था की यदि १०० बैल-गाडी अनाज की भर कर यहाँ लायी जाए और एक-एक मुट्ठी अनाज यहाँ के हर मंदिर में दिया जाए... तो अनाज कम पड़ जायगा परन्तु मंदिरों की गिनती पूर्ण नहीं होगी...

७) द्वारका... द्वारका पुरी सप्त-पुरीयों के साथ ही चार धामों में भी परिगणित है... यह सातवी पुरी है जो गुजरात प्रदेश के काठियावाड़ जिले के पश्चिम समुद्र तट पर स्थित है... भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने जीवन का अधिकांश समय यहीं व्यतीत किया था... यहाँ अनेको मंदिर और तीर्थ-स्थल हैं...

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय...

अपने आप को भारतीय कहलाने वाले गर्व करो |



अपने आप को भारतीय कहलाने वाले गर्व करो |
पाश्चात्य संस्कृति पर मरने वालो शर्म करो |

भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा उन के युद्धों का विस्तरित वर्णन है। सैनिक क्षमताओं वाले विमानों के प्रयोग, विमानों की भिडन्त, तथा ऐक दूसरे विमान का अदृष्य होना और पीछा करना किसी आधुनिक वैज्ञिानिक उपन्यास का आभास देते हैं लेकिन वह कोरी कलपना नहीं यथार्थ है।

प्राचीन वामानों के प्रकार

प्राचीन विमानों की दो श्रेणिया इस प्रकार थीः-

मानव निर्मित विमान, जो आधुनिक विमानों की तरह पंखों के सहायता से उडान भरते थे।

आश्चर्य जनक विमान, जो मानव निर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडन तशतरियों’ के अनुरूप है।


विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ

भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया। प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्हों ने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-
1. ऋगवेद- इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हे अश्विनों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणत्या तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई सन्देह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी। याता-यात के लिये ऋग वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-

जल-यान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 6.58.3)

कारा – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 9.14.1)

त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋग वेद 3.14.1)

त्रिचक्र रथ – यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता था। (ऋग वेद 4.36.1)

वायु रथ – रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 5.41.6)

विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 3.14.1).

2. यजुर्वेद में भी ऐक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिस का निर्माण जुडवा अशविन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्हो मे राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।

3. विमानिका शास्त्र –1875 ईसवी में भारत के ऐक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की ऐक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से 400 वर्ष पूर्व का बताया जाता है तथा ऋषि भारदूाज रचित माना जाता है। इस का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तरित जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियाँ अब लुप्त हो चुकी हैं। इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थेः-

विमान के संचलन के बारे में जानकारी, उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी, तुफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय, आवश्यक्ता पडने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि। इस से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में ‘एन्टी ग्रेविटी’ क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी।

विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी बताया गया है। ऐक विशेष प्रकार के शीशे की आठ नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था जिस के विधान की पूरी जानकारी लिखित है किन्तु इस में से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं।

इस ग्रन्थ के आठ भाग हैं जिन में विस्तरित मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं।

ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वर्तान्त है तथा 16 धातुओं का उल्लेख है जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं क्यों कि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं और भार में हल्की हैं।

4. यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रन्थ भी ऋषि भारदूाजरचित है। इस के 40 भाग हैं जिन में से एक भाग ‘विमानिका प्रकरण’के आठ अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारदूाजने विमानों को तीन श्रेऩियों में विभाजित किया हैः-

अन्तरदेशीय – जो ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।

अन्तरराष्ट्रीय – जो ऐक देश से दूसरे देश को जाते

अन्तीर्क्षय – जो ऐक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते

इन में सें अति-उल्लेखलीय सैनिक विमान थे जिन की विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-

पूर्णत्या अटूट, अग्नि से पूर्णत्या सुरक्षित, तथा आवश्यक्ता पडने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही ऐक दम से स्थिर हो जाने में सक्ष्म।

शत्रु से अदृष्य हो जाने की क्षमता।

शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्ष्म। शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृष्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता।

शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना।

शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता।

निजि रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता।

आवश्यक्ता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता।

चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता।

स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता।

हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बडा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णत्या नियन्त्रित कर सकने में सक्ष्म।

विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाईटर और उडन तशतरी का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारदूाजकोई आधुनिक ‘फिक्शन राईटर’ नहीं थे परन्तुऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञिानक माडल का विचार कैसे किया। उन्हों ने अंतरीक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाडी का ज्ञान भी पूर्णत्या हासिल नहीं कर पाये थे।

5. समरांगनः सुत्रधारा – य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उन से सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है।इस के 230 पद्य विमानों के निर्माण, उडान, गति, सामान्य तथा आकस्माक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं।

लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है। किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णत्या स्पष्ट और सूक्ष्म है। कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है।

समरांगनः सुत्रधारा के आनुसार सर्व प्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था। पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

रुकमा – रुकमानौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे।

सुन्दरः –सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे।

त्रिपुरः –त्रिपुर तीन तल वाले थे।

शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था।


दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का परिशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुरज़े, उपकरण, चालकों एवम यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये।

ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबु अथवा सेब या कोई अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।

सात प्रकार के ईजनों का वर्णन किया गया है तथा उन का किस विशिष्ट उद्देष्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊचाई पर उस का प्रयोग सफल और उत्तम होगा। सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्द्ध है। विमान आधुनिक हेलीकोपटरों की तरह सीधे ऊची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्ष्म बताये गये हैं

6. कथा सरित-सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वालो विमानों को बना सकते थे। यह रथ-विमान मन की गति के समान चलते थे।

कोटिल्लय के अर्थ शास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सोविकाओं का उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उडाते थे । कोटिल्लय ने उन के लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है जिस का अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलेट) आकाश रथ, चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है जो उस के काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे।

उपरोक्त तथ्यों को केवल कोरी कल्पना कह कर नकारा नहीं जा सकता क्यों कल्पना को भी आधार के लिये किसी ठोस धरातल की जरूरत होती है। क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इस विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं ? आज तकनीक ने भारत की उन्हीं प्राचीन ‘कल्पनाओं’ को हमारे सामने पुनः साकार कर के दिखाया है, मगर विदेशों में या तो परियों और ‘ऐंजिलों’ को बाहों पर उगे पंखों के सहारे से उडते दिखाया जाता रहा है या किसी सिंदबाद को कोई बाज उठा कर ले जाता है, तो कोई ‘गुलफाम’ उडने वाले घोडे पर सवार हो कर किसी ‘सब्ज परी’ को किसी जिन्न के उडते हुये कालीन से नीचे उतार कर बचा लेता है और फिर ऊँट पर बैठा कर रेगिस्तान में बने महल में वापिस छोड देता है। इन्हें कल्पना नहीं, ‘फैंटेसी’ कहते हैं।

अपने आप को भारतीय कहलाने वाले गर्व करो |
पाश्चात्य संस्कृति पर मरने वालो शर्म करो |

शिवलिंग मुद्रा



बाएं हाथ को पेट के पास लाकर सीधा रखें। दाएं हाथ की मुठ्ठी बना कर बाईं हथेली पर रखें और दाएं हाथ का अंगूठा सीधा ऊपर की ओर रखें। नीचे वाले बाएं हाथ की अंगुलियाँ और अंगूठा मिला कर रखें। दोनों बाजुओं की कोहनियाँ सीधी रखें। इस मुद्रा को शिवलिंग मुद्रा कहते हैं।
शिवलिंग मुद्रा दिन में दो बार पाँच मिनट के लिए लगाएं।
लाभ :

@ शिवलिंग मुद्रा लगाने से सुस्ती, थकावट दूर हो नयी शक्ति का विकास होता है।

@ शिवलिंग मुद्रा लगाते हुए लम्बे व गहरे सांस लेने चाहिये।

@ शिवलिंग मुद्रा लगाने से मानसिक थकान व चिंता दूर होती है।

20 September 2012

आज ऋषिपंचमी है...


आज 20 सितंबर, गुरुवार को ऋषिपंचमी है...

