13 June 2013

!!! सुन्दरकाण्ड !!!




॥ अथ तुलसीदास कृत रामचरितमानस सुन्दरकाण्ड ॥श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभोविजयते
श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान-सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदांतवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ॥ १ ॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥ ३ ॥
चौ॰-जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥ १ ॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥
यह कह नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥ २ ॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥ ३ ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता । चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥ ४ ॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ॥ ५ ॥
दोहा
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ॥ १ ॥
चौ॰-जात पवनसुत देवन्ह देखा । जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता । पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥ १ ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥ २ ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥ ३ ॥
जोजन भरि तिहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥ ४ ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥ ५ ॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥ ६ ॥
दोहा
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥ २ ॥
चौ॰-निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई ॥ करि माया नभु के खग गहई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥ १ ॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥ २ ॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥ ३ ॥
नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥ ४ ॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई ॥ प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहि देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥ ५ ॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोटि कर परम प्रकासा ॥ ६ ॥
छंद
कनक कोटि बिचित्र मणि कृत सुंदरायतना घना ।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहुबिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै ।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ १ ॥
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।
नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥ २ ॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ ३ ॥
दोहा
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ॥ ३ ॥
चौ॰-मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥ १ ॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं डनमनी ॥ २ ॥
पुनि संभारि उठी सो लंका । जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥
जब रावनहि ब्रह्म कर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥ ४ ॥
दोहा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥
चौ॰-प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥ १ ॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना । पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥ २ ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
गयउ दसानान मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥ ३ ॥
सयन किएँ देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥ ४ ॥
दोहा
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ॥ ५ ॥
चौ॰-लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥ १ ॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ॥ २ ॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥ ३ ॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ॥ ४ ॥
दोहा
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ ६ ॥
चौ॰-सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥ १ ॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ॥ २ ॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥ ३ ॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिले अहारा ॥ ४ ॥
दोहा
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ ७ ॥
चौ॰-जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य विश्रामा ॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चलेउँ जानकी माता ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥
दोहा
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥
चौ॰-तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥
तव अनुचरीं करेउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥ ३ ॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥ ४ ॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥ ५ ॥
दोहा
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥
चौ॰-सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तब सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥ १ ॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंदर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥ २ ॥
चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥ ३ ॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥ ४ ॥
मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥ ५ ॥
दोहा
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥
चौ॰-त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥ १ ॥
सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥ २ ॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥ ३ ॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥ ४ ॥
दोहा
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच ॥ ११ ॥
चौ॰-त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी । मातु बिपति संगिनि तैं मोरी ॥
तजौं देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई ॥ १ ॥
आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहु लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को श्रवन सूल सम बानी ॥ २ ॥
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि ॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥ ३ ॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥ ४ ॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥ ५ ॥
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि जनि करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥ ६ ॥
दोहा
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥ १२ ॥
चौ॰-तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी । हरष विषाद हृदयँ अकुलानी ॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ॥
सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥ २ ॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥ ३ ॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होति किन भाई ॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥ ४ ॥
राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥ ५ ॥
नर बानरहि संग कहु कैसें । कही कथा भई संगति जैसें ॥ ६ ॥
दोहा
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास ।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ॥ १३ ॥
चौ॰-हरिजन हानि प्रीति अति गाढ़ी । सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी ॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना । भयहु तात मो कहुँ जलजाना ॥ १ ॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी । अनुज सहित सुख भवन खरारी ॥
कोमलचित कृपाल रघुराई । कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥ २ ॥
सहज बानि सेवक सुख दायक । कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता । होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता ॥ ३ ॥
बचनु न आव नयन भरे बारी । अहह नाथ हौं निपट बिसारी ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥ ४ ॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता । तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना । तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ॥ ५ ॥
दोहा
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर ।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर ॥ १४ ॥
चौ॰-कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कहुँ सकल भए बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥ १ ॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा । बारिद तपत तेल जनु बरिसा ॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा । उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा ॥ २ ॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई । काहि कहौं यह जान न कोई ॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एकु मनु मोरा ॥ ३ ॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं । जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं ॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥ ४ ॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक सुखदाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥ ५ ॥
दोहा
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु ।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु ॥ १५ ॥
चौ॰-जौं रघुबीर होति सुधि पाई । करते नहिं बिलंबु रघुराई ॥
राम बान रबि उएँ जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥ १ ॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई । प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई ॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा । कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं । तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
मोरें हृदय परम संदेहा । सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा । समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥ ५ ॥
दोहा
सुनु मात साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल ।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल ॥ १६ ॥
चौ॰-मन संतोष सुनत कपि बानी । भगति प्रताप तेज बल सानी ॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना । होहु तात बल सील निधाना ॥ १ ॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू । करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना । निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥ २ ॥
बार बार नाएसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता । आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥ ३ ॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा । लागि देखि सुंदर फल रूखा ॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी । परम सुभट रजनीचर भारी ॥ ४ ॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं । जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ॥ ५ ॥
दोहा
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु ।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु ॥ १७ ॥
चौ॰-चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा । फल खाएसि तरु तौरैं लागा ॥
रहे तहां बहु भट रखवारे । कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥ १ ॥
नाथ एक आवा कपि भारी । तेहिं असोक बाटिका उजारी ॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥ २ ॥
सुनि रावन पठए भट नाना । तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना ॥
सब रजनीचर कपि संघारे । गए पुकारत कछु अधमारे ॥ ३ ॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा । चला संग लै सुभट अपारा ॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥ ४ ॥
दोहा
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि ।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि ॥ १८ ॥
चौ॰-सुनि सुत बध लंकेस रिसाना । पठएसि मेघनाद बलवाना ॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही । देखिअ कपिहि कहाँ कर आही ॥ १ ॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा । बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥
कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥ २ ॥
अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा ॥
रहे महाभट ताके संगा । गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा ॥ ३ ॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई । ताहि एक छन मुरुछा आई ॥ ४ ॥
उठि बहोरि कीन्हसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन जाया ॥ ५ ॥
दोहा
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार ।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार ॥ १९ ॥
चौ॰-ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा । परतिहुँ बार कटकु संघारा ॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयउ । नागपास बांधेसि लै गयउ ॥ १ ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी । भव बंधन काटहिं नर ग्यानी ॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा । प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा ॥ २ ॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए । कौतुक लागि सभाँ सब आए ॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥ ३ ॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥ ४ ॥
दोहा
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद ।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ॥ २० ॥
चौ॰-कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ १ ॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया । पाइ जासु बल बिरचित माया ॥ २ ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ॥
जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ॥ ३ ॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता । तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा । तेहि समेत नृप दल मद गंजा ॥ ४ ॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली । बधे सकल अतुलित बलसाली ॥ ५ ॥
दोहा
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ॥ २१ ॥
चौ॰-जानेउ मैं तुम्हारि प्रभुताई । सहसबाहु सन परी लराई ॥
समर बालि सन करि जसु पावा । सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ॥ १ ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥ २ ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥ ३ ॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ॥ ४ ॥
जाकें डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहें जानकी दीजै ॥ ५ ॥
दोहा
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि ।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि ॥ २२ ॥
चौ॰-राम चरन पंकज उर धरहू । लंकाँ अचल राज तुम्ह करहू ॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका । तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ॥ १ ॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी । सब भूषन भूषित बर नारी ॥ २ ॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं । बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं ॥ ३ ॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिं कोपी ॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही । सकहिं न राखि राम कर द्रोही ॥ ४ ॥
दोहा
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान ।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान ॥ २३ ॥
चौ॰-जदपि कही कपि अति हित बानी । भगति बिबेक बिरति नय सानी ॥
बोला बिहसि महा अभिमानी । मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ॥ १ ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ॥
उलटा होइहि कह हनुमाना । मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ॥ २ ॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना । बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना ॥
सुनत निसाचर मारन धाए । सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ॥ ३ ॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति बिरोधा न मारिअ दूता ॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई । सबहीं कहा मंत्र भल भाई ॥ ४ ॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर । अंग भंग करि पठइअ बंदर ॥ ५ ॥
दोहा
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ॥ २४ ॥
चौ॰-पूँछ हीन बानर तहँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लइ आइहि ॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई । देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ॥ १ ॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भइ सहाय सारद मैं जाना ॥
जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचें मूढ़ सोइ रचना ॥ २ ॥
रहा न नगर बसन घृत तेला । बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला ॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी । मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ॥ ३ ॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी । नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी ॥
पावक जरत देखि हनुमंता । भयउ परम लघुरूप तुरंता ॥ ४ ॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं । भइँ सभीत निसाचर नारीं ॥ ५ ॥
दोहा
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास ।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास ॥ २५ ॥
चौ॰-देह बिसाल परम हरुआई । मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई ॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला । झपट लपट बहु कोटि कराला ॥ १ ॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा । एहिं अवसर को हमहि उबारा ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरें सुर कोई ॥ २ ॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा । जरइ नगर अनाथ कर जैसा ॥
जारा नगर निमिष एक माहीं । एक बिभीषन कर गृह नाहीं ॥ ३ ॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा । जरा न सो तेहि कारन गिरिजा ॥
उलटि पलटि लंका सब जारी । कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ॥ ४ ॥
दोहा
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि ।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि ॥ २६ ॥
चौ॰-मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा । जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा ॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवनसुत लयऊ ॥ १ ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ॥
दीन दयाल बिरिदु सँभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी ॥ २ ॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥
मास दिवस महुँ नाथ न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥ ३ ॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती ॥ ४ ॥
दोहा
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह ।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ २७ ॥
चौ॰-चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा । सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा ॥ १ ॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा ॥ २ ॥
मिले सकल अति भए सुखारी । तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥
चले हरषि रघुनायक पासा । पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥ ३ ॥
तब मधुबन भीतर सब आए । अंगद संमत मधु फल खाए ॥
रखवारे जब बरजन लागे मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥ ४ ॥
दोहा
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज ।
सुन सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ २८ ॥
चौ॰-जौं न होति सीता सुधि पाई । मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा । आइ गए कपि सहित समाजा ॥ १ ॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा । मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी । राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥ २ ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना । राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ । कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ॥ ३ ॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई । परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥ ४ ॥
दोहा
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज ।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥ २९॥
चौ॰-जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥ १ ॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर । तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू ॥ २ ॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवनतनय के चरित सुहाए । जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥ ३ ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥ ४ ॥
दोहा
चौ॰-नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥ ३० ॥
चौ॰-चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी । बचन कहे कछु जनककुमारी ॥ १ ॥
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना । दीन बंधु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी । केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी ॥ २॥
अवगुन एक मोर मैं माना । बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा । निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ ३ ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी । जरैं न पाव देह बिरहागी ॥ ४ ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला । बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥ ५ ॥
दोहा
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति ।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ ३१ ॥
चौ॰-सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना । भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन कायँ मन मम गति जाही । सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥ १ ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥ २ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी । नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ॥
प्रति उपकार करौं का तोरा । सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥ ३ ॥
सुनु सत तोहि उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता । लोचन नीर पुलक अति गाता ॥ ४ ॥
दोहा
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत ।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ॥ ३२ ॥
चौ॰-बार बार प्रभु चहइ उठावा । प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा । सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥ १ ॥
सावधान मन करि पुनि संकर । लागे कहन कथा अति सुंदर ॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा । कर गहि परम निकट बैठावा ॥ २ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका । केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना । बोला बचन बिगत हनुमाना ॥ ३ ॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई । साखा तें साखा पर जाई ॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा । निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा ॥ ४ ॥
सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥ ५ ॥
दोहा
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल ।
तव प्रभावँ वड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल ॥ ३३ ॥
चौ॰-नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥ १ ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥
यह संबाद जासु उर आवा । रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥ २ ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा । जय जय जय कृपाल सुखकंदा ॥
तब रघुपति कपिपतिहिं बोलावा । कहा चलैं कर करहु बनावा ॥ ३ ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे । तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी । नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥ ४ ॥
दोहा
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ ३४ ॥
चौ॰-प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा । गर्जहिं भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सेना । चितइ कृपा करि राजिव नैना ॥ १ ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भए सुंदर सुभ नाना ॥ २ ॥
जासु सकल मंगलमय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥ ३ ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहि सोई ॥
चला कटकु को बरनैं पारा । गर्जहिं बानर भालु अपारा ॥ ४ ॥
नख आयुध गिरि पादपधारी । चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं । डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥ ५ ॥
छंद
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे ।
मन हरष सब गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं ।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥ १ ॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई ।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी ।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥ २ ॥
दोहा
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर ।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ ३५ ॥
चौ॰-उहाँ निसाचर रहहिं ससंका । जब तें जारि गयउ कपि लंका ॥
निज निज गृह सब करहिं बिचारा । नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥ १ ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई । तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी । मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥ २ ॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी । बोली बचन नीति रस पागी ॥
कंत करष हरि सन परिहरहू । मोर कहा अति हित हियँ धरहू ॥ ३ ॥
समुझत जासु दूत कइ करनी । स्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी ॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई । पठवहु कंत जो चहहु भलाई ॥ ४ ॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदायई । सीता सीत निसा सम आई ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ॥ ५ ॥
दोहा
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ ३६ ॥
चौ॰-श्रवन सुनि सठ ता करि बानी । बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा । मंगल महुँ भय मन अति काचा ॥ १ ॥
जों आवइ मर्कट कटकाई । जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा । तासु नारि सभीत बड़ि हासा ॥ २ ॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई । चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता । भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ॥ ३ ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई । सिंधु पार सेना सब आई ॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहेहू । ते सब हँसे मष्ट करि रहेहू ॥ ४ ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं । नर बानर केहि लेखे माहीं ॥ ५ ॥
दोहा
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ ३७ ॥
चौ॰-सोइ रावन कहुँ बनी सहाई । अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा । भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥ १ ॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन । बोला बचन पाइ अनुसासन ॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता । मति अनुरूप कहउँ हित ताता ॥ २ ॥
जो आपन चाहै कल्याना । सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥
सो परनारि लिलार गोसाई । तजउ चउथि के चंद कि नाई ॥ ३ ॥
चौदह भुवन एक पति होई । भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ॥
गुन सागर नागर नर जोऊ । अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ॥ ४ ॥
दोहा
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥ ३८ ॥
चौ॰-तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥ १ ॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी । कृपा सिंधु मानुष तनुधारी ॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता । बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥ २ ॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा । प्रनतारति भंजन रघुनाथा ॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही । भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥ ३ ॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा । बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोई प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥ ४ ॥
दोहा
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस ।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ॥ ३९ क ॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात ।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ ३९ ख ॥
चौ॰-माल्यवंत अति सचिव सयाना । तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन । सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥ १ ॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ । दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी । कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥ २ ॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं । नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना । जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥ ३ ॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता । हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥
कालराति निसिचर कुल केरी । तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥ ४ ॥
दोहा
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार ।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥ ४० ॥
चौ॰-बुध पुरान श्रुति संमत बानी । कही बिभीषन नीति बखानी ॥
सुनत दसानन उठा रिसाई । खल तोहि निकट मृत्य अब आई ॥ १ ॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा । रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥
कहसि न खल अस को जग माहीं । भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं ॥ २ ॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती । सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा । अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥ ३ ॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥ ४ ॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ । सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ॥ ५ ॥
दोहा
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ ४१ ॥
चौ॰-अस कहि चला बिभीषनु जबहीं । आयूहीन भए सब तबहीं ॥
साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥ १ ॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा । भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं । करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥ २ ॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता । अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥
जे पद पसरि तरी रिषिनारी । दंड़क कानन पावनकारी ॥ ३ ॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए । कपट कुरंग संग धर धाए ॥
हर उर सर सरोज पद जेई । अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई ॥ ४ ॥
दोहा
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ ४२ ॥
चौ॰-एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा । आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा । जान कोउ रिपु दूत बिसेषा ॥ १ ॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए । समाचार सब ताहि सुनाए ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । आवा मिलन दसानन भाई ॥ २ ॥
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा । कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ॥
जानि न जाइ निसाचर माया । कामरूप केहि कारन आया ॥ ३ ॥
भेद हमार लेन सठ आवा । राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी । मम पन सरनागत भयहारी ॥ ४ ॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना । सरनागत बच्छल भगवाना ॥ ५ ॥
दोहा
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ ४३ ॥
चौ॰-कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥ १ ॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजहु मोर तेहि भाव न काऊ ॥
जौं पै दुष्टहृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ॥ २ ॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥
भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥ ३ ॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ॥
जो सभीत आवा सरनाईं । राखिहउँ ताहि प्रान की नाईं ॥ ४ ॥
दोहा
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत ॥ ४४ ॥
चौ॰-सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता । नयनानंद दान के दाता ॥ १ ॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी । रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥ २ ॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ॥
नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥ ३ ॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥ ४ ॥
दोहा
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ ४५ ॥
चौ॰-अस कहि करत दंडवत देखा । तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥ १ ॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भय हारी ॥
कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥ २ ॥
खल मंडलीं बसहु दिन राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती । अति नय निपुन न भाव अनीती ॥ ३ ॥
बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥
अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥ ४ ॥
दोहा
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।
जब लगि भजन न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ ४६ ॥
चौ॰-तब लगि हृदयँ बसत खल नाना । लोभ मोह मच्छर मद माना ॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा । धरें चाप सायक कटि भाथा ॥ १ ॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी । राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ॥ २ ॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे । देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला । ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥ ३ ॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ । सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा । तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥ ४ ॥
दोहा
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ॥ ४७ ॥
चौ॰-सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवौ सभय सरन तकि मोही ॥ १ ॥
तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥
जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥ २ ॥
सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥ ३ ॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें ॥ ४ ॥
दोहा
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम ।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ ४८ ॥
चौ॰-सुन लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥
राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥ १ ॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा । हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥ २ ॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥
उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥ ३ ॥
अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिंधु कर नीरा ॥ ४ ॥
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन वृष्टि नभ भई अपारा ॥ ५ ॥
दोहा
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड ।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड ॥ ४९ क ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्ह दिएँ दस माथ ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ ॥ ४९ ख ॥
चौ॰-अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना । ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना ॥
निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ॥ १ ॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी । सर्बरूप सब रहित उदासी ॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक । कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥ २ ॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा । केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा ॥
संकुल मकर उरग झष जाती । अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥ ३ ॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक । कोटि सिंधु सोषक तव सायक ॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई । बिनय करिअ सागर सन जाई ॥ ४ ॥
दोहा
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि ।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ॥ ५० ॥
चौ॰-सखा कही तुम्ह नीकि उपाई । करिअ दैव जौं होइ सहाई ॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा । राम बचन सुनि अति दुख पावा ॥ १ ॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा । सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा ॥
कादर मन कहुँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ॥ २ ॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा । ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा ॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई । सिंधि समीप गए रघुराई ॥ ३ ॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई । बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए । पाछें रावन दूत पठाए ॥ ४ ॥
दोहा
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ॥ ५१ ॥
चौ॰-प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिं आने ॥ १ ॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर । अंग भंग करि पठवहु निसिचर ॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए । बाँधि कटक चहु पास फिराए ॥ २ ॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे ॥
जो हमार हर नासा काना । तेहि कोसलाधीस कै आना ॥ ३ ॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए । दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए ॥
रावन कर दीजहु यह पाती । लछिमन बचन बाचु कुलघाती ॥ ४ ॥
दोहा
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार ।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार ॥ ५२ ॥
चौ॰-तुरत नाइ लछिमन पद माथा । चले दूत बरनत गुन गाता ॥
कहत राम जसु लंकाँ आए । रावन चरन सीस तिन्ह नाए ॥ १ ॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता । कहसि न सुक आपनि कुसलाता ॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी । जाहि मृत्यु आई अति नेरी ॥ २ ॥
करत राज लंका सठ त्यागी । होइहि जव कर कीट अभागी ॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई । कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥ ३ ॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा । भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा ॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी । जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ॥ ४ ॥
दोहा
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर ।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥ ५३ ॥
चौ॰-नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें । मानहु कहा क्रोध तजि तैसें ॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा । जातहिं राम तिलक तेहि सारा ॥ १ ॥
रावन दूत हमहि सुनि काना । कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥
श्रवन नासिका काटैं लागे । राम सपथ दीन्हें हम त्यागे ॥ २ ॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई । बदन कोटि सत बरनि न जाई ॥
नाना बरन भालु कपि धारी । बिकटानन बिसाल भयकारी ॥ ३ ॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा । सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा ॥
अमित नाम भट कठिन कराला । अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥ ४ ॥
दोहा
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि ।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ॥ ५४ ॥
चौ॰-ए कपि सब सुग्रीव समाना । इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना ॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं । तृन समान त्रैलोकहि गनहीं ॥ १ ॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर । पदुम अठारह जूथप बंदर ॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं । जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ॥ २ ॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा । आयसु पै न देहिं रघुनाथा ॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला । पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला ॥ ३ ॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा । ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा ॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका । मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका ॥ ४ ॥
दोहा
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम ।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम ॥ ५५ ॥
चौ॰-राम तेज बल बुधि बिपुलाई । सेष सहस सत सकहिं न गाई ॥
सक सर एक सोषि सत सागर । तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ॥ १ ॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं । मागत पंथ कृपा मन माहीं ॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा । जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥ २ ॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई । सागर सन ठानी मचलाई ॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई । रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥ ३ ॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें । बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी । समय बिचार पत्रिका काढ़ी ॥ ४ ॥
रामानुज दीन्ही यह पाती । नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन । सचिव बोलि सठ लाग बचावन ॥ ५ ॥
दोहा
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस ।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ॥ ५६ क ॥
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग ।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ॥ ५६ ख ॥
चौ॰-सुनत सभय मन मुख मुसुकाई । कहत दसानन सबहि सुनाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा । लघु तापस कर बाग बिलासा ॥ १ ॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी । समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी ॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा । नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥ २ ॥
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ । जद्यपि अखिल लोक कर राऊ ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही । उर अपराध न एकउ धरही ॥ ३ ॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे । एतना कहा मोर प्रभु कीजे ॥
जब तेहि कहा देन बैदेही । चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ॥ ४ ॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ । कृपासिंधु रघुनायक जहाँ ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई । राम कृपाँ आपनि गति पाई ॥ ५ ॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी । राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी ॥
बंदि राम पद बारहिं बारा । मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥ ६ ॥
दोहा
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ॥ ५७ ॥
चौ॰-लछिमन बान सरासन आनू । सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू ॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती । सहज कृपन सन सुंदर नीती ॥ १ ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी । अति लोभी सन बिरति बखानी ॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा । ऊसर बीज बएँ फल जथा ॥ २ ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा । यह मत लछिमन के मन भावा ॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला । उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ॥ ३ ॥
मकर उरग झष गन अकुलाने । जरत जंतु जलनिधि जब जाने ॥
कनक थार भरि मनि गन नाना । बिप्र रूप आयउ तजि माना ॥ ४ ॥
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच ।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ॥ ५८ ॥
चौ॰-सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे । छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ॥
गगन समीर अनल जल धरनी । इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ॥ १ ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए । सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई । सो तेहि भाँति रहें सुख लहई ॥ २ ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ॥
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी ॥ ३ ॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई । उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई ॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई । करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई ॥ ४ ॥
दोहा
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ ।
जेहि बिधि उतरैं कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ ५९ ॥
चौ॰-नाथ नील नल कपि द्वौ भाई । लरिकाईं रिषि आसिष पाई ।
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥ १ ॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई । करिहउँ बल अनुमान सहाई ॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ । जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥ २ ॥
एहिं सर मम उत्तर तट बासी । हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा । तुरतहिं हरी राम रन धीरा ॥ ३ ॥
देखि राम बल पौरुष भारी । हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥ ४ ॥
छंद
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गाउअऊ ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥
दोहा
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥ ६० ॥
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।

