08 October 2012

धार्मिक कार्यों में 108 की संख्या का महत्व ही क्यों ?



जब हम माला करते है तो मन में अक्सर ये प्रश्न आता है कि माला में १०८ मनके ही क्यों होते है.इससे कम या ज्यादा क्यों नहीं ? हमारे धर्म में 108 की संख्या महत्वपूर्ण मानी गई है. ईश्वर नाम के जप, मंत्र जप, पूजा स्थल या आराध्य की परिक्रमा, दान इत्यादि में इस गणना को महत्व दिया जाता है. जपमाला में इसीलिए 108 मणियाँ या मनके होते हैं. उपनिषदों की संख्या भी 108 ही है. विशिष्ट धर्मगुरुओं के नाम के साथ इस संख्या को लिखने की परंपरा है. तंत्र में उल्लेखित देवी अनुष्ठान भी इतने ही हैं.

परंपरानुसार इस संख्या का प्रयोग तो सभी करते हैं, लेकिन इसको अपनाने के रहस्यों से ज्यादातर लोग अनभिज्ञ होंगे. अतः इस हेतु कुछ तथ्य प्रस्तुत हैं-

1. - इस विषय में धार्मिक ग्रन्थों में अनेक मत हैं .एक मत के अनुसार हम २४ घंटों में २१,६०० बार सांस लेते हैं. १२ घंटे का समय अपनी दिनचर्या हेतु निर्धारित है और बाकी के १२ घंटे का समय देव आराधना हेतु. अर्थात १०,८०० सांसों में ईष्टदेव का स्मरण करना चाहिये, किन्तु इतना समय दे पाना मुश्किल है. अत: अन्तिम दो शून्य हटा कर शेष १०८ सांसों में प्रभु स्मरण का विधान बनाया गया है . इसी प्रकार मणियों की संख्या १०८ निर्धारित की गयी है.

2.- दूसरी विचारधारा के अनुसार सॄष्टि के रचयिता ब्रह्म हैं. यह एक शाश्वत सत्य है. उससे उत्पन्न अहंकार के दो गुण होते हैं , बुद्धि के तीन , मन के चार , आकाश के पांच , वायु के छ, अग्नि के सात, जल के आठ और पॄथ्वी के नौ गुण मनुस्मॄति में बताये गये हैं. प्रक्रिति से ही समस्त ब्रह्मांड और शरीर की सॄष्टि होती है. ब्रह्म की संख्या एक है जो माला मे सुमेरु की है. शेष प्रकॄति के २+३+४+५+६+७+८+९=४४ गुण हुये. जीव ब्रह्म की परा प्रकॄति कही गयी है. इसके १० गुण हैं. इस प्रकार यह संख्या ५४ हो गयी , जो माला के मणियों की आधी संख्या है ,जो केवल उत्पत्ति की है. उत्पत्ति के विपरीत प्रलय भी होती है, उसकी भी संख्या ५४ होगी. इस माला के मणियों की संख्या १०८ होती है.

माला में सुमेरु ब्रह्म जीव की एकता दर्शाता है. ब्रह्म और जीव मे अंतर यही है कि ब्रह्म की संख्या एक है और जीव की दस इसमें शून्य माया का प्रतीक है, जब तक वह जीव के साथ है तब तक जीव बंधन में है. शून्य का लोप हो जाने से जीव ब्रह्ममय हो जाता है.

माला का यही उद्देश्य है कि जीव जब तक १०८ मणियों का विचार नहीं करता और कारण स्वरूप सुमेरु तक नहीं पहुंचता तब तक वह इस १०८ में ही घूमता रहता है . जब सुमेरु रूप अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान प्राप्त कर लेता है तब वह १०८ से निवॄत्त हो जाता है अर्थात माला समाप्त हो जाती है. फ़िर सुमेरु को लांघा नहीं जाता बल्कि उसे उलट कर फ़िर शुरु से १०८ का चक्र प्रारंभ किया जाता है

108 की संख्या परब्रह्म की प्रतीक मानी जाती है. 9 का अंक ब्रह्म का प्रतीक है. विष्णु व सूर्य की एकात्मकता मानी गई है अतः विष्णु सहित 12 सूर्य या आदित्य हैं. ब्रह्म के 9 व आदित्य के 12 इस प्रकार इनका गुणन 108 होता है. इसीलिए परब्रह्म की पर्याय इस संख्या को पवित्र माना जाता है.

3.- मानव जीवन की 12 राशियाँ हैं. ये राशियाँ 9 ग्रहों से प्रभावित रहती हैं. इन दोनों संख्याओं का गुणन भी 108 होता है.

4.- नभ में 27 नक्षत्र हैं. इनके 4-4 पाद या चरण होते हैं. 27 का 4 से गुणा 108 होता है. ज्योतिष में भी इनके गुणन अनुसार उत्पन्न 108 महादशाओं की चर्चा की गई है.

5.- ऋग्वेद में ऋचाओं की संख्या 10 हजार 800 है. 2 शून्य हटाने पर 108 होती है.

6.- शांडिल्य विद्यानुसार यज्ञ वेदी में 10 हजार 800 ईंटों की आवश्यकता मानी गई है. 2 शून्य कम कर यही संख्या 
108 शेष रहती है.

जैन मतानुसार भी अक्ष माला में 108 दाने रखने का विधान है. यह विधान गुणों पर आधारित है. अर्हन्त के 12, सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25 व साधु के 27 इस प्रकार पंच परमिष्ठ के कुल 108 गुण होते हैं.

(जनेऊ) एक उपनयन संस्कार है



यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक उपनयन संस्कार है जिसमें जनेऊ पहना जाता है इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है. यज्ञोपवीत को जनेऊ, ब्रहासूत्र कहते है.यज्ञोपवीत= यज्ञ + उपवती अर्थात जिसे यज्ञ कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो यज्ञोपवीत धारण किये बिना किसी को गायत्री मंत्र करने या वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है, और इसके बाद ही विद्यारंभ होता है.

सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है. यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ होता है.

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है, इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं. ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है. तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है, तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं. अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है. यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।


ब्रह्मचारी को तीन धागों बाला और विवाहित को 6 धागो बाला जनेऊ धारण करना चाहिये.

अशौच के समय जनेऊ कान में क्यों बांधते है

धार्मिक महत्व - शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है. आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है. यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता.

शारीरिक महत्व - यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव इसका सदैव धारण करना चाहिए.

"यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत "

अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है. हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान पर से उतारें. यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है.जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है. इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का हिस्सा अपवित्र माना गया है.

दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है दाएं कान को ब्रहमसूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है. यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां कान ब्रहमसूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है


मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है.आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है. जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते.


यज्ञोपवीत बाएँ कंधे पर ही क्यों 

यज्ञोपवीत व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है.इस प्रकार धारण करने के मूल में भी एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है. शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है.यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है. यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता.

अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है.


यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है। 

यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता। अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है। 

यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है। इसीलिए सभी धर्मों में किसी न किसी कारणवश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। 

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है। यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव एसका सदैव धारण करना चाहिए। शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। 

आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।

यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत। अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है। अपनी अशुचि अवस्था को सूचित करने के लिए भी यह कृत्य उपयुक्त सिद्ध होता है। हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान पर से उतारें। इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का हिस्सा 

अपवित्र माना गया है। दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है। मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है। दाएं कान को ब्रrासूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है। यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है। यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां कान ब्राम्सूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है।

बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दाएं कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है। किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है। अंडवृद्धि के सात कारण हैं। मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है। दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है। इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है।

पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, 

जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांति मौजूद है| लोग जनेऊ को धर्म से जोड़ दिए हैं जबकि सच तो कुछ और ही है| तो आइए जानें कि सच क्या है? जनेऊ पहनने से आदमी को लकवा से सुरक्षा मिल जाती है| क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए अन्यथा अधर्म होता है| 

दरअसल इसके पीछे साइंस का गहरा रह्स्य छिपा है| दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता| आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का| अब एक एक जनेऊ में 9 - 9 धागे होते हैं| जो हमें 
बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9 - 9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है| अब इन 9 - 9 धांगों के अंदर से 1 - 1 धागे निकालकर देंखें तो इसमें 27 - 27 धागे होते हैं| अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27 - 27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है| अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36 = 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है| अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के मिलने सेबना है | 1 + 1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा हमें शीतलता प्रदान करता है| जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है| तो यह रहा जनेऊ का वास्तविक रहस्य|

जनेऊ कान पर क्यों चढ़ाते है?

जनेऊ को अपवित्र होने से बचाने के लिए लघुशंका एवं दीर्घशंका के समय उसे दाहिने कान पर चढाने का नियम है। दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ाने का वैज्ञानिक कारण है; आयुर्वेद के अनुसार, दाहिने कान पर 'लोहितिका' नामक एक विशेष नाड़ी होती है, जिसके दबने से मूत्र का पूर्णतया निष्कासन हो जाता है। इस नाड़ी का सीधा संपर्क अंडकोष से होता है। हर्निया नामक रोग का उपचार करने के लिए डॉक्टर दाहिने कान की नाड़ी का छेधन करते है । एक तरह से जनेऊ 'एक्यूप्रेशर' का भी काम करता है

पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी गयी है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, 


जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते।जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

दिशा अनुसार करें रंगों का प्रयोग



रंग जीवंतता के प्रतीक हैं। विभिन्न रंगों से प्रेम हमारी अलग-अलग मनोभावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। मानव जीवन पर उसके भवन की ऊर्जा का गहरा प्रभाव पड़ता है और इस ऊर्जा को संतुलित करने का विज्ञान है वास्तु शास्त्र।


किसी भी भवन में गृहस्वामी का शयनकक्ष तथा कारखानों, कार्यालयों में दक्षिण-पश्चिम भाग में जो भी कक्ष हो, वहाँ की दीवारों व फर्नीचर आदि का रंग हल्का गुलाबी अथवा नींबू जैसा पीला हो तो श्रेयस्कर रहता है।

गुलाबी रंग को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। यह आपसी सामंजस्य तथा सौहार्द में वृद्धि करता है। इस रंग के क्षेत्र में वास करने वाले जातकों की मनोभावनाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। इस भाग में गहरे लाल तथा गहरे हरे रंगों का प्रयोग करने से जातक की मनोवृत्तियों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