भाद्रपद की शुक्ल पक्ष पर पड़ने वाली पंचमी "ऋषि पंचमी" कहलाती है। इस दिन किया जाने वाला व्रत ऋषि पंचमी व्रत कहलाता है। यह व्रत और यह पूजा, आरती, अर्घ्य, तर्पण की प्रक्रिया हमारे महान तपोनिष्ट ऋषियों के प्रति हमारी श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण आदर की भावना को प्रदर्शित करता है...

हम जिनके वंश परम्परा से आते हैं और जिन्होंने स्वयं को तिल तिल जलाकर तप कर हमारी सुंदर, सुरक्षित भविष्य हेतु हमें सक्षम ग्रन्थ दिए, उपदेश दिए, मंत्र, दान, पूजा,

जाप आदि की प्रक्रिया बताकर हमारा साक्षात्कार ईश्वर से करवाया, इस प्रकार यह पर्व हमारा आभार है... इन महान विद्वानों और उनकी साधना तपस्चर्या व हमारे लिए किये गए मार्गदर्शन के लिए...

यह व्रत जाने-अनजाने किसी भी प्रकार किये गये पापों से मुक्ति के लिये किया जाता है। इसलिये यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों ही के लिये समान विधि और समान फ़ल वाला बताया गया है...

कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्नणन्त्वर्घ्यं नमो नमः॥

इस व्रत में सप्तऋषियों सहित अरुन्धती (महर्षि वसिष्ठ की पत्नी) का पूजन होता है। इसीलिये इसे ऋषि पंचमी कहते हैं...

आज कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि तथा वशिष्ठ-इन सप्तर्षियों व अरुंधती का षोडशोपचारपूर्वक पूजन करना चाहिए। इस व्रत में नमक का प्रयोग वर्जित है। हल से जुते हुए खेत का अन्न खाना वर्जित है। दिन में केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए...

ॐ नमः शिवाय...

कच्ची हल्दी का अचार





कच्ची हल्दी का अचार - Fresh Turmeric Pickle - Kachi Haldi Achar Recipe

कच्ची हल्दी का अचार खाने में तो स्वादिष्ट होता ही है इसमें अनेकों औषधीय गुण भी हैं. स्वाद में एकदम तीखा हल्दी का अचार की बस एक चौथाई चम्मच आपके खाने को एक नया स्वाद देगी.

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Turmeric Pickle


कच्ची हल्दी - 250 ग्राम (कद्दूकस की हुई एक कप)
सरसों का तेल - 100 ग्राम (आधा कप)
नमक - 2 1/2 छोटी चम्मच
लाल मिर्च - आधा छोटी चम्मच
दाना मैथी - 2 1/2छोटी चम्मच दरदरी पिसी
सरसों पाउडर - 2 1/2 छोटी चम्मच
अदरक पाउडर - 1 छोटी चम्मच
हींग - 2-3 पिंच
नीबू - 250 ग्राम ( 1/2 कप का रस)



विधि - How to make haldi pickle

हल्दी को छीलिये और धोकर पानी सुखाने के लिये थोड़ी देर के लिये धूप में रख दीजिये या सूती कपड़े से पोंछ कर पानी हटा दीजिये.

अब इस छिली हल्दी को कद्दूकस कर लीजिये या बारीक काट लीजिये. चूंकि हल्दी का अचार एकदम कम मात्रा में खाया जाता है इसलिये छोटे टुकडों के अचार के बजाय कद्दूदक की गई हल्दी का अचार अधिक सुविधाजनक होता है.


सरसों का तेल कढ़ाई में डाल कर अच्छी तरह गरम करके, थोड़ा सा ठंडा कर लीजिये, तेल में हींग, मैथी और सारे मसाले और कद्दूकस की गई हल्दी डाल कर अच्छी तरह मिलाइये.

हल्दी के अचार को प्याले में निकालिये और अचार में नीबू का रस डालकर अच्छी तरह मिलाकर हल्दी के अचार को ढककर रख दीजिये. 4-5 घंटे बाद अचार चमचे से फिर से ऊपर नीचे करके मिला दीजिये.


हल्दी का अचार बन चुका है, हल्दी के अचार को एकदम सूखे कांच या चीनी मिट्टी के कन्टेनर में भर कर रख लीजिये, सम्भव हो तो अचार के कन्टेनर को 2 दिन धूप में रख दें, धूप में रखने से अचार की सैल्फ लाइफ बढ़ जाती है और अचार स्वादिष्ट भी हो जाते हैं.

हल्दी का अचार (Turmeric Pickle) यदि तेल में डुबा हुआ रखा हो तब यह अचार 6 महिने से भी ज्यादा अच्छा रहेगा.

सावधानी:
अचार को निकालते समय हमेशा साफ और सूखी चम्मच प्रयोग में लाइये.







राजेश अग्रवाल

मिट्टी कूल कंपनी




मिट्टी कूल कंपनी के मालिक श्री मनसुख लाल राघव जी भाई प्रजापति 'भारत रत्न अब्दुल कलाम जी' से सम्मान प्राप्त करते हुए।

भारत के कुंभार दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक होते हैं। इन्होने उसी से प्रेरणा लेते हुए मिट्टी के उत्पादों की शृंखला पेश की। आमतौर पर फ्रिज में जो कम्प्रेसर होता है उसमें से जहरीली गैस निकलती हैं जो पर्यावरण को तो नुकसान पहुंचातीही हैं साथ ही उनसे कई बीमारियोंका खतरा भी रहता है। इसी कारण पिछले 20 वर्षों में फ्रिज बढ्ने के साथ साथ 'अर्थराइटिस' के रोगी बढ़ें हैं और लगभग प्रत्येक घर में एक अर्थराइटिस रोगी है।

उन्होंने जो मिट्टी का फ्रिज बनाया है वो पूरी तरह से ईको फ्रेंडली है। ये बिजली के बिना चलता है जिससे ये पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। मिट्टी से बना ये फ्रिज पानी को ठंडा और फल-सब्जियों को पूरा दिन ताजा रखता है। इसकी एक खासियत ये भी है कि इसका तापमान बाहर के तापमान से 10 डिग्री सेल्सियस कम रहता है।
2002 में इन्होने मिट्टी का फ्रिज बनाया जो बिना गैस और बिजली के चलता है। 2004 में मिट्टी कूल (नॉन स्टिक तवा) बनाया उसके लिए 2005 में 'राष्ट्रीय और राज्य ग्रामीण विकास' से पुरस्कार मिला था। अब इन्हें इनके विभिन्न कलात्मक उत्पादों के लिए विदेश से ऑर्डर मिलते हैं और लोगों को इनके प्राकृतिक रेफ्रिजरेटर / फिल्टर का उपयोग करना पसंद करते हैं।
इनका कहना है "मेरा उद्देश्य देश भर में उन सभी लोगों को सभी शानदार चीजें प्रदान करना है जो इलेक्ट्रॉनिक सामान को वहन करनेकी कल्पना नहीं कर सकते हैं। ये तो अभी शुरुआत है मैं चाहता हूं कि अपनी इन छोटी-छोटी कोशिशों से पर्यावरण को बचाने में जितना हो सके उतनी मदद करूं।"


देखिये इनकी वैबसाइट पर सम्पूर्ण:




Mitticool Clay Creation

Address: R.K. Nagar Wankaner -363622
Dist.: Rajkot (Gujarat) India
Call me at: 02828 221156 (M) 0-9825177249
Fax: 02828 221453
Mail me at: info@mitticool.com




राजेश अग्रवाल

19 September 2012

बुधवार का दिन धर्मग्रन्थों में गणेश जी का दिन माना जाता है

बुधवार का दिन धर्मग्रन्थों में गणेश जी का दिन माना जाता है. इस वर्ष गणेश पर्व बुधवार से प्रारंभ हो रहा है. यह शुभ संयोग आप सभी को मंगलमय जीवन दे और आपकी इच्छाओं की पूर्ति करे... ऐसी मंगलकामना के साथ..........
हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार समस्त विघ्न बाधाओं को दूर
करनेवाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश का आविर्भाव हुआ था।

भगवान विनायक के जन्मदिवस पर मनाया जानेवाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्सोल्लास पूर्वक और भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। इस महापर्व पर लोग प्रात: काल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। पूजन के पश्चात् नीची नजर से चंद्रमा को अघ्र्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है।

कथानुसार एक बार मां पार्वती स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अन्दर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया। इसपर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अन्दर चले गए। जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश का कटा हुआ सिर देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गई।
तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जिंदा करने का अनुरोध किया। महामृत्युंजय रूद्र उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

राजेश अग्रवाल 

टूथपेस्ट रगड़-रगड़ के चमकाते हैं दांत, तो हो जाएं सावधान!


ज्यादा टूथपेस्ट और टूथपाउडर लगा कर दांतों को चमकाने वाले सावधान हो जाएं। ऐसा करने वाले लोग अपने दांतों को ना सिर्फ नुक्सान पहुंचा सकते है बल्कि दांतों को जल्दी बूढा भी बना सकते है।
बीएचयू में चल रहे एक शोध के प्रारंभिक परिणामों का हवाला माने तो मार्केट में बिकने वाले कुछ टूथपेस्ट/टूथपाउडर में अधिक और अनुचित आकार में अब्रैजिव (घिसने) वाले पदार्थों के होने से दांतों की सेहत और उम्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। 

RAJESH AGRAWAL


भारत का वैज्ञानिक चिन्तन

पश्चिम का विज्ञान : एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट तक -----------------
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विज्ञान का एक दूसरा रूप है जिसे प्योर साइंस कहा गया है। इसके अन्तर्गत कुछ मूलभूत प्रश्नों के संदर्भ में विचार किया गया। व्रह्माण्ड क्या है? इसका अंतिम सत्य क्या है व्रह्माण्ड की विभिन्न इकाइयों का स्वरूप क्या है तथा उनका आपसी सम्बंध क्या है?
उपर्युक्त मूलभूत प्रश्नों पर पश्चिम और भारत-दोनों ही जगह विचार किया गया, विश्लेषण किया गया, निष्कर्ष निकाले गए। परन्तु दोनों के मार्ग भिन्न थे। जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा, ‘पश्चिमी विज्ञान बहिर्जगत्‌ के व्यापक विश्लेषण और प्रयोग द्वारा इन प्रश्नों के उत्तर पाने की दिशा में बढ़ा और भारत बहिर्जगत्‌ का सामान्य परन्तु अन्तर्जगत्‌ का विशेष रूप से अवलोकन करते हुए आगे बढ़ा।‘ दोनों ने इस खोज यात्रा के निष्कर्ष निकाले, उस आधार पर उनकी एक विश्व दृष्टि और जीवन दृष्टि बनी, जिसने सम्पूर्ण जगत के विभिन्न पारस्परिक व्यवहारों को प्रभावित किया।

भारत का वैज्ञानिक चिंतन की अंतिम कड़ियों में हम पश्चिम और भारत की इस खोज यात्रा और उसके परिणामों का विश्लेषण करेंगे।

पश्चिम की विज्ञान यात्रा
(क) प्राचीन ग्रीक दार्शनिकों के अनुसार जगत पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि-इन चार तत्वों से बना है। कुछ दार्शनिकों ने यह माना कि जगत अणुमय है। इन सभी का संसार के प्रति जैविक दृष्टिकोण था। यह धारणा सन्‌ १५०० तक पश्चिम में प्रभावी रही परन्तु सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में पश्चिम में विज्ञान के क्षेत्र में मूलभूत परिवर्तन हुए, जिन्होंने आज तक चली आ रही धारणाओं को जड़-मूल से हिला दिया। इस परिवर्तन के सूत्रधार थे फ्रांसिस बेकन, रेने देकार्ते, गैलीलियो एवं न्यूटन।

(ख) जगत के ज्ञान की प्राप्ति हेतु 
फ्रांसिस  बेकन ने गणितीय पद्धति का प्रतिपादन किया। उसके अनुसार पहले प्रयोग करना फिर सामान्य निष्कर्ष निकालना तथा पुन: प्रयोग से जांचना, इससे जो ठीक निकलेगा वह ठीक और बाकी गलत है।

रेने देकार्ते ने ज्ञान की पारंपरिक विधि न मानते हुए कहा कि समस्त ज्ञान, जिसमें संभावना की बात कही गई हो, अस्वीकार करने योग्य है। केवल वही ज्ञान स्वीकार्य है जो निश्चयात्मक और संशयातीत हो। इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने का तरीका उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘डिस्कोर्स ऑन मेथड‘ में बताया। इस पुस्तक में उन्होंने प्रतिपादित किया कि किसी समस्या को जानना है तो उसके छोटे से छोटे टुकड़े करते जाएं, फिर उनका तार्किक संयोजन करें। यह विश्लेषणात्मक पद्धति उसकी आधुनिक विज्ञान को बड़ी देन बनी।

गैलीलियो ने यंत्रों के प्रयोग से निरीक्षण करने का प्रयत्न किया और ग्रहों के निरीक्षण के आधार पर उस समय की भू-केन्द्रक विश्व की अवधारणा को चुनौती दी और प्रतिपादित किया कि सूर्य पृथ्वी का नहीं अपितु पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।

इस प्रकार देकार्ते ने विश्व को छोटे से छोटे टुकड़े कर समझने की बात कही तो गैलीलियो ने विशाल अंतरिक्ष के निरीक्षण का द्वार खोला और आगे चलकर पश्चिम की विज्ञान यात्रा व्रह्माण्ड के सूक्ष्मतम अंश की खोज और उसकी विशालता को मापने की दिशा में अग्रसर हुई।


व्रह्माण्ड के सूक्ष्मतम भाग की खोज में पहले माना गया कि यह जगत तत्व (एलीमेंट) यौगिक (कम्पाऊन्ड) तथा मिश्रण (मिक्सचर) का समुच्चय है। फिर खोज आगे बढ़ी तब कहा कि मूल तत्व एलीमेंट हैं और वह अविभाज्य है। लगभग ९२ प्रकार के तत्व खोजे गए और माना गया कि जगत इनका समुच्चय है। परन्तु एवगेड्रो और डाल्टन ने प्रतिपादित किया कि तत्व (एलीमेंट) मूल नहीं हैं बल्कि ये छोटे-छोटे अविभाज्य कणों से बने हैं जिन्हें अणु और परमाणु कहा गया।

न्यूटन ने इन समस्त वैज्ञानिक तथ्यों का संयोजन करते हुए सम्पूर्ण व्रह्माण्ड की कल्पना प्रस्तुत की। उसने अपनी प्रतिभा से एक नयी गणितीय पद्धति, जिसे डिफरेंशियल कैलकुलस कहा जाता है, का विकास किया तथा उसके द्वारा केप्लर के ग्रहीय गति (प्लेनेटरी मोशन) के नियमों तथा गैलीलियो के गिरती वस्तु के नियम (लॉ ऑफ फालिंग बॉडीज) को अपने सामान्य गति के नियमों में समाहित किया, जिसके द्वारा सामान्य पत्थर से लेकर सौर मंडलों और तारों तक के नियंत्रण और गति की व्याख्या हो सकती थी। इस आधार पर न्यूटन ने अपना एक व्रह्माण्डीय मॉडल प्रस्तुत किया। न्यूटन के अनुसार सम्पूर्ण व्रह्माण्ड में दिक्‌ और काल अनंत है इनमें दिक्‌ एक रस है व काल सरल रैखिक है। इसी देश-काल से सामान्य रेत के कण से लेकर विराट ग्रह व नक्षत्र सब बने हैं। इनका निर्माण छोटे-छोटे अविभाज्य कणों के द्वारा हुआ है और कणों को गति गुरुत्व शक्ति से मिलती है। न्यूटन ने अपने गति संबंधी नियमों से व्रह्माण्ड की गति की व्याख्या प्रस्तुत की तथा प्रतिपादित किया कि सम्पूर्ण व्रह्माण्ड इन नियमों से चलता है। आगे लगभग ३०० वर्षों तक न्यूटन की व्रह्माण्डीय मशीन की अवधारणा सम्पूर्ण पश्चिमी जगत पर हावी रही।


(ग) १९वीं सदी के अंत तथा २०वीं सदी के प्रारंभ में विज्ञान के क्षेत्र में दो बड़ी सैद्धान्तिक प्रणालियां अस्तित्व में आएं जिन्होंने न्यूटन के मशीनी व्रह्माण्ड तथा इस जगत का निर्माण मूलभूत कणों से हुआ है, इस अवधारणा को जड़-मूल से हिला दिया। ये सैद्धान्तिक प्रणालियां थीं ऊर्जा पुंज सिद्धान्त (क्वांटम थ्योरी) जिसका सम्बन्ध शक्ति की बुनियादी इकाई से था। तथा सापेक्षता सिद्धान्त (थ्योरी ऑफ रिलेटीविटी) जिसका सम्बंध दिक्‌ (स्पेस) काल (टाइम) तथा सम्प्पूर्ण व्रह्माण्ड की बनावट से था।

ऊर्जापुंज सिद्धान्त के प्रतिपादन में मैक्सवेल, मैक्सप्लांक, मैडमक्यूरी, रदर फोर्ड, नील्स बोर, हीजनबर्ग, जेम्स चाडविक, लुई डी व्रोगली, इरविन श्रोडिंगर आदि का योगदान रहा।


(१) १८वीं सदी के मध्य तक परमाणु अविभाज्य माना गया। परन्तु हेम्होस नामक जर्मन भौतिकविद्‌ ने यह अवधारणा रखी कि विद्युत ऋण और धन आवेश युक्त होती है और जैसे तत्व परमाणु से बने हैं, उसी प्रकार विद्युत भी कणों से बनी होगी। आगे चलकर थामसन, हर्ट आदि ने प्रयोगों से सिद्ध किया कि विद्युत इलेक्ट्रान नामक सूक्ष्म कणों से बना है। ये कण परमाणु के नाभिक के आस-पास चक्कर लगाते हैं। रदरफोर्ड और नील्सबोर ने परमाणु के ग्रहीय रूप का प्रतिपादन किया। आगे चलकर परमाणु का नाभिक टूटा और घन आवेशित प्रोटान और बिना आवेश के न्यूट्रान ऋण की खोज हुई। आइंस्टीन ने प्रतिपादित किया कि प्रकाश फोटोन नामक कणों का प्रवाह है जो विद्युत चुम्बकीय कणों से भिन्न है। इस खोज की प्रक्रिया में १९६३ तक परमाणु के अंदर मेसोन, पायोन न्यूयॉन, हाइपरान, न्यूट्रीनों आदि २०० प्रकार के सूक्ष्म कणों की खोज हुई और मानो कणों का जंगल खड़ा हो गया। अनेकानेक कण खोजे गए, परन्तु इन कणों का सत्य क्या है, यह जानने जब विज्ञान निकला तो एक बाधा आई, जिसका समाधान आज तक नहीं हो पाया। क्योंकि यदि हम इलेक्ट्रॉन की आन्तरिक रचना जानना चाहते हैं तो हमें इलेक्ट्रॉन की गति तथा दिशा का ज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा। उसकी दिशा जानने के लिए गामा किरण का प्रयोग करना पड़ेगा। पर इलेक्ट्रान, जो प्रकाश के साधारण फोटोन से टकराकर अपना रूप बदल देता है, गामा किरण से टकराने के साथ ही भिन्न रूप में आ जाएगा। तब समस्या यह आई कि जिसकी आन्तरिक रचना जानना है उसे देखते हैं तो वह वही नहीं रहता। इसे वर्नर हीजनबर्ग ने अनिश्चितता का सिद्धान्त कहा और कहा कि इलेक्ट्रान कोई वस्तु नहीं है, इसकी अन्तरिक रचना जानना कठिन है। तब प्रश्न उठा कि फिर जानने का माध्यम क्या? इस प्रश्न के उत्तर की खोज में ध्यान में आया कि मूल तत्व कण है या तरंग, यह हम नहीं जानते। परन्तु कभी ये एक इकाई के रूप अकेले नहीं अपितु एक प्रवाह के रूप में व्यवहार करते हैं। कभी वे कण रूप में भासित होते हैं तथा कभी तरंग रूप में, और यह अनुभूति वास्तविक है। तो ध्यान में आया कि कण या तरंग रूप का अनुभव उस प्रक्रिया पर निर्भर है जिसका उपयोग जानने के लिए किया गया है। इस प्रकार इन सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति दृष्टा या आब्जर्वर तथा उसके द्वारा अपनाये जाने वाली प्रक्रिया पर आश्रित हो गई। आज का वैज्ञानिक असंख्य कणों को न जानते हुए भी उनके स्वभाव के आधार पर उनसे व्यवहार करता है। इसका उल्लेख करते हुए सर जेम्स जीन्स अपनी पुस्तक ‘न्यू बैकग्राउण्ड ऑफ साइंस‘ में कहते हैं ‘आज के भौतिक विज्ञान के इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान वैसे ही हैं, जैसे किसी बालक के पास बीज गणित के क,ख,ग। आज अधिक से अधिक यह हो रहा है कि बिना यह जाने कि यह कण क्या है हम इनसे व्यवहार कर कुशलतापूर्वक आविष्कार करने में सक्षम हुए हैं।‘ इससे व्रह्माण्ड के अंतिम सत्य को जानने की विज्ञान यात्रा आइंस्टीन के शब्दों में ‘एक अस्पष्ट से दूसरे अस्पष्ट को निकालना मात्र रह गई है।‘

(२) विज्ञान ने व्रह्माण्ड के मूल तत्व की खोज की यात्रा में पाया कि अन्त: पारमाण्विक जगत के कण या तरंग अकेले व्यवहार नहीं करते अपितु उनका प्रवाह रहता है और यह प्रवाह ऊर्जा रूप है और हम उन ऊर्जाओं के साथ व्यवहार करते हैं। पूर्व में प्रकाश, ताप, चुम्बकत्व, विद्युत, ध्वनि आदि विविध शक्तियां भिन्न-भिन्न मानी जाती थीं। परन्तु बाद में नवीन खोजों से शक्तियों के एकीकरण की प्रक्रिया चली और इसमें से माना गया कि चार मूलभूत बल हैं। (१) गुरुत्वाकर्षण बल-यह सभी मुख्य कणों इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन तथा न्यूट्रोनों के बीच है तथा पृथ्वी सहित समस्त व्रह्माण्ड पर नियमन करने वाला बल है। पर इसका कारण माने जाने वाले ग्रेविटोन को अभी तक जाना नहीं जा सका है। (२) विद्युत चुम्बकीय बल, इलेक्ट्रोमेग्नेटिक फोर्स। अब यह सिद्ध हो गया है कि ताप, विद्युत, ध्वनि, चुम्बकत्व और अन्य सब शक्तियां विभिन्न तरंगदैध्य वाली विद्युत चुम्बकीय शक्ति ही हैं। (३) प्रबल नाभिकीय बल, यह परमाणु के नाभिक में प्रोट्रॉन और न्यूट्रॉन को बांधे रखने वाला बल है। यह विद्युत चुम्बकीय बल से दस लाख गुना प्रबल है। (४) निर्बल नाभिकीय बल (ध्र्ड्ढड्ढत्त्‌ त्दद्यड्ढद्धद्मठ्ठड़द्यत्दृद)। इन चार बातों में सब कुछ समाहित है। इसमें विद्युत चुम्बकीय तथा प्रबल और निर्बल नाभिकीय बलों का समन्वय वाइनबर्ग एवं पाकिस्तान के अब्दुस सलाम ने किया है। परन्तु अभी गुरुत्व बल को इसमें नहीं जोड़ा जा सका है। (जारी)

(३) आइंस्टीन ने अपने विशिष्ट सापेक्षिता सिद्धांत में पदार्थ व ऊर्जा का एकीकरण किया। उन्होंने कहा ऊर्जा की स्थूल अभिव्यक्ति पदार्थ है तथा अपने प्रसिद्ध समीकरण कउथ्र्ड़२ द्वारा सिद्ध किया कि दोनों एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं।


राजेश अग्रवाल