॥ सियावर रामचन्द्र की जै ॥<


अगर आपको कड़ी मेहनत के बाद भी किसी महत्वपूर्ण कार्य में सफलता नहीं मिल पा रही है तो हनुमानजी आराधना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इसके लिए आपको शनिवार के दिन किसी हनुमान मंदिर जाना है। मंदिर जाते समय अपने साथ एक नींबू और 4 लौंग लेकर जाएं।




जब आप मंदिर पहुंच जाएं इसके बाद उस नींबू के ऊपर चारों लौंग लगा दें। फिर हनुमान चालीसा का पाठ करें या हनुमानजी के मंत्रों का जप करें। इसके बाद हनुमानजी से सफलता दिलवाने की प्रार्थना करें। इसके बाद हनुमानजी का पूजन करें। पूजन के बाद यह नींबू अपने साथ रखें या घर पर किसी पवित्र स्थान पर रखें।




इस उपाय से आपके कार्यों में आ रही बाधाएं नष्ट हो जाएंगी। किसी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हो जाएगी। घर-परिवार के सदस्यों पर किसी की बुरी नजर का प्रभाव नहीं होगा। यह एक टोटका है अत: इसके संबंध में कोई शक या संदेह नहीं करना चाहिए। यह पूरी तरह आस्था और विश्वास का उपाय है।




यदि कोई व्यक्ति शनिवार के दिन हनुमानजी का ध्यान और पूजन करता है तो उसे शनि के दोषों से किसी भी प्रकार का भय नहीं होता है। शनिवार के दिन हनुमानजी को बना हुआ मीठा पान भी चढ़ाया जा सकता हैं। हनुमानजी के लिए मीठा पान भी महत्वपूर्ण नैवैद्य माना जाता है। इससे कुंडली के ग्रह दोषों से शांति मिलती है।




यदि किसी व्यक्ति का व्यापार ठीक से नहीं चल रहा हो उसे शनिवार के दिन नींबू का एक उपाय करना चाहिए। उपाय के अनुसार एक नींबू को दुकान की चारों दीवारों पर स्पर्श कराएं। इसके बाद नींबू को चार टुकड़ों में अच्छे से काट लें और चारों में दिशाओं में नींबू का एक-एक टुकड़ा फेंक दें। इससे दुकान की नेगेटिव एनर्जी नष्ट हो जाएगी।

!!! बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग !!!


बजरंग बाण

भौतिक मनोकामनाओं की पुर्ति के लिये बजरंग बाण का अमोघ विलक्षण प्रयोग

अपने इष्ट कार्य की सिद्धि के लिए मंगल अथवा शनिवार का दिन चुन लें। हनुमानजी का एक चित्र या मूर्ति जप करते समय सामने रख लें। ऊनी अथवा कुशासन बैठने के लिए प्रयोग करें। अनुष्ठान के लिये शुद्ध स्थान तथा शान्त वातावरण आवश्यक है। घर में यदि यह सुलभ न हो तो कहीं एकान्त स्थान अथवा एकान्त में स्थित हनुमानजी के मन्दिर में प्रयोग करें।

हनुमान जी के अनुष्ठान मे अथवा पूजा आदि में दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। पाँच अनाजों (गेहूँ, चावल, मूँग, उड़द और काले तिल) को अनुष्ठान से पूर्व एक-एक मुट्ठी प्रमाण में लेकर शुद्ध गंगाजल में भिगो दें। अनुष्ठान वाले दिन इन अनाजों को पीसकर उनका दीया बनाएँ। बत्ती के लिए अपनी लम्बाई के बराबर कलावे का एक तार लें अथवा एक कच्चे सूत को लम्बाई के बराबर काटकर लाल रंग में रंग लें। इस धागे को पाँच बार मोड़ लें। इस प्रकार के धागे की बत्ती को सुगन्धित तिल के तेल में डालकर प्रयोग करें। समस्त पूजा काल में यह दिया जलता रहना चाहिए। हनुमानजी के लिये गूगुल की धूनी की भी व्यवस्था रखें।

जप के प्रारम्भ में यह संकल्प अवश्य लें कि आपका कार्य जब भी होगा, हनुमानजी के निमित्त नियमित कुछ भी करते रहेंगे। अब शुद्ध उच्चारण से हनुमान जी की छवि पर ध्यान केन्द्रित करके बजरंग बाण का जाप प्रारम्भ करें। “श्रीराम–” से लेकर “–सिद्ध करैं हनुमान” तक एक बैठक में ही इसकी एक माला जप करनी है।

गूगुल की सुगन्धि देकर जिस घर में बगरंग बाण का नियमित पाठ होता है, वहाँ दुर्भाग्य, दारिद्रय, भूत-प्रेत का प्रकोप और असाध्य शारीरिक कष्ट आ ही नहीं पाते। समयाभाव में जो व्यक्ति नित्य पाठ करने में असमर्थ हो, उन्हें कम से कम प्रत्येक मंगलवार को यह जप अवश्य करना चाहिए।

बजरंग बाण ध्यान

श्रीराम

अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं।
दनुज वन कृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।। 

दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान।। 

चौपाई

जय हनुमन्त सन्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी।।
जन के काज विलम्ब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै।।
जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा। सुरसा बदन पैठि विस्तारा।।
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा।।
बाग उजारि सिन्धु मंह बोरा। अति आतुर यम कातर तोरा।।
अक्षय कुमार को मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा।।
लाह समान लंक जरि गई। जै जै धुनि सुर पुर में भई।।
अब विलंब केहि कारण स्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी।।
जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता। आतुर होई दुख करहु निपाता।।
जै गिरधर जै जै सुख सागर। सुर समूह समरथ भट नागर।।
ॐ हनु-हनु-हनु हनुमंत हठीले। वैरहिं मारू बज्र सम कीलै।।
गदा बज्र तै बैरिहीं मारौ। महाराज निज दास उबारों।।
सुनि हंकार हुंकार दै धावो। बज्र गदा हनि विलम्ब न लावो।।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुँ हुँ हुँ हनु अरि उर शीसा।।
सत्य होहु हरि सत्य पाय कै। राम दुत धरू मारू धाई कै।।
जै हनुमन्त अनन्त अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा।।
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत है दास तुम्हारा।।
वन उपवन जल-थल गृह माहीं। तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं।।
पाँय परौं कर जोरि मनावौं। अपने काज लागि गुण गावौं।।
जै अंजनी कुमार बलवन्ता। शंकर स्वयं वीर हनुमंता।।
बदन कराल दनुज कुल घालक। भूत पिशाच प्रेत उर शालक।।
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल वीर मारी मर।।
इन्हहिं मारू, तोंहि शमथ रामकी। राखु नाथ मर्याद नाम की।।
जनक सुता पति दास कहाओ। ताकी शपथ विलम्ब न लाओ।।
जय जय जय ध्वनि होत अकाशा। सुमिरत होत सुसह दुःख नाशा।।
उठु-उठु चल तोहि राम दुहाई। पाँय परौं कर जोरि मनाई।।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनु हनुमंता।।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल।।
अपने जन को कस न उबारौ। सुमिरत होत आनन्द हमारौ।।
ताते विनती करौं पुकारी। हरहु सकल दुःख विपति हमारी।।
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा। कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
हे बजरंग, बाण सम धावौ। मेटि सकल दुःख दरस दिखावौ।।
हे कपिराज काज कब ऐहौ। अवसर चूकि अन्त पछतैहौ।।
जन की लाज जात ऐहि बारा। धावहु हे कपि पवन कुमारा।।
जयति जयति जै जै हनुमाना। जयति जयति गुण ज्ञान निधाना।।
जयति जयति जै जै कपिराई। जयति जयति जै जै सुखदाई।।
जयति जयति जै राम पियारे। जयति जयति जै सिया दुलारे।।
जयति जयति मुद मंगलदाता। जयति जयति त्रिभुवन विख्याता।।
ऐहि प्रकार गावत गुण शेषा। पावत पार नहीं लवलेषा।।
राम रूप सर्वत्र समाना। देखत रहत सदा हर्षाना।।
विधि शारदा सहित दिनराती। गावत कपि के गुन बहु भाँति।।
तुम सम नहीं जगत बलवाना। करि विचार देखउं विधि नाना।।
यह जिय जानि शरण तब आई। ताते विनय करौं चित लाई।।
सुनि कपि आरत वचन हमारे। मेटहु सकल दुःख भ्रम भारे।।
एहि प्रकार विनती कपि केरी। जो जन करै लहै सुख ढेरी।।
याके पढ़त वीर हनुमाना। धावत बाण तुल्य बनवाना।।
मेटत आए दुःख क्षण माहिं। दै दर्शन रघुपति ढिग जाहीं।।
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की।।
डीठ, मूठ, टोनादिक नासै। परकृत यंत्र मंत्र नहीं त्रासे।।
भैरवादि सुर करै मिताई। आयुस मानि करै सेवकाई।।
प्रण कर पाठ करें मन लाई। अल्प-मृत्यु ग्रह दोष नसाई।।
आवृत ग्यारह प्रतिदिन जापै। ताकी छाँह काल नहिं चापै।।
दै गूगुल की धूप हमेशा। करै पाठ तन मिटै कलेषा।।
यह बजरंग बाण जेहि मारे। ताहि कहौ फिर कौन उबारे।।
शत्रु समूह मिटै सब आपै। देखत ताहि सुरासुर काँपै।।
तेज प्रताप बुद्धि अधिकाई। रहै सदा कपिराज सहाई।।

दोहा

प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।।
तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।



सुबह बोलें 5 हनुमान मंत्र... आनन-फानन में बनेंगे काम






रुद्रावतार श्री हनुमान को बजरंगबली भी कहा जाता है। उनका यह नाम मात्र उऩके वज्र के समान बलवान शरीर या अनेक शक्तियों के स्वामी होने के कारण ही नहीं बल्कि हनुमान के प्रति आस्था और भक्ति का वह प्रभाव भी है जो भक्तों को तन, मन और धन के संकटों से मुक्त करती हैं। हर मानव का जीवन भी सुख-दुःख के उतार-चढ़ावो से भरा-पूरा होता है, इसलिए हर इंसान सुखों की चाहत और दुःखों से निजात के लिए देव स्मरण करता है। संकट, मुसीबतों और दुःखों से बचने के लिए फेराई जाने वाली भक्ति की इस देव माला के अनमोल रत्न हैं- महाबली हनुमान। जिनके स्मरण के लिए यहां बताए जा रहे हैं कुछ अचूक मंत्र। प्रत्येक सुबह, खासतौर पर शनिवार के दिन श्री हनुमान की उपासना में इन मंत्रो का जप और भी असरकारक होता है। शास्त्रों में हनुमान भक्ति ग्रहदोष शांति खासतौर पर शनिदशा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए बहुत ही शुभ और प्रभावी मानी गई है। इसलिए जानें महाबली हनुमान के इन मंत्रों और श्री हनुमान पूजा की सरल विधि-


शनिवार के दिन सुबह स्नान के बाद घर के देवालय या हनुमान मंदिर में श्री हनुमान की प्रतिमा पर सुगंधित तेल सिंदूर चढ़ाकर गंध, अक्षत, लाल फूल, नारियल अर्पित कर गुग्गल धूप लगाने के बाद लाल आसन पर बैठें और इन हनुमान मंत्रों का जप संकटमोचन की कामना से करें व अंत में आरती करें-


- ऊँ रक्षोविध्यंसकाराय नमः


- ऊँ वज्रकायाय नमः


- ऊँ सर्वरोगहराय नमः


- ऊँ बलसिद्धिकराय नमः

- ऊँ महावीराय नमः


!!! पेड़ पोधो से बदले भाग्य !!!

मन्त्र- शरीर- रक्षा, आरोग्य, शक्ति आदि के लिए बांदा की इस मन्त्र दुवारा सिद्ध करें :-

" ॐ नमो रुदाय मृतार्क मध्ये संस्थिताय मम शरीर अमृतं कुरु कुरु स्वाहा l "
मन्त्र - भोतिक - समृधि के लिए प्रयुक्त होने वाले बांदा को इस मन्त्र दुवारा सिद्ध करें :-

"ॐ नमो धनदाय स्वाहा l "

प्रयोग - बांदा को मन्त्र- सिद्ध कर लेने के पश्यात निम्नलिखित नश्त्र- क्रम से विविध उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है l

अश्विनी - इसनक्षत्र के दिन (पहले से निमंत्रण देकर ) बेल के वृघ्स्य का बांदा लायें और उसकी विधिवत पूजाकरके , मन्त्र संख्या एक के दुवारा सिद्ध करें l उस बांदा को हाथ मे धारण कर लेने से साधक दूसरों की दृष्टि से अदेरिश्ये होने की शमता प्रयाप्त कर लेता है l समरण रहे कि प्रय्तेक प्रयोग मे बांदा को विधिवत सिद्धि कर लें l

भरणी:-
इस नक्षत्र मे बांदा- प्रयोग का प्रभाव अदभुत हैं l कपास का बांदा भी अद्रिश्यीकरण कि शक्ति प्रदान करता हैं l कुश का बांदा लाकर विधिवत पूजाकरके घर मे रखने से धन- धान्य कि वृद्धि होती है l

कृतिका:-
कृतिका नक्षत्र मे थूहर का बांदा धारण करने से वाक्शक्ति बढती है और केथ का बांदा मुंह मे रखने से आंशका नहीं रहती l

रोहिणी :-
इस नक्षत्र मे गूलर का बांदा विधिवत घर मे रखने से धन- धान्य कि वृद्धि होती है और बरगद का बांदा धारण करने से लोगो पर वशीकरण का प्रभाव पड़ता है l

मृगशिरा:-
सिंघोर के वृगश का बांदा इस नक्षत्र मे सिद्धकरके पान मे खाने से साधक को निराकारिणी- विधा (अद्रिश्ये होने कि शक्ति ) प्रयाप्त होती है , बेल का बांदा भी ऐसा ही प्रभाव रखता है , गोखरू, आम और सिंगोर- इन तीनो वृग्श्यो से बांदा लाकर उनमे नमक और दूध मिलाकर पिसें, इस लेपन का तिलक मस्तक पर लगाने से अज्ञात (गुप्त ) धन का बोध होता हैl

पुष्ये :-
यह नक्षत्र इमली के बांदा को प्रभावित करता है , उसे लाकर नियमानुसार सिद्धकरके हाथ मे धारण करें , और घर मे रखे तो श्री- समर्धि प्रयाप्त होती हैंl

चित्रा :-
इस नक्षत्र मे धावडी का बांदा सिद्धकरके पान मे खिलोने से प्रेमप्रसड मे सफलता प्रयाप्त होती हैl

स्वाति:-
हरड का बांदा राज़- सम्मान देता है, बेर का बांदा याचना मे अभीशत वस्तु कि प्रयापति कराता है , और नीम का बांदा अद्रिश्येकरण कि शक्ति प्रदान करता हैl

विशाखा :-
इन नक्षत्र मे महुआ का बांदा सिद्धकरके सिर पर धारण करने से शारीरिक क़ी वृद्धि होती हैl

अनुराधा:-
रेहितक वृष का बांदा लाकर धारण करने से शत्रु परास्त होता है कनेर का बांदा भी शत्रु-दमनकारी होता हैl

मूल :-
इस नक्षत्र मे खजूर का बांदा लाकर, भुजा पर धारण करने से शत्रु- दमन क़ी शक्ति बढती है l

पुर्वाषाड :-
इस नक्षत्र मे दूब का बांदा दांये हाथ मे बाँधने से व्यापार क़ी वृद्धि होती हैl

उतराषादा :-
इस नक्षत्र मे अशोक-वृक्ष का बांदा लाकर ताबीज मे धारण करें, अद्रिस्ये क़ी शमता देता हैl

शतभिषा :-
नक्षत्र मे सुपाली के वृह्स्य का बांदा गाये के दूध के साथ पीने से बुदापे का दमन होता हैl

अशलेषा:-
मे बकरी के दूध मे अर्जुन के वृक्ष का बांदा घिसकर, जिसके मस्तक पर तिलक किया जाये, वह वशवर्ती हो जाएगा, सोमवार के दिन यदि यह नक्षत्र हो तो बहेड़े का बांदा भण्डार मे रखने से समृधि होती है l

मधा:-
इस नक्षत्र मे बारहसिंगा का बांदा सिद्ध करने से घर मे धन-धान्ये क़ी प्रचुरता रहती है l

पूर्वाफाल्गुनी :-
मे बहेड़े का बांदा लाकर चुर्ण बना लें . इस चुर्ण के सेवन से भुत-प्रेत क़ी बाधा शांत हो जाती है, अनार तथा सेमर का बांदा घर मे रखने से धन- सम्पति क़ी वृद्धि होती हैl

उतराफाल्गुनी :-
इस नक्षत्र मे आम का बांदा धारण करने से घर-परिवार मे तथा सर्वत्र प्रेम बढ़ता है l

वनस्पति के विशिस्ट प्रयोग :-

(1) होली के दिन प्रात: नियमानुसार पलाश का बांदा प्रयाप्तकरके पूजनोपरांत उसे अन भडार मे रखने से समृधि होती हैl

(2) चन्द्रगहण या सुर्येग्रहण के दिन सुर्यदये के पूर्व ही गूलर जा बांदा लें, आंये , (प्रतेक बांदा को एक दिन पूर्व निमंतरण देना आवश्यक है ) फिर ग्रहण के समय उसको पंचोपचार पूजाकरके , ग्रहण-काल मे कमलगट्टा क़ी माला से " लक्ष्मी-गायत्री " मन्त्र का जप करें l ग्रहण समाप्यत होने पर (मोखास्य के पश्यात) उस बांदा को सोने के ताबीज मे धारण करें l यदि साधना निर्दोष (गद्दा हुआ) धन दृष्टीगोचर होगा l लक्ष्मी-गायत्री " का मन्त्र इस प्रकार है l
"ॐ महालक्षये च विहाहे विष्णुपत्त्न्ते च धीमहि तत्रो लक्ष्मी प्रचोदयात !!"
सफलता के लिए यह समस्त विधान पहले से भली-भांति समझ लेना चाहिए , ताकि साधना मे कोई विध्रे न आ सके l

(3) साधक किसी ऐसे शनिवार को, जबकि उसका चंद्रमा बलबान हो, और चुतर्थी, नवमी या चतुर्दशी तिथि हो, प्रात: सुर्येदया से पूर्व पीपल के पेड़ का बांदा ले आयेंl (एक दिन पूर्व संध्या को पुर्बोह्त विधि से निमंत्र्ण देकर ही बांदा लगाना चाहिए ) और घर मैं किसी एकात पवित्र स्थान मे रख दें l
बाद मे फिर कभी वैसा ही योग (बलबान चंद्रमा, शनिवार, और उपरोक्त कोई तिथि ) हो, तब उस बांदा की पूजाकरके ताबीज मे धारण करे. l यह तांत्रिक-प्रयोग अथरोपाजन का धवार उद्घाटित करता हैं l

सहदेवी की सिद्धियाँ :-

किसी रवि-पुष्ये योग के दिन प्रात: (पूर्व संध्या को विधिवत निमंत्रण देने के पश्यात) स्नात्रोप्रांत सहदेवी-पोधे के पास जाए और "ॐ हीं फट स्वाहा!"जपते हुए उसे उखाड़ लें l पोधो का पंचाद्द आवश्यक है. l फिर घर लें आये और पंचामृत से स्नान कराकर उसकी विधिवत धुप दीप से पूजा करे और तदुपरांत 21 बार नीचे लिखा मन्त्र पड़कर उस पर जल छिडक दें l इस विधि से वह पोधा तात्रिक- शक्ति से संपन ही जाता है l
मन्त्र :-

"ॐ नमो रूपावती सर्व प्रोतेती श्री सर्वजनरंजनी सर्वलोक वाशीकरणी सर्वसुखरंजनी महामाइल घोल थी कुरु कुरु स्वाहा"

तंत्र-सिधि सहदेवी का पोधा विभिन कार्यो मे प्रयुक्त होता है l

धन-वृद्धि के लिए :-
पोधो की जड़ को तिजारी मे रखने से येष्ठ धन-वृद्धि होती है l

सम्मोहन हेतु :-
इस पोधो की जड़ का अंजन लगाने से दृष्टी मे मोहक-प्रभाव उतपन होता है l

प्रसव-वेदना निवारक :-
इसकी जड़ तेल मे घिसकर जन्नेद्रिये पर लेप कर दें l अथवा स्त्री की कमर मे बांध दें , तो वह प्रसव-पीढा से मुक्त हो जाती हैं l

संतान-लाभ :-
यदि कोई स्त्री मासिक-धर्म से पांच दिन पूर्व तथा पांच दिन पष्चात तक गाये के घी मे सहदेवी का पंचाग सेवन करे तो अवश्य गर्भ सिथर होता है l

आकर्षण हेतु :-
पंचाग का चुर्ण पान मे रखकर खिलाने से वह व्यक्ति आक्रिस्थ (मोहित) होता है l

प्रभाव-वृद्धि:-
पंचाग का चुर्ण तिलक की भाति मस्तक पर कही जाए l तो दर्शको पर प्रभाव पड़ता हैl सुब लोग इसको सामान की दृष्टी से देखते है l

पतों के चमत्कार :-
तंत्राचायरो ने वर्षायो के शोध और अथक परिश्रम के दुवारा यह सिध्तान प्रतिपादित किया है कि यदि समय-विशेस किया जाये तो उसका आश्यचयरेजनक परिणम दिखाई पड़ता है l असंभव् हो जाते है l विभिन तंत्र ग्रथो मे वर्णित ऐसे पत्र-प्रयोगों से सहज - संभव हो जाते है l विभिन तंत्र ग्रथो मे वणरन ऐसे पत्र -प्रयोगों मे से कुश गिने-चुने प्रयोग यहाँ प्रसुत हैl

चूँकि वनस्पति गणना का कोई सर्वमान्य नियम नहीं है l अत: हम नक्षत्र क्रम से विभिन पोधो के पतों के तांत्रिक- प्रयोग लिख रहे है l साधक के लिए यह आवश्यक होगा कि वह किसी भी प्रयोग को व्यवहारिक रूप देने से पूर्व किसी योग्य व्यक्ति से भली-भांति विषय को समझ ले और मुहर्त तथा साधना के नियमो का पूर्णतया पालन करें l तंत्र- मन्त्र मे मुहर्त और नियम-पालन ही सफलता कि मूल आधार है l

अश्विनी -
जिस दिन अश्विनी नक्षत्र हो, उससे एक दिन पूर्व बेल के पेड़ को निमंतरण देकर, उसका पता (बिलब=पत्र ) लाकर, एक रंग कि गाये क्र दूध मे स्त्री को पिलाने से वह गर्भवती हो जाती है l

भरणी:-
इस नक्षत्र मे पान का पता लाकर, उसे सुपारी कथे से पूरा बीड़ा बनाये l यह बीड़ा चोरी वाले स्थान पर रख देने से चोरी गयी वस्तु का पता चल जाता है l

कृतिका :-
इस नक्षत्र मे पियाज का पता गाये के दूध मे पीसकर पीने से समस्त रोग शांत हो जाते है l

आद्र :-
इस नक्षत्र के दिन मतुड़ा पोधो का सबसे उपरी चोटी वाला पता लायें l उसे खेत मे रखने से पैदावार बढ जाती है l

पुष्ये :-
यह परम प्रभाव शाली नक्षत्र है l इससे विधिवत प्रयाप्त कि गयी शंखपुष्पी कि जड़ को चांदी कि डिब्बी मे रखकर, तिजोरी मे रखने से धन की वृद्धि होती है l चमेली की जड़ को ताबीज मे धारण करने से शत्रु पर विजय प्रयाप्त होती है l

अशलेशा :-
नक्षत्र के बरगद का पता लाकर अन- भडार मे रखने से लाभ होता है l

पूर्वाफाल्गुनी :-
इस नक्षत्र मे बहेदे का पता लाकर घर मे रखने से कोई तंत्र-प्रयोग (अभिचार, कर्म, झूठ आदि ) हानि नहीं पहुचाता l

हस्त:-
नक्षत्र मे रविवार के दिन (पवार) की जड़ लाकर हाथ मे धारण करने वाला वयक्ति धुत-क्रीडा (जुआ-खेलने ) मे विजयी होता है l

मूल:-
नक्षत्र मे ताड़ की जड़ लाकर धारण करने से पित-रोग शांत हो जाता है l

श्रवण :-
नक्षत्र के दिन बेंत का टुकड़ा लायें और दांये हाथ मे धारण कर लें l यह प्रयोग युद्ध मे विजयी बनाता है l इसी नक्षत्र मे प्रयाप्त काले अरंड की जड़ धारण करने वाली स्त्री संतानवती होती है l


!!! ऋण से मुक्ति के उपाय !!!

ऋण से मुक्ति पाने के लिए :-

अनेक बार व्यक्ति को किसी से ऋण लेना पड़ता है l और जिस दिन कर्जा लिया जाता है l उसी दिन से सवार हो जाती है l उसे चुकाने की चिंता l उधोगपति और व्यापारी तो सामान्य रूप से ऋण लेते और चुकाते ही रहते है l परन्तु जब सामान्य गृहस्थ कर्ज के चक्कर मे एक बार फस जाता है l तब वर्षो तक उससे मुक्त होने के प्रयासों मे ही उलझा रहता है l प्राय: लड़की की शादी, मकान बनाने अथवा किसी भयकर दुर्घटना अथवा जटिल बीमारी के निदान के लिए ऋण लिया जाता है l ऋण लेते समय तो प्राय: शीघ्र ही उसे चुकाने का वायदा कर दिया जाता है l परन्तु प्राय: मूलधन का चुकाना तो दूर, समय पर ब्याज भी आसानी से नहीं निकल पाता l इस अवस्था से मुक्ति पाने के लिए तीन उपाए इस अध्याय मे दिए जा रहे है , आप ऋण की मात्रा और अपनी सामर्थ्ये के अनुसार उनमे से किन्ही एक अथवा दो का प्रयोग इस समस्या के समाधान के लिए करे l यदि आपकी नीयत साफ़ है तो भगवान की कृपा से आप शीघ्र ही ऋणमुक्त हो जायेंगे l इसके साथ ही दिए गए ऋण और लगभग डूब चुके धन को प्रयाप्त करने के दो उपाए भी इस अध्याय मे संगृहीत किये गए है l

कुछ प्रभाव टोटके और कार्य :-

1. घर, दुकान, अथवा कार्यालय मे गाये के आगे खड़े होकर वंशी बजाते हुए भगवान का चित्र रखने पर कर्जा नहीं चडता और धन डूबने की सम्भावना भी कम ही रहती है l

2. भगवान शिव पर नित्य प्रात: जल चड़ने, प्रय्तेक सोमवार को दीपक जलाने और प्रदोष का व्रत करने से ऋण से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है l

3. यदि गृह ख़राब होने के कारण आर्थिक तंगी है और कर्ज नहीं चुका पा रहा तो उस गृह की शांति के लिए प्रयास अवश्य करें l

!!! दुर्भाग्य दूर करने के उपाय !!!




यह एक बहुत ही शक्तिशाली टोटका हैं | नीचे चित्र में प्रदर्शित यंत्र को पर्याप्त बड़े ग्यारह सफ़ेद कागजों पर अनार की कलम से केसर और कस्तूरी मिश्रित स्याही से लिखें | धुप - दीप जलाकर अपने उपास्य देव को याद करें और उनसे दुर्भाग्य हटाकर अच्छे दिन देने की प्रार्थना करें | सच्चे दिल से भगवान् से प्रार्थना करने के बाद पर्याप्त मात्रा में आटा लेकर गुंध लें | उस आटे के ग्यारह लोइयां बनाकर प्रत्येक में तह करके एक - एक यंत्र रखें और इस प्रकार गोले बनाएं कि कागज पूरी तरह आटे में छिप जाये | आटे के इन गोलों को किसी नदी में दाल दें | यह कार्य लगातार ग्यारह दिन किया जाता हैं और वह भी सूर्य के छिपने से पहले | शाम को प्रतिदिन एक निश्चित समय पर और सभी से छुपाकर इस टोटके को करने पर इसका प्रभाव और भी बढ जाता हैं |


18 48 6
12 24 6
42 या बासित 30



दुर्भाग्य हटाने का तावीज़ इस यंत्र को सिद्धयोग , दीपावली या होली के दिन अनार की कलम से, अष्टगंद स्याही से भोजपत्र पर लिखकर धूप - दीप से पूजन करे | फिर स्वरण के तावीज़ में डालकर, दाहिनी भुजा में काले धागे से बाँध लें | यह सर्व प्रकार की बाधाओं को हटाकर अत्यत शुभ देने वाला हैं |

दुर्भाग्य हटाने वाला तावीज़


59 15 59 08 59 13
59 10 59 12 59 14
59 11 59 16 59 09


दुर्भाग्य विनाशक तावीज़



165 618 165 621 165 625 165 611
165 624 165 612 165 617 165 622
165 613 165 627 165 619 165 616
165 620 165 615 165 614 165 626

यह एक अत्यत शक्तिशाली तावीज़ हैं, जिसे सुलेमानी तावीज़ भी कहा जाता हैं | शुद्ध केसर से कस्तूरी घोलकर अनार की कलम से सफ़ेद कागज़ पर इसे लिखा जाता हैं | इस प्रकार के दो यंत्र तैयार करें | लोबान की धूनी देकरएक को धोकर पी ले और दुसरे को कपडे में सीकर दायीं भुजा में बान्ध लें | इश्वर की कृपा से बुरे शीघ्र दिन ही अच्छे दिनों में बदल जायेंगे |

यदि किसी व्यक्ति को किसी भी वजह से कोई परेशानी और मुश्किल पेश आ रही हो जैसे - कारोबारी मंदी, बेकारी, निर्धनता, मुकदमा, घरेलु झंझट आदि , तो उपरोक्त यंत्र को वह गुलाब व् जाफरान से शुरू महीने में, मुश्तरी या जोहरा की घडी में लिखे और अपने दाहिने बाजू पर बांध ले (स्त्री अपने बाएं बाजू पर बाधे ) | हर मुश्खिल और परेशानी दूर हो जाएगी | घरेलु मुश्खिले समाप्त हो जाएगी, निर्धनता की जगह सम्पन्नता का मार्ग प्रशस्त होगा तथा मुकदमों एवं विवादों से छुटकारा मिल जायेगा | ध्यान रहे कि यंत्र को नहा - धोकर एवं साफ़ - सुथरे कपडे पहनने के बाद ही लिखें |

तंगी और परेशानी से बचाने वाला ताबीज

786

53 48 55
54 52 50
49 56 51

मुंह- हाथ धोकर, मुश्क और जाफरान से उपरोक्त यंत्र की लिखे तथा तह करके, गंडा बनाकर आपने दाहिये बाजू पर बांध लें l हर तंगी व परेशानी से निजात मिल जाएगी l यह एक चमत्कारी यंत्र है l इसके धारण करने से मात्र कुछ ही दिनों मैं शुभ फल प्रयाप्त होने लगता है l  

11 June 2013

!!! माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने का एक अचूक उपाय !!!


माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने का एक अचूक उपाय

माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने का एक अचूक उपाय


प्रातः काल, स्नानादि व तुलसी सेवन करके

 'हरिजागरणं प्रातः स्नानं तुलसीसेवनम्। उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके॥'

इस मंत्र के साथ दीपदान करें| आपको बता दें कि इसी मंत्र के द्वारा सत्यभामा ने अक्षय सुख, सौभाग्य और संपदा के साथ सर्वेश्वर को सुलभ किया था।

वास्तु ग्रंथों में लक्ष्मी, यश-कीर्ति की प्राप्ति उपाय के रूप में कई उपाय मिलते हैं। लक्ष्मी, गायत्री मंत्र का निरंतर जाप भी इष्टप्रद है।


'महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।'

आपको हमेशा कमलासन पर विराजित लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। देवीभागवत में कहा गया है कि कमलासना लक्ष्मी की आराधना से इंद्र ने देवताओं के राजा होने का गौरव प्राप्त किया था। इंद्र ने लक्ष्मी की आराधना 'कमलवासिन्यै नमः' मंत्र से की थी। यह मंत्र आज भी अचूक है।


!!! सुन्दर काण्ड का अद्भुत अनुष्ठान !!!




सुन्दर काण्ड का अद्भुत अनुष्ठान

इस अनुष्ठान से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ निश्चय ही पूर्ण होती है । अनेक व्यक्तियों द्वारा यह अनुभूत है ।

सर्वप्रथम अपने पूजा स्थान में श्रीहनुमान जी का एक सुन्दर चित्र विधि-वत् प्रतिष्ठित कर लें । उस चित्र के सम्मुख दीपक एवं धूपबत्ती जलाकर रखें । चित्र का यथा-शक्ति भक्ति-भाव के साथ पूजन करें ।



पूजन कर चुकने पर ‘श्रीराम-चरित-मानस‘ के ‘किष्किन्धा-काण्ड‘ की निम्न-लिखित पंक्तियों का पाठ हाथ जोड़ कर 11 बार करें -


“कहइ रीछ-पति-’सुनु हनुमाना ! का चुप साधि रहेहु बलवाना ?
पवन-तनय बल पवन समाना , बुधि विवेक विग्यान निधाना ।।

कौन-सी काजु कठिन जग माँहीं, जो नहीं होत तात तुम पाहीं ।”

11 पाठ कर चुकने पर ‘सुन्दर-काण्ड‘ का आद्योपान्त पाठ करें । तदनन्तर पुनः उक्त पंक्तियों का पाठ 11 बार करें । इस प्रकार यह ‘एक पाठ‘ हुआ । उक्त पाठ को 45 बार करना है । इस अनुष्ठान को किसी भी मंगलवार के दिन श्रीहनुमान जी के दर्शन करने के बाद प्रारम्भ करना चाहिए । प्रतिदिन तीन पाठ करें, तो 15 दिनों में अनुष्ठान पूरा हो जाएगा । यदि तीन पाठ न कर सकें, तो प्रतिदिन एक ही पाठ कर 45 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण कर सकते हैं ।



अनुष्ठान काल में अपनी दिन-चर्या इस प्रकार बितानी चाहिए, जिससे श्रीहनुमान जी प्रसन्न हों अर्थात् ब्रह्मचर्य, सत्य-वादिता, भगवान् श्रीराम का गुणानुवाद, सत्संग आदि में तत्पर रहे ।




12 April 2013

!!! स्थितप्रज्ञ के लक्षण !!!


 स्थितप्रज्ञ यानी वो जिसे ज्ञान की परम अनुभूति हो चुकी है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है,  जो पुरुष मन में आने वाली सभी कामनाओं का त्याग कर अपने आत्म भाव में ही सन्तृष्ट रहता है, वो पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है। जो सुख-दु:ख सभी परिस्थितयों में समान रहता है। जिसे न तो सुख लुभा सकता है,  और न ही दु:ख डिगा सकती है। वो पुरुष जिसे सुख की अनुभूति के लिए बाहरी असत्य वस्तुओं पर आश्रित रहने की जरुरत नहीं है। स्थितप्रज्ञ पुरुष अपने अन्दर ही पूर्ण सुख की खोज कर लेता है। उसके लिए न तो कोई शुभ वस्तु प्रसन्नता लाती है और न ही दु:खी करने वाली वस्तु दु:ख का बोध कराती है।

अब ऐसा नहीं समझना चाहिए की स्थितप्रज्ञ पुरुष वो है जिसके जीवन में कोई रस नहीं है । वस्तुत:  जीवन में परम आनन्द की अनुभूति सिर्फ स्थितप्रज्ञ पुरुष को ही होती है, क्योंकि वह क्षणिक आनन्द देने वाली बाहरी वस्तुओं पर आश्रित नहीं है। अब आप अपने जीवन में ही एक प्रयोग करके देखें। कभी सोचा है जिस खिलौने को हम अपने बाल्यावस्था में किसी को स्पर्श भी नहीं करने देना चाहते थे,  आज वो हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं रखता है । आज हमारी अवस्था अलग है, हम आज अपने परिवार के साथ मन बहला रहे हैं , हमारे बच्चे / पोते आज हमारे लिए मन बहलाने वाले खिलौनें हैं। आज हमें कोई बाल्यावस्था के खिलौनें भेंट में दे तो हम उसे पागल समझेंगे। अत: हमारे आनन्द का साधन बदलता रहता है। ये तो बाल्यावस्था से युवावस्था तक आने की बातें है। आप युवावस्था में ही आनन्द के लिए वस्तुएँ बदलते रहते हैं। पिछले महीने आपने जो वस्तु अपने आनन्द के लिए खरीदी थी,  आज आपको वही वस्तु अब उतना आनन्द नहीं देती।  अत: समय के साथ आपके लिए आनन्द की परिभाषा बदलती रहती है। आप अपने आनन्द के लिए बाहरी परिस्थिति और वस्तुओं को बदलते बदलते थक जाते है। पर कभी सोचा है ऐसी अवस्था हो जहाँ आनन्द बाहरी परिस्थिति और वस्तुओं पर आश्रित न हो। यानी परम और पूर्ण आनन्द की अवस्था जो हमेशा बना रहे। स्थितप्रज्ञ पुरुष को यह अवस्था प्राप्त है।

ठीक इसी तरह जब आप अपने जीवन में दु:ख के कारणों की खोज करेंगे तो पायेंगे कि आपने अपने मन को जीवन की बाहरी बदलती हुई परिस्थिति में इतना आसक्त कर रखा है की थोड़ी बदली हुई परिवेश जो आपको पसन्द न हो दु:ख पहुँचा जाती है। हम किसी भी चोट पहुँचाने वाले स्थिति से आहत होते है और दु:ख हमें घेर लेता है। कई बार तो हमारा मन इतना कमजोर हो चुका होता है कि किसी के द्वारा बनाई हुई परिस्थिति हमें इतना आहत करती है कि हम उदासीनता की न्यूनतम स्थिति में पहुँच जाते हैं। इस स्थिति को आधुनिक विज्ञान की भाषा में "डिप्रेशन" भी कहते है। कभी सोचा है कि हम इस दु:ख वाली स्थिति से पूर्णता बाहर रह सकते है। स्थितप्रज्ञ पुरुष को यह अवस्था प्राप्त है। अत: स्थितप्रज्ञ पुरुष वो है जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली हो।                    

स्थितप्रज्ञ पुरुष कामना रहित है है। उसे अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण स्वामीत्व प्राप्त है। आधुनिक स्वेच्छाचारी जीवन प्रवृति का तर्क प्रस्तुत करने वालों का मानना है कि अपनी कामनाओं को रोको मत और इच्छाओं की ज्यादा से ज्यादा पूर्ति करो, ताकि आनन्द की अनुभूति बढ़ती जाये। आज की आधुनिक पीढ़ी ऐसा कर रही है। किन्तु हमें अपनी इच्छाओं का अन्त कहीं नजर नहीं आता है। एक कामना की पूर्ति करो तो दूसरी आ खड़ी होती है। फिर हम दूसरी कामना की पूर्ति में लग जाते है। पहली कामना पूर्ति का सुख क्षणिक होता है और दूसरी कामना जो सामने खड़ी है उसकी पूर्ति करने को मन परेशान होता रहता है। अत: वस्तुत: आनन्द की अनुभूति कामनाओं की पूर्ति में नहीं है। आनन्द को बढ़ाना है तो मन में स्थित इच्छाओं की संख्या को कम करना होगा। परम पूज्य गुरुदेव स्वामी चिन्मयानन्द जी ने इसे गणित की सुन्दर भाषा में इस तरह समझाने की कोशिश की है

सुख की मात्रा =   पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्या
                                 --------------------------------                               
                                  मन में स्थित इच्छाओं की संख्या



         आज का हमारा आधुनिक अर्थशास्त्र भी इस सिद्धान्त कि पुष्टि करता है । ला आफ डिमिनिशिंग मार्जनिल युटिलिटी अर्थशास्त्र का एक सिद्धान्त है जो यह सिद्ध करता है कि हम एक वस्तु का जितना भोग करते जायेंगे, हमारी आनन्द की अनुभूति उससे कम होती जायेगी।

स्थितप्रज्ञ पुरुष क्रोध मुक्त होता है । हम अपने जीवन में क्रोध के कारणों का पता लगायें तो पायेंगे कि क्रोध का कारण हमारा मन है जो बाहरी परिस्थितयों में आनन्द की खोज करता है। जब भी हमारे सामने प्रतिकूल परिस्थिति आती है तो हमें क्रोध आ जाता है और जब अनुकूल परिस्थिति आती है तो हमें आनन्द आता है। उदाहरण के लियें हमने कहीं सफर करने के लिए रेलवे से वातानुकूलित डिब्बे में टिकट आरक्षित करवाई। जब प्रस्थान वाले दिन हम रेलवे स्टेशन पहुँचते है तो हमें पता लगता है की वातानुकूलित आरक्षित डिब्बे रद्द कर दी गई है और हमें अनारक्षित सामान्य डिब्बे में सफर करना पड़ेगा। अब इस समय स्थिति हमारे अनुकूल नहीं है, हमें क्रोध आता है। हम क्रोध करते है रेलवे कर्मचारियों पर। इस क्रोध में संपूर्ण मार्ग पर परेशान होते हुए सफर करते है। प्रयोग के लिए ऐसी स्थिति में क्रोध न करके देखें। आपके सफर का आनन्द दुगुना हो जायेगा। स्थितप्रज्ञ पुरुष अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में स्थिर रहता है। अत: स्थितप्रज्ञ पुरुष क्रोध मुक्त होता है ।

              
               
[29 सितम्बर को ब्रह्मलीन परम पूज्य स्वामी शंकरानन्द जी की पूण्यतिथि है
एक बार उन्होनें मुझे कहा था " कुछ पढ़ो कुछ लिखो " कलम उठाकर लिखने लगा तो
उनका चेहरा सामने आया, तो स्थितप्रज्ञ पुरुष के सारे लक्षण सामने आ गये ]


!!! पुरुषार्थ से सुधारें अपना प्रारब्ध !!!


पुरुषार्थ से हम अपना भाग्य बदल सकते हैं। इस संबंध में एक पुरानी कहावत भी है कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है। लेकिन लोग अक्सर कर्म के सिद्धांत को समझने में गलती कर देते हैं और अपनी नियति को भाग्य से जोड़ देते हैं। बहुत से लोगों को ऐसा कहते सुना जाता है कि अगर भाग्य पहले से निर्धारित है, तो कर्म करने की क्या जरूरत है? हर चीज भाग्य पर छोड़ दो। लेकिन ऐसा नहीं है। 

कर्म के सिद्धांत को समझने के लिए कर्म के प्रकारों को समझना जरूरी है। कर्म के तीन प्रकार हैं: संचित, प्रारब्ध और क्रियामना अर्थात् आगामी। बीत चुके समय या पिछले जन्मों के कर्म संचित कर्म हैं। इनकी झलक व्यक्ति के चरित्र, उसके रुझान, क्षमता, प्रवृति और इच्छा में देखने को मिलती है। प्रारब्ध कर्म भी संचित कर्म का ही हिस्सा है और यह व्यक्ति के वर्तमान जीवन को प्रभावित करते हैं। यह कर्म की वह स्थिति है, जब हमें पहले के कर्मों का फल प्राप्त होने लगता है। क्रियामना से आशय उन कर्मों से है, जो भविष्य के लिए किए जाते हैं। इनका फल भविष्य में मिलता है या फिर अगले जन्मों में।
कर्म के प्रकारों को वेदों में एक धनुर्धर (धनुषधारी) का उदाहरण देकर समझाया गया है। उसकी पीठ पर मौजूद तरकश के तीर संचित कर्म के समान हैं। जो तीर उसने छोड़ दिए हैं, उनकी तुलना प्रारब्ध कर्म से की गई है और जो तीर वह छोड़ेगा, वे आगामी या क्रियामना कर्म हैं। संचित और आगामी कर्मों पर तो उसका पूरा नियंत्रण है, लेकिन उसके लिए जरूरी है कि वह प्रारब्ध को नियंत्रित करे। 
कर्म की तुलना भंडार में जमा करके रखे गए चावलों से भी की गई है। संचित कर्म भंडार में रखे चावलों की तरह हैं और वर्तमान को प्रभावित करने वाला प्रारब्ध-कर्म पकाने के लिए तैयार गए चावलों की तरह। खेत में बोया जाने वाला चावल वर्तमान कर्मों के परिणाम, यानी क्रियामना की तरह है। चावल की जो फसल बोई जा रही है, वह कल की ऐसी पूंजी है, जिससे धान का भंडार बढ़ेगा।