इसी प्रकार उत्तर-पश्चिम के भवन में हल्के स्लेटी रंग का प्रयोग करना उचित रहता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार यह भाग घर की अविवाहित कन्याओं के रहने या अतिथियों के ठहरने हेतु उचित माना जाता है। किसी कार्यालय के उत्तर-पश्चिम भाग में भी स्लेटी रंग का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।

भवन के दक्षिण भाग में नारंगी रंग का प्रयोग करना उचित माना जाता है। इस रंग के प्रयोग से मन में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता है। इसके ठीक विपरीत इस भाग में यदि हल्के रंगों का प्रयोग किया जाता है तो सुस्ती एवं आलस्य की वृद्धि होती है। भवन में पूरब की ओर बने हुए कक्ष में सफेद रंग का प्रयोग किया जाना अच्छा रहता है। सफेद रंग सादगी एवं शांति का प्रतीक होता है।

इस स्थान पर चटख रंगों का प्रयोग करने से मन चंचल होगा। भवन में पश्चिम दिशा के कक्ष में नीले रंग का प्रयोग किया जाना चाहिए। ऐसा करने से वहाँ रहने वाले आज्ञाकारी और आदर देने वाले बने रहेंगे तथा उनके मन में अच्छी भावना बनी रहेगी।

नीला रंग नीलाकाश की विशालता, त्याग तथा अनंतता का प्रतीक है, वहाँ रहने वाले के मन में संकुचित या ओछे भाव उत्पन्न नहीं होंगे। वास्तु के उत्तर-पूर्वी भाग को हरे एवं नीले रंग के मिश्रण से रंगना अच्छा रहता है, यह स्थान जल तत्व का माना जाता है। इसलिए इस स्थान पर चटख रंगों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। भवन में दक्षिण-पूर्व का भाग अग्नि तत्व का माना जाता है। इस स्थान की साज-सज्जा में पीले रंग का प्रयोग उचित होता है।

वास्तु शास्त्र के सामान्य नियम (Vastu Shastra)

आजकल वास्तुशास्त्र का बोलबाला है। एक सामान्य से घर को वास्तु के इतने जटिल नियमों में बाँध दिया जाता है कि जिन्हें पढ़कर मनुष्य न केवल भ्रमित हो जाता है वरन जिनके घर पूर्णत: वास्तु अनुसार नहीं होते, वे शंकाओं के घेरे में आ जाते हैं। ऐसे मनुष्य या तो अपना घर बदलना चाहते हैं या शंकित मन से घर में निवास करते हैं।

वास्तु विज्ञान का स्पष्ट अर्थ है चारों दिशाओं से मिलने वाली ऊर्जा तरंगों का संतुलन...। यदि ये तरंगें संतुलित रूप से आपको प्राप्त हो रही हैं, तो घर में स्वास्थ्य व शांति बनी रहेगी। अत: ढेरों वर्जनाओं में बँधने की बजाय दिशाओं को संतुलित करें तो लाभ मिल सकता है। निम्न निर्देशों का ध्यान रखें-

1. किचन दक्षिण-पूर्व में, मास्टर बैडरूम दक्षिण-पश्चिम में, बच्चों का बैडरूम उत्तर-पश्चिम में और शौचालय आदि दक्षिण में हों। 


2. पानी की निकासी उत्तर में हो, ईशान (उत्तर-पूर्व) खुला हो, दक्षिण-पश्चिम दिशा में भारी सामान हो।

3. मुख्य दरवाजा अन्य दरवाजों से बड़ा और भारी हो।


4. खि‍ड़कियाँ व दरवाजे सम संख्या में हों व पूर्व या उत्तर में खुलें।

5. तीन दरवाजे एक सीध में न हों, दरवाजे बंद करते या खोलते समय आवाज न हो।

6. पूजा के लिए ईशान कोण हो या भगवान का मुख ईशान में हो।

7. उत्तर या पूर्व में तुलसी का पौधा लगाएँ।

8. पूर्वजों के फोटो पूजाघर में न रखें, दक्षिण की दीवार पर लगाएँ।

9. शाम को घर में सांध्यदीप जलाएँ। आरती करें।

10. इष्टदेव का ध्यान और पूजन अवश्य करें।

11. भोजन के बाद जूठी थाली लेकर अधिक देर तक न बैठें। न ही जूठे बर्तन देर तक सिंक में रखें।

12. अपनी आय का एक हिस्सा इष्टदेव के नाम पर अलग रखें। घर में हमेशा समृद्धि बनी रहेगी।

घर का मुख्य द्वार किस दिशा में हो, यह भी चिंता का विषय रहता है। अधिकतर दक्षिण व पश्चिम द्वार को शुभ नहीं माना जाता मगर यह तय ‍करने के लिए जन्म पत्रिका का अध्ययन जरूरी है। कुछ राशियों के लोगों के लिए ये द्वार बेहद शुभ फल देते हैं विशेषकर जिन लोगों की कुंडली में शनि-मंगल शुभ कारक ग्रह होते हैं। अत: हर दृ‍ष्टि से विचार करके वास्तु संबंधी बातें तय की जाएँ तो घर में सर्वत्र सुख-शांति का वास रह सकता है।

वास्तु व जीवन में बाँसुरी की महत्वपूर्ण भूमिका



जीवन में सुख और दुःख दोनों ही आते-जाते रहते हैं। दुःख के अनंतर सुख आता है और सुख के अनंतर दुःख आता है। इस प्रकार सुख और दुःख आपस में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। सुख-दुःख व दुःख-सुख की यह भाव श्रृंखला न जाने कब से चली आ रही हैं। इस संसार में न तो कोई पूर्ण सुखी है और न ही कोई पूर्ण दुःखी। यहाँ प्रत्येक मनुष्य प्रभु की माया के छलावे में आकर जीवन-भर बेहोशीपूर्ण व्यवहार करता रहता है। उसे यह जानने की फुर्सत ही नहीं मिलती कि वास्तव में वह कौन है, कहाँ से आया है, कहाँ जाएगा और साथ क्या ले जाएगा ? शरीर छोड़ने के पश्चात् क्या वह वापस अपने परिवार, सगे-सम्बन्धियों व आत्मीय जनों से मिल पाएगा अथवा नहीं।

स्वस्थ, प्रसन्न और मधुर जीवन के लिए हम अपने नज़रिए को ऊँचा और महान बनाएँ। जिस व्यक्ति की सोच और दृष्टि ऊँची और सकारात्मक होती है, वह अपने जीवन में कभी असफल नहीं हो सकता। सकारात्मक सोच संसार का वह विलक्षण मंत्र है कि जिससे यह सध गया, वह सफल जीवन का स्वतः स्वामी बन गया।

मनुष्य का जीवन प्रकृति और परमात्मा की एक महान सौगात है। जीवन को इस तरह जिया जाना चाहिए कि जीवन स्वयं वरदान बन जाए। मनुष्य का जीवन बाँस की पोंगरी की तरह है। यदि जीवन में स्वर और अंगुलियों को साधने की कला आ जाए, तो बाँस की पोंगरी भी बाँसुरी बनकर संगीत के सुमधुर संसार का सृजन कर सकती है। भला जब किसी बाँस की पोंगरी से संगीत पैदा किया जा सकता है, तो जीवन और माधुर्य और आनन्द का संचार क्यों नहीं किया जा सकता ?

दो दोस्त जब बेहद करीब आ जाते हैं तो उन्हें लगता है कि वे एक-दूसरे के बारे में सब कुछ जानते हैं। उनके बीच कोई बात रत्ती मात्र भी छिपी नहीं है। उन्हें महसूस होता है कि दोनों के जीवन में घटने वाली हर गंभीर घटना की जानकारी उन्हें अवश्य होगी। और यदि यह दोस्ती प्यार में बदल गई तो वे आँख मूँदकर एक-दूसरे पर विश्वास करने लगते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनका भरोसा भी पक्का होता जाता है। उन्हें अहसास होता है कि यह निश्चिंतता ही प्यार का दूसरा नाम है।

प्यार की धुन पर कदम मिलाकर चलने वाले इन प्रेमियों के होश व हवास उस समय उड़ जाते हैं जब एक ही पदचाप पूरी तरह सुनाई नहीं देती। बिना किसी सूचना के ही एक की बाँसुरी अलग राग अलापने लगती है। छेड़े गए उस राग को समझना सामने वाले के लिए नामुमकिन सा जान पड़ता है। दिल की हर झंकार को समझने वाला साथी तब मामूली सा संवाद बनाने में भी खुद को असमर्थ पाता है। ऐसे में एक इशारे में पूरी-पूरी पुस्तक का मायने समझने वाले व्यक्ति के लिए इस बेरुखी का मतलब निकालना कठिन हो जाता है। कुछ ही दिनों में रंगारंग कहानियों से लिखा यह रिश्ता कोरे कागज से ज्यादा कुछ नहीं रह जाता है। तब एक साथी को यह समझ नहीं आता कि वह इस वर्तमान को सच माने या बीते कल को।

घर की शान्ति -शंख और घंटी तथा बाँसुरी -

भारत में ध्वनि द्वारा घर तथा वातावरण को शुद्ध करने की परम्परा कई सदियों से चली आ रही है.

शंख के बारे में शोध किया गया और यह निष्कर्ष निकला कि शंख की आवाज से आसपास के सूक्ष्म कीटाणुओं में भारी कमी आ जाती है, इसी प्रकार घंटी व घंटे की आवाज से कुछ अदृश्य बुरी शक्तियां दूर होती है. चीन में इस सिंगिंग बाउल का प्रयोग परिवार के सदस्यों के बीच आपसी लगाव में सुधार लाने के लिए भी किया जाता है. इसकी ध्वनि येंग व यिन ऊर्जा में संतुलन लाती है.यदि आपको लगता है या महसूस हो रहा है कि घर-परिवार में कुछ अशांति हो रही है, तो इसका नियमित प्रयोग करने से घर की ऊर्जा शुद्ध हो जायेगी. चीन या फेंगशुई में इस ऊर्जा को ची कहा जाता है.




बाँसुरी को शान्ति, शुभता एवं स्थिरता का प्रतीक माना जाता है. यह उन्नति, प्रगति एवं सकारात्मक गुणों की वृद्धि की सूचक भी होती है. फेंगशुई और हमारे शास्त्रों में शुभ वस्तुओं में बाँसुरी का अत्यधिक महत्व है. फेंगशुई के उपायों का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वास्तु शास्त्र में जहां कहीं किसी दोष से पूर्णतः मुक्ति के लिए अशुभ निर्माण कार्य को तोड़ना आवश्यक होता है, वहीं फेंगशुई में अशुभ निर्माण को तोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होती है. अपितु पैगोडा, बाँसुरी आदि सकरात्मक वस्तुओं का प्रयोग कर के उस दोष से मुक्ति पा लेते है.

बाँसुरी का निर्माण बाँस के ताने से होता है. सभी वनस्पतियों में बाँस सबसे तेज गति से बढ़ने वाला पौधा होता है.इसी कारण से यह विकास का प्रतीक है.और किसी भी वातावरण में यह अपना अस्तित्व बनाए रखने की क्षमता इसमें होती है. यदि किसी भी दूकान या व्यवसाय स्थल पर इसके पौधे को लगाया जाए तो जैसे बाँस के पौधे की वृद्धि तेज गति से होगी, वैसे ही उस दूकान या व्यवसाय स्थल के मालिक की भी प्रगति होगी. बाँस के पौधे के ये सभी गुण बाँसुरी में भी विद्यमान होते है.



बाँसुरी का उपयोग न केवल फेंगशुई में, वरन वास्तु शास्त्र एवं ग्रह दोष निवारण में बहुत ही उपयोगी है. वास्तु में बीम संबंधी दोष, द्वार वेध, वृक्ष वेध, वीथी वेध आदि सभी वेधो के निराकरण में और अशुभ निर्माण संबंधी वास्तु दोषों में बाँसुरी का प्रयोग होता है. ग्रह दोषों के अंतर्गत शनि, राहू आदि पाप ग्रहों से सम्बन्धित दोषों के निवारण में बाँसुरी का कोई विपरीत प्रभाव नहीं होता है.

लेकिन बाँसुरी के प्रयोग में एक सावधानी अवश्य रखनी चाहिए वह यह है कि, जहां कहीं भी इसे लगाया जाए, वहां इसे बिलकुल सीधा नहीं लगा कर थोड़ा तिरछा लगाना चाहिए तथा इसका मुंह नीचे की तरफ होना चाहिए.


जापान, चीन, हांगकांग, मलेशिया और मध्य एशिया में इसका प्रयोग बहुतायत में किया जाता है. यदि किसी के विकास में अनेक प्रयास करने के बाद भी बाधाए उत्पन्न हो रही हो तो इस बाँसुरी का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए.वैसे तो ”बाँसुरी एक फायदे अनेक है”.

बाँसुरी के संबंध में एक धार्मिक मान्यता है कि जब बाँसुरी को हाथ में लेकर हिलाया जाता है, तो बुरी आत्माएं दूर हो जाति है. और जब इसे बजाया जाता है, तो ऐसी मान्यता है कि घरों में शुभ चुम्बकीय प्रवाह का प्रवेश होता है.


इस प्रकार बाँसुरी प्रकृति का एक अनुपम वरदान है. यदि सोच समझ कर इसका उपयोग किया जाए तो वास्तु दोषों का बिना किसी तोड़ फोड के निवारण कर अशुभ फलो से बचा जा सकता है. जहां रत्न धारण, रुद्राक्ष, यंत्र, हवन, आदि श्रमसाध्य और खर्चीले उपाय है, वहीं बाँसुरी का प्रयोग सस्ता, सुगम और प्रभावी होता है. अपनी आवश्यकता के अनुसार इसका प्रयोग करके लाभ उठाया जा सकता है.

१:- बाँसुरी बाँस के पौधे से निर्मित होने के कारण शीघ्र उन्नतिदायक प्रभाव रखती है अतः जिन व्यक्तियों को जीवन में पर्याप्त सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही हो, अथवा शिक्षा, व्यवसाय या नौकरी में बाधा आ रही हो, तो उसे अपने बैडरूम के दरवाजे पर दो बाँसुरियों को लगाना चाहिए.

२:- यदि घर में बहुत ही अधिक वास्तु दोष है, या दो या तीन दरवाजे एक सीध में है, तो घर के मुख्यद्वार के ऊपर दो बाँसुरी लगाने से लाभ मिलता है तथा वास्तु दोष धीरे धीरे समाप्त होने लगता है.

३:- यदि आप आध्यात्मिक रूप से उन्नति चाहते है, या फिर किसी प्रकार की साधना में सफलता चाहते है तो, अपने पूजा घर के दरवाजे पर भी बाँसुरिया लगाए. शीघ्र ही सफलता प्राप्त होगी.

४:- बैडरूम में पलंग के ऊपर अथवा डाइनिंग टेबल के ऊपर बीम हो तो, इसका अत्यंत खराब प्रभाव पड़ता है. इस दोष को दूर करने के लिए बीम के दोनों ओर एक एक बाँसुरी लाल फीते में बाँध कर लगानी चाहिए. साथ ही यह भी ध्यान रखे कि बाँसुरी को लगाते समय बाँसुरी का मुंह नीचे की ओर होना चाहिए.

५:- यदि बाँसुरी को घर के मुख हाल में या प्रवेश द्वार पर तलवार की तरह “क्रास” के रूप में लगाया जाए, तो आकस्मिक समस्याओं से छुटकारा मिलता है.

६:- घर के सदस्य यदि बीमार अधिक हों अथवा अकाल मृत्यु का भय या अन्य कोई स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्या हो, तो प्रत्येक कमरें के बाहर और बीमार व्यक्ति के सिरहाने बाँसुरी का प्रयोग करना चाहिए इससे अति शीघ्र लाभ प्राप्त होने लगेगा.

७:- यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में शनि सातवें भाव में अशुभ स्थिति में होकर विवाह में देर करवा रहे हो, अथवा शनि की साढ़ेसती या ढैया चल रही हो, तो एक बाँसुरी में चीनी या बूरा भरकर किसी निर्जन स्थान में दबा देना लाभदायक होता है इससे इस दोष से मुक्ति मिलती है.

८:- यदि मानसिक चिंता अधिक तेहती हो अथवा पति-पत्नी दोनों के बीच झगड़ा रहता हो, तो सोते समय सिरहाने के नीचे बाँसुरी रखनी चाहिए.

९:- यदि आप एक बाँसुरी को गुरु-पुष्य योग में शुभ मुहूर्त में पूजन कर के अपने गल्ले में स्थापित करते है तो इसके कारण आपके कार्य-व्यवसाय में बढोत्तरी होगी, और धन आगमन के अवसर प्राप्त होंगे.

१०:- पाश्चात्य देशो में इसे घरों में तलवार की तरह से भी लटकाया जाता है.इसके प्रभाव स्वरुप अनिष्ट एवं अशुभ आत्माओं एवं बुरे व्यक्तियों से घर की रक्षा होती है.

११:- घर और अपने परिवार की सुख समृधि और सुरक्षा के लिए एक बाँसुरी लेकर श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन रात बारह बजे के बाद भगवान श्री कृष्ण के हाथों में सुसज्जित कर दे तो इसके प्रभाव से पूरे वर्ष आपकी और आपके परिवार की रक्षा तो होगी ही तथा सभी कष्ट व बाधाए भी दूर होती जायेगी.

वास्तु अपनाएँ धन बढ़ाएँ



प्रत्येक व्यक्ति अपनी मेहनत से कमाए धन को सुरक्षित रखना तो चाहता ही है, साथ ही यह भी चाहता है कि उसमें दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी होती रहे। सामान्यतः हर व्यक्ति पैसे, आभूषण, मूल्यवान वस्तुएँ, कागजात वगैरह को सुरक्षित रखने के लिए तिजोरी, अलमारी, कैशबॉक्स इत्यादि का उपयोग करता है। इनमें धन सुरक्षित भी रहे और बढ़ता भी रहे। धन रखने के लिए उत्तर दिशा को सबसे शुभ माना गया है क्योंकि उत्तर दिशा का स्वामी धन का देवता कुबेर है।

* उत्तर दिशा : 

घर की इस दिशा में कैश व आभूषण जिस अलमारी में रखते हैं, वह अलमारी भवन की उत्तर दिशा के कमरे में दक्षिण की दीवार से लगाकर रखना चाहिए। इस प्रकार रखने से अलमारी उत्तर दिशा की ओर खुलेगी, उसमें रखे गए पैसे और आभूषण में हमेशा वृद्धि होती रहेगी।

* ईशान कोण : 

यहाँ पैसा, धन और आभूषण रखे जाएँ तो यह दर्शाता है कि घर का मुखिया बुद्धिमान है और यदि यह उत्तर ईशान में रखे हों तो घर की एक कन्या संतान और यदि पूर्व ईशान में रखे हों तो एक पुत्र संतान बहुत बुद्धिमान और प्रसिद्ध है।

* पूर्व दिशा :

यहाँ घर की संपत्ति और तिजोरी रखना बहुत शुभ होता है और उसमें बढ़ोतरी होती रहती है।

* आग्नेय कोण : 

यहाँ धन रखने से धन घटता है, क्योंकि घर के मुखिया की आमदनी घर के खर्चे से कम होने के कारण कर्ज की स्थिति बनी रहती है।

* दक्षिण दिशा :

इस दिशा में धन, सोना, चाँदी और आभूषण रखने से नुकसान तो नहीं होता परंतु बढ़ोत्तरी भी विशेष नहीं होती है।

* नैऋत्य कोण : 

यहाँ धन, महँगा सामान और आभूषण रखे जाएँ तो वह टिकते जरूर है, किंतु एक बात अवश्य रहती है कि यह धन और सामान गलत ढंग से कमाया हुआ होता है।

* पश्चिम दिशा : 

यहाँ धन-संपत्ति और आभूषण रखे जाएँ तो साधारण ही शुभता का लाभ मिलता है। परंतु घर का मुखिया अपने स्त्री-पुरुष मित्रों का सहयोग होने के बाद भी बड़ी कठिनाई के साथ धन कमा पाता है।

* वायव्य कोण : 

यहाँ धन रखा हो तो खर्च जितनी आमदनी जुटा पाना मुश्किल होता है। ऐसे व्यक्ति का बजट हमेशा गड़बड़ाया रहता है और कर्जदारों से सताया जाता है।

घर की तिजोरी के पल्ले पर बैठी हुई लक्ष्मीजी की तस्वीर जिसमें दो हाथी सूंड उठाए नजर आते हैं, लगाना बड़ा शुभ होता है। तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम या आफ व्हाइट रखना चाहिए।

सीढ़ियों के नीचे तिजोरी रखना शुभ नहीं होता है। सीढ़ियों या टायलेट के सामने भी तिजोरी नहीं रखना चाहिए। तिजोरी वाले कमरे में कबाड़ या मकड़ी के जाले होने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जो परिवार की खुशहाली में बाधा उत्पन्न करती है।

घर के अंदर से देखने पर घर के आगे के भाग के दाएँ हाथ की खिड़की पर स्थित कमरे में घर के जेवर, गहने, सोने-चाँदी के सामान, लक्जरी आर्टिकल्स रखे जाते हों, उस घर की मालकिन को सुख-सुविधाएँ पसंद होती हैं और उसे बहुत खुशियाँ प्राप्त होती हैं। उसका पैसा बेमतलब की वस्तुओं पर खर्च होता है और स्वास्थ्य हमेशा नरम-गरम चलता रहता है।
यदि ड्राइंग हॉल को पति-पत्नी अपने बेडरूम की तरह उपयोग में लें और उसका कोई भाग घर के पैसे और गहने रखने के काम में आ रहा हो तो ऐसे 

घर की महिला बुद्धिमान, सुंदर, बातचीत से प्रभावित करने वाली होती है और घर का मुखिया व्यापार में जमीन-जायदाद में बहुत अच्छा पैसा सरलता से कमाता है और लग्जरी के सब सुख-साधनों का उपभोग करता है। पति पत्नी को प्यार करता है और दोस्तों से अच्छे संबंध रखता है, पत्नी भी बहुत बुद्धिमान और संवेदनशील रहती है। यदि हॉल के अंदर इस तरह लोहे की तिजोरी में पैसा रखा जाए तो यह मानिए की यह बहुत शुभ और अच्छा होता है।

घर के खाद्यान्न रखने के कमरे में यदि घर के गहने, पैसे, आभूषण, कपड़े इत्यादि रखे जाएँ या यह सामान रखने का ही एक भाग हो तो ऐसे लोग पैसे उधार देने का काम करते हैं या ऐसे लोग लग्जरी आइटम या बड़े सौदों का काम कर पैसा कमाते हैं।

फेंगशुई के अनुसार शयनकक्ष या तिजोरी वाले कमरे के प्रवेश द्वार के सामने वाली दीवार के बाएँ कोने में संपत्ति एवं भाग्य का क्षेत्र होता है। यह कोना कभी भी कटा हुआ नहीं होना चाहिए और यहाँ पर धातु की कोई चीज रखना या लटकाना धन वृद्धि में सहायक होता है।

वास्तु (Vaastu) उपाय


माल बिकता नहीं हो तो :-


दुकान है माल पड़ा रहता है | बिकता भी नहीं , पड़ा रहता है तो जो माल पड़ा रहता है , उसे दुकान में उत्तर और पश्चिम दिशा के बीच वायव्य कोण पड़ता है उधर रख दो | तो वायव्य दिशा याने वायु भगवान् की दिशा है , तो माल वायु वेग से बिकेगा |

दुकान पे मन नहीं लगता हो तो :-


दुकान पे कई लोगो का मन नहीं लगता या मजा नहीं आता ....कई बार कुछ ग्राहिकीनहीं होती तो भी मन नहीं लगता या कई बार इससे ही मन उचाट रहता है …. दुकान पर मन नहीं लगता होतो दुकान के मुख्य द्वार पर गणपतिजी की तस्वीर लगायी जाये और थोडासा कपूर जला कर घुमा दें | जहाँ से ग्राहक आते है उधर और दुकान मेंशांत बैठ के थोड़ा गुरु मंत्र का जप करे | तो अपने आप मन भी लगता है और कोई दोष हो तो वो भी नष्ट हो जाते है |

धन में बरकत

तिजोरी का दरवाज़ा उत्तर की तरफ हो तो पैसों की बरकत होगी ।
दुकान में cash-box अगर उत्तर दिशा में खुलता हुआ हो तो उत्तर दिशा के मालिक कुबेर भंडारी की नजर पड़ने से धन की बरकत रहती है ।

घर के फालतू सामान!

अपने घर के छत पर फालतू सामान नहीं रखना चाहिए| इससे भार बढ़ता है कर्जे का, टेंशन का| फालतू सामान घर के नैर्रुत्य (पश्चिम - दक्षिण) कोण में रखना चाहिए|

दीपक की दिशा

दीपक अपने से दक्षिण दिशा की तरफ रखने से प्राण हानि होती है ।
दीपक अपने से नैऋत्य दिशा की तरफ रखने से विस्मृति कारक उर्जा बनती है ।
दीपक अपने से पश्चिम दिशा की तरफ रखने से शांतिदायक होता है ।
दीपक अपने से वायव्य दिशा की तरफ रखने से सम्पत्तिनाशक होता है ।
दीपक अपने से उत्तर दिशा की तरफ रखने से स्वास्थ्य व धन प्रदायक होता है ।
दीपक अपने से ईशान कोण दिशा की तरफ रखने से कल्याणकारक होता है ।

दिवाली के दिनों में

दिवाली (13th Nov' 2012)के दिनों में घर के पहले द्वार पर चावल का आटा और हल्दी का मिश्रण करके स्वस्तिक अथवा ॐ लगा देना, ताकि गृह दोष दूर हों और लक्ष्मी की स्थिति हो ।

बरकत व झगड़े शांत करने के लिए

घर में बरकत नहीं है तो खड़ा नमक व २-३ साबुत हल्दी एक कटोरी में रख दो । घर के झगड़े शांत होंगे व बरकत आएगी।
पति-पत्नी के झगड़े या अनबन

पति-पत्नी में झगड़े होते हों, तलाक को नौबत आ जाए अथवा पति-पत्नी में मन नहीं बनता है तो पति अपने सिर के नीचे सिन्दूर रख के सो जाए और पत्नी अपने सिर के नीचे कपूर रख के सो जाए । सुबह उठे तो कपूर की आरती कर डालें और पति सिन्दूर घर में फ़ेंक दें, तो पति-पत्नी का स्वभाव अच्छा हो जायेगा ।

लक्ष्मी की बरकत के लिए

  • ईशान कोण में तुलसी का पौधा लगाने से, गंगा जल रखने से या भगवान की मूर्ति रखने से घर में लक्ष्मी की बरकत होती है ।
  • घर के आँगन में बेल का पौधा लगाने से.....वो घर पाप नाशक व यशस्वी होता है । अगर उत्तर-पश्चिम में है तो यश बढेगा, उत्तर-दक्षिण में हो तो सुख-शांति बढेगा और बीच में है तो मधुर जीवन होगा l रविवार और द्वादश को बेल के पौधे की परिक्रमा करें तो बड़े-बड़े ब्रह्महत्या जैसे पाप ठीक हो जाते हैं।
  • घर में पीपल का पेड़ ठीक नहीं ....लेकिन खेत-खली में पश्चिम की तरफ पीपल का पेड़ बड़ा सम्पत्तिकारक है।
  • अमावस्या, शुक्रवार व रविवार छोड़कर आंवले का रस रगड़ के स्नान करने से भी लक्ष्मी स्थायी होती है ....ऐसा पद्म पुराण में आता है ।
  • गौझरण (गौ मूत्र) से शरीर को रगड़ के स्नान करने से पाप नाशक उर्जा पैदा होती है ।
  • गाय के दूध की दही .....वो रगड़ के थोड़ी देर "लक्ष्मी नारायण....लक्ष्मी नारायण" जप करें तो घर में लक्ष्मी स्थिर होती है ।

अशांति मिटाने के लिए

गाय के गोबर के कंडे लें, उसके ऊपर घी में भीगे हुए चावल डालकर जलाएं घर में शांति आएगी व वास्तु दोष दूर होंगे 

वास्तु के नियम


घर की छत धरती से सवा दस फुट की ऊँचाई पर होनी चाहिए l
घर के बड़े को दक्षिण-पश्चिम में रहना चाहिए l

धरती कैसी होनी चाहिए..... पश्चिम में ऊँची हो, पूर्व में ढली हो, दक्षिण में ऊँची हो और उत्तर में ढली हो  उस धरती पे कुछ भी करेगा मकान, धंधा ........सब टनाटन, छनाछन होगा 

07 October 2012

अच्छी सेहत का राज ...




दोस्तों शायद आप सोच रहे होंगे की इस Artical मे आपको मै कुछ 2 +2 =4 जैसा सीधा तरीका बताने वाला हूँ , सेहत के लिए , है ना ? 

चलिए ,सेहत का नुस्खा जानने के पहले हम ये तो जान लें , की सेहत या स्वास्थ्य (health) की परिभाषा क्या है ? आप किसे स्वस्थ मानेंगे ?किसी bodybuilder को, किसी हीरो को, कोई गोरा इंसान , कोई बहत सुंदर महिला ,कोई famous person, कोई अमीर या कोई पहलवान ?
दोस्तों ये सारे आधार सफलता के हो सकते हैं सेहत के नहीं !


आयुर्वेद के शब्दों मे स्वस्थ वही है जिसकी अग्नि सम है ,सारे system (heart ,kidney ,lungs ,stomach etc .) सही काम कर रहे हैं ,समय से भूख , समय से motion, समय से सही नींद जिसे आती है ! जिसकी आत्मा ,मन और 10 इन्द्रियां प्रसन्न है, 

मतलब देखना,सुनना,बोलना,सूंघना सांस लेना, महसूस करना वगेरह जिसका सही है वही स्वस्थ है !

संपूर्ण स्वस्थ्य वही है जो ना सिर्फ शरीर से बल्कि मन से भी स्वस्थ है ! ऐसे लोग आपको अक्सर दिख जाएँगे जो दिखने मे तो पहलवान हैं पर मन से बड़े कमजोर हैं , depressed हैं ! ऐसे लोग भी स्वास्थय की सीमा मे नहीं आते हैं !


चलिए , अब बात करते हैं अच्छी सेहत के formula की .....


जिस तरह एक तिपाई (स्टूल) तीन पैरों पर टिका होता है , उसी तरह आपकी health भी स्टूल की तरह इन तीन पैरों पर टिकी होती है , ये हैं -






1 आहार ,भोजन (Food

2 व्यायाम,कसरत (Exercise
3 आराम ( Rest, Comfort )


अच्छी सेहत के पेपर को हम 100 numbers का मान सकते हैं , जिसमे आहार ,व्यायाम और आराम इन तीनो sections को हम 30 -30 numbers का मान सकते हैं , बचे हुए 10 no. grace के (medicines etc .) लिए रख सकते हैं !


health के पेपर मे पास होने के लिए तीनो section मे अलग अलग पास होना जरूरी है तभी totally उसे पास माना जाएगा ! लेकिन दोस्तों होता ये है की भोजन के section मे तो हम 30 मे से 28 no. ले आते हैं , लेकिन व्यायाम और आराम के section मे 4 या 5 से ज्यादा no. नहीं ला पाते , इसीलिए in total हम health के पेपर मे अधिकतर फ़ैल ही हो जाते हैं , या supplementary लाते हैं , फिर वो जो 10 marks ग्रेस के हैं मतलब medicines, injections, doctor etc . उनकी सहायता से फिर हम health के passing marks ला पाते हैं !,है ना?


36 % से पास होने वाला और 90 -95 % से distinction लाने वाले मे जो अंतर होता है वही अंतर एक healthy और बीमार मे होता है ! और आप जानते हैं की जब numbers बहुत ही कम हों तो passing marks (doctors ,medicines ) भी उसे पास नहीं करा सकते , वो तो फिर फेल ही होता है finally !

चलिए अब इन तीनो के बारे मे भी थोड़ी सी चर्चा कर ली जाए ------


1. भोजन (Food )

 जिस तरह किसी कार का भोजन पेट्रोल होता है जो उसे चलने की energy देता है , उसी तरह हमारा खाना हमारी इस machine (बॉडी) को चलाने की energy देता है ! आप भी जानते हैं की पेट्रोल जितनी बढ़िया quality (speed वाला,) का होगा उतनी ही ज्यादा mileage देगा और engine भी उतना ही सही रहेगा .वहीँ घांसलेट मिला हलकी quality का पेट्रोल गाड़ी की mileage और life दोनों कम कर देगा ! उसी तरह बढ़िया ,healthy , nutritious food आपको healthy और fit रखेगा ! 

लेकिन यहाँ मै एक बात कहना चाहुंगा , की शुरू से ही खाना हम 2 कारणों से लेते हैं -----1 .शक्ति (energy ) के लिए और 2 . स्वाद (taste) के लिए ..


शक्ति और स्वाद की कुश्ती मे , अधिकतर जीतता स्वाद ही है , है ना ? और स्वाद ,अपने २ सेकंड के स्वाद के लिए हमे वो चीजें भी खिला देता है जो हमारे लिए कही से भी फायदेमंद नहीं हैं ! (pizza ,burger ,junk फ़ूड, spicy ,cold drink ,drink .............)


२.व्यायाम (exercise

 ये किसी भी रूप मे हो सकती है ,योग,एरोबिक्स,प्राणायाम, morning walk, jogging ,इत्यादि !

व्यायाम उस police की तरह है जो सारे शहर मे मुस्तेदी से गस्त करती है और कही भी चोर ,बदमाशो का अड्डा नहीं बनने देती ! उसी तरह exercise आपकी body को rhythm मे, tone मे रखती है , और मोटापा, B.P. आलस्य जैसी बिमारियों को शारीर से दूर रखती है !
जिस तरह इक शर्ट iron (प्रेस) करने के बाद ही चमकती है और सलवट से रहित सुंदर दिखती है , उसी तरह exercise आपकी body को fit रखती है रिंकल्स देर से पड़ते हैं और बॉडी ग्लो भी करती है !


3 . आराम (Rest )

यहाँ मै आराम की बात कर रहा हूँ आलस की नहीं ! दिन भर जीतोड़ मेहनत करने के बाद जो किया जाता है वो आराम है और सुबह उठने के बाद जो सज्जन बिना कुछ किये ही थक जाते हैं , वापस बिस्तर की शरण मे चले जाते हैं ,वो आलस है ना की आराम !

कोई भी मोटर या मशीन ज्यादा देर लगातार चलाने पर गरम होकर ख़राब हो सकती है इसीलिए बीच बीच मे उसे बंद कर के आराम देते हैं ,उसी तरह दिन भर ,लगातार शारीर और मन से थकने के बाद हमे भी हमारी मशीन को ठंडा ओर repair करने के लिए आराम की जरूरत होती है ! परमात्मा ने दिन काम के लिए और रात आराम के लिए बनाई है !

तो दोस्तों अगर हमे वाकई मे healthy रहना है तो हमे अपने health के तीनो पेरों को मजबूत रखना पड़ेगा !

आयुर्वेद मे 13 तरह की अग्नियाँ (fire ) बताई गई हैं ,जिनमे से एक है जठराग्नि !



जिगर की आग यानि पेट की अग्नि (जठराग्नि) की ,जो हमारे स्वस्थ रहने का एक मुख्य साधन है ! जब तक हमारी जठराग्नि सही है ,तब तक हमारा स्वास्थ्य भी अच्छा है,और जहाँ यह अनियमित हुई वहीँ पेट की बीमारियों को आमंत्रण शुरू हो जाता है !

आयुर्वेद मे 13 तरह की अग्नियाँ (fire) बताई गई हैं ,जिनमे से एक है जठराग्नि ! जठर=पेट (stomach) अग्नि =आग (fire)

जिस तरह रसोई मे खाना पकाने के लिए हमें गैस की जरुरत होती है , उसी तरह पेट मे गया हुआ खाना पचाने के लिए हमें जिस उर्जा की जरुरत होती है उसे ही जठराग्नि कहते हैं !

आपने देखा होगा कई व्यक्ति बहुत गरिष्ठ (भारी), heavy खाना खाकर भी उसे आराम से पचा लेते हैं,जबकि कई मूंग की खिचड़ी जैसा हल्का भोजन भी नहीं पचा पाते ! कभी हमें भूख बहुत अच्छी लगती है, तो कभी हमारा खाने की तरफ देखने का भी मन नहीं करता ,है ना?

दोस्तों इसके पीछे कई कारण काम करते हैं ,जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे!

जठराग्नि 4 तरह की होती है-

1 . समाग्नी- जब खाया हुआ अन्न अच्छे से पच जाए!

2 . विषमाग्नि-जब कभी तो खाना पच जाये,कभी नहीं पचे, digestion irregular हो !

3 . मन्दाग्नि -जब हमारी पेट की गैस का बर्नर बिलकुल sim पर हो और बहुत हल्का खाना भी नहीं पचे !

4 . तिक्ष्नाग्नी -बड़ी गैस भट्टी के बड़े बर्नर से निकलती तेज आंच जैसी अग्नि जो non veg . ,उरद का हलुवा जैसे heavy food को भी आसानी से पचा लेती है!

अब ये तो अग्नि की भिन्नता के आधार पर व्यक्तियों के 4 प्रकार हुए ! जिनमे समाग्नी ही स्वास्थ्य की परिचायक है! जरुरी नहीं की जिस व्यक्ति की जो अग्नि है ,वही जिंदगी भर उसके पेट मे बनी रहे !

जठराग्नि को प्रभावित करने वाले कारक factor -

1. काल (टाइम)  


आपने देखा होगा की December, January मे हमारे पेट की अग्नि अपनी पूर्णता पर होती है, हम जो भी खाते हैं आसानी से पच जाता है! हमे अच्छी भूख लगती है ,शरीर मे भी हल्कापन रहता है, इसीलिए गाजर का हलवा या उरद के लड्डू (मुहं मे पानी आ गया ना ) जैसी गरिष्ठ चीजे भी हम बड़ी आसानी से पचा जाते हैं !

वहीँ जून ,जुलाई मे जब गर्मी, बारिश, उमस (humidity) से हमारा शरीर आक्रांत रहता है, हमे भूख नहीं लगती है , २ रोटी भी पचाना मुश्किल होता है, है ना? ये काल का प्रभाव है !

2 . अनियमित खानपान (irregular diet)

दोस्तों कुदरत ने हमारे शरीर की प्रत्येक गतिविधि को बड़े ही practically एक समय की सारणी मे आबद्ध किया है ! इसे हम आम भाषा मे जैविक घडी biological clock कहते हैं !

ऐसा अधिकतर होता है की बिना अलार्म के ठीक 5 बजे हमारी नींद खुल जाती है, बिस्तर से उतरते ही हमे nature call (motion) आ जाता है, ठीक 11 बजे हमे भूख लग आती है ,रात मे ठीक 10 या 11 बजे हमे नींद आने लगती है, होता है ना? लेकिन ये उन खुशकिस्मत लोगो के साथ होता है जिनकी नियमित दिनचर्या होती है !


दोस्तों जठराग्नि मतलब वो पाचक रस जो खाने को पचाते हैं ! हमारा शरीर हमारी जैविक घडी के अनुसार एक निश्चित समय पर , एक निश्चित मात्रा मे पेट मे पाचक रस स्रावित करता है जो की उस अन्न को पचाने के लिए आवश्यक होता है ! और उस पाचक स्राव की मात्रा और secretion के टाइम का निर्धारण हर इंसान की जैविक घडी के अनुसार अलग अलग होता है!

मान लीजिये आप नियम से रोजाना सुबह 11 बजे और शाम 8 बजे खाना खाते हैं, तब आपका शरीर बिना नागा रोज fix time पर पेट मे पाचक रस का स्राव कर देता है और पेट मे आया अन्न सही तरीके से पच कर आपकी सेहत को बनाये रखता है !

दोस्तों समस्या तब होती है जब हमारा खाने का समय निश्चित नहीं होता कभी हम 9 बजे ही खा लेते हैं तो कभी काम की व्यस्तता मे दिन के २-३ बजे तक पेट मे खाना डालने की फुर्सत भी नहीं मिलती है ,ऐसे मे आपके शरीर का biological system , जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है वो disturb हो जाता है ! फिर ऐसा होने लगता है की जब आपका पेट पाचक रस (जठराग्नि) छोड़ता है, खाना पचाने के लिए तब पेट मे खाना नहीं होता 


और अपने काम से निबट कर अपनी सहूलियत से जब आप पेट मे खाना डालते हैं तब पाचक रस का स्राव नहीं होता ! 

क्योंकि शरीर की biological clock तो अपने ही नियम से चलेगी , ना की आपके मूड से, है ना ?

ये कुछ उसी तरह है की जब गैस की लो (आंच) तेज होती है तब उस पर पकाने के लिए कुछ नहीं होता ,बर्तन खाली होता है तो जाहिर है बर्तन ज्यादा गरम हो जाएगा या जल जाएगा (एसिडिटी की शुरुआत ) और जब आप गैस चूल्हे पर बर्तन मे बहुत सारी चीजें पकाने के लिए रखते हैं तो पता पड़ता है की गैस ही ख़तम हो गई है ! इसी दिनचर्या से फिर शुरुआत होने लगती है पेट की परेशानियों (भूख ना लगना ,constipation, acidity, gastritis जैसी बिमारियों की ).............

आहार-संबंधी कुछ महत्वपूर्ण बातों का रखें ध्यान !!!



आयुर्वेद की एक प्रचलित कहावत है- जैसा भोजन वैसा ही भेष। निरोगी शरीर, स्वस्थ तन, मन और हमारी लंबी उम्र, ये सब निर्भर करता है हमारे द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन पर। पर्याप्त भोजन और भोजन करने की सही विधि हमारी शारीरिक और मानसिक क्षमता में असीमित वृध्दि करता है। शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि सही भोजन से हम अपने शरीर को बीमार होने से बचा सकते हैं।



आयुर्वेद के अनुसार हमारे भोजन को पचाने वाली आग की जठराग्नि कहा जाता है। ये आग ही हमारे शरीर के अंदर भोजन को पचाने का कार्य करती है। इस आग का सटीक संतुलन ही भोजन के शरीर के रग-रग तक पहुंचाने में समर्थ होता है। चीनी चिकित्सा में यह माना जाता है कि पेट और प्लीहा एक दूसरे से बंधे होते हैं। हमारे पेट में क्वी नामक जीवनी शक्ति होती है। जिसकी अनुपस्थिति हमारे लिए घातक हो सकती है। अच्छी सेहत के लिए क्वी का बनना बहुत महत्वपूर्ण है जो कि स्वस्थ पेट से निकलती है। हमारे पेट को हमेशा नमी की आवश्यकता होती है और अगर इसकी नमी सूख जाए तो कर्ठ प्रकार की बीमारियां जैसे सांस-संबंधी समस्याएं, मुंह और मसूढ़े संबंधी समस्याएं पैदा होती है।

स्वस्थ सेहत के आयुर्वेदिक नुस्खे:-

अपनी जठराग्नि को उत्तेजित करने के लिए अदरक का प्रयोग जरूरी है। अदरक के एक टुकड़े को नींबू के रस में डुबोकर उस पर नमक डालकर खा लें। यह सामान्य सा प्रयोग लार ग्रंथियों की मदद से जठराग्नि को तेज करताहै। ये भोजन को पचाकर शरीर को कई तरह की ऊर्जा प्रदान करता है। जिनका प्रयोग हमारा शरीर कई प्रकार से करता है।

दोपहर के समय जठराग्नि अपने चरमोत्कर्ष पर होती है। इसलिए ये खाने को पचा पाने में पूरी तरह सक्षम होती है। दोपहर के समय में फेरबदल नहीं करना चाहिए। साथ ही इस बात की भी कोशिश करनी चाहिए कि सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद कुछ भी न खाएं।

सुबह का नाश्ता दिन में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए नाश्ता अच्छा और पौष्टिक होना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार सुबह के नाश्ते को न करना शरीर पर अत्याचार करने के जैसा है।

खाना तभी खाएं जब आपको भूख लगे। संभवत: इतनी भ देर न कर दें कि आप के शरीर को कष्ट होने लगे खासकर सुबह के समय में।

ठंडे पेय और आइसक्रीम रहित दुनिया-हमारी जठराग्नि ठंडे भोज्य पदार्थों जैसे ठंडे पेय पदार्थ और आइसक्रीम आदि के संपर्क में आकर मंदी हो जाती है। जिसके कारण भोजन सही ढंग से पच नहीं पाता और हमें पर्याप्त ऊर्जा नहीं मिलती। 

इसलिए हमें हमेशा पके हुए और गर्म भोजन को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसा भोजन आसानी से पचता है। खाना खाते समय हमें पानी नहीं पीना चाहिए। लेकिन अगर आवश्यक हो जाए तो हल्का गर्म पानी या फिर अदरक वाली चाय पीने चाहिए क्योंकि खाने के दौरान पानी या कोई अन्य द्रव्य लेने से पाचक रस पतला हो जाता है जिससे वह सही ढंग से पच नहीं पाता। खाने से एक घंटे पहले या एक घंटे के बाद पानी पीने का सही समय होता है।

भोजन का आदर करें:- 

आयुर्वेद के अनुसार भोजन करने से पहले हमें ध्यानमग्न होकर प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि भोजन स्वयं को समाप्त कर हमें संतुष्टि और शक्ति प्रदान करना है। इसलिए कम से कम हमें खाने के समय इसका आदर करना चाहिए।

भोजन करते समय पूरा ध्यान भोजन की तरफ ही होना चाहिए। इस समय टीवी देखना, पुस्तक आदि पढ़ना या कोई अन्य काम नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से हमारे पाचन की गति कम होती है और हमारे संवेदनशील पेट पर इसका गहरा असर पड़ता है। जितनी भूख हो खाना उतना ही खाना चाहिए। भूख से अधिक या भूख से कम खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकरक हो सकता है। इससे पाचक रस का ज्यादा बहाव हो जाने के कारण खाना नीचे की ओर सरकने लगता है जो कि पेट की मांसपेशियों और पाचन को नकारात्मक तौर पर प्रभावित करता है।


हमेशा खुले और शांत माहौल में ही भोजन ग्रहण करना चाहिए। खड़े होकर खाना नुकसानदायक हो सकता है।

खाना हमेशा चबा-चबाकर और धीरे-धीरे खाना चाहिए। जिससे खाना जल्दी पचता है। भोजन की प्रकृति को देखते हुए भोजन को तीन रूपों में बांटा गया है। सात्विक भोजन, राजसी भोजन और तामसी भोजन।

सात्विक भोजन : 

सात्विक भोजन हमारे चित्त को शांत और स्वभाव को स्नेहपूर्ण बनाते हैं। इससे हमारी मानसिकता सुधरती है। बादाम, शहद ताजे फल, दूध, आदि इसके अंतर्गत आते हैं।

राजसी भोजन: 

राजसी भोजन हमारी मानसिकता को ऐशोआराम पसंद और भड़काऊ बनाता है। विभिन्न प्रकार के पकवान, मिठाई, लस्सी, मसालेदार चीजें इसका अंग है।

तामसी भोजन : 

तामसी भोजन के अंतर्गत मांस-मंदिरा, प्याज, लहसुन आदि आता है जो हमारे आलस्य को बढ़ाता है। हमारे व्यवहार को खराब करता है ओर हमें बुरी चीजों की ओर आकर्षित करता है।

खाने की चीजों का तालमेल जरूरी- कई बार अपने स्वाद को और अधिक बढ़ाने के लिए हम कई सारी चीजों को एक साथ मिला देते हैं जिससे उनके गुण समाप्त हो जाते हैं। कुछ फल जैसे आम, पपीता, संतरा आदि को दूध में मिलाया जाता है जिसे आयुर्वेद में निषेध माना गया है। किसी भी दो फलों और सब्जियों को आपस में मिला देना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए एक बार में एक फल या एक ही सब्जी खाएं।
ताजा दही और गरम चावल, खट्टे फल और दूध, नमकयुक्त मसालेदार भोजन के तुरंत बाद दूध आदि नहीं लेना चाहिए।

वितरीत मौसम की फल व सब्जियां भी नुकसानदायक हो सकती है।

संपूर्ण भोजन- 

भोजन नीचे दिए गए क्रम में करना चाहिए !



संपूर्ण भोजन पुष्टिकर और स्वास्थ्यवर्ध्दक होता है। संपूर्ण भोजन का मतलब देखने में सुन्दर, अच्छी खुशबू वाला और छ: प्रकार के रसों से युक्त होना चाहिए। 

जैसे - खट्टा मीठा, नमकीन, मसालेदार, कसैला और सुगंधित। भोजन में इन सभी रसों की मात्रा एक निश्चित अनुपात में होनी चाहिए।

इसमें किसी भी रस का मौजूद न होना भोजन को असंपूर्ण बनाता है। ये सारे रस ज्यादातर फलों में पाए जाते हैं।

भोजन जरूरत से ज्यादा पका हुआ नहीं होना चाहिए। इससे कई बीमारियों का न्यौता मिलता है।

बासी भोजन नहीं खाना चाहिए। खाना पकने के तीन घंटे बाद बासी हो जाती है। इसलिए इसे पुन: गरम करने से बचना चाहिए।


खाना खाते वक्त पानी को नहीं भूलना चाहिए। हमारे शरीर में 70 भाग पानी है। ये हमारे शरीर से कइ्र विषैले पदार्थों को बाहर निकालता ळै। पानी को उबालकर ठंडा करके पीना चाहिए। पानी में हमें कई पोषक तत्त्वों को अलग से मिला सकते हैं। पानी हमारी त्वचा में नमी बनाए रखने में भी सहायक होती है।


पित्त-पथरी? बिना आपरेशन सफ़ल चिकित्सा: easy remedies for gallstones

गाल ब्लाडर में पथरी (gallstones)बनना एक भयंकर पीडादायक रोग है। इसे ही पित्त पथरी कहते हैं। पित्ताषय में दो तरह की पथरी बनती है।
प्रथम कोलेस्ट्रोल निर्मित पथरी।
दूसरी पिग्मेन्ट से बननेवाली पथरी।

ध्यान देने योग्य है कि लगभग८०% पथरी कोलेस्ट्रोल तत्व से ही बनती हैं।वैसे तो यह रोग किसी को भी और किसी भी आयु में हो सकता है लेकिन महिलाओं में इस रोग के होने की सम्भावना पुरुषों की तुलना में लगभग दूगनी हुआ करती है।पित्त लिवर में बनता है और इसका भंडारण गाल ब्लाडर में होता है।यह पित्त वसायुक्त भोजन को पचाने में मदद करता है। जब इस पित्त में कोलेस्ट्रोल और बिलरुबिन की मात्रा ज्यादा हो जाती है,तो पथरी निर्माण के लिये उपयुक्त स्थिति बन जाती है।पथरी रोग में मुख्य रूप से पेट के दायें हिस्से में तेज या साधारण दर्द होता है।भोजन के बाद पेट फ़ूलना,अजीर्ण होना,दर्द और उल्टी होना इस रोग के प्रमुख लक्छण हैं।

प्रेग्नेन्सी,मोटापा,मधुमेह,,अधिक बैठे रेहने की जीवन शैली, तेल घी अधिकता वाले भोजन,और शरीरमें खून की कमी से पित्त पथरी रोग होने की सम्भावना बढ जाती है।

दो या अधिक बच्चों की माताओं में भी इस रोग की प्रबलता देखी जाती है।

अब मैं कुछ आसान घरेलू नुस्खे प्रस्तुत कर रहा हूं जिनका उपयोग करने से इस भंयकर रोग से होने वाली पीडा में राहत मिल जाती है और निर्दिष्ट अवधि तक इलाज जारी रखने पर रोग से मुक्ति मिल जाती है।





 १) गाजर और ककडी का रस प्रत्येक १०० मिलिलिटर की मात्रा में मिलाकर दिन में दो बार पीयें। अत्यन्त लाभ दायक उपाय है।


२) नींबू का रस ५० मिलिलिटर की मात्रा में सुबह खाली पेट पीयें। यह उपाय एक सप्ताह तक जारी रखना उचित है।

३) सूरजमुखी या ओलिव आईल ३० मिलि खाली पेट पीयें।इसके तत्काल बाद में १२० मिलि अन्गूर का रस या निम्बू का रस पीयें। यह विधान कुछ हफ़्तों तक जारी रखने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं।


४) नाशपती का फ़ल खूब खाएं। इसमें पाये जाने वाले रसायनिक तत्व से पित्ताषय के रोग दूर होते हैं।

५) विटामिन सी याने एस्कोर्बिक एसिड के प्रयोग से शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत बनता है।यह कोलेस्ट्रोल को पित्त में बदल देता है। ३-४ गोली नित्य लें।



६) पित्त पथरी रोगी भोजन में प्रचुर मात्रा में हरी सब्जीयां और फ़ल शामिल करें। ये कोलेस्ट्रोल रहित पदार्थ है।

७) तली-गली,मसालेदार चीजों का परहेज जरुरी है।

८) शराब,चाय,काफ़ी एवं शकरयुक्त पेय हानिकारक है।

९) एक बार में ज्यादा भोजन न करें। ज्यादा भोजन से अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रोल निर्माण होगा जो हनिकारक है।

१०) आयुर्वेद में उल्लेखित कतिपय औषधियां इस रोग में लाभदायक साबित हो सकती हैं।कुटकी चूर्ण,त्रिकटु चूर्ण,आरोग्य वर्धनी वटी,फ़लत्रिकादि चूर्ण,जैतुन का तैल ,नींबू का रस आदि औषधियां व्यवहार में लाई जाती हैं।

हार्ट अटैक के बाद जीवन शैली और घरेलू उपचार.

हार्ट अटैक के बाद की जीवन शैली और घरेलू उपचार

एक बार हार्ट अटैक झेल चुके हृदय के मरीजों को अत्यन्त सावधानी के साथ अपनी जीवन शैली में ऐसे बदलाव अपनाने चाहिये जिससे दूसरी बार अटैक से बचे रहें। मैं ऐसे रोगियों के लिये परामर्ष के तौर पर कुछ लाभदायक बातें और निर्देश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। अपने चिकित्सक के परामर्श से अमल में लाकर लाभ उठावें।

१) हार्ट अटैक के बाद रोगी २-३ सप्ताह पूर्ण विश्राम करें।
२) विश्राम अवधि के बाद धीरे-धीरे चलने का अभ्यास करें। हां ,ज्यादा थकावट मेहसूस नहीं होनी चाहिय। शारीरिक सक्रियता लगातार बढाते जाएं। तकलीफ़ मालुम ना हो तो तेज चलने का उपक्रम भी करते रहें।
३) मन में निराशा,चिंता,टेंशन बिल्कुल न आने दें। प्रसन्न रहना हार्ट रोगियों के लिये टानिक का काम करता है। अटैक पडने के एक दो माह बाद तबीयत ठीक हो तो सेक्स करने मे भी कोइ अडचन नही है।
४) अपने ब्लड प्रेशर की नियमित जांच करवाते रहना चाहिये। खून में कोलेस्ट्रोल के लेविल की जांच भी नियमित अंतराल पर करवाते रहें।
५) हार्ट के मरीजों के भोजन में हरी सब्जीयां और फ़लों की अधिकता जरूरी है। अंकुरित किये हुए मैथी बीज सोयाबीन बीज मूंग,अलसी बीज खाने की आदत डालना आवश्यक है।
६) आंवला विटामिन सी का उत्तम स्रोत है। यह हृदय के लिये अमृत समान फ़ल है। नित्य १० मिलि. आंवला रस पीना लाभदायक है।
७) अदरक का हार्ट पर उत्तम प्रभाव देखा गया है। इससे कोलेस्त्रोल का लेविल घटता है। और अदरक के प्रभाव से खून में थक्का भी नहीं जमता है।
८) नींबू के नियमित सेवन से खून की नलियों मे कोलेस्ट्रोल नहीं जम पाता है। एक नींबू का रस मामूली गरम जल में रोजाना लेते रहें।
९) आयुर्वेदिक चिकित्सक हृदय रोगियों में अर्जुनारिषट का बहुतायत से प्रयोग करते हैं ।
इससे परिसंचरण तन्त्र मजबूत होता है। हार्ट की सुरक्छा के लिये यह औषधि प्रसिद्ध हो चुकी है।
१०) शहद १५ ग्राम एक नींबू के रस में मिलाकर लेने से हृदय की ताकत में इजाफ़ा होता है।
११) ताजा अनुसंधान में पता चला है कि लहसुन की ४ कली चाकू से बारीक काटकर १०० ग्राम दूध में उबालकर लेने से खून में थक्का नहीं जमता है और कोलेस्ट्रोल का लेविल भी कम हो जाता है।

हार्ट के मरीज ऊपर बताये गये उपाय अपनाकर अपने हृदय को सुरक्छित रखते हुए दूसरे हार्ट अटैक से बचे रहेंगे और उनका इम्युन सिस्टम भी शक्तिशाली बन जाएगा।

माईग्रेन(आधाशीशी) रोग का सरल उपचार

माईग्रेन (अर्धावभेदक)क्या है?

सिरदर्द एक आम रोग है और प्रत्येक व्यक्ति को कभी न कभी इसे मेहसूस करता ही है।इस रोग के विशेषग्य इसके कारण के मामले में एकमत न होकर अलग-अलग राय रखते हैं। सभी की राय है कि माईग्रेन के विषय में और अनुसंधान की आवश्यकता है। अभी तक माईग्रेन की तीव्रता का कोइ वैग्यानिक माप नहीं है।

माईग्रेन एक रक्त परिसंचरण(vascular) तंत्र की व्याधि है। मस्तिष्क की रुधिर वाहिकाओं का आकार बढ जाने से याने खून की नलिकाएं फ़ैल जाने से इस रोग का संबंध माना जाता है। इन रुधिर वाहिकाओं पर नाडियां(नर्व्ज) लिपटी हुई होती हैं। जब रक्त वाहिकाएं फ़ैलकर आकार में बढती हैं तो नाडियों पर तनाव बढता है और फ़लस्वरूप नाडियां एक प्रकार का केमिकल निकालती हैं जिससे दर्द और सूजन पैदा होते हैं,यही माईग्रेन है।


 

माईग्रेन अक्सर हमारे सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इस नाडीमंडल की अति सक्रियता से आंतों में व्यवधान होकर अतिसार,वमन भी शिरोवेदना के साथ होने लगते हैं। इससे आमाषय स्थित भोजन भी देरी से आंतों में पहुंचता है। माईग्रेन की मुख मार्ग से ली गई दवा भी भली प्रकार अंगीकृत नहीं हो पाती है। प्रकाश और ध्वनि के प्रति असहनशीलता पैदा हो जाती है। रक्त परिवहन धीमा पडने से चर्म पीला पड जाता है और हाथ एवं पैर ठंडे मेहसूस होते हैं।

माईग्रेन का सिरदर्द गर्मी,मानसिक तनाव,अपर्याप्त नींद से बढ जाता है। करीब ७० प्रतिशत माईग्रेन रोगियों का पारिवारिक इतिहास देखें तो उनके नजदीकी रिश्तेदारों में इस रोग की मौजूदगी मिलती है। पुरुषों की बनिस्बत औरतों में यह रोग ज्यादा होता है। इस रोग को आधाशीशी भी कहते हैं ।यह ज्यादातर सिर के बांये अथवा दाहिने भाग में होता है। कभी-कभी यह दर्द ललाट और आंखों पर स्थिर हो जाता है। सिर के पिछले भाग में गर्दन तक भी माईग्रेन का दर्द मेहसूस होता है। माईग्रेन का सिरदर्द ४ घंटे से लेकर ३-४ दिन की अवधि तक बना रह सकता है। बहुत से माईग्रेने रोगियों में सिर के दोनों तरफ़ दर्द पाया जाता है। माईग्रेन एक बार बांयीं तरफ़ होगा तो दूसरी बार दांये भाग में हो सकता है। माईग्रेन का दर्द सुबह उठते ही प्रारंभ हो जाता है और सूरज के चढने के साथ रोग भी बढता जाता है। दोपहर बद दर्द में कमी हो जाती है। ऐसा देखने में आया है कि ६० साल की उम्र के बाद यह रोग हमला नहीं करता है।

इस रोग के इलाज में माडर्न दवाएं ज्यादा सफ़ल नहीं हैं। साईड ईफ़ेक्ट ज्यादा होते हैं। निम्नलिखित उपाय निरापद और कारगर हैं--

१) बादाम १०-१२ नग प्रतिदिन खाएं। यह माईग्रेन का बढिया उपचार है।

२) बंद गोभी(पत्ता गोभी) को कुचलकर एक सूती कपडे में बिछाकर मस्तक (ललाट) पर बांधें। रात को सोते वक्त या दिन में भी सुविधानुसार कर सकते हैं। जब गोभी का पेस्ट सूखने लगे तो नया पेस्ट बनाककर पट्टी बांधें। मेरे अनुभव में यह माईग्रेन का सफ़ल उपाय हैं।



३) अंगूर का रस २०० मिलि सुबह -शाम पीयें। बेहद कारगर नुस्खा है।

४) नींबू के छिलके कूट कर पेस्ट बनालें। इसे ललाट पर बांधें । जरूर फ़ायदा होगा।



५) गाजर का रस और पालक का रस दोनों करीब ३०० मिलि पीयें ।आधाशीशी में गुणकारी है।



६) गरम जलेबी २०० ग्राम नित्य सुबह खाने से भी कुछ रोगियों को लाभ हुआ है।

७) आधा चम्मच सरसों के बीज का पावडर ३ चम्मच पानीमें घोलक्रर नाक में रखें । माईग्रेन का सिरदर्द कम हो जाता है।

७) सिर को कपडे से मजबूती से बांधें। इससे खोपडी में रक्त का प्रवाह कम होकर सिरदर्द से राहत मिल जाती है।




८) माईग्रेन रोगी देर से पचने वाला और मसालेदार भोजन न करें।
९) विटामिन बी काम्प्लेक्स का एक घटक नियासीन है। यह विटामिन आधाशीशी रोग में उपकारी है। १०० मिलि ग्राम की मात्रा में रोज लेते रहें।

१०) तनाव मुक्त जीवन शैली अपनाएं।



११) हरी सब्जियों और फ़लों को अपने भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।

फ़ल-चिकित्सा:फ़लों से करें रोग निवारण


यह तो सभी जानते हैं कि फ़ल और सब्जियां सबसे अच्छे भोज्य पदार्थ हैं।अत: भोजन में इनको ज्यादा से ज्यादा शामिल करना अच्छे स्वास्थ के लिये बेहद जरूरी है। यहां मैं उन लोगों के लिये जो विभिन्न प्रकार के रोगों से संघर्ष करते हुए जीवन जी रहे हैं ,रोगों के अनुसार फ़लों व सब्जियों से चिकित्सा का विधान प्रस्तुत कर रहा हूं। आप युर्वेदिक,ऐलोपैथिक,यूनानी जो भी ईलाज ले रहे हों ,फ़ल-सब्जी की चिकित्सा से आप अतिरिक्त लाभ उठा सकते हैं। फ़लों और सब्जियों में एन्टिओक्सीडेंट्स पाये जाते हैं। शरीर का इम्यून पाव्रर यानी रोगों से लडने की क्षमता बढती है।

उच्च रक्त
चाप:अंगूर,टमाटर,अखरोट,तरबूज,संतरा,सेवफ़ल,केला,नाशपती, पत्तागोभी,लहसुन ककडी,नींबू,

रक्ताल्पता,एनीमिया,खून की कमी:

टमाटर,संतरा,अंगूर,सेवफ़ल,स्ट्राबेरी,चुकंदर,गाजर,अंजीर,आलूबुखारा,दाख,पालक,शलजम,

उच्च कोलेस्टरोल(खराब वाला):

आम,अखरोट ,सेवफ़ल,जामुन,गाजर,प्याज,लहसुन,संतरा,

हृदय के रोग:

सेवफ़ल,अख्र्रोट,केला,पाएनेपल,तरबूज,नाशपती

लिवर के विकार:

पपीता,नीबू,अंगूर,गाजर,टमाटर,ककडी,चुकंदर

धमनियां कठोर हो जाना:

संतरा,टमाटर,सेवफ़ल,स्ट्राबेरी,अखरोट,केला

मधुमेह,डायबीटीज,शूगर:

टमाटर,तरबूज,नाशपती,अमरूद ,खट्टे फ़ल

छोटी आंत में पीडा,मरोड,दर्द:

अंगूर टमाटर ,सेवफ़ल,केला,अमरूद,पाईनेपल

खांसी:

अंगूर,सेवफ़ल,स्ट्राबेरी,नाशपती,पाईनेपल,गाजर,नींबू.प्याज,पालक,संतरा

अतिसार,दस्त लगना:

सेवफ़ल

बदहजमी:

पपीता,सेवफ़ल,अंगूर,गाजर,चुकंदर,नीबू,संतरा,पाईनेपल, पालक

बवासीर:

सेवफ़ल,केला ,अंगूर,संतरा,पपीता,पाईनेपल,गाजर,पालक,शलजम

संधिवात:

अंगूर,सेवफ़ल,गाजर,नींबू,नाशपाती,ककडी,पाईनेपल,टमाटर,लाल मिर्च,संतरा,चुकंदर,पालक

गठिया:अनानास(पाईनेपल),ककडी,चुकंदर,पालक,टमाटर

दांत की तकलीफ़:
अंगूर,स्ट्राबेरी

चर्म रोग:

सेवफ़ल,टमाटर,पपीता,अखरोट,स्ट्राबेरी

फ़्लू बुखार:

नींबू,पाईनेपल,लोकाट,स्ट्राबेरी

गर्भवती को उल्टी होना:

नाशपती कमर दर्द: तरबूज,नाशपती

पीठ दर्द:
तरबूज,नाशपती

मोटापा:

नीबू,संतरा,अंगूर,पाईनेपल,पपीता,चुकंदर,गोभी,टमाटर। सेवफ़ल सप्ताह में एक बार आधा किलो जूस पीयें।

वातव्याधि:

विटामिन" सी" और एंटी ओक्सेडेंट परिपूर्ण फ़लों का सेवन करं।

हार्ट अटेक,स्ट्रोक:

रसभरी फ़ल(रास्पबेरी) जितना भी पचा सकें ,खाएं। इससे धमनी का रक्त दाब घटता है और कोलेस्टरोल की मात्रा भी संतुलित होती हैं।

मुख पाक,मुख के संक्रमण:

सतरा,नाशपती,अमरूद

किडनी फ़ेल्योर रोगी:

जो रोगी डायलिसिस पर चल रहे हों उन्हें ककडी का जूस कई महीने देते रहने से डायलिसिस की जरूरत नहीं रहेगी। किडनी एक्टीवेट करने वाला फ़ल है।सेवफ़ल,संतरा,नीबू,गाजर,चुकंदर का रस भी उपयोगी हैं।

बुढापा रोकने वाले फ़ल:

सेवफ़ल,पत्तागोभी,ब्रोकली,जामुन,आंवला,लहसुन,अंगूर,,मूली,पालक,टमाटर

दमा,अस्थमा:

गाजर,संतरा,नाशपाती,लाल मिर्च

सर्दी,जुकाम:
लहसुन,गाजर,पत्तागोभी,नीबू,प्याज,संतरा,स्त्राबेरी,पाईनेपल

कब्ज:

गाजर,पत्तागोभी,,अंजीर,अंगूर,संतरा,पपीता,आलूबुखारा,कद्दू,चुकंदर,सेवफ़ल,शलजम

चेहरे पर कील,मुहासे:
आम,गाजर,अंगूर,संतरा,तरबूज,प्याज,कद्दू,पालक,स्ट्राबेरी

ब्लाडर,मूत्राषय समस्याएं:

नीबू,ककडी,गाजर,सेवफ़ल,

नींद की कमी,निद्राल्पता:

नीबू,गाजर,अंगूर,सेवफ़ल

पीलिया:
नीबू,गाजर,नाशपाती,अंगूर,पालक,चुकंदर,ककडी,पपीता

नाडी मंडल का दर्द,न्यूराईटीज:

पाईनेपल,सेवफ़ल,गाजर,चुकंदर,संतरा

मासिक धर्म के विकार:
आलू बुखारा,शलजम,,चुकंदर,पालक,अंगूर

एक्जीमा:
गाजर,लाल अंगूर,पालक,ककडी,चुकंदर
सिर दर्द:
नीबू,गाजर,अंगूर,पालक

मिर्गी रोग,एपिलेप्सी:
पालक,अंजीर,गाजर,लाल अंगूर

किडनी विकार:
सेवफ़ल,नीबू,संतरा,ककडी,गाजर,चुक्कंदर

पेट के अल्सर:
अंगूर,गोभी,गाजर

गले के विकार:
नीबू,संतरा,पाईनेपल,गाजर,मूली,पालक,आलूबुखारा,टमाटर,प्याज

हार्ट अटैक :सामान्य जानकारी






हृदय हमारे शरीर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है।संपूर्ण शरीर मे रक्त परिसंचरण हृदय की मांसपेशी के जरिये ही होता है।कोरोनरी धमनी के माध्यम से दिल की मांसपेशियों को रक्त की आपूर्ति होती रहती है और इसी प्रक्रिया से दिल की पेशियां जीवंत रकर कार्यक्षम बनी रहती है।जब इन रक्त वाहिकाओं में खून का थक्का जमने से रक्त परिभ्रमण रूक जाता है तो हार्ट अटैक का दौरा पड जाता है। हृदय की जिन मांस पेशियों को रक्त की आपूर्ति नहीं होती हैं वे मरने लगती हैं। हार्ट अटैक पडने के बाद के १-२ घंटे रोगी के जीवन को बचाने की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण होते हैं।बिना देर किये फ़ौरन मरीज को किसी बडे अस्पताल में पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिये। प्राथमिक चिकित्सा के तौर पर रोगी की जिबान के नीचे सोर्बिट्रेट और एस्प्रिन की गोली रखना चाहिये। समय पर ईलाज मिलने से रक्त का थक्का घुल जाता है और प्रभावित मांसपेशी फ़िर से काम करने लगती है।


हार्ट अटैक के प्रमुख लक्षण--




रोगी को छाती के मध्य भाग में दवाब,बैचेनी,भयंकर दर्द,भारीपन और जकडन मेहसूस होती है। यह हालत कुछ समय रहकर समाप्त हो जाती है लेकिन कुछ समय बाद ये लक्षण फ़िर उपस्थित हो सकते हैं।

अगर यह स्थिति आधा घंटे तक बनी रहती है और सोर्बिट्रेट गोली के इस्तेमाल से भी राहत नहीं मिलती है तो यह हृदयाघात का पक्का प्रमाण माना चाहिये। छाती के अलावा शरीर के अन्य भागों में भी बेचैनी मेहसूस होती है।भुजाओं ,कंधों,गर्दन,कमर और जबडे में भी दर्द और भारीपन मेहसूस होता है।

छाती में दर्द होने से पहिले रोगी को सांस में कठिनाई और घुटन के लक्षण हो सकते हैं। अचानक जोरदार पसीना होना,उल्टी होना और चक्कर आने के लक्षण भी देखने को मिलते हैं। कभी-कभी बिना दर्द हुए दम घुटने जैसा मेहसूस होता है।

जैसा कि ऊपर बताया गया है हार्ट अटैक के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को एस्प्रिन की गोली देना चाहिये। घुलन शील एस्प्रिन(डिस्प्रिन) मिल जाए तो आधी गोली पानी में घोलकर पिलानी चाहिये। सोर्बिट्रेट गोली तुरंत जिबान के नीचे रखना चाहिये। एस्प्रिन में रक्त को पतला करने का गुण होता है। रक्त पतला होकर थक्का घुलने लगता है और प्रभावित मांस पेशी को खून मिलने से वह पुन: काम करने लगती है।

इसके बाद हार्ट अटैक रोगी को तुरंत किसी बडे अस्पताल में जहां ईसीजी और रक्त की जांच के साधन हो, पहुंचाने की व्यवस्था करें। साधन विहीन अस्पताल में समय नष्ट करने से रोगी अक्सर मौत के मुंह में चले जाते हैं।रोगी को एक या ज्यादा से ज्यादा डेढ घंटे में बडे अस्पताल में पहुंचाना बेहद जरूरी है। याद रखें, आधे से ज्यादा हृदयाघात के मरीज अस्पताल पहुंचने से पहिले ही मर जाते हैं।