16 October 2012

माता शैलपुत्री: पूजन विधि, ध्यान मंत्र, महत्व व शुभ मुहूर्त




दुर्गा पूजा के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा -वंदना इस मंत्र द्वारा की जाती है . माँ दुर्गा की पहली स्वरूप और शैलराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री के पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा आरम्भ हो जाता है . नवरात्र पूजन के प्रथम दिन कलश स्थापना के साथ इनकी ही पूजा और आराधना की जाती है . माता शैलपुत्री का वहां वृषभ है , उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है . नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार ’ चक्र में स्थित करते हैं और यही से उनकी योग साधना प्रारंभ होता है . पौराणिक कथानुसार माँ शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष के घर कन्या रूप में उत्पन्न हुयी थी . उस समय माता का नाम सटी था और इनका विवाह भगवन शंकर से हुआ था . एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ आरम्भ किया और सभी देवताओं को आमंत्रित किया परन्तु भगवन शिव को आमंत्रण नहीं दिया . अपने माँ aur बहनों से मिलने को आतुर माँ सटी बिना निमंत्रण के ही जब पिता के घर पहुंची तो उन्हें वह अपने और भोलेनाथ के प्रति तिरस्कार से भरा भाव मिला . माँ सटी इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और वही योगाग्नि द्वारा खुद को जलाकर भस्म कर दिया और अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया . शैलराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारन माँ दुर्गा के इस प्रथम स्वरुप को शैलपुत्री कहा जाता है .

नवरात्रि के पहले दिन (16 अक्टूबर, मंगलवार) मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी का यह नाम हिमालय के यहां जन्म होने से पड़ा। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं व योग साधना करते हैं। इनकी पूजन विधि इस प्रकार है-

सबसे पहले चौकी (बाजोट) पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका(सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें। इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।


महत्व

हमारे जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता व आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: नवरात्रि के पहले दिन हमें अपने स्थायित्व व शक्तिमान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री का आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है।


पूजन के शुभ मुहूर्त


सुबह 10:45 से दोपहर 12:12 तक (लाभ का चौघडिय़ा)

दोपहर 11.49 से 12:35 (अभिजीत मुहूर्त)

दोपहर 12:12 से 01:38 तक (अमृत का चौघडिय़ा)

शाम 07:38 से रात 09:36 तक (स्थिर लग्न वृषभ)




शैलपुत्री की ध्यान :

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।

वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥



अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥





शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥


शैलपुत्री की कवच :

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥


थाइराइड ग्रंथि की समस्या - समाधान



थाइराइड ग्रंथि की समस्या आज आमतौर पर ज्यादातर लोगों में देखी जा सकती है। थाइराइड की समस्या आदमी की तुलना में महिलाओं में ज्यादा होती है। थाइराइड एक साइलेंट किलर है जो सामान्य स्वास्‍थ्‍य समस्यायओं के रूप में शरीर में शुरू होती है और बाद में घातक हो जाती है। थाइराइड से बचने के लिए विटामिन, प्रोटीनयुक्त और फाइबरयुक्त आहार का ज्यादा मात्रा में सेवन करना चाहिए। थाइराइड में ज्यादा आयोडीन वाले खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। मछली और समुद्री मछली थाइराइड के मरीज के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है। थाइराइड के मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर ही अपना डाइट प्लान बनाना चाहिए। हम आपको कुछ आहार के बारे में जानकारी दे रहे हैं जो कि थाइराइड के मरीज के लिए फायदेमंद हो सकता है।


स्व्स्थ खान-पान 

अपना कर थाइराइड के खतरे को कम किया जा सकता है। इसलिए अपने डाइट प्लान में थाइराइड के लिए उपयोगी आहार को शामिल कीजिए।


थाइराइड में फायदेमंद आहार - 

मछली – 


थाइराइड के मरीज को आयोडीनयुक्त भोजन करना चाहिए। मछली में ज्यादा मात्रा में आयोडीन होता है। आम मछलियों की तुलना में समुद्री मछलियों में आयोडीन होता है। इसलिए समुद्री मछली जैसे, सेलफिश और झींगा खाना चाहिए जिसमें ज्यादा मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। अल्बकोर ट्यूना, सामन, मैकेरल, सार्डिन, हलिबेट, हेरिंग और फ़्लाउंडर, ओमेगा -3 फैटी एसिड की शीर्ष आहार स्रोत हैं।

साबुत अनाज - 

आटा या पिसे हुए अनाज की तुलना में अनाज में ज्यादा मात्रा में विटामिन, मिनरल, प्रोटीन और फाइबर होता है। अनाज में विटामिन-बी और अन्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिसे खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है। पुराना भूरा चावल, जंगली चावल, जई, जौ, ब्रेड, पास्ता और पापकॉर्न खाना चाहिए।


दूध और दही - 

थाइराइड के मरीज को दूध और उससे बने खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। दूध और दही में पर्याप्त मात्रा में विटामिन, मिनरल्स, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। दही में पाऐ जाने वाले स्वस्थ बैक्टीरिया (प्रोबायोटिक्स) शरीर के इम्‍यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। प्रोबायोटिक्स थाइराइड रोगियों में गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल को स्‍वस्‍थ बनाए रखने में मदद करता है।

फल और सब्जियां -

फल और सब्जिया एंटीऑक्सीडेंट्स का प्राथमिक स्रोत होती हैं जो कि शरीर को रोगों से लडने में सहायता प्रदान करते हैं। सब्जियों में पाया जाने वाला फाइबर पाचन क्रिया को मजबूत करता है जिससे खाना अच्छे से पचता है। हरी और पत्तेदार सब्जियां थाइराइड ग्रंथि की क्रियाओं के लिए अच्छी होती हैं। हाइपरथाइराइजिड्म हड्डियों को पतला और कमजोर बनाता है इसलिए हरी और पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना चाहिए जिसमें विटामिन-डी और कैल्शियम होता है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है। लाल और हरी मिर्च, टमाटर और ब्लूबेरी खाने में शरीर के अंदर ज्यादा मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट जाता है। इसलिए थाइराइड के रोगी को फल और हरी सब्जियों का सेवन करना चाहिए।


आयोडीन - 

थाइराइड के मरीज को आयोडीनयुक्त भोजन करना चाहिए। आयो‍डीन थाइराइड ग्रंथि के दुष्प्रभाव को कम करता है। थाइराइड के मरीज को ज्या‍दा आयोडीनयुक्त नमक नहीं खाना चाहिए क्योंकि उसमें सूगर की मात्रा भी मौजूद होती है जिससे थाइराइड बढता है।
थाइराइड को साइलेंट किलर भी कहा जाता है। थाइराइड के मरीज को सामान्य स्वास्‍थ्‍य समस्याएं होती हैं जिसे भागदौड की जिंदगी में आदमी असानी से उपेक्षा कर देता है जो कि घातक हो सकता है। लेकिन स्वस्थ खान-पान अपनाकर थाइराइड के खतरे को कम किया जा सकता है।


आयोडीन क्या है?


आयोडीन आपके बढ़ते शिशु के दिमाग के विकास और थायराइड प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है। यह एक माइक्रोपोशक तत्व है जिसकी हमारे शरीर को विकास एवं जीने के लिए बहुत थोड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है। थायराइड ग्रंथि गर्दन के सामने है और यह उन हार्मोन का उत्पादन करता है जो शरीर की चयापचय का नियंत्रण करते हैं

आयोडीन हमारे शरीर के तापमान को भी विनियमित करता है, विकास में सहायक है और भ्रूण के पोशक तत्वों का एक अनिवार्य घटक है।


आपके शरीर को कितने आयोडीन की जरूरत है?

एक व्यक्ति को जीवनभर में एक छोटे चम्मच से भी कम आयोडीन की आवश्यकता पड़ती है। चूंकि आयोडीन शरीर में जमा नहीं रह सकता इसे दैनिक आधार पर लेना पड़ता है। रिसर्च से पता चला है कि महिलाओं को गर्भावस्था एवं स्तनपान के दौरान अपने आहार में पर्याप्त आयोडीन नहीं मिलता।

डब्ल्यूएचओ(WHO)की हिदायतों के अनुसार ली जाने वाली आयोडीन की मात्रा निम्न है:

गर्भवती महिलाओं के लिए 200-220 माइक्रोग्राम प्रतिदिन
स्तनपान कराती महिलाओं के लिए 250-290 माइक्रोग्राम
1 वर्ष से छोटे शिशुओं के लिए 50-90 माइक्रोग्राम प्रतिदिन
1-11 वर्ष के बच्चों के लिए 90-120 माइक्रोग्राम प्रतिदिन, और
वयस्कों तथा किशोरों के लिए 150 माइक्रोग्राम प्रतिदिन


आयोडीन की कमी से क्या कुप्रभाव हो सकते हैं?


आयोडीन की कमी से आप मानसिक तथा शारीरिक तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। इसके आम लक्षण हैं त्वचा का सूखापन, नाखूनों और बालों का टूटना, कब्ज़ और भारी और कर्कश आवाज़ । इनमें से कुछ लक्षण गर्भावस्था में आम पाए जाते हैं इसलिए इस बारे में डाक्टर से सलाह लेना सुरक्षित है।

आयोडीन की कमी से वज़न बढ़ना, रक्त में कोलेस्ट्रोल का स्तर बढ़ना और ठंड बर्दाश्त न होना आदि लक्षण होते हैं। वस्तुत: आयोडीन की कमी से मस्तिश्क का धीमा होना और दिमाग को क्षति आदि हो सकते हैं जिन्हें समय से रोका जा सकता है।

आयोडीन की लगातार कमी से चेहरा फूला हुआ, गले में सूजन (गले के अगले हिस्से में थाइराइड ग्रंथि में सूजन) थाइराइड की कमी (जब थाइराइड हार्मोन का बनना सामान्य से कम हो जाए) और मस्तिश्क की कार्यप्रणाली में बाधा आती है।

गर्भवती महिलाओं में आयोडीन की कमी से गर्भपात, नवज़ात शिशुओं का वज़न कम होना,शिशु का मृत पैदा होना और जन्म लेने के बाद शिशु की मृत्यु होना आदि लक्षण होते हैं। एक शिशु में आयोडीन की कमी से उसमें बौद्धिक और विकास समस्यायें जैसे कि मस्तिश्क का धीमा चलना, शरीर का विकास कम होना, बौनापन, देर से यौवन आना, सुनने और बोलने की समस्यायें तथा समझ में कमी आदि होती हैं।


आयोडीन के अच्छे प्राकृतिक स्रोत क्या हैं?

आयोडीन मुख्यत: मिट्टी और पानी में पाया जाता है। बहरहाल, पेड़ काटने, बाढ़ आने, विक्षालन तथा भारी वर्षा के कारण मिट्टी में मौजूद आयोडीन घुल कर बह जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में आयोडीन की मात्रा सबसे कम होती है जबकि तटीय क्षेत्रों में इसकी मात्रा बेहतर होती है।

आयोडीन के सर्वोत्तम प्राकृतिक स्रोत हैं अनाज, दालें एवं ताजे खाद्य पदार्थ। दूध, मछली और खाने योग्य समुद्री जीव, मॉस तथा अंडों में भी कुछ मात्रा में आयोडीन होता है।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि लोगों के विष्वास के विपरीत समुद्री नमक में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा नहीं होती। अत: विकल्प के तौर पर समुद्री नमक का इस्तेमाल न करें क्योंकि इसके प्रत्येक ग्राम में केवल 2 माइक्रोग्राम आयोडीन होता है।


क्या आयोडीन युक्त नमक इसका सर्वोत्तम उपाय है?


आयोडीन युक्त नमक अपने आहार में आयोडीन शामिल करने का सबसे बेहतर तरीका है। एक औसत भारतीय प्रतिदिन लगभग 10-15 ग्रा. नमक का सेवन करता है। अपने दैनिक भोजन में आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल करने से आपकी आयोडीन की दैनिक मात्रा पूरी हो जाती है।

नमक में आयोडीन नष्ट नहीं होता यदि इसे उचित ढंग से रखा जाए। बहरहाल, लम्बे समय तक सूर्य की रोशनी तथा नमी पड़ने से नमक में मौजूद आयोडीन नष्ट हो सकता है। आपको आयोडीन युक्त नमक शीशे या प्लास्टिक के बंद कंटेनरों में रखना चाहिए और उस पर लिखी निर्माण की तारीख हमेशा देखें। आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल पैकिंग की तारीख से 12 महीने के अंदर कर लेना चाहिए।

बहरहाल, यदि आपको उच्च रक्तचाप तथा कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है जिसके कारण आप अपने आहार में नमक का इस्तेमाल कर पाने में असमर्थ हैं तो इसके विकल्प के लिए अपनी डाक्टर से सलाह करें।


आयोडीन की कमी का पता कैसा चलता है?


चूंकि सेवित आयोडीन की 90 प्रतिशत मात्रा मूत्र के जरिए निकल जाती है, अत: आयोडीन की कमी का पता लगाने का सर्वोत्तम तरीका 24 घंटे मूत्र कलेक्षन टेस्ट या अचानक किया जाने वाला आयोडीन-से -क्रियेटिनाइन मूत्र परीक्षण है। आपके शरीर में टी एस एच(TSH) स्तर की जांच के लिए एक थाइराइड प्रक्रिया परीक्षण भी किया जाता है।


आयोडीन की कमी का उपचार कैसा किया जाता है?


यदि आयोडीन की कमी का पता चल जाए, आपकी डाक्टर इसके संबंध में की जाने वाली कार्रवाई की हिदायत देंगी और इस संबंध में आपके स्वास्थ्य पर नज़र रखी जाएगी। गर्भवती तथा स्तनपान कराती महिलाओं को इसके सप्लीमेंट लेने चाहिएं ताकि मां तथा शिशु दोनों को आयोडीन की पर्याप्त मात्रा मिले। अपनी डाक्टर के निर्देश का अनुपालन करना आवश्यक है क्योंकि इसकी दवा की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के अनुसार भिन्न हो सकती है।
बहरहाल, आयोडीन के सप्लीमेंट लेने की सलाह सभी को नहीं दी जाती, विशेषकर उन लोगों को जिन्हें थाइराइड की समस्या हो। अत: आयोडीन के सप्लीमेंट लेने से पहले अपनी डाक्टर से सलाह जरूर करें।

थाइराइड उपचार के तरीके -


रेडियोएक्टिव आयोडीन ट्रीटमेंट -



थाइराइड के मरीज को रेडियोएक्टिव आयोडीन दवाई गोली या लिक्विड के द्वारा दिया जाता है। इस उपचार के द्वारा थाइराइड की ज्यादा सक्रिय ग्रंथि को काटकर अलग किया जाता है। इसमें जो आयोडीन दिया जाता है वह आयोडीन स्कैन से अलग होता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन को लगातार आयोडनी स्कैन चेकअप के बाद दिया जाता है और आयोडीन हाइपरथाइराइजिड्म के पहचान की पुष्टि करता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन थाइराइड की कोशिकाओं को समाप्त करते हैं। इस थेरेपी से शरीर को कोई भी साइड-इफेक्ट नहीं होता है। रेडियोएक्टिव आयोडीन 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में भी सुरक्षित तरीके से प्रयोग किया जा सकता है। प्रेग्नेंसी में रेडियोएक्टिव आयोडीन ट्रीटमेंट का इलाज नहीं किया जाता है इससे मां और बच्चे को नुकसान हो सकता है। दिल के मरीजों के लिए यह उपचार बहुत ही सुरक्षित होता है। इस थेरेपी से 8-12 महीने में थाइराइड की समस्या समाप्त हो जाती है। सामान्यतया 80 प्रतिशत तक थाइराइड के मरीजों को रेडियोएक्टिव आयोडीन के एक ही खुराक से उपचार हो जाता है। लेकिन थाइराइड की समस्या गंभीर होने पर इसके इलाज में कम से कम 6 महीने तक लग सकते हैं।



सर्जरी -

सर्जरी के द्वारा आंशिक रूप से थाइराइड ग्रंथि को निकाल दिया जाता है, जो कि बहुत सामान्य तरीका है। थाइराइड के मरीजों में सर्जरी के द्वारा उसके शरीर से थाइराइड के ऊतकों को निकाला जाता है जो कि ज्यादा मात्रा में थाइराइड के हार्मोन पैदा करते हैं। लेकिन सर्जरी से आसपास के ऊतकों पर भी प्रभाव पडता है। इसके अलावा मुंह की नसें और चार अन्य। ग्रंथियां (जिनको पैराथाइराइड ग्रंथि कहते हैं) भी प्रभावित होती हैं जो कि शरीर में कैल्शियम स्तर को नियमित करती हैं। थाइराइड की सर्जरी उन मरीजों को करानी चाहिए जिनको खाना निगलने में दिक्कत हो रही हो और सांस लेने में दिक्कत हो। प्रग्नेंट महिला और बच्चे जो कि थाइराइड की दवाइयों को बर्दास्त नहीं कर सकते हैं उनके लिए सर्जरी उपयोगी है।



एंटीथाइराइड गोलियां -

थाइराइड में सामान्य समस्याएं जैसे बुखार, गले में ख्रास जैसी समस्याएं होती हैं। यह छोटी समस्याएं थाइराड की वजह से हो सकती हैं इसलिए दवाईयां लेने से पहले जांच करानी चाहिए। थाइराइड के मरीज को चिकित्सक से सलाह लेकर एंटीथाइराइड की गोलियां खानी चाहिए। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीथाइराइड की गोलियां आपके लिए हानिकारक हो सकती हैं।


शारदीय नवरात्र की आज से शुरूआत हो गई है



शारदीय नवरात्र: 
प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना

शारदीय नवरात्र की आज से शुरूआत हो गई है. नवरात्र का आज पहला दिन है.नवरात्र के नौ दिनों में आदिशक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है.

मां के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है. नवरात्र के नौ दिनों मे मां दुर्गा के जिन नौ रूपों का पूजन किया जाता है 

वह हैं : -

  • पहला शैलपुत्री,
  • दूसरा ब्रह्माचारिणी,
  • तीसरा चन्द्रघन्टा,
  • चौथा कूष्माण्डा,
  • पांचवा स्कन्द माता,
  • छठा कात्यायिनी,
  • सातवां कालरात्रि,
  • आठवां महागौरी,
  • नौवां सिद्धिदात्री।

देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप : शैलपुत्री 

नवदु्र्गाओं में सर्वप्रथम गिरिराज हिमवान की पुत्री शैलपुत्री का नाम आता है. श्वेत एवं दिव्यस्वरूपा वृषभ पर आरूढ़ हिमवान की पुत्री आदि महाशक्तिरूपा सती पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं. जब दक्ष ने एक यज्ञ के आयोजन में सभी देवताओं को आमंत्रित किया लेकिन आदि देव शंकर जी को नहीं बुलाया तो सती शंकर जी से आज्ञा लेकर अपने पिता के घर गईं

सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के ऊपर अपने पति शंकर जी को न बुलाए जाने पर अत्यंत क्रोधित हुईं. पिता दक्ष प्रजापति ने सती के सामने ही शंकर जी को कुछ अपमानजनक शब्द बोले जिसे सती अपने पति शंकर जी का अपमान सहन न कर सकीं.

अपमानित सती ने अपने पिता दक्ष की भर्त्सना की एवं दहकते यज्ञ कुंड में अग्नि की ज्वाला में अपनी योगमाया की शक्ति का आवाहन कर के अपने प्राण त्याग दिए.

वहीं सती कालांतर में पार्वती के रूप में पुन: हिमालय की पुत्री बनकर शंकर जी की अरधागिनी बनीं. यही पार्वती देवी ने इन्द्रादि देवताओं के अंहकार को नष्ट करने के लिए उनको शक्तिहीन कर दिया. तब ब्रहमा, विष्णु एवं महेश त्रिदेवों को लेकर सभी देवता पार्वती देवी की शरण में गए एवं दीन भाव से उनकी स्तुति की.

देवताओं द्वारा की गई स्तुति से प्रसन्न होकर पार्वती जी ने पुन: उन्हें अस्त्र-शस्त्र के साथ उनकी शक्ति को वापस किया. इन्हीं देवी पार्वती को देवी शैलपुत्री के नाम से पुकारा गया.


ध्यान मंत्र

वंदे वांछित लाभायचन्द्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारुढ़ां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम् ।।

अर्थात् मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करने वाली, वृष पर आरूढ़ होने वाली, शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा जी की मैं वंदना करता हूं. इस प्रकार ध्यान करते हुए शैलपुत्री देवी के मंत्र 


‘ऊं’ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊं शैलपुत्री देव्यै नम:

का नित्य एक माला जाप करने से हर प्रकार की शुभता प्राप्त होती है.

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या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

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15 October 2012

क्यों 'ॐ' से शुरू होते हैं मंत्र ?



देव उपासना में तरह-तरह के मंत्र बोलें जाते हैं। लेकिन सभी मंत्रों में एक शुभ अक्षर समान रूप से बोला जाता है। वह है ॐ यानी प्रणव। वैदिक, पौराणिक या बीज मंत्रों की शुरुआत ऊँकार से होती है। असल में मंत्रों के आगे ॐ लगाने के पीछे का रहस्य धर्मशास्त्रों में मिलता है। 

डालते हैं इस पर एक नजर-

शास्त्रों के मुताबिक पूरी प्रकृति तीन गुणों से बनी है। ये तीन गुण है - रज, सत और तम। वहीं ॐ को एकाक्षर ब्रह्म माना गया है, जो पूरी प्रकृति की रचना, स्थिति और संहार का कारण है। इस तरह इन तीनों गुणों का ईश्वर ॐ है। चूंकि भगवान गणेश भी परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। उनके नाम का एक अर्थ गणों के ईश ही नहीं गुणों का ईश भी है।

इस कारण ॐ को प्रणवाकार गणेश की मूर्ति भी माना गया है। श्री गणेश मंगलमूर्ति होकर प्रथम पूजनीय देवता भी हैं। इसलिए ॐ यानी प्रणव को श्री गणेश का प्रत्यक्ष रूप मानकर वेदमंत्रों के आगे विशेष रूप से लगाकर उच्चारण किया जाता है। जिसमें मंत्रों के आगे श्री गणेश की प्रतिष्ठा, ध्यान और नाम जप का भाव होता है, जो पूरे संसार के लिये बहुत ही मंगलकारी, शुभ और शांति देने वाला होता है।

क्या स्त्रियों को वेदाधिकार नहीं है... ?



इस विषय पर मैं पाठकों का ध्यान कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर दिलाना चाहता हूँ :

०१. जब ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा ऋषि स्त्रियां हो सकतीं हैं तो उनको अध्ययन के अधिकार का निषेध करना मेरी दृष्टि से कभी समयविशेष की आवश्यकता रही होगी, आज इस बात की आवश्यकता नहीं।

०२. ऋग्वेद के मन्त्रों का दर्शन करने वाले ४०२ ऋषियों में से ३७७ पुरुष तथा २५ महिलायें हैं, जब देवता हिरण्यगर्भ प्राण इन २५ ऋषिकाओं के पवित्र हृदय में वेदमन्त्रों का प्राकट्य कर सकते हैं, तो फिर माताओं को वेदाध्ययन का अधिकार न देने का कोई औचित्य नहीं।

०३. बृहदारण्यकोपनिषद् में गार्गी एवं मैत्रेयी के याज्ञवल्क्यमुनि के साथ संवाद को देख कर कहीं से भी नहीं लगता कि वे अपने वैदिक ज्ञान में यजुर्वेद के इस श्रेष्ठतम मुनि से कहीं भी कम होंगी।

०४. इसके अतिरिक्त स्मृतिवाक्यों ने स्वीकार किया कि प्राचीन काल में स्त्रियों को गायत्री मन्त्र भी दिया जाता था ओर मौञ्जी बन्धन भी किया जाता था। पुरा कल्पे तु नारीणां मौज्ञ्जी बन्धनमिष्यते इत्यादि।

०५. पत्नी शब्द का संस्कृत में अर्थ ही होता है पति के साथ यज्ञ में संयुक्त होने वाली... हम जानते हैं कि वैदिक काल में कोई भी यज्ञ यजमानी के बिना नहीं हो सकता था... अब अगर उसको वेद का ज्ञान नहीं होगा, तो वह वैदिक यज्ञ कैसे सम्पन्न करेगी ?

०६. हां, कुछ अपेक्षाकृत आधुनिक धर्मशास्त्रों में और पुराणों में स्पष्ट निषेध है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब विदेशियों के आक्रमण के परिणाम स्वरूप स्त्रियों का जीवन भारत में असुरक्षित होता चला गया है, तभी घूंघट से ले कर सारे सीमित करने वाले नियम उनकी सुरक्षा के लिये वैसे ही बनाये गये हैं। जैसे आज से कुछ वर्ष पहले तक फिलिस्तीन की मुसलमान लड़कियां कभी अपने बाल और सिर नहीं ढकती थी, पर अब इतने अधिक अत्याचार के उपरान्त अधिकतर अपनी सुरक्षा के लिये उन्हें ढकने लगी हैं।

०७. ऋग्वेद १०:८५ के सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिकाएँ " सूर्या सावित्री" हैं।

०८. ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के २४ अध्याय में इस प्रकार है -

घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित ।
ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्तस्य स्वसादिती !!८४!!
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी ।
लोपामुद्रा च नद्यस्य यमी नारी च शाश्वती !!८५!!
श्री लक्ष्मिः सार्पराज्ञी वाक्श्रद्धा मेधाच दक्षिण ।
रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः !!८६!!


०९. ऋग्वेद के १०:१३४, १०:३९, १९:४०, ८:९१, १०:५, १०:१०७, १०:१०९, १०:१५४, १०:१५९, १०:१८९, ५:२८, ८:९१ अदि सूक्तों की मंत्रद्रष्टा यह ऋषिकाएँ हैं।

१०. आचार्य श्री मध्वाचार्य जी ने महाभारत निर्णय में द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए लिखा है :

वेदाश्चप्युत्तम स्त्रीभिः कृष्णात्ताभिरिहाखिलाः !

इससे यह प्रमाणित होता है कि महाभारत काल में भी स्त्रियाँ वेदाध्ययन करती थीं।

११. तैत्तिरीय ब्रह्मण में सोम द्वारा 'सीता सावित्री' ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है। (तैत्तिरीय ब्राह्मण १:३:१० )

१२. वभूव श्रीमती राजन शांडिलस्य महात्मनः !
सुता धृतव्रता साध्वी, नियता ब्रह्मचारिणी !!
साधू तप्त्वा तपो घोरे दुश्चरम स्त्री जनेन ह !
गता स्वर्ग महाभागा देव ब्रह्मण पूजिता!! 
महाभारत , शल्य पर्व ५४:९ !!

अर्थात:- महात्मा शांडिल्य की पुत्री 'श्रीमती' थी, जिसने व्रतों को धारण किया। वेदाध्ययन में निरंतर प्रवृत्त थी! अत्यंत कठिन तप करके वह देवी ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारीं।

१३. अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणी वेद पारगा!
अधीत्य सकलान वेदान लेभेSसंदेहमक्षयम !! महाभारत, उद्योग पर्व १९०:१८ !!

अर्थात:- शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारंगत थीं, उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष प्राप्त किया !

१४. विष्णु पुराण १:१० और १८:१९ में तथा मार्कंडेय पुराण अध्याय २२ में भी इस प्रकार ब्रह्मवादिनी (वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है।

१५. आचार्य शंकर को भारती देवी के साथ शास्त्रार्थ करना पड़ा था। उसने ऐसा अद्भुत शास्त्रार्थ किया था कि बड़े-बड़े विद्वान भी अचंभित रह गए थे।

शंकर-दिग्विजय में भारती देवी के सम्बन्ध लिखा है-


सर्वाणि शास्त्राणि षडंग वेदान,
कव्यादिकान वेत्ति, परंच सर्वम !
तन्नास्ति नो वेत्ति यदत्र वाला,
तस्मादभुच्चित्र पदम् जनानाम !! 
शंकर दिग्विजय ३:१६ !!

अर्थात:- भारती देवी सर्वशास्त्र तथा अंगों सहित सब वेदों और काव्यों को जानती थीं। उससे बढ़कर श्रेष्ठ और विद्वान् स्त्री और न थी।

आज जिस प्रकार स्त्रियों के शास्त्राध्ययन पर रोक लगी जाती है, यदि उस समय ऐसे प्रतिबन्ध होते तो याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाली स्त्रिया किस प्रकार हो सकती थीं?

ऐसे अनेकों प्रमाण मिलते हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थीं! वे यज्ञ-विद्या, ब्रह्म-विद्या आदि में पारंगत थीं। वेद, उपनिषद् आदि धर्मशास्त्रों पर स्त्रियों का सामान अधिकार सर्वदा रहा है।



सोमवार व्रत कथा


एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी मृत्युलोक में विवाह की इच्छा करके माता पार्वती के साथ पधारे। विदर्भ देश की अमरावती नगरी जो कि सभी सुखों से परिपूर्ण थी वहां पधारे. वहां के राजा द्वारा एक अत्यंत सुन्दर शिव मंदिर था, जहां वे रहने लगे. एक बार पार्वती जी ने चौसर खलने की इच्छा की. तभी मंदिर में पुजारी के प्रवेश करन्बे पर माताजी ने पूछा कि इस बाज़ी में किसकी जीत होगी? तो ब्राह्मण ने कहा कि महादेव जी की. लेकिन पार्वती जी जीत गयीं. तब ब्राह्मण को उन्होंने झूठ बोलने के अपराध में कोढ़ी होने का श्राप दिया. कई दिनों के पश्चात देवलोक की अपसराएं, उस मंदिर में पधारीं, और उसे देखकर कारण पूछा. पुजारी ने निःसंकोच सब बताया. तब अप्सराओं ने ढाढस बंधाया, और सोलह सोमवार के व्रत्र रखने को बताया. विधि पूछने पर उन्होंने विधि भी उपरोक्तानुसार बतायी. इससे शिवजी की कृपा से सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं.फ़िर अप्सराएं स्वर्ग को चलीं गयीं. ब्राह्मण ने सोमवारों का व्रत कर के रोगमुक्त होकर जीवन व्यतीत किया. 

कुछ दिन उपरांत शिव पार्वती जी के पधारने पर, पार्वती जी ने उसके रोगमुक्त होने का करण पूछा. तब ब्राह्मण ने सारी कथा बतायी. तब पार्वती जी ने भी यही व्रत किया, और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई. उनके रूठे पुत्र कार्तिकेय जी माता के आज्ञाकारी हुए. परन्तु कार्तिकेय जी ने अपने विचार परिवर्तन का कारण पूछा. तब पार्वती जी ने वही कथा उन्हें भी बतायी. तब स्वामी कार्तिकेय जी ने भी यही व्रत किया. उनकी भी इच्छा पूर्ण हुई. उनसे उनके मित्र ब्राह्मण ने पूछ कर यही व्रत किया. फ़िर वह ब्राह्मण विदेश गया और एक राज के यहां स्वयंवर में गया. वहां राजा ने प्रण किया था, कि एक हथिनी एक माला, जिस के गले में डालेगी , वह अपनी पुत्री उसी से विवाह करेगा. वहां शिव कृपा से हथिनी ने माला उस ब्राह्मण के गले में डाल दी. राजा ने उससे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया. उस कन्या के पूछने पर ब्राह्मण ने उसे कथा बतायी. तब उस कन्या ने भी वही व्रत कर एक सुंदर पुत्र पाया. 

बाद में उस पुत्र ने भी यही व्रत किया और एक वृद्ध राजा का राज्य पाया. जब वह नया राजा सोमवार की पूजा करने गया, तो उसकी पत्नी अश्रद्धा होने से नहीं गयी. पूजा पूर्ण होने पर आकाश वाणी हुई, कि राजन इस कन्या को छोड़ दे, अन्यथा तेरा सर्वनाश हो जाये गा.अंत में उसने रानी को राज्य से निकाल दिया. वह रानी भूखी प्यासी रोती हुई दूसरे नगर में पहुंची. वहां एक बुढ़िया उसे मिली, जिसके साथ वह कथा का बाकि अंश उसे एक बुढि औरत मिलि जो धागे बनाती थी। उसिके साथ काम करने लगि पर दुसरे दिन जब वो धागा बेचने निकली तो अचानक तेज हवा चलि और सारे धागे उडगए तो मालिकिन ने गुस्से मे आकर उसे कामसे निकाल दिया। फिर रोते फिरते वह एक तेलिके घर पहुँची तेलिने उसे रखलिया पर भन्डार घरमे जाते हि तेलके बर्तन गिरगए और तेल बहगया तो उस तेलीने उसे घरसे नीकाल दिया। इसप्रकार सभि जगहसे निकाले जानेके बाद वह एक सुन्दर वनमे पहुँची वहाँके तलावसे पानी पिने के लिए जब बढि तो तालाब सुखगया थोडा पानी बचा जो कि किटोसे युक्त था। उसि पानीको पिकर वो एक ब्रक्षके निचे बैठ गई पर तुरंत उस ब्रक्षके पत्ते झड गए। इसतरह वो जिस ब्रक्षके निचेसे गुजरति वह ब्र्क्ष पत्तोसे बिहिन होजाता ऐसे ही सारा वन हि सुखनेको आया। यह देखकर कुछ चरवाहोने उस रानीको लेकर एक शिवमंदिरके पुजारीके पास लेगए। वहा रानीने पुजारीके आग्रहसे सारी बात बतायी और सुनकर पुजारीने कहाकी तुम्हे शिवका श्राप लगा है। रानीने बिन्ती करके पुछातो पुजारीने इसके निदानका उपाय बताया और सोमवार ब्रतकि बिधि बताई। रानीने तनमन से ब्रत पुरा किया और शिवकी क्रिपासे सत्रहवे सोमवारको राजाका मन परिवर्तन हुवा। 

राजाने रानी को ढुढने दूत भेजे। पता लगने के बाद राजाने बुलावा भेजा पर पुजारीने कहा राजाको स्वयं भेजो। इसपर राजाने विचार कीया और स्वयं पहुचे। रानीको लेकर दरवार पहुचे और उनका स्थान दिया। सम्पुर्ण सहरमे खुसिया मनायी गयि राजाने गरिबोको काफि दानतक्षिणा किया और शिवके परमभक्त होकर नियम पुर्वक 16 सोमवार का ब्रत करने लगे और संसारके सारे सुखको भोगकर अंतमे सिवधाम गए। इसप्रकार जो भि मनुश्य श्रद्धा पुर्वक नियमसे 16 सोमवार का ब्रत करेगा वह इस लोकमे परम सुखोको प्राप्तकर अंतमे परलोकमे मुक्ती प्राप्त होगा

शहद गुणों की खान





शहद को आयुर्वेद में औषधीय गुणों का खजाना माना गया है। शहद का अलग-अलग तरह से उपयोग कर हम हमारे शरीर की कई सारी समस्याओं को दूर भगा सकते हैं। शहद में यह गुण होता भी है कि इसका अलग-अलग वस्तुओं के साथ उ
पयोग करने पर इसके गुण भी भिन्न हो जाते हैं ।

१. शहद को मसूड़ों पर मलने से पायरिया नहीं होता।

२. छोटे बच्चों को दूध पिलाने से पहले शहद चटा दें। फिर दूध पिलाएं ये रोग निरोधक क्षमता बढ़ाता है।

३. बेसन, मलाई में शहद मिलाकर त्वचा पर लगाएं। थोड़ी देर बाद धो लें, चेहरा चमक उठेगा ।

४. प्रतिदिन 25 ग्राम शहद दूध के साथ जरूर लें । इससे शरीर को ताकत मिलती है।

५. त्वचा सम्बन्धी रोग हो या कहीं जल-कट गया हो तो शहद लगाएं। जादू सा असर दिखाई देगा।

६. रात को सोने से पहले दूध के साथ शहद लेने पर बहुत अच्छी नींद आती है।

७. दूध में शक्कर की जगह शहद लेने से गैस नहीं बनती और पेट के कीड़े भी निकल जाते हैं।

८. जुकाम होने पर शहद की भाप लें व उसी पानी से कुल्ला करें।

९. शहद, गाजर के जूस के साथ लेने से आंखों की रोशनी को बढ़ाने में मदद करता है। इसे खाना खाने से एक घंटा पहले लेना चाहिये।

१०. खांसी में यह एक अचूक औषधि का काम करती है। बराबर की मात्र में अदरक के रस के साथ लेने से, सर्दी, गले की खराश, जुकाम तथा छाती में कन्जैशन से आराम मिलता है।

११. अदरक जूस, काली मिर्च के पाउडर के साथ शहर मिला कर (बराबर मात्र) में लेने से अस्थमा के रोगियों को दिन में तीन बार लेने से आराम मिलता है।

१२. प्रात: काल शौच जाने से पहले गर्म पानी के गिलास में 1-2 चम्मच शहद तथा एक चम्मच ‘निंबू जूस’ मिलाकर पीने से रक्त शुद्धि का कार्य करता है तथा मोटापे को बढ़ने से भी रोकता है।

१३. ह्रदय के लिए भी शहद गुणकारी है, मीठी सौंफ के साथ 1-2 चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से दिल को मजबूत तो करता ही है। हृदय को सुचारू रूप से कार्य करने में भी मदद करता है।

हल्दी है इन दो जानलेवा बीमारियों की गजब की दवा --------


हल्दी के गुणों से तो हम और आप तो वर्षों से परिचित रहे हैं और दुनिया के वैज्ञानिक भी इसके नए- नए गुणों के पन्ने जोड़ते चले जा रहे हैं। अब हाल के ही एक शोध को ले लीजिये ,हल्दी मैं पाए जानेवाले तत्व कुर्कुमिन को कैंसर को फैलानेवाली अवस्था जिसे मेटास्टेसिस के नाम से जाना जाता है ,इसे रोकने में मददगार पाया गया है। पश्चिमी देशों में प्रोस्टेट कैंसर सबसे खतरनाक माना जाता रहा है और अधिकांश में इसका पता तब चलता है ,जब इसका ट्यूमर शरीर के कई अंगों में फैल चुका होता है। तीन प्रतिशत रोगियों में यह फैलाव घातक होता है। म्यूनिक स्थित एल.एम् .यू.के डॉ बेट्रिक बेक्मिरर की मानें तो हल्दी के सकिय तत्व करक्यूमिन को मेटास्टेसिसरोधी गुणों से युक्त पाया गया है। 


इन वैज्ञानिकों की टीम ने करक्यूमिन को कैंसर से बचाव सहित दूसरे अंगों में फैलने से रोकने वाले गुणों से युक्त पाया गया है। इससे पूर्व भी इन्हें वैज्ञानिकों ने करक्यूमिन को फेफेड़ों और स्तन के मेटास्टेसिस को रोकने वाले गुणों से युक्त पाया था,वैज्ञानिकों ने करक्यूमिन में कैंसर के फैलने के लिए जिम्मेदार दो प्रोटीन के निर्माण को कम कर देने वाले गुणों से युक्त पाया है।

करक्यूमिन के इस प्रभाव के कारण ट्यूमर कोशिकाएं कम मात्रा में साइटोकाईनिन को पैदा कर पाती हैं,जो मूलत: कैंसर के फैलाव यानी मेटास्टेसिस के लिए जिम्मेदार होता है। डॉ.बेक्मिरर का तो यहाँ तक कहना है की हल्दी में पाया जानेवाला तत्व करक्यूमिन केवल कैंसर के फैलाव को ही कम नहीं करता है ,अपितु इसके नियमित सेवन से स्तन और प्रोस्टेट के कैंसर से भी बचा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने प्रतिदिन आठ ग्राम तक करक्यूमिन की मात्रा को मानव शरीर के लिए सुरक्षित माना है। 


हल्दी के गुणों का आयुर्वेद के जानकार सदियों से चिकित्सा में प्रयोग कराते आ रहे हैं । भारतीय व्यंजन हल्दी के श्रृंगार के बगैर अधूरी ही मानी गई है। वैज्ञानिकों का यह मानना है की बी.एच .पी .(बीनाइन प्रोस्टेटिक हायपरप्लेसीया ) एवं महिलाएं जिनका पारिवारिक स्तन कैंसर का इतिहास रहा हो उनमें करक्यूमिन का सेवन कैंसर से बचाव की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है।
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@भारतीय संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है|


"वेद हिन्दू सनातन धर्म का आधार स्तम्भ"" है...!



जैसा कि आप सभी जानते हैं कि.... ""वेद हिन्दू सनातन धर्म का आधार स्तम्भ"" है...!

परन्तु दुर्भाग्य से.... आधुनिक एवं कलुषित शिक्षा प्रणाली के कारण... आज अत्यधिक पढ़े लिखे लोग भी हमारे अपने धार्मिक एवं परम पवित्र वेद के बारे में बहुत ही कम जानते हैं...!

वेद..... 'विद' शब्द से बना है.... जिसका अर्थ होता है...... ज्ञान या जानना... अथवा , ज्ञाता या जानने वाला..!

सिर्फ जानने वाला... और, जानकर जाना-परखा ज्ञान.... अनुभूत सत्य.... जाँचा-परखा मार्ग....ही वेद है..!

और, हमारे इसी वेद
में संकलित है...... 'ब्रह्म वाक्य'।
आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि....वेद..... मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं.......।

इनमे से ....वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं......जिनमे ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं...... जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है।

ज्ञातव्य है कि....यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है.... और, यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।

वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है..... और ... 'श्रुति' शब्द 'श्रु' धातु से शब्द बना है......... 'श्रु' यानी सुनना।

कहते हैं कि...... इसके मन्त्रों को ईश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन तपस्वियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था..... जब वे गहरी तपस्या में लीन थे।

सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को इसका ज्ञान दिया:- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य।

वेद ......वैदिककाल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति हैं...... जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले छह-सात हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है।

विद्वानों ने...... संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है..... और, ये चारों भाग सम्मिलित रूप से श्रुति कहे जाते हैं।

बाकी ग्रन्थ स्मृति के अंतर्गत आते हैं।

संहिता इसका मन्त्र भाग है.... और, वेद के मन्त्रों में सुंदरता भरी पड़ी है।

वैदिक ऋषि जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है.... और, जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है... वो मुग्ध हो उठता है।

ब्राह्मण : ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है... और, वेदों के मंत्रों की व्याख्या है.... तथा, यज्ञों के विधान और विज्ञान का विस्तार से वर्णन है।

मुख्य ब्राह्मण 3 हैं : (1) ऐतरेय, ( 2) तैत्तिरीय और (3) शतपथ।

आरण्यक : वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'.... इसीलिए, अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'।

मुख्य आरण्यक पाँच हैं :
(1) ऐतरेय, (2) शांखायन, (3) बृहदारण्यक, (4) तैत्तिरीय और (5) तवलकार।

उपनिषद : उपनिषद को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है और यही वेदों का अंतिम सर्वश्रेष्ठ भाग होने के कारण "वेदांत" कहलाए।

उपनिषद में ईश्वर, सृष्टि और आत्मा के संबंध में गहन दार्शनिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है..।

उपनिषदों की संख्या 1180 मानी गई है, लेकिन वर्तमान में 108 उपनिषद ही उपलब्ध हैं।

जिनमे से मुख्य उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर।

असंख्य वेद-शाखाएँ, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद विलुप्त हो चुके हैं.... और, वर्तमान में ऋग्वेद के दस, कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस, सामवेद के सोलह, अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद उपलब्ध माने गए हैं।

वैदिक काल :
प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था।

दरअसल... वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई.... अर्थात, यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से वेदत्रयी भी कहा जाता था।

ऐसी मान्यता है कि.... वेद का वि‍भाजन भगवान् राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था... और, बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया।

दूसरी ओर कुछ लोगों का यह भी मानना है कि...... भगवान कृष्ण के समय द्वापरयुग की समाप्ति के बाद महर्षि वेद व्यास ने वेद को चार प्रभागों संपादित करके व्यवस्थित किया।
इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी... और, उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया।

अगर इस गणना को ही मान लिया जाये तो भी.... लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं... वेद।

और.....इस तथ्य को भी नाकारा नहीं जा सकता है कि .....कृष्ण के आज से 5112 वर्ष पूर्व होने के पुख्ता प्रमाण ढूँढ लिए गए हैं।

वेद के कुल चार विभाग हैं:

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

१. ऋग-स्थिति,
२. यजु-रूपांतरण,
३. साम-गति‍शील और
४. अथर्व-जड़।

ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है।

इन्ही चारों के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

ऋग्वेद : ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें 10 मंडल हैं और 1,028 ऋचाएँ। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें 5 शाखाएँ हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन।

यजुर्वेद : यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में 1975 मन्त्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मन्त्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं कृष्ण और शुक्ल।

सामवेद : साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इसमें 1875 (1824) मन्त्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएँ हैं। इस संहिता के सभी मन्त्र संगीतमय हैं, गेय हैं। इसमें मुख्य 3 शाखाएँ हैं, 75 ऋचाएँ हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है।

अथर्ववेद : थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कम करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। अथर्ववेद में 5987 मन्त्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएँ हैं। इसमें रहस्यमय विद्या का वर्णन है।

उक्त सभी में परमात्मा, प्रकृति और आत्मा का विषद वर्णन और स्तुति गान किया गया है। इसके अलावा वेदों में अपने काल के महापुरुषों की महिमा का गुणगान व उक्त काल की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थिति का वर्णन भी मिलता है।

छह वेदांग : (वेदों के छह अंग)- (1) शिक्षा, (2) छन्द, (3) व्याकरण, (4) निरुक्त, (5) ज्योतिष और (6) कल्प।

छह उपांग : (1) प्रतिपदसूत्र, (2) अनुपद, (3) छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), (4) धर्मशास्त्र, (5) न्याय तथा (6) वैशेषिक।

ये 6 उपांग ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इसे ही षड्दर्शन कहते हैं, जो इस तरह है:- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।

वेदों के उपवेद : ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

आधुनिक विभाजन : आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों का विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया-

(1) याज्ञिक, (2) प्रायोगिक और (3) साहित्यिक।

वेदों का सार है...... उपनिषदें और उपनिषदों का सार...... 'गीता' को माना है।

इस क्रम से वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ हैं, दूसरा अन्य कोई नहीं।

स्मृतियों में वेद वाक्यों को विस्तृत समझाया गया है।

जबकि....वाल्मिकी रामायण और महाभारत को इतिहास तथा पुराणों को पुरातन इतिहास का ग्रंथ माना है।

विद्वानों ने भी वेद, उपनिषद और गीता के पाठ को ही उचित बताया है।

ऋषि और मुनियों को दृष्टा कहा गया है..... और, वेदों को ईश्वर वाक्य।

वेद ऋषियों के मन या विचार की उपज नहीं है.... और, ऋषियों ने वह लिखा या कहा जैसा कि... उन्होंने पूर्णजाग्रत अवस्था में देखा... सुना और परखा।

मनुस्मृति में श्लोक (II.6) के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है... और, वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते।

ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं..... जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं।

जन्म के आधार पर जाति का विरोध ऋग्वेद के पुरुष-सुक्त (X.90.12), व श्रीमद्‍भगवत गीता के श्लोक (IV.13), (XVIII.41) में मिलता है।

श्लोक : श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥
अर्थात : जहाँ कहीं भी वेदों और दूसरे ग्रंथों में विरोध दिखता हो, वहाँ वेद की बात की मान्य होगी।-वेद व्यास

प्रकाश से अधिक गतिशील तत्व अभी खोजा नहीं गया है..... और, न ही मन की गति को मापा गया है।

परन्तु.... हमारे ऋषि-मुनियों ने..... मन से भी अधिक गतिमान ....किंतु, अविचल का साक्षात्कार किया और उसे 'वेद वाक्य' या 'ब्रह्म वाक्य' बना दिया।

अथ वेद कथा....

जय महाकाल...!!!


वैश्विक षड्यन्त्र ...


देश की लगभग 99 % जनता को लगता है कि देश व दुनियाँ जैसे सामने से दिख रही है वैसे ही सरलता, सहजता, समरसता, प्रेम, सदभावना, समझदारी, लोकतान्त्रिक एवं न्यायपूर्ण तरीको से चल रही है। दुर्भाग्य से जैसे हमें दिख रहा है वैसे दुनियाँ नहीं चल रही है। उदाहरण के तौर पर हम चार विषय प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. राजनैतिक षड्यन्त्र : 

भारत का प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, विदेशमंत्री व रक्षामंत्री ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो अमेरिका व अमेरिकन कंपनियों तथा अन्य विदेशी कंपनियों के हित में नितियाँ बनाने वाला हो, राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय नितियों व विषयों पर अमेरिका के नितियों का समर्थन हो, इसके लिए विदेशी ताकतें सामाजिक व आर्थिक रूप से एक लम्बी कार्ययोजना के तहत काम करती हैं। मिडिया मैनेजमेन्ट से लेकर इमेज-बिल्डिंग के लिए बहुत ही बुद्धिमत्ता के साथ काम करती हैं। आने वाले 5 वर्षों से लेकर 50 वर्षों तक भारत के विकास के माडल कैसे हों जिससे कि विदेशी कंपनियाँ अपनी तकनीक, अपनी फैक्ट्रियाँ एवं अनुसंधान उसी दिशा में करें और विदेशों की प्रतिबंधित दवा, हथियार व अन्य उत्पाद भारत में खपते रहें, भारत एक डैम्पिंग सेन्टर बन जाए, इस प्रकार बहुत से ऐसे विषय हैं। हमारी संसद में भी अमेरिका, यूरोप व अन्य विदेशी कंपनियों तथा उन देशों के समर्थक लोगों को बाकायदा फाइनेंश करके तथा अनेक प्रकार से परोक्ष रूप से मदद करके संसद में तथा विधानसभाओं में भेजा जाता है, जिससे की देश के जल, जंगल, जमीन, भू-सम्पदाओं पर विदेशी कंपनियों का कब्जा हो सके। F.D.I.यानी विदेशी पूँजी निवेश के जरिए विदेशी कंपनियों व भ्रष्टाचार करके देश को लूटने वाले लोगों का भारत के सभी आर्थिक संस्थानों, रिटेल से लेकर शेयर मार्केट तक पूरी अर्थव्यवस्था पर इनका वर्चस्व कायम हो सके, इसके लिए वे बहुत ही कूटनीतिक तरीके से ये विदेशी ताकतें तात्कालिक, मध्यकालिक व मध्यकालिक व दिर्घकालिक योजना के तहत काम करती हैं।

2. आर्थिक षड्यन्त्र : 

किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है वहाँ की मजबूत अर्थव्यवस्था। पहले देशों को भौगोलिक रूप से गुलाम बनाकर आर्थिक रूप से लूटा जाता था। अब आर्थिक रूप से गुलाम बनाने का बहुत बड़ा कुचक्र चल रहा है। इस आर्थिक लूट के चक्रव्यूह के जाल का ताना-बाना ऐसे बुना जाता है कि सामान्य व्यक्ति की समझ में तो ये बातें आ ही नहीं सकती। बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं। किसी भी देश की G.D.P.यानी अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य आधार होते हैं। अग्रीकल्चर, इन्डस्ट्री एवं सर्विसेज। हमारे जल, जंगल, जमीन, भू-सम्पदा एवं बौद्धिक सम्पदाओं का विदेशी कंपनियाँ पूरा शोषण व दोहन कर रही हैं। आज रिटेलर से लेकर शेयर मार्केट तक, हैल्थ, एजुकेशन, रिसर्च एण्ड डेवलप्मेन्ट, मीडिया, रक्षा सामान, पेट्रोलियम प्रोडक्ट से लेकर हमारे देवी-देवता, बच्चों के खिलौने, टी.वी., गाड़ी, मोबाईल, साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट से लेकर जीवन की हर जरूरत का हर सामान विदेशी कंपनियाँ बेच रही हैं। एक तरह से हमने अपना पूरा देश विदेशी कंपनियों के हाथों में गिरवी रख दिया है। अमेरिका, चीन, जर्मनी व जापान आदि स्वदेशी के रास्ते पर चलकर खुद को स्वावलम्बी बना रहे हैं। हम भारतवासी भी बिना स्वदेशी के अपने देश को स्वावलम्बी नहीं बना सकते।

3. सामाजिक षड्यन्त्र : 

सामाजिक रूप से देश का कौन नेतृत्व करेगा, सामाजिक आवाज के रूप में किसे सुना जायेगा। किसे आर्थिक, राजनैतिक व अन्य विषयों में विशेषज्ञ का दर्जा मिलेगा। कौन विश्वसुन्दरी होगी? शोश्यल एक्टिविस्ट के रूप में देश में किसे स्थापित करना है। इसके लिए विदेशी सरकारें, विदेशी कंपनियाँ एवं विदेशी फाउंडेशन्स भारतीय एन.जी.ओ. को दान करती हैं। जो विदेशी कंपनियाँ अमेरिका व यूरोप के हितों में काम करें, उसे बाकायदा अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जाता है। जिससे उनकी देश में प्रतिष्ठा बढ़े, उन्हें विश्वसुन्दरी आदि के पुरस्कार दिये जाते हैं, जिससे कि विदेशी कंपनियों का सामान बेचने के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सके। ऐसे कानून पास करवाने के लिए भी विदेशी कंपनियाँ एन.जी.ओ. को दान देती हैं, जिससे उस देश से उनको जरूरी सुचनाएँ प्राप्त करने में आसानी हो और सरकारी संस्थाएँ कमजोर पड़ें जिससे विदेशी कंपनियों व प्राईवेट क्षेत्र के बड़े-बड़े पूँजीपति अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकें। ये सब कार्य इतनी होशियारी से किया जाता है कि इनके खिलाफ उठाने वाले व्यक्ति को ही ये अपराधी या दोषी के रूप में प्रमाणित कर देते हैं।

4. नैतिक षड्यन्त्र : 

हमारे देश कि संस्कृति, सभ्यता, संयम, सदाचार एवं प्राचीन मूल्य, आदर्शों व गौरव के सभी प्रतीकों, हमारे महापुरुषों, देवी-देवताओं, गौ, गंगा, गायत्री व वेदों से लेकर भगवान राम, कृष्ण व शिव आदि महापुरुषों के बारे में झूठी बातें प्रचारित करना। महापुरुषों को काल्पनिक बताना तथा रामायण व महाभारत आदि महाकाव्यों को उपन्यास बताकर अपने प्राचीन गौरव को झुठलाने का प्रयास करना। टी.वी. पर ऐसे सीरियल व मनोरंजन के नाम पर ऐसी फिल्में बनवाना व उसमें भोग विलास व दुराचार को ग्लैमर के साथ प्रस्तुत करके देश के लोगों के पुरुषार्थ व चरित्र को नष्ट करने का एक बहुत बड़ा षड्यन्त्र रचा जाता है। ऐसे अश्लील कार्यक्रमों के लिए विज्ञापन खूब मिलें, इसके लिए टी.आर.पी. तय करने वाली कंपनी भी 100% विदेशी नियन्त्रण वाली है। वह टी.आर.पी. बताने वाली विदेशी कंपनी परोक्ष रूप से देश के सभी चैनलों का नियन्त्रण करती हैं। देश की भाषा, भेषज्, भजन, भोजन, भाव व संस्कृति के विनाश का बहुत बड़ा षड्यन्त्र चल रहा है। देश के चरित्र को नष्ट करने का ये चक्रव्यूह हमने नहीं तोड़ा तो देश की बहुत बड़ी हानि हो रही है और आगे बड़ा खतरा आने वाला है। इसी तरह देश में जाति, धर्म व मजहब के नाम पर भी बहुत प्रकार के षड्यन्त्र चलते रहते हैं।

आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कार्यकर्ताओं को इन सब बातों का गंभीरता से ध्यान रखकर सावधानी पुर्वक खुद इन षड्यन्त्रों से बचना चाहिए व सामान्य कार्यकर्ताओं को भी सावधान करते रहना चाहिए।



घुटनों का दर्द - कमर का दर्द - बुखार का रामबाण



गठिया या संधिबात का की सबसे अछि दावा है मेथी, हल्दी और सुखा हुआ अदरक माने सोंठ , इन तीनो को बराबर मात्रा में पिस कर, इनका पावडर बनाके एक चम्मच लेना गरम पानी के साथ सुभाह खाली पेट तो इससे घुटनों का दर्द ठीक होता है, कमर का दर्द ठीक होता है, देड़ दो महिना ले सकता है ।

और एक अछि दावा है , एक पेड़ होता है उसे हिंदी में हाड़सिंगार कहते है, संस्कृत पे पारिजात कहते है, बंगला में शिउली कहते है , उस पेड़ पर छोटे छोटे सफ़ेद फूल आते है, और्फूल की डंडी नारंगी रंग की होती है, और उसमे खुसबू बहुत आती है, रात को फूल खिलते है और सुबह जमीन में गिर जाते है । इस पेड़ के पांच पत्ते तोड़ के पत्थर में पिस के चटनी बनाइये और एक ग्लास पानी में इतना गरम करो के पानी आधा हो जाये फिर इसको ठंडा करके पियो तो बीस बीस साल पुराना गठिया का दर्द इससे ठीक हो जाता है  


और येही पत्ते को पीस के गरम पानी में डाल के पियो तो बुखार ठीक कर देता है और जो बुखार किसी दावा से ठीक नही होता वो इससे ठीक होता है ; जैसे चिकनगुनिया का बुखार, डेंगू फीवर, Encephalitis , ब्रेन मलेरिया, ये सभी ठीक होते है

बुखार की और एक अछि दावा है अपने घर में तुलसी पत्ता ; १० - १५ तुलसी के पत्ते तोड़ो, तीन  चार काली मिर्च ले लो पत्थर में पीस के एक ग्लास गरम पानी में मिलके पी लो .. इससे भी बुखार ठीक होता है ।

बुखार की एक और दावा है नीम की गिलोय, अमृता भी कहते है, उडूनची भी कहते है, इसको थोडासा चाकू से काट लो , पत्थर में कुचल के पानी में उबाल लो फिर वो पानी पी लेना तो ख़राब से ख़राब बुखार ठीक हो जाता है ३ दिन में । कभी कभी बुखार जब बहुत जादा हो जाते है तब खून में श्वेत रक्त कनिकाएं , प्लेटलेट्स बहुत कम हो जाते है तब उसमे सबसे जादा काम आती है ये गिलोय ।

नंदी / Nandi


नन्दी भगवान शिव के प्रधान अनुचर एवं भक्त हैं। बिना नन्दी के शिव तत्त्व का उद्देश्य समझना कठिन है। नन्दी का शाब्दिक अर्थ हर्ष, प्रसन्नता आदि है। भगवान शिव का परिवार समग्र विश्व में एक अद्वितीय उदाहरण है, जहां परस्पर विरोधी तत्त्व वास करते हैं और सभी प्रसन्न रहते हुए भक्तों की प्रसन्नता के लिए सदैव चिंतित रहते हैं।

शिव पुराण के अनुसार ऋषि सनत्कुमार ने भगवान शिव के अनुचर नन्दी से पूछा कि आप भगवान शिव के अंश से कैसे उत्पन्न हुए और आपने शिवत्व को कैसे प्राप्त किया, इसके विषय में मुझे कृपा करके कुछ बताएं।

इसके पश्चात् भगवान नन्दी ने अपने संदर्भ में बताते हुए कहा कि जब ऋषि शिलाद को पितरों के उद्धार की इच्छा से संतान प्राप्ति की इच्छा हुई, तब शिलाद ने देवराज इंद्र की प्रसन्नता के लिए तप किया। इंद्र ने प्रसन्न होकर शिलाद से कहा, ‘मैं आपकी तपस्या से प्रसन्न हूं, आप वर मांगो।’ शिलाद ने कहा, ‘हे देवराज इंद्र, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप मुझे एक अयोनिज अमर पुत्र दीजिए।’ इंद्र ने कहा, ‘हे मुनिश्रेष्ठ मैं तुम्हें अयोनिज मृत्यरहित पुत्र नहीं दे सकता। मैं, देवराज इंद्र और ब्रह्मा-विष्णु कोई भी आपकी इस कामना को पूर्ण नहीं कर सकते।’

अत: इस प्रकार के पुत्र की इच्छा से महादेव भगवान शिव की अराधना करो, वे ही तुम्हें ऐसा पुत्र देंगे। इनके अनन्तर ऋषि शिलाद भगवान महादेव की तपस्या में संलग्न हो गए।

ऋषि की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान महादेव ने उन्हें वर देते 
हुए कहा, ‘हे तपस्वी ब्राह्माण! मैं तुम्हारे घर नन्दी नामक अयोनिज पुत्र के रूप में प्रकट होऊंगा और तुम तीनों लोकों के पिता हो जाओगे।’

‘ऐसा कह कर भगवान महोदव अन्तर्ध्यान हो गए और शिलाद अपने आश्रम में आकर यज्ञ की तैयारी करने लगे। उसी समय मैं शिलाद पुत्र प्रलयकाल की अग्नि के सदृश देदीप्यमान होकर प्रकट हुआ। देवताओं और ऋषियों ने शिलाद के घर मेरे उत्पन्न होने की प्रसन्नता में फूलों की वर्षा कर स्तुतिगान किया। शिलाद ने भी मुझे प्रलयकार के सूर्य के सदृश त्रिनेत्र, चतुर्भुज जटामुकुटधारी बालक के रूप में देख कर कहा, ‘हे प्रभो, आपने मुझे हर्ष और आनंद से आह्लादित किया है, अत: आपका नाम नन्दी होगा और मैं आपको प्रणाम करता हूं।’ मैंने अपना दिव्यरूप छोड़ कर मानव रूप धारण किया।

पांच वर्ष में ही मैंने सभी शास्त्रों एवं वेदों का अध्ययन पूर्ण कर लिया था। सात वर्ष पूर्ण होने पर मित्तावरुण नाम के दो मुनि मुझे (नन्दी) देखने आए और उन्होंने शिलाद से कहा, ‘सभी शास्त्रों के ज्ञाता नन्दी की एक वर्ष आयु शेष है।’ यह सुन कर पुत्र वत्सल शिलाद पुत्र का आलिंगन कर रोने लगे। इसके बाद नन्दी ने कहा, ‘आप क्यों दु:खी हो रहे हैं। देव, दानव, काल और कोई भी मुझे मारना चाहे तो भी मेरी अल्प मृत्यु नहीं हो सकती। मैं आपकी शपथ खाकर सत्य कह रहा हूं।’ शिलाद ने कहा, ‘कौन तप? कौन ज्ञान, कौन योग और कौन तुम्हारा स्वामी है, जो तुम्हें इस दु:ख से दूर करेगा।’ तब पुत्र नन्दी ने कहा, ‘न तप से, न विद्या से। मैं मात्र महादेव शिव के भजन से मृत्यु को जीत सकता हूं।’ इसके बाद मैं पिता को प्रणाम कर उत्तम वन की ओर चला गया।

‘एकांत में जाकर मैंने कठोर तप कर बुढ़ापे और शोक नाश के लिए प्रार्थना की। भगवान शिव ने कहा, ‘हे वत्स तुम्हें यह भय कैसे हुआ? उन दोनों मुनियों (ब्राह्माणों) को मैंने ही भेजा था। तुम नि:संदेह मेरे समान हो। तुम अपने पिता तथा मित्रजनों के साथ अजर-अमर, दु:खरहित अविनाशी गणपति हो। तुम मेरे बल हो, सदा हमारे साथ रहोगे, मेरे प्रिय होगे। मेरी कृपा दृष्टि से तुम्हें कभी बुढ़ापा नहीं आएगा। न मृत्यु होगी और न ही तुम्हारा कभी अंत होगा।’ भगवान शिव ने निर्मल जल लेकर मुझ पर छिड़कते हुए कहा, तुम नन्दी हो जाओ। इसके बाद भगवान शिव ने अपने गणेशों का स्मरण किया और उन्हें कहा कि नन्दी मेरा प्रिय पुत्र है। इन्हें सभी गणेश्वरों में प्रमुख स्वीकार करो। विष्णु, इंद्रादि देवों के साथ सभी गणेशों ने नन्दी का अभिषेक किया। भगवान नन्दी की पूजा एवं प्रार्थना से अभीष्ट की प्राप्ति होती है।


___खीरा के असरकारी नुस्खे................





ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही बाजारों में खीरे व ककड़ी की बहार आ जाती है। खीरे का सेवन भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक किया जाता है। खीरा देश के हर भाग में उपलब्ध है।

**आयुर्वेद के अनुसार खीरा

स्वादिष्ट, शीतल, प्यास, दाहपित्त तथा रक्तपित्त दूर करने वाला रक्त विकार नाशक है।खीरा व ककड़ी एक ही प्रजाति के फल हैं। खीरे में विटामिन बी व सी, पोटेशियम, फास्फोरस, आयरन आदि विद्यमान होते हैं।

* पेट की गैस, एसिडिटी, छाती की जलन में नियमित रूप से खीरा खाना लाभप्रद होता है।

* जो लोग मोटापे से परेशान रहते हैं उन्हें सवेरे इसका सेवन करना चाहिये। इससे वे पूरे दिन अपने आपको फ्रेश महसूस करेंगे। खीरा हमरी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है।

* खीरे को भोजन में सलाद के रूप में अवश्य लेना चाहिये। नमक, काली मिर्च व नींबू डालकर खाने से भोजन आसानी से पचता है व भूख भी बढ़ती है।

* आप यदि उदर विकार से परेशान हैं तो दही में खीरे को कसकर उसमें पुदानी, काला नमक, काली मिर्च, जीरा व हींग डालकर रायता बनाकर खाएं। आराम मिलेगा।

* घुटनों के दर्द को भी दूर भगाता है खीरे का सेवन। घुटनों के दर्द वाले व्यक्ति को खीरे अधिक खाने चाहिये तथा साथ में एक लहसुन की कली भी खा लेनी चाहिये।

* पथरी के रोगी को खीरे का रस दिन में दो-तीन बार जरूर पीना चाहिये। इससे पेशाब में होने वाली जलन व रुकावट दूर होती हैं।
सेहत के लिए गुणकारी : खीरा रक्तचाप को भी काबू में रखने में कारगार है। इसमें मौजूद पोटेशियम ज्यादा और कम दोनों तरह के रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। अगर आपके नाखून बार-बार टूट जाते हैं तो आज ही खीरे का सेवन शुरू करें, यह आपके नाखूनों को मजबूती देता है। गैस की समस्या में भी खीरा बेहद लाभदायक होता है। अगर आप किडनी या लीवर की समस्या से परेशान हैं तो खीरे का नियमित रूप से सेवन करने से आपके बालों को भी फायदा होगा। अपने बालों का सेहतमंद रखने के लिए खीरे के जूस का सेवन करें। इसके नियमित इस्तेमाल से बाल लंबे और घने होते हैं। दांतों और मसूढ़े से जुड़ी समस्या और पायरिया जैसे रोग में भी खीरा फायदेमंद है।

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खीरे का उपयोग करते समय कुछ सावधानियां भी बरतें जैसे :-

$ खीरा कभी भी बासी न खाएं।
$ जब भी खीरा खरीदें यह जरूर देख लें कि वह कहीं से गला हुआ न हो।
$ खीरे का सेवन रात में न करें। जहां तक हो सके, दिन में ही इसे खाये।
$ खीरे के सेवन के तुरंत बाद पानी न पियें।
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14 October 2012

श्री पतञ्जलि----



पतञ्जलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में विद्यमान थे। इनका जन्म गोनारद्य (गोनिया) में हुआ था पर ये काशी में "नागकूप' पर बस गये थे। ये व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे। काशीनाथ आज भी श्रावण कृष्ण ५, नागपंचमी को "छोटे गुरु का, बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग लो' कहकर नाग के चित्र बाँटते हैं क्योंकि पतञ्जलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है। पतञ्जलि महान् चकित्सक थे और इन्हें ही 'चरक संहिता' का प्रणेता माना जाता है। पतञ्जलि का महान अवदान है 'योगसूत्र'। पतञ्जलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे - अभ्रक विंदास अनेक धातुयोग और लौहशास्र इनकी देन है। पतञ्जलि संभवत: पुष्यमित्र शुंग (१९५-१४२ ई.पू.) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है।

ई.पू. द्वितीय शताब्दी में 'महाभाष्य' के रचयिता पतञ्जलि काशी-मण्डल के ही निवासी थे। मुनियत्र की परंपरा में वे अंतिम मुनि थे। पाणिनी के पश्चात् पतञ्जलि सर्वश्रेष्ठ स्थान के अधिकारी पुरुष हैं। उन्होंने पाणिना व्याकरण के महाभाष्य की रचना कर स्थिरता प्रदान की। वे अलौकिक प्रतिभा के धनी थे। व्याकरण के अतिरिक्त अन्य शास्रों पर भी इनका समान रुप से अधिकार था। व्याकरण शास्र में उनकी बात को अंतिम प्रमाण समझा जाता है। उन्होंने अपने समय के जनजीवन का पर्याप्त निरीक्षण किया था। अत: महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोश भी है। यह तो सभी जानते हैं कि पतञ्जलि शेषनाग के अवतार थे। द्रविड़ देश के सुकवि रामचन्द्र दीक्षित ने अपने 'पतञ्जलि चरित' नामक काव्य ग्रंथ में उनके चरित्र के संबंध में कुछ नये तथ्यों की संभावनाओं को व्यक्त किया है। उनके अनुसार शंकराचार्य के दादागुरु आचार्य गौड़पाद पतञ्जलि के शिष्य थे किंतु तथ्यों से यह बात पुष्ट नहीं होती है।

प्राचीन विद्यारण्य स्वामी ने अपने ग्रंथ 'शंकर दिग्विजय' में शंकराचार्य में गुरु गोविंद पादाचार्य का रुपांतर माना है। इस प्रकार उनका संबंध अद्वेैत वेदांत के साथ जुड़ गया। पतञ्जलि के समय निर्धारण के संबंध में पुष्यमित्र कण्व वंश के संस्थापक ब्राह्मण राजा के अश्वमेध यज्ञों की घटना को लिया जा सकता है। यह घटना ई.पू. द्वितीय शताब्दी की है। इसके अनसार महाभाष्य की रचना काल ई.पू. द्वितीय शताब्दी का मध्यकाल अथवा १५० ई. पूर्व माना जा सकता है। पतञ्जलि की एकमात्र रचना महाभाष्य है जो उनकी कीर्ति को अमर बनाने के लिये पर्याप्त है। दर्शन शास्र में शंकराचार्य को जो स्थान 'शारीरिक भाष्य' के कारण प्राप्त है, वही स्थान पतञ्जलि को महाभाष्य के कारण व्याकरण शास्र में प्राप्त है। पतञ्जलि ने इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनी के व्याकरण की प्रामाणिकता पर अंतिम मुहर लगा दी है।




श्री पाणिनी-----



पाणिनी मुनि अपने व्याकरण 'अष्टाध्यायी" अथवा 'पाणिनीय अष्टक' के लिये प्रसिद्ध हैं। अब तक प्रकाशित ग्रंथों में सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ पाणिनी का ही है। पाणिनी का काल ३५० ई.पू. माना जाता है किंतु इस संबंध में प्रस्तुत सन्देह रहित नहीं है। संभवत: उनका काल ५०० ई. पूर्व या उसके बाद का था।

सूत्र साहित्य में पाणिनी कृत - 'अष्टाधायायी', 'श्रौत सूत्र', 'गृह्यसूत्र' तथा धर्मसूत्र का समावेश है। पाणिनीकृता 'अष्टाध्यायी' संस्कृत व्याकरण संबंद ग्रंथ है। इसमें श्रौत सूत्रों में पुरोहितों द्वारा सम्पादित किये जाने वाले संस्कारों का विवरण है। 'धर्मसूत्र' में परम्परागत नियम तथा विधियाँ दी गयी हैं और गृह्यसूत्रों में जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक की जीवन विष्यक क्रियाओं का उल्लेख है। प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, बोधायन-आपस्तम्ब, वशिष्ठ, आश्वलायन तथा कात्यायन आदि कि गणना होती है।

पाणिनी के नाम से कमनीय पद्य केवल सूक्तियों में ही संग्रहित नहीं है, बल्कि कोश ग्रंथों में तथा अलंकार शास्रीय पुस्तकों में भी उधृत मिलते हैं। पुरातत्व वेत्ताओं में इस बात पर गहरा मतभेद है कि ये कविताएँ, वैय्याकरण पाणिनी की हैं अथवा 'पाणिनी' नामधारी किसी अन्य कवि की? डॉक्टर भाण्डारकर, पीचर्सन आदि विद्वान सब कुछ सोचने-विचारने के बाद यही सोचते हैं कि इन श्लोकों का रचियता पाणिनी वैय्याकरण पाणिनी नहीं हो सकता। इस के विपरीत डॉक्टर औफ्रेक्ट तथा डॉक्टर पिशेल की सम्मति है कि पाणिनी को केवल एक खूसट वैय्याकरम मानना बड़ी भारी भूल करना है, वह स्वयं अच्छ कवि थे। संस्कृत साहित्य की परंपरागत प्रसिद्धि पर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि पाणिनी ही इन पद्यों के नि:सन्दिग्ध रचयिता है। राजशेखर ने सूक्तिग्रंथों में पाणिनी को व्याकरण तथा 'जाम्बवती जय' का रचयिता माना है -

नम: पाणिनये तस्मै यस्मादाविर भूदिह।

आदौ व्याकरणं काव्यमनु जाम्बवतीजयम्।।

यह बात महत्वपूर्ण है कि पाणिनी यदा-कदा फुटकर पद्य लिखने वाले कवि नहीं थे, बल्कि संस्कृत साहित्य के सर्वप्रथम महाकाव्य लिखने का श्रेय उन्हीं को जाता है। इस महाकाव्य का नाम कहीं तो 'पाताल विजय' तो कहीं 'जाम्बवती जय' पाया जाता है। अष्टाध्यायी में पारिभाषिक शब्दों में ऐसे अनेक शब्द हैं जो पाणिनी के बनाये हुए हैं और बहुत से ऐसे हैं जो पहले से ही प्रचलित हैं। पाणिनी ने अपने रचे शब्दों की व्याख्या की है और पहले के अनेक पारिभाषिक शब्दों की भी नयी व्याख्या कर उनके प्रयोग को विकसित किया है।

महर्षि पाणिनी ने काशी शब्द को गण के आदि में दिखलाया है।

काश्यादिभ्यष्ठञत्रिठौ-अष्टाध्यायी ४-२-११६

अष्टाध्यायी में 'काशीय:' रुप की सिद्धि भी बतायी गयी है।

संस्कृत में उच्चारण की शुद्धता पर अधिक जोर दिया जाता है। वैदिक मन्त्रों में उच्चारण में यदि छोटी सी भी त्रुटि हो जाती है, तो महान् अनर्थ उपस्थित हो जाता है और इस अनर्थ का भाजन स्वयं वृत्तासुर को बनना पड़ा था जिसे यज्ञ में स्वर के अपराध से लेने के देने पड़ गये थे। महर्षि पाणिनी ने व्याघ्री को अपने बच्चे को मुँह में ले जाते देखा था और उसी को उन्होंने वर्णोंच्चारण-विधान में आदर्श माना था। बोलने वाले को चाहिये कि न तो वह वर्णों का काटे, न वर्णों को मुँह से बिखरने दे -

व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्।

भीता पतन-भेदाभ्यां तद्वद् वर्णान प्रजोजयेत्।।-पाणिनी शिक्षा-श्लोक २४




भूख से कम खाने पर लाभ :


गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते आरोग्यमायुश्च बलं सुखं च।
अनाबिलं चास्य भवत्यपत्यं न चैनमाद्यूत इति क्षिपन्ति।।


भूख से थोड़ा सा कम खाने से पहला फायदा है कि व्यक्ति रोगी नहीं होता। क्योंकि ज्यादा खाना पाचन में गड़बड़ी से कई बीमारियों की वजह बनता है। कम खाने से इनसे बचाव होता है।

जब व्यक्ति खान-पान नियंत्रित रख निरोगी रहता है तो जाहिर है कि उसकी उम्र बढ़ती है यानी लंबे वक्त तक जीवित रहता है।

कम भोजन से सेहतमंद और बलवान शरीर मन, वचन व व्यवहार को भी साधकर जीवन के सारे सुख बटोरना आसान बना देता हैं।

कम खाने से जुड़ी व्यावहारिक तौर पर सबसे रोचक बात व फायदा यही है कि ऐसे व्यक्ति को कोई 'ज्यादा खाने वाला' यानी 'पेटू'बोलकर ताना नहीं मारता, टोकता नहीं या फिर कोई उससे कतराता नहीं है।


ॐ ॐ

धूप का महत्व


धूप, दीप, चंदन, कुमकुम, अष्टगंध, जल, अगर, कर्पूर, घृत, गुड़, घी, पुष्प, फल, पंचामृत, पंचगव्य, नैवेद्य, हवन, शंख, घंटा, रंगोली, माँडना, आँगन-अलंकरण, तुलसी, तिलक, मौली (कलाई पर बाँधे जाने वाला नाड़ा), स्वस्तिक, ओम, पीपल, आम और कैले के पत्तों का सनातन धर्म में बहुत महत्व है। भोजन करने के पूर्व कुछ मात्रा में भोजन को अग्नि को समर्पित करने से वैश्वदेव यज्ञ पूर्ण होता है।

तंत्रसार के अनुसार अगर, तगर, कुष्ठ, शैलज, शर्करा, नागरमाथा, चंदन, इलाइची, तज, नखनखी, मुशीर, जटामांसी, कर्पूर, ताली, सदलन और गुग्गुल ये सोलह प्रकार के धूप माने गए हैं। इसे षोडशांग धूप कहते हैं। मदरत्न के अनुसार चंदन, कुष्ठ, नखल, राल, गुड़, शर्करा, नखगंध, जटामांसी, लघु और क्षौद्र सभी को समान मात्रा में मिलाकर जलाने से उत्तम धूप बनती है। इसे दशांग धूप कहते हैं।

इसके अलावा भी अन्य मिश्रणों का भी उल्लेख मिलता है जैसे- छह भाग कुष्ठ, दो भाग गुड़, तीन भाग लाक्षा, पाँचवाँ भाग नखला, हरीतकी, राल समान अंश में, दपै एक भाग, शिलाजय तीन लव जिनता, नागरमोथा चार भाग, गुग्गुल एक भाग लेने से अति उत्तम धूप तैयार होती है। रुहिकाख्य, कण, दारुसिहृक, अगर, सित, शंख, जातीफल, श्रीश ये धूप में श्रेष्ठ माने जाते हैं।

यहाँ प्रस्तुत है सामान्य तौर पर गुड़ और घी से दी जाने वाली धूप के महत्व के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

कैसे दें धूप : धूप देने और दीप जलाने का बहुत ज्यादा महत्व है। सामान्य तौर पर धूप दो तरह से ही दी जाती है। पहला गुग्गुल-कर्पूर से और दूसरा गुड़-घी मिलाकर जलते कंडे पर उसे रखा जाता है। यहाँ गुड़ और घी से दी गई धूप का खास महत्व है।


सर्वप्रथम एक कंडा जलाएँ। फिर कुछ देर बाद जब उसके अंगारे ही रह जाएँ तब गुड़ और घी बराबर मात्रा में लेकर उक्त अंगारे पर रख दें और उसके आस-पास अँगुली से जल अर्पण करें। अँगुली से देवताओं को और अँगूठे से अर्पण करने से वह धूप पितरों को लगती है। जब देवताओं के लिए करें तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश का ध्यान करें और जब पितरों के लिए अर्पण करें तब अर्यमा सहित अपने पितरों का ध्यान करें और उनसे सुख-शांति की कामना करें।

धूप देने के नियम : रोज धूप नहीं दे पाएँ तो तेरस, चौदस, और अमावस्या, चौदस तथा पूर्णिमा को सुबह-शाम धूप अवश्य देना चाहिए। सुबह दी जाने वाली धूप देवगणों के लिए और शाम को दी जाने वाली धूप पितरों के लिए।

धूप देने के पूर्व घर की सफाई कर दें। पवित्र होकर-रहकर ही धूप दें। धूप ईशान कोण में ही दें। घर के सभी कमरों में धूप की सुगंध फैल जाना चाहिए। धूप देने और धूप का असर रहे तब तक किसी भी प्रकार का संगीत नहीं बजाना चाहिए। हो सके तो कम से कम बात करना चाहिए।

लाभ : धूप देने से मन, शरीर और घर में शांति की स्थापना होती है। रोग और शोक मिट जाते हैं। गृहकलह और आकस्मिक घटना-दुर्घटना नहीं होती। घर के भीतर व्याप्त सभी तरह की नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकलकर घर का वास्तुदोष मिट जाता है। ग्रह-नक्षत्रों से होने वाले छिटपुट बुरे असर भी धूप देने से दूर हो जाते हैं। श्राद्धपक्ष में 16 दिन ही दी जाने वाली धूप से पितृ तृप्त होकर मुक्त हो जाते हैं तथा पितृदोष का समाधान होकर पितृयज्ञ भी पूर्ण होता है।


ॐ ॐ


आयोडीन के नाम पर जो महंगा नमक बेचा जा रहा है... वह आयोडीन केवल हम खरीदते हैं...वह हमारे भोजन में पहुंचता ही नहीं...!!


आज हिन्दुराष्ट्र भारत में आयोडीन के नाम पर जो महंगा नमक बेचा जा रहा है... वह आयोडीन केवल हम खरीदते हैं...वह हमारे भोजन में पहुंचता ही नहीं...!!

हमारे देश की रसोई में रोज खाना बनाने की परंपरा है हमारे देश की बहू बेटियां प्रतिदिन हमें ताजा खाना बनाकर ...गरमा गरम खाना परोसती हैं

जबकि विदेशों में बाजार से खरीदा हुआ ठंडा बासी खाना जो फ्रिज में हफ़्तों पड़ा रहा हो ... वह भी खाने की परंपरा है.

आयोडीन एक अत्यंत वाष्पशील पदार्थ है और यह हलकी सी गर्मी से ही बाष्प बनके उड़ जाता है. अपनी सब्जी, दाल, कढ़ी में जिस आयोडीन नमक को हम डालते हैं... वह हलकी सी गर्मी भी नहीं झेल सकता और यह वाष्प बनके तुरंत उड़ जाता है. आपकी रसोई में रखा हुआ नमक का पैकेट भी अगर गर्म है और खुला हुआ है तो आयोडीन उसमें है ही नहीं.. जाँच करके देख लीजिये.

आप थोडा सा स्टार्च या चावल या मक्का या गेंहू का आटा लीजिये..
या अमरुद को काट लीजिये रिवाईटल तो घर में होगा... कपड़ों में डालने वाला

इनमें से किसी भी वस्तु पर आप जिस ब्रांड के आयोडीन नमक को डालना चाहें... डालिए...अगर रंग बदल के हल्का काला या नीला हो जाय तो इसका अर्थ है... उस नमक में आयोडीन है.

अब उस एक चम्मच नमक को हल्का सा ही गर्म कीजिये या नमक को पानी में घोल लीजिये और गर्म कीजिये और पुनः डालके देखिये...
अब रंग नहीं बदलेगा ...इसका अर्थ है... आयोडीन हवा में वाष्प बन के उड़ गया.!!

हम जिस स्टाईल में सब्जी, दाल, कढ़ी बनाते समय पहले नमक डाल के देर तक भूनते है.. या दो चार सीटी लगा के उबाल उबाल के दाल या कढ़ी बनाते हैं ...


उसके बाद एक अणु आयोडीन भी उस भोजन में बचता ही नहीं.
लेकिन चिंता मत कीजिये... इस आयोडीन की आपको जरूरत भी नहीं है...
इसलिए..कम्पनियाँ इसको केवल बेचती हैं... आपको खाने नहीं देती...
नहीं तो आप अधिक आयोडीन खाने से बौने रह जायेंगे.
हा हा हा

नमक में जिस आयोडीन की बात कर कर के इस देश में करोड़ों का नमक का बाजार बनाया गया ...वह इस देश के गरीबों के साथ धोखा है... और कुछ नहीं.


आज नमक जो कभी एक रुपये का पांच किलो मिलता था अब दूध के भाव १५ -१६ रुपये किलो बिक रहा है और बड़ी बड़ी कम्पनियाँ आयोडीन का भय दिखा दिखा के करोड़ों लूट रही हैं...!!

जिस देश के पास हजारों किलोमीटर लम्बा समुद्र तट हो और जहाँ नहाने पर भी मुंह, कान, नाक में रेट के साथ फ्री का नमक भर जाय वहां नमक भी बाजार का ब्रांड बन गया ...! 
स्टेटस सिम्बल है... अब आयोडीन नमक...आज लोगों की आँखों न पानी हैं न नमक ...मगर इसकी चिंता कोई नहीं करता !!

यह बाजारवाद की संस्कृति हमारे गलें में घेघा ठीक करे न करें... घेंघा का डर दिखाने वाले रिसर्च की फंब्डिंग जरूर करती है...! पहले झूठ मूठ के रिसर्च करो...फिर बाजार में विकल्प के नाम पर कूड़ा बेचो...!!

अधिक आयोडीन खाने से ही दसों बीमारियाँ होती हैं...भाई अपनी गर्दन को घेंघा से नहीं .. इन बाजार में बैठे डकैतों से... बचाईये...

सोचिये जरा ...!


13 October 2012

बिरसा मुंडा/Birsa


'बिरसा भगवान्' के नाम से लोकप्रिय बिरसा मुंडा का जन्म सन 1875 में झारखण्ड राज्य के रांची जिले में हुआ था। उनका जन्म बृहस्पतिवार को हुआ था, इसलिए मुंडा जनजातियों की परंपरा के अनुसार उनका नाम 'बिरसा मुंडा' रखा गया। इनके पिता एक खेतिहर मजदूर थे। पिता के पास रहने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं था और वे बाँस से बनी एक छोटी सी झोंपड़ी में अपने परिवार के साथ रहते थे।

बिरसा बचपन से ही बड़े प्रतिभाशाली थे। वे अन्य मुंडा बच्चों की तरह ही अपने साथियों के साथ मिट्टी और रेत में खेला करते थे। जैसे-जैसे वे बड़े होने लगे, उनका शरीर मजबूत और सुडौल बनने लगा। कुछ बड़ा होने पर वे अपने साथियों के साथ जंगल में भेड़-बकरियां चराने जाने लगे। जंगल में वें बाँसुरी बजाया करते थे। बाँसुरी बजाने में वे इतने प्रवीण हो गए थे कि उसकी मधुर तान सुनकर लोग उनके पास आकर इकठ्ठा हो जाते थे। बिरसा का परिवार अत्यंत गरीबी में जीवन-यापन कर रहा था। गरीबी के कारण ही बिरसा को उनके मामा के पास भेज दिया गया। वहीं पर वह एक स्कूल में जाने लगे। स्कूल के संचालक बिरसा की प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बिरसा को जर्मन मिशन स्कूल में पढने की सलाह दी। जर्मन मिशन स्कूल में पढने के लिए ईसाई धर्म स्वीकार करना अनिवार्य था। अतः बिरसा और उनके सभी परिवार वालों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। धर्मान्तरण के बाद मुंडा का नाम बदलकर 'बिरसा डेविड' रख दिया गया। उनके कुछ साथी उन्हें बिरसा दाउद कहकर बुलाने लगे। सन 1886 से 1890 तक का समय बिरसा ने जर्मन मिशन में बिताया। इसके बाद उन्होंने जर्मन मिशनरी की सदस्यता त्याग दी और प्रसिद्ध वैष्णव भक्त आनंद पांडे के संपर्क में आये।

बिरसा ने आनंद पांडे से धार्मिक शिक्षा ग्रहण की। आनंद पांडे के सत्संग से उनकी रूचि भारतीय दर्शन और संस्कृति के रहस्यों को जानने की ओर हो गयी। धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ उन्होंने रामायण, महाभारत, हितोपदेश, गीता आदि धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया। इसके बाद वे सत्य की खोज के लिए एकांत स्थान पर कठोर साधना करने लगे। लगभग चार वर्ष के एकांतवास के बाद जब बिरसा प्रकट हुए तो उनका रूप बिलकुल बदला हुआ था। वे एक हिन्दू महात्मा की तरह पीला वस्त्र, लकड़ी की खडाऊं और यज्ञोपवीत धारण करने लगे थे।

बिरसा ने हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रचार करना शुरू कर दिया। ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले वनवासी बंधुओं को उन्होंने समझाया कि ईसाई धर्म हमारा अपना धर्म नहीं है। यह अंग्रेजों का धर्म है। वे हमारे देश पर शासन करतें हैं, इसलिए वे हमारे हिन्दू धर्म का विरोध और ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे हैं। ईसाई धर्म अपनाने से हम अपने पूर्वजों की श्रेष्ठ परंपरा से विमुख होते जा रहे हैं। अब हमें जागना चाहिए। उनके विचारों से प्रभावित होकर बहुत से वनवासी उनके पास आने लगे और उनके शिष्य बन गए। धीरे-धीरे एक महात्मा और सुधारक के रूप में बिरसा मुंडा की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। उन्होंने गौ-हत्या का विरोध किया और अपने शिष्यों को नित्य तुलसी की पूजा करने की प्रेरणा दी।

सन 1893-94 में सिंघभूमि, मानभूमि, पालामऊ आदि क्षेत्रों की भूमी को अंग्रेजी सरकार ने आरक्षित वन क्षेत्र घोषित कर दिया। इसके अंतर्गत जंगल में बसे गाँवों को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर दिया और वनवासियों के अधिकारों को बहुत कम कर दिया गया। वन अधिकारी वनवासियों के साथ ऐसा व्यवहार करते थे जैसे उनके सभी अधिकार समाप्त कर दिए गए हों। वनवासियों ने इसका विरोध किया और अदालत में एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने अपने पुराने पैतृक अधिकारों को बहाल करने की मांग की। इस याचिका पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। बिरसा मुंडा ने वनवासी किसानों को साथ लेकर स्थानियों अधिकारियों के अत्याचारों के विरुद्ध याचिका दायर की। इस याचिका का भी कोई परिणाम नहीं निकला।

बिरसा के विचारों का वनवासी बंधुओं पर गहरा प्रभाव पड़ा। धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयायी बनते गए। बिरसा उन्हें प्रवचन सुनाते और अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रेरणा देते। इस प्रकार उन्होंने वनवासियों का संगठन बना लिया। बिरसा के बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता को देखकर अंग्रेज मिशनरी चिंतित हो उठे। उन्हें डर था कि बिरसा द्वारा बनाया गया वनवासियों का यह संगठन आगे चलकर मिशनरियों और अंग्रेजी शासन के लिए खतरे की घंटी बन सकता है। अतः बिरसा को गिरफ्तार कर लिया गया। बिरसा की चमत्कारी शक्ती और उनकी सेवाभावना के कारण वनवासी उन्हें भगवान का अवतार मानने लगे थे। अतः उनकी गिरफ्तारी से सारे वनांचल में असंतोष फ़ैल गया। वनवासियों ने हजारों की संख्या में एकत्रित होकर पुलिस थाने का घेराव किया और उनको निर्दोष बताते हुए उन्हें छोड़ने की मांग की। अंग्रेजी सरकार ने वनवासी मुंडाओं पर भी राजद्रोह का आरोप लगाकर उन पर मुकदमा चला दिया। बिरसा को दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गयी और फिर हजारीबाग की जेल में भेज दिया गया। बिरसा का अपराध यह था कि उन्होंने वनवासियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने हेतु संगठित किया था। जेल जाने के बाद बिरसा के मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा और बढ़ गयी और उन्होंने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया।

दो वर्ष की सजा पूरी करने के बाद बिरसा को जेल से मुक्त कर दिया गया। उनकी मुक्ति का समाचार पाकर हजारों की संख्या में वनवासी उनके पास आये। बिरसा ने उनके साथ गुप्त सभाएं कीं और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए उन्हें संगठित किया। अपने साथियों को उन्होंने शस्त्र संग्रह करने, तीर कमान बनाने और कुल्हाड़ी की धार तेज करने जैसे कार्यों में लगाकर उन्हें सशस्त्र क्रान्ति की तैयारी करने का निर्देश दिया। सन 1899 में इस क्रांति का श्रीगणेश किया गया। बिरसा के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने रांची से लेकर चाईबासा तक की पुलिस चौकियों को घेर लिया और ईसाई मिशनरियों तथा अंग्रेज अधिकारियों पर तीरों की बौछार शुरू कर दी। रांची में कई दिनों तक कर्फ्यू जैसी स्थिति बनी रही। घबराकर अंग्रेजों ने हजारीबाग और कलकत्ता से सेना बुलवा ली। अब बिरसा के नेतृत्व में वनवासियों ने अंग्रेज सेना से सीधी लड़ाई छेड़ दी। अंग्रेजों के पास बंदूक, बम आदि आधुनिक हथियार थे, जबकि वनवासी क्रांतिकारियों के पास उनके साधारण हथियार तीर-कमान आदि ही थे। बिरसा और उनके अनुनायियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेज सेना का मुकाबला किया। अंत में बिरसा के लगभग चार सौ अनुयायी मारे गए। बिरसा को गिरफ्तार करने का बहुत प्रयास किया गया लेकिन वें अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आये। इस घटना के कुछ दिन बाद अंग्रेजों ने मौका पाकर बिरसा को जंगल से गिरफ्तार कर लिया। उन्हें जंजीरों में जकड़कर रांची जेल में भेज दिया गया, जहाँ उन्हें कठोर यातनाएं दी गयीं। बिरसा हँसते-हँसते सब कुछ सहते रहे और अंत में 9 जून 1900 को उनका देहावसान हो गया। बिरसा ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी दिशा देकर भारतीयों, विशेषकर वनवासियों में स्वदेश प्रेम की भावना जाग्रत की।

बिरसा मुंडा की गणना महान देशभक्तों में की जाती है। उन्होंने वनवासियों को संगठित कर उन्हें अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए तैयार किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारतीय संस्कृति की रक्षा करने के लिए धर्मान्तरण करने वाले ईसाई मिशनरियों का विरोध किया। ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले हिन्दुओं को उन्होंने अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की जानकारी दी और अंग्रेजों के षडयन्त्र के प्रति सचेत किया । आज भी झारखण्ड, उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के वनवासी लोग बिरसा को भगवान के रूप में पूजते हैं। अपने पच्चीस वर्ष के अल्प जीवनकाल में ही उन्होंने वनवासियों में स्वदेशी तथा भारतीय संस्कृति के प्रति जो प्रेरणा जगाई वह अतुलनीय है। धर्मान्तरण, शोषण और अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति का संचालन करने वाले महान सेनानायक थे 'बिरसा मुंडा